सौर ऊर्जा से आवश्यकताओं की पूर्ति

Submitted by Hindi on Sun, 05/15/2016 - 15:15
Source
योजना, 26 जनवरी, 1993

सौर ऊर्जा का हमारे जीवन में अत्यधिक महत्त्व है, विशेषकर इस तथ्य को देखते हुए कि तेल, कोयला तथा ऊर्जा के अन्य परम्परागत साधन पर्यावरण सम्बंधी, समस्याएँ पैदा करते हैं। भविष्य में ऊर्जा के उन्हीं साधनों का व्यापक इस्तेमाल होगा जिन साधनों से कम-से-कम प्रदूषण होता है, अतः सुरक्षा की दृष्टि से उससे कम-से-कम खतरे हैं और जो सब जगह उपलब्ध हैं। लेखक का मानना है कि सौर ऊर्जा तैयार करने पर शुरू में ऊँची लागत आने के बावजूद हमारी बढ़ती हुई ऊर्जा सम्बंधी आवश्यकताओं की समस्या का एकमात्र समाधान सौर ऊर्जा ही प्रतीत होती है।

ऊर्जा हमारे समाज के अस्तित्व एवं विकास के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्व बन चुका है और ऊर्जा की पर्याप्त आपूर्ति न होने पर मानव आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो सकती। ऊर्जा तथा समृद्धि में कितना अधिक सम्बंध है, इसकी झलक विकसित देशों व विकासशील देशों के जीवन स्तर को देखने से मिल जाती है। विकसित देशों में ऊर्जा की प्रति व्यक्ति खपत 5 - 11 किलोवाट है, जबकि विकासशील देशों में यह केवल 1 से 1.5 किलोवाट के बीच है। ऊर्जा की खपत का विश्वस्तरीय औसत 2 किलोवाट है। यह ऊर्जा बिजली, ताप, प्रकाश, यांत्रिक ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा आदि के रूप में इस्तेमाल की जाती है।

आजकल ऊर्जा सम्बंधी आवश्यकताएँ मुख्यतया तेल, कोयला, गैस, ईंधन लकड़ी आदि के अलावा बहते हुए पानी, गोबर, खेती की घास-फूस आदि से प्राप्त ऊर्जा से पूरी की जाती है। जीवाश्म ईंधन हजारों सालों तक पृथ्वी के नीचे दबे पेड़-पौधों के जीवाश्मों के रूप में होते हैं। इसलिए उनका भण्डार असीमित नहीं है। शेल कम्पनी द्वारा हाल में कराए गए विश्वव्यापी सर्वेक्षण से पता चलता है कि आज भी खपत के आधार पर तेल निकाला जाता रहा तो तेल के भण्डार केवल 42 वर्ष तक, गैस के भण्डार 62 वर्ष तक तथा कोयले के भण्डार लगभग 180 वर्ष तक चलेंगे। समय बीतने के साथ-साथ दुनिया की आबादी में और वृद्धि होगी इससे लोगों की ऊर्जा की मांग भी बढ़ेगी। इस प्रकार शेल कम्पनी के ये निष्कर्ष तब तक असंगत हो जाएँगे। हो सकता है भविष्य में भूमिगत ऊर्जा के कुछ और भण्डारों का भी पता चल जाए। किन्तु ऐसे स्थान बहुत दूर होने के कारण उन्हें खोज पाना इतना आसान नहीं है। ईंधन लकड़ी की स्थिति अभी से भयावह रूप ले चुकी है और देश में कुल क्षेत्रफल में वन क्षेत्र केवल 17 से 19 प्रतिशत रह गया है, जबकि आदर्श स्थिति के अनुसार यह प्रतिशत 33 से कम नहीं होना चाहिए। जनसंख्या वृद्धि के कारण वनों पर दबाव अभी और बढ़ेगा।

विविध समस्याएँ


कोयला, तेल, गैस, ईंधन लकड़ी, गोबर आदि पदार्थों के जलन से बहुत सी प्रदूषणकारी सामग्री निकलती है, जिनमें बेकार जाने वाला ताप, राख, भस्म, कार्बन के ऑक्साइड, गन्धक, नाइट्रोजन तथा अन्य हानिकारक तत्व वायुमंडल में फैलते हैं। अनुमान है कि अकेला ऊर्जा उद्योग ही विश्व भर में हर वर्ष 20 अरब टन कार्बन डाइ-ऑक्साइड तथा अन्य दूषित तत्व छोड़ता है। इस कार्बन डाइ-ऑक्साइड से ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा होता है। जो वायुमंडल में तापमान में वृद्धि का एक प्रमुख कारण है। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फरडाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन आदि गैसें मौजूद होने के कारण ही कुछ देशों में तेजाबी बारिश होती है।

अणुओं के विखण्डन तथा द्रवण से ऊर्जा तैयार करने की प्रक्रिया को भविष्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा उत्पादन प्रक्रिया माना जाता है। किन्तु रेडियो धर्मी विखण्डन उत्पादों का समुचित ढंग से संचालन आज भी विश्व भर में समस्या बना हुआ है और इसमें दुर्घटनाओं आदि की भी आशंका बनी रहती है।

इस प्रकार ऐसी तीन मुख्य समस्याएँ हैं, जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है और मानव मात्र के अस्तित्व से जिनका सीधा सम्बंध है। ये हैंः 1. बढ़ती हुई जनसंख्या के लिये अधिक ऊर्जा की व्यवस्था करना 2. पर्यावरण प्रदूषण को कम करना और 3. परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल में सुरक्षा सम्बंधी खतरों को घटाना। सम्भवतः मनुष्य को फिलहाल तो ऊर्जा के सभी उपलब्ध साधनों का उपयोग करना होगा। भविष्य में उन्हीं साधनों का व्यापक इस्तेमाल होने की अधिक सम्भावनाएँ हैं, जिनसे न्यूनतम प्रदूषण हो, सुरक्षा के कम-से-कम खतरे हों और जो विश्व भर में उपलब्ध हो। इसलिये यही समय है जब ऊर्जा के इस तरह के स्रोतों का विकास किया जाए तथा उन्हें लोगों को उपलब्ध कराया जाए। इसमें और समय गँवाना उचित नहीं होगा। ऊर्जा की हमारी बढ़ती हुई आवश्यकताएँ केवल सौर ऊर्जा से ही पूरी हो सकती है।

सौर ऊर्जा


सूर्य पृथ्वी पर जीवन का स्रोत होने के साथ-साथ मनुष्य को उपलब्ध सभी प्रकार की ऊर्जाओं (भूतापीय तथा परमाणु ऊर्जा को छोड़कर) का भी स्रोत है। सूर्य एक विशाल परमाणु ‘रिएक्टर है, जिसमें हाइड्रोजन लगातार उच्च तापमान तथा दबाव पर जल रही है और ऊर्जा उत्पन्न कर रही है। सूर्य द्वारा अंतरिक्ष में प्रेषित ऊर्जा का लघु अंश भी पृथ्वी पर विकिरित ऊर्जा के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह ऊर्जा तीन मुख्य क्षेत्रों में प्राप्त होती है ये हैं: 1. पराबैगनी (अल्ट्रावायलेट), 2. प्रकाश तथा 3. अवरक्त (इन्फ्रारेड) अथवा ताप विकिरण। इनमें ऊर्जा की मात्रा क्रमशः 2 प्रतिशत, 51 प्रतिशत तथा 47 प्रतिशत होती है। ऊर्जा की मात्रा की दृष्टि से पराबैंगनी रूप का कोई महत्त्व नहीं, क्योंकि अधिकांश ऊर्जा दो क्षेत्रों में होती है।

पृथ्वी ग्रह के ऊपर अनेक गैसों, जलकणों, विलग सामग्री आदि के मिश्रण की एक चादर सी तनी हुई है। किन्तु यह चादर एक निश्चित ऊँचाई तक ही विद्यमान है और उसके बाद शून्य है। सौर आतपाघात वायुमंडल के ऊपर है तथा सूर्य के सामने पड़ने वाले समतल स्थान पर वह 1.35 किलोवाट प्रति वर्ग मीटर से पड़ता है। इसे सौर स्थिरांक कहा जाता है। पृथ्वी की ओर जाने वाली सौर ऊर्जा का कुछ भाग वायुमंडल द्वारा सोख लिया जाता है या अंतरिक्ष में वापस परावर्तित हो जाता है। इसलिये पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध सौर आतपाघात कम हो जाता है और इसकी अधिकतम मात्रा 1 से 1.1 कि.वा./एम2 के बीच होती है। यह मात्रा भी पूरा दिन एक समान नहीं रहती। क्योंकि पृथ्वी अपनी धुरी पर 23.05 अंश झुकी हुई है, अतः उपलब्ध सौर ऊर्जा की मात्रा वर्ष में मौसमों तथा दिन के समय के हिसाब से घटती बढ़ती रहती है। आकाश की स्थितियों पर भी यह निर्भर करती है।

इन अनिश्चित स्थितियों के बावजूद हमारे देश के धरातल पर उपलब्ध सौर ऊर्जा की वार्षिक मात्रा लगभग 515 किलोवाट घंटा/ वर्ष है, जो बहुत अधिक है। यद्यपि पृथ्वी पर वनस्पति, जानवर, मनुष्य आदि का जीवन सौर विकिरण उपलब्ध होने के कारण है, किन्तु सौर ऊर्जा का हमारे रोज-मर्रा के कार्यों में भी विभिन्न प्रकार से उपयोग हो सकता है। सौर ऊर्जा के उपयोग की सबसे महत्त्वपूर्ण विधि है सौर ऊर्जा को ताप ऊर्जा में परिवर्तित करना तथा सौर विकिरित ऊर्जा को फोटो वोल्टैक परिवर्तन के माध्यम से सीधे विद्युत ऊर्जा में बदलना। सौर ऊर्जा को उपयोगी ऊर्जा में परिवर्तित करने की चर्चा करते हुए यह बात ध्यान रखने की है कि अधिकतर विधियों में 2 ओह्म वेवलेंग्थ तक ऊर्जा इस्तेमाल की जाती है। इस प्रकार इन अधिकतम तकनीकों में सौर वर्णक्रम का केवल दृश्यमान भाग ही इस्तेमाल होता है। सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने की फोटोबोल्टैक विधि में उपयोग का वर्णक्रम दायरा और भी कम हो जाता है और यह केवल लगभग 0.8 से 2 ओह्म है। सौर वर्णक्रम के शेष भाग में उपलब्ध ऊर्जा या तो इस्तेमाल नहीं होती या ताप के रूप में बेकार चली जाती है। इसका कारण यह है कि फोटोवोल्टैक परिवर्तन प्रक्रियाओं में इलक्ट्रॉनों को वेलेंस बैंड से कंडक्शन बैंड की ओर फोटोन की सहायता से उत्तेजित किया जाता है। उत्तेजन की ये प्रक्रियाएँ निश्चित ऊर्जा से ही होती है।

फोटोथर्मल परिवर्तन


सौर विकिरित ऊर्जा को सोलर कलेक्टरों की सहायता से ताप ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। सोलर कलेक्टर वास्तव में लाम्बा, अल्यूमीनियम, इस्पात आदि उच्च ताप संचालक सामग्री से बनाया गया उपकरण होता है जो ऊर्जा का अवशोषण करता है। इन धातुओं पर काले पेंट, क्रोमियम, ताम्बा आदि के ऑक्साइड जैसे काले रंग के पदार्थों की परत चढ़ाई जाती है। काली परत की इस सामग्री में सौर वर्ण क्रम के दृश्यमान क्षेत्र में अवशोषण क्षमता अवरक्त क्षेत्र में उच्च तापमान पर कम उत्सर्जन की क्षमता, उच्च स्तर की स्थितरता, उत्पादन की कम लागत आदि विशेषताएँ होनी चाहिए। इससे कितना तापमान प्राप्त हो सकता है, यह इन रिसीवरों की दृष्टितापीय विशेषताओं के साथ-साथ इस बात पर भी निर्भर है कि उन पर कितनी सघनता से सौर विकिरण पड़ रहा है। ये संग्राहक परवलयत्र (पैराबोलिक) द्रोणिक, परवलयत्र रकाबी, हीलियोस्टेट, फ्रेस्नेल लेंस जैसे आकारों के संघटकों अथवा समतल सतह के रूप में होते हैं। हाट प्लेट सौर संग्राहक के अन्य उपकरणों में अवशोषक सतह से ताप को व्यर्थ जाने से बचाने के लिये परत की सामग्री सोखने वाले हिस्सों और आप-पास की हवा से सम्पर्क को रोकने के लिये अति पारदर्शी चमकीले पदार्थ वाला अग्र भाग, पानी, तेल वायु तथा गर्म किए जा सकने वाले किसी अन्य द्रव जैसी ताप स्थानांतरण सामग्री अवशोषक को चारों ओर से ढकने के लिये बाहरी बक्सा तथा सामने के चमकदार पदार्थ को सहारा देने का उपकरण तथा परत चढ़ाने की सामग्री शामिल है। संग्राहकों में सौर रिसीवर के अलावा सहारा देने के समुचित प्रबंध वाले तथा ट्रैकिंग विधि से युक्त परावर्तन दर्पण भी लगे होते हैं।

सोलर कुकर


विकिरित ऊर्जा से पैदा हुआ ताप भोजन पकाने में भी इस्तेमाल हो सकता है। देश में दो प्रकार के सोलर कुकर विकसित किए गए हैं और उपयोग किए जा रहे हैं। पहला सामान्य बक्से के आकार का कुकर है और दूसरे में संघटकों का उपयोग किया जाता है। बक्से के आकार वाले कुकर में चपातियाँ पकाने तथा तलने का काम नहीं हो सकता। भोजन पकाने के समय इसे खुली धूप में रखना पड़ता है। किन्तु दूसरे प्रकार के कुकर में परावर्तित ऊर्जा को रसोई घर तक ले जाया जा सकता है और घर आदि के अन्दर ही खाना पकाना सम्भव है। बक्से के आकार वाले कुकर लोकप्रिय हो रहे हैं और उनके उपयोग में बराबर-बराबर वृद्धि हो रही है।

सौर ऊर्जा से पानी गर्म करना


सौर ऊर्जा का एक महत्त्वपूर्ण उपयोग पानी गर्म करने के लिये हो सकता है। देश में घरों, उद्योगों तथा व्यापारिक प्रतिष्ठानों में सोलर वाटर हीटर बड़े पैमाने पर काम में लाये जा रहे हैं। 60 डिग्री सेल्सियस से 80 डिग्री सेलिसयस तक के तापमान वाली 100 लीटर से 2,40,00 लीटर प्रति दिन तक पानी गर्म करने की क्षमता वाली प्रणालियाँ लगाई जा चुकी है। सौर ऊर्जा से पानी गर्म करने की टेक्नोलॉजी से परम्परागत ऊर्जा की तो बचत होती ही है, साथ ही पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है, क्योंकि कोयला, तेल आदि के जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फरडाइऑक्साइड, नाइट्रोजन जैसे प्रदूषणकारी तत्व वातावरण में पहुँचते हैं। सौर विधि से ऊर्जा भी कम खर्च होती है तथा इसके रख-रखाव पर लागत कम आती है। तथा ऊर्जा के अन्य कार्यों में इस्तेमाल और सरकारी सब्सिडी के बिना प्रणाली लगाने के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रारम्भिक लागत 5-7 साल में निकल आती है।

सौर ऊर्जा से वायु गर्म करना


अनाज, फलों सब्जियों, मछली, रसायनों आदि को सुखाने, सर्दियों में इमारतों को गर्म रखने, लकड़ियों को मजबूत बनाने तथा इसी तरह के अन्य कई कामों में गर्म हवा इस्तेमाल की जाती है। इन कार्यों के लिये अब देश में सोलर एयर हीटर बनाए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया में परम्परागत ईंधन/ऊर्जा की बचत के अलावा सुखाए जाने वाले उत्पादों की गुणवक्त्ता में भी सुधार होता है क्योंकि सुखाए जाने के दौरान वे आस-पास की गंदी हवा से बचे रहते हैं, जिससे वे सड़ते नहीं हैं।

सौर ऊर्जा से खारापन दूर करना


तापीय वाष्पीकरण तथा संघटन की प्रक्रिया से अशुद्ध खारे पानी को स्वच्छ किया जा सकता है। अस्वच्छ जल को सौर ऊर्जा से स्वच्छ बनाने की विधि को सोलर हीटर कहा जाता है। सोलर स्टिल के अनेक डिजाइन विकसित किए गए हैं। इनमें एक सोलर स्टिल साधारण बेसिन के आकार का है, जिसमें एक या दो स्लोप होते हैं। इसके अलावा मल्टी स्टेज स्टिल तथा अचानक वाष्पीकरण प्रक्रिया वाले स्टिल तैयार किए गए हैं। यद्यपि इन प्रणालियों से साफ किया गया पानी बहुत शुद्ध होता है, किन्तु इसे चिकित्सा सम्बंधी कार्यों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनमें अधिकतर प्रणालियों में तापमान 100 डिग्री सैल्सियस से कम रहता है। एक स्लोप वाले स्टिल से साफ आकाश वाले दिन कलेक्टर क्षेत्र के प्रति वर्ग मीटर में हर रोज 4 लीटर स्वच्छ पानी प्राप्त किया जा सकता है। यह पानी एकदम पीने लायक नहीं होता और इसमें कुछ लवण मिश्रित करने पड़ते हैं। कॉलेजों व विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं में तथा बैटरियों आदि में यह पानी इस्तेमाल किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में चिकित्सा सम्बन्धी कार्यों को छोड़कर स्वच्छ किया गया यह पानी सभी कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

सौर प्रशीतन


व्यापक अर्थों में प्रशीतन या रेफीजरेशन का अर्थ है बाहरी उपायों से तापमान कम करना। इस प्रक्रिया में स्थान को ठण्डा करना या कोल्ड स्टोरेज भी शामिल है। अवशोषण तथा अधिशोषण के सिद्धान्तों के आधार पर सौर ऊर्जा का इस्तेमाल प्रशीतन के लिये भी किया जा सकता है। इसके लिये सामग्री के अनेक संयोजन काम में लाए जा सकते हैं। उनमें आक्वा-अमोनिया, लिव्र वाटर एक्टीवेटिड कार्बन एथनोल आदि शामिल हैं। अमोनिया, पानी, एथनोल आदि कार्यकारी द्रवों को उनके मिश्रणों से वाष्पीकृत करने के लिये सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। इन द्रवों का संघटन करने के बाद प्रशीतन के लिये उनका इस्तेमाल किया जाता है। यह लिब्र-वाटर प्रणाली स्थान को ठण्डा करने के लिये उपयोगी है क्योंकि इस मामले में कार्यकारी द्रव पानी होता है। इसलिये इसे लगभग 4 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर ठण्डा नहीं किया जा सकता। अन्य तरल पदार्थों का इस्तेमाल शून्य डिग्री से कम तापमान पैदा करने के लिये भी किया जाता है। सौर प्रशीतन विधि देश के दूर-दराज के उन ग्रामीण क्षेत्रों में इस्तेमाल की जा सकती है, जहाँ बिजली उपलब्ध नहीं और इस प्रकार गाँवों के लोगों के सामाजिक स्तर को बेहतर बनाया जा सकता है।

बिजली उत्पादन


सौर ऊर्जा की कुछ अंतर्निहित सीमाएं हैं। कोयला, गैस, तेल आदि की तुलना में सौर ऊर्जा का घनत्व कम है। इसका घनत्व सतत नहीं है। सुबह से शाम तक यह बदलता रहता है। और सबसे अधिक घनत्व दोपहर बाद 1 से 2 बजे तक रहता है। अनेक ठण्डे देशों में सब्जियों, फल, फूल आदि उगाने तथा मुर्गियों या पक्षियों को पालने में ग्रीन हाउस टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की जा रही है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में यह टेक्नोलॉजी बहुत उपयोगी पाई गई है।

तापीय माध्यम से कई सौ मेगावाट तक बिजली पैदा की जा सकती है। इस उद्देश्य के लिये स्टीम साइकिल, ऑर्गेनिक रैंकिन साइकिल अथवा स्टिलिंग साइकिल विधि काम में लाई जा सकती है। भारत सहित विभिन्न देशों में अनुसंधान एवं विकास सुविधा के रूप में अनेक सौर ताप बिजली घर बनाए गए हैं। ये बिजली घर भाप टर्बाइन से जुड़े परवलयज नलिका संघटकों, स्टिर्लिग इंजन, भाप इंजन से जुड़े रकाबी संघटकों, भाप टर्बाइन से जुड़े सोलर टावर, ऑर्गेनिक रैकिन साइकिल से जुड़े सोलर पांड तथा ऑर्गेनिक रैकिन साइकिल से जुड़े समलत प्लेट संग्राहकों के आधार पर बनाए जा सकते हैं। भाप टर्बाइन से जुड़े परवलयज नलिका संग्राहक व्यापारिक दृष्टि से उपयोगी सिद्ध हुए हैं। 14 मेगावाट, 30 मेगावाट, 80 तथा 350 मेगावाट तक की क्षमता वाले सौर बिजली घर अमरीका के कैलीफोर्निया में पिछले कई वर्षों से चल रहे हैं। बाकी विधियाँ अभी प्रायोगिक स्तर पर हैं। सोलर टावर सिद्धान्त 100 मेगावाट तथा उससे अधिक क्षमता के लिये उपयोगी है, जबकि स्टर्लिंग इंजिन पर आधारित प्रणालियाँ किलोवाट क्षमता वाले बिजली घरों में विकेन्द्रित उपयोग के लिये अधिक कारगर हो सकती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अमरीका में मैसर्स लुज इंटरनेशनल कम्पनी ने 80 मेगावाट क्षमता का सौर ताप बिजली घर सात महीनों में तैयार कर दिखाया। यहाँ भारत में 2 वर्ष से कम समय में इसे बनाया जा सकता है। इतनी क्षमता के कोयला आधारित बिजली घर के निर्माण में 4-5 साल लग सकते हैं।

वातानुकूलन


सौर ऊर्जा का इस्तेमाल पैसिव तथा एक्टिव अवधारणाओं और लाइटिंग अवधारणा का उपयोग करते हुए घरों और व्यापारिक व औद्योगिक इमारतों को आरामदेह बनाने में भी किया जा सकता है। भवनों के डिजाइन तैयार करते हुए इन अवधारणों को शामिल कर लेने से परम्परागत ऊर्जा की खपत की बचत होने के साथ-साथ उन स्थानों पर पर्यावरण प्रदूषण की आशंका भी समाप्त हो जाती है, जहाँ जाड़े के दिनों में कमरे गर्म करने के लिये कोयला आदि जलाया जाता है। वास्तव में भारत में प्राचीन इमारतों के निर्माण में आस-पास के पर्यावरण, हवा की आवाजाही, छत की ऊँचाई तथा इमारत की दिशा का निर्धारण सूर्य की गति को ध्यान में रखते हुए किया गया है। किन्तु आजकल नई इमारतें बनाते हुए हमने पुराने डिजाइनों को छोड़ दिया है और इस प्रकार ऐसी इमारतें बन रही है, जिनमें ऊर्जा की बहुत अधिक जरूरत पड़ती है।

पानी निकालना


पीने तथा सिंचाई के लिये जमीन से पानी निकालने के काम में भी सौर तापीय ऊर्जा उपयोग की जा सकती है। 50 मीटर तक की गहराई से पानी निकालने के पम्प देश में विकसित किए जा चुके हैं। दस से बीस मीटर की गहराई से पानी निकालने वाले साधारण पम्पों का डिजाइन तैयार करने का भी प्रस्ताव है।

ग्रीन हाउस टेक्नोलॉजी


अनेक ठण्डे देशों में सब्जियों, फल, फूल आदि उगाने तथा मुर्गियों या पक्षियों को पालने में ग्रीन हाउस टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की जा रही है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में यह टेक्नोलॉजी बहुत उपयोगी पाई गई है। देश के शुष्क तथा अर्ध शुष्क इलाकों में भी ग्रीन हाउस बनाए जा सकते हैं।

ईंधन का उत्पादन


सौर ऊर्जा से एथनोल, हाइड्रोजन जैसे ईंधनों का उत्पादन करने के बारे में भी परीक्षण किया जा रहा हैं आने वाले वर्षों में हाइड्रोजन का ईंधन के रूप में काफी इस्तेमाल होने वाला है जो पानी को उच्च तापमान पर विभाजित करके प्राप्त की जा सकती है। सौर ऊर्जा से कार्बनडाई ऑक्साइड को ज्वलनशील गैसों में विभाजित किया जा सकता है और इस प्रकार ज्वलनशील गैसें प्राप्त करने के अलावा प्रदूषण कम किया जा सकता है। संघटित सौर ऊर्जा की मदद से बायोमास तथा कोयले से गैसें तैयार करने और अन्य ऐसे कम प्रदूषणकारी ईंधन तैयार करने के बारे में परीक्षण चल रहे हैं।

सौर ऊर्जा चिकित्सा के क्षेत्र में भी कई तरह से काम में लाई जा सकती है। सौर वर्णक्रम में विद्यमान सात रंगों से अनेक रोगों का इलाज होता है।

फोटोवोल्टैक परिवर्तन


विद्युतीय संचालन की दृष्टि से पदार्थों के मोटे तौर पर तीन वर्ग बनाए जाते हैं। ये हैः उच्च संचालक, अर्ध संचालक तथा उच्च अवरोधी अथवा गैर-संचालक पदार्थों की एक चौथी श्रेणी की खोज की गई है, जो तरल हीलियम तापमान के निकट उच्च संचालक बन जाते हैं। इन पदार्थों को अति उच्च संचालक अर्थात सुपरकंडक्टर कहा जाता है।

सुपरकंडक्टर पदार्थों के वर्ग में कुछ पदार्थ भी हैं, जो दृश्यमान प्रकाश में लाए जाने पर संचालक बन जाते हैं। ऐसे पदार्थ फोटोकंडक्टर कहलाते हैं। इस वर्ग में कुछ पदार्थों में दृश्यमान प्रकाश में लाए जाने पर दो सतहों के बीच अंतर पैदा हो जाता है। इन्हें फोटोवोल्टैक पदार्थ कहा जाता है। फाटोवोल्टैक सामग्री में सिलिकान, जर्मेनियम, जैलियम आर्सेनाइड, कैडमियम, सल्फेट, इंडियन एंटीमोनाइड आदि शामिल हैं। इन पदार्थों की फोटो कंडक्टिंग विशेषताएँ वैलेंस बैंड और कंडक्शन बैंड के बीच के ऊर्जा अंतर से जुड़ी हुई है। क्योंकि प्रत्येक पदार्थ का यह बैंड निश्चित होता है इसलिये बैंड अंतर के बराबर की ऊर्जा का सौर विकिरण ही वैलेंस बैंड से कंडक्शन बैंड तक इलेक्ट्रॉनों को उत्तेजित करने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। मुख्य फोटोवोल्टाइक सामग्री में कुछ प्रकार के पदार्थ अल्प मात्रा में शामिल करने से ऊर्जा में थोड़ी सी वृद्धि करना संभव है। किन्तु मिश्रित किए जाने वाले इन पदार्थों की उत्तेजन ऊर्जा का भी पूर्व निर्धारण करना होगा और उत्तेजन का प्रमात्रा स्वरूप सदैव इसी के अनुरूप रहेगा। बैंड अंतर से कम ऊर्जा से युक्त और विकिरण व्यर्थ चला जाता है, जबकि उच्च ऊर्जा विकिरणों के मामले में आवश्यकता से अधिक ऊर्जा पदार्थ में ही ताप ऊर्जा के रूप में बेकार चली जाती है। उत्तेजन के इस प्रमात्रा स्वरूप के कारण सौर विकिरित ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने की समग्र कार्य क्षमता बहुत अधिक नहीं है। भारत में इस समय उपलब्ध सोलर सेलों की क्षमता केवल 12-13 प्रतिशत है।

फोटोवोल्टैक सामग्री में सिलिकॉन सबसे अधिक प्रचुरता में उपलब्ध है। इसे रेत से तैयार किया जा सकता है। सौर ऊर्जा जेनरेटर अथवा सोलर सेल तैयार करने में एकदम शुद्ध सामग्री इस्तेमाल की जानी चाहिए। शुद्धता के अलावा श्रेष्ठ सोलर सेल एक स्फाटकीय सिलिकान से प्राप्त किए जा सकते हैं। स्फाटकीय स्वरूप वाले उच्च शुद्धता के सिलिकान तैयार करना कोई आसान काम नहीं है। यह प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म है तथा इसमें प्रचुर ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। किन्तु इसकी तकनीकें व्यापारिक आधार पर उपलब्ध हैं और भारत सहित बहुत कम देशों में इनका उत्पादन हो रहा है।

सिलिकान के एक स्फाटक वाले सोलर सेलों के अलावा अब स्फाटक रहित सामग्री बहुस्फाटकीय सामग्री, पतली फिल्मों, बहुसतही सामग्री आदि के सोलर सेल भी बनाए जा सकते हैं स्फाटक रहित तथा बहुस्फाटकीय सामग्री के सोलर सेल एक स्फाटक पर आधारित सोलर सेलों के मुकाबले सस्ते पड़ते हैं। किन्तु इनकी कार्यक्षमता कम होती है। इन्हें सरल विधियों से ही बनाया जा सकता है और इनमें कम सामग्री इस्तेमाल होती है।

आवश्यक मात्रा में ऊर्जा प्राप्त करने के लिये बड़ी संख्या में गोलाकार अथवा अन्य आकारों के सोलर सेलों को समानांतर मेल से जोड़ दिया जाता है। एक गोलाकार सोलर सेल का व्यास लगभग 10 सेंटीमीटर होता है। सौर विकिरण के सामने लाए जाने पर ये सेल सीधा करेंट देते हैं, जिसे ए.सी. पावर का इस्तेमाल करनेवाले इन्वर्टरों में बदला जा सकता है। इस प्रकार फोटोवोल्टाइक सोलर सेलों की सहायता से तैयार की गई बिजली डी.सी तथा ए.सी. दोनों तरह के उपकरण चलाने के लिये इस्तेमाल की जा सकती है।

बिजली की आवश्यकता के अनुसार बड़ी संख्या में सोलर सेल अथवा सोलर पैनल समानांतर मेल के हिसाब से जोड़े जाते हैं। इस प्रकार सोलर सेलों व सोलर पैनलों से सैकड़ों वाट तक मात्रा में ए.सी. और डी.सी. बिजली पैदा की जा सकती है। यह बिजली विमान, अंतरिक्ष यान तथा उपग्रह समेत किसी भी विद्युतकीय उपकरण में काम में लाई जा सकती है। उपग्रहों को बिजली उपलब्ध कराने के लिये भी सोलर सेल-उपयोग किए जा रहे हैं।

निष्कर्ष


ऊर्जा का इतना अधिक महत्त्व है कि इसकी समुचित तथा समयानुकूल सप्लाई के बिना कोई भी समाज प्रगति नहीं कर सकता। ईंधन लकड़ी समेत जीवाश्म ईंधन के भण्डार बड़ी तेजी से समाप्त हो रहे हैं और इनके जलाने से प्रदूषण भी फैलता है। किन्तु प्रकृति ने हमें सूर्य के रूप में ऊर्जा का अनंत स्रोत प्रदान किया है। वास्तव में परमाणु ऊर्जा तथा भूतापीय ऊर्जा को छोड़कर ऊर्जा के सभी स्रोत अपनी ऊर्जा सूर्य से ही प्राप्त करते हैं। इसलिये जीवाश्म ईंधनों को सौर ऊर्जा का डिब्बा बंद रूप माना जाता है। ऊपर बताई गई बातों से स्पष्ट होता हैं कि विभिन्न रूपों ऊर्जा सूर्य से ग्रहण की जा सकती है। किन्तु जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने और अंततः उनका उपयोग पूरी तरह से रोकने से पहले अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में बहुत प्रयास करने की आवश्यकता है यदि समय पर निर्णय तथा कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य निश्चय ही अंधकारमय होगा। हम सौर ऊर्जा के दोहन की आवश्यकता के सम्बंध में बहुत कुछ कहते रहे हैं। अब बहुत कम समय रह गया है और निर्णय लेने वालों को यह फैसला करना होगा कि सौर ऊर्जा पर आधारित टेक्नोलॉजी के समुचित विकास के लिये सुविचारित नीतिगत दिशा निर्देशों की जरूरत है या नहीं। इसमें शुरू में काफी पूँजी लगानी पड़ेगी। विकेन्द्रीकृत उपयोगों के लिये यह टेक्नोलॉजी बहुत उपयुक्त है। किन्तु इस टेक्नोलॉजी के व्यापक इस्तेमाल करने के लिये हमें अपनी मानसिकता एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना होगा। सोलर वाटर हीटर या सौर प्रकाश व्यवस्था जैसी छोटी वस्तु की तुलना कोयले पर आधारित 500 मेगावाट के बिजली घर से नहीं की जा सकती किन्तु आज यही हो रहा है। हमें इस मानसिकता से मुक्ति पानी होगी हमें सब तरह के पूर्वाग्रहों को छोड़कर अपना दिमाग खुला रखना होगा तभी समग्र राष्ट्र ऊर्जा के विशाल स्रोत सूर्य से लाभ उठा सकता है।

सौर ऊर्जा की कुछ अंतर्निहित सीमाएं हैं। कोयला, गैस, तेल आदि की तुलना में सौर ऊर्जा का घनत्व कम है। इसका घनत्व सतत नहीं है। सुबह से शाम तक यह बदलता रहता है। और सबसे अधिक घनत्व दोपहर बाद 1 से 2 बजे तक रहता है। यह साल भर में मौसम के हिसाब से भी घटता-बढ़ता है और आकाश की स्थिति का भी इस पर प्रभाव पड़ता है। क्योंकि सौर ऊर्जा का घनत्व कम है इसलिये सौर उपकरणों के लिये स्थान की आवश्यकता व्यापारिक रूप से उपयोग में लाई जा रही ऊर्जा पर आधारित उपकरणों की तुलना में अधिक प्रतीत होती है किन्तु सौर ऊर्जा से कुछ निश्चित आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये आवश्यक कुल स्थान की तुलना जीवाश्म ईंधन पर आधारित टेक्नोलॉजी से की जाए तो उत्पाद के समूचे जीवन काल के दौरान कोई खास अंतर नहीं है, क्योंकि जीवाश्म ईंधन पर आधारित टेक्नोलॉजी ईंधन के लिये विभिन्न स्थानों का लगातार उपयोग होता है, जैसे कि कोयले की खुदाई और परिवहन आदि के लिये स्थान का इस्तेमाल किया जाता है। यदि कोयले के खनन तथा परिवहन आदि के लिये आवश्यक स्थान का हिसाब लगाया जाए तो सौर तापीय विधि से और कोयले से बिजली उत्पादन के लिये लगभग समान क्षेत्र की जरूरत टेक्नोलॉजी में भू-क्षेत्र की आवश्यकता का प्रश्न उठाना उचित नहीं है।

प्रकृति मानव के प्रति कभी क्रूर नहीं रही है। सच तो यह है कि वह मनुष्य को अपनी विभिन्न जरूरतें पूरी करने के लिये कई तरह की सामग्री और साधन उपलब्ध करा रही है।

सौर ऊर्जा भी इसी श्रेणी में आती है। किन्तु हमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध सौर ऊर्जा का लाभ उठाने के लिये कड़ी मेहनत करनी होगी तथा प्रकृति के गुप्त तथ्यों का पता लगाना होगा।

सौर ऊर्जा टेक्नोलॉजी के विकास तथा उनके उपयोग के सम्बंध में पिछले 20 वर्षों से गहन अध्ययन चल रहा है। इस दौरान अति महत्त्वपूर्ण तथ्य तथा अनुभव एकत्र कर लिये गए हैं। इसके फलस्वरूप सौर ऊर्जा के उपयोग के कुछ क्षेत्रों में तकनीकी पक्ष की बजाय आर्थिक पक्ष पर बल दिया जाने लगा है किन्तु सौर ऊर्जा टेक्नोलॉजी अभी प्रारम्भिक अवस्था में हैं और उन्हें परिपक्व बनने में अभी समय लगेगा। यह लक्ष्य सौर ऊर्जा के उपयोग के विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान एवं विकास की गतिविधियाँ बढ़ाकर ही प्राप्त किया जा सकता है। सैद्धांतिक रूप से इससे मनुष्य की सभी आवश्यकताओं के लिये ऊर्जा मिल सकती है। टेक्नोलॉजी को और अधिक विकसित कर उपयोग करने की आवश्यकता है।

विश्व ऊर्जा परिषद की पाँचवी कांग्रेस में 1990 से 2020 तक के लिये ऊर्जा के बार-बार इस्तेमाल हो सकने वाले स्रोत मूल्य एवं बाधाओं पर गठित कार्यदल ने कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख किया है जो इस प्रकार हैं।

1. बार-बार इस्तेमाल हो सकने वाले ऊर्जा स्रोतों (जिनमें सौर ऊर्जा भी शामिल है) की स्थापना की लागत स्थान पर निर्भर करती है क्योंकि स्रोतों को पर्याप्त रूप से स्थानीय बनाया जा सकता है। इसलिये यह सामान्य अनुमान लगाना कठिन है कि बार-बार इस्तेमाल हो सकने वाले कौन से स्रोत की आर्थिक दृष्टि से परम्परागत स्रोतों से तुलना की जा सकती है।

2. बार-बार इस्तेमाल हो सकने वाले ऊर्जा स्रोत अनिवार्यतः स्वदेशी होते हैं, अतः उसमें विदेशी भुगतान की समस्या नहीं होती तथा पर्यावरण सम्बंधी मसलों और जीवाश्म ईंधन के परिवहन की कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है।

3. अल्पकालिक स्तर पर नियोजन तथा आर्थिक निर्णय प्रक्रिया इस दिशा में बहुत बड़ी बाधा है। लोकतांत्रिक देशों में अनेक निर्वाचित नेता अगले चुनावों से जुड़े लक्ष्यों पर ध्यान देते हैं, जिससे सरकार के नीति निर्देशों में व्यापक परिवर्तन होते रहते हैं। विकासशील देशों में सरकारों के भीतर ऊर्जा, कृषि, वन तथा ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में क्षेत्रीय योजनाओं में प्रभावकारी समन्वय की बहुत आवश्यकता है।

4. इन स्रोतों में आर्थिक गतिविधियों का प्रसार व्यापक क्षेत्र तक करके आर्थिक विकास में दीर्घकालिक योगदान करने की क्षमता है, जिससे स्थानीय लोगों के बड़े शहरों में पलायन की उस प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है, जिसका क्षेत्र विशेष तथा अनेक सामाजिक समस्याओं से जुड़ी परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

5. बार-बार इस्तेमाल हो सकने वाले ऊर्जा स्रोतों की क्षमताओं का पूरा लाभ तभी उठाया जा सकता है, जब हम इन लाभों का मूल्यांकन विश्वस्तरीय परिप्रेक्ष्य में करने को तैयार हों।

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