पर्यावरण से विश्वासघात क्यों

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योजना, 15 जून, 1993

बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिये रचनात्मक दिशा प्रदान करनी होगी जिससे न तो पर्यावरण प्रदूषित हो और न ही आर्थिक सामाजिक विकास ही। हमें औद्योगीकरण के विकास को जारी रखते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पर्यावरण प्रदूषण कम से कम हो, अधिकाधिक छायायुक्त, फलयुक्त व इमारती लकड़ी वाले वृक्षों की रोपाई पर विशेष जोर देना चाहिए। वनों की अंधाधुंध कटाई पर सरकार को सख्ती बरतनी चाहिए, भूमि को बंजर होने से बचाने, पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने तथा वन रोपन हेतु सिंचाई की व्यवस्था में सुधार के लिये सघन वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए और योजना आयोग, पर्यावरण और वन विभाग, गैर परम्परागत ऊर्जा विभाग, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभागों के बीच ऐसा समन्वय हो कि ये तीनों विभाग पर्यावरण की सुरक्षा के लिये कृतसंकल्प हों।

पर्यावरण प्रदूषण की समस्या विकसित देशों की ही नहीं अपितु विकासशील एवं अविकसित देशों में भी व्याप्त हैं। वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को स्पष्ट कर दिया है कि प्रदूषण किसी भी तरह का हो मानव जाति के लिये हानिकारक है- लेकिन मनुष्य स्वयं इसके लिये जिम्मेदार है। पर्यावरण की कीमत पर होने वाला विकास जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काटने वाले कालिदास जैसी हालत में ले जाएगा। विकसित देशों की थाली को सजाने के लिये बाकी दुनिया के देश अपना सब कुछ लुटा रहे हैं- अपने लोग, अपनी भूमि, वन, जल, पशु-पक्षी इत्यादि भी। लगता है कि पर्यावरण की चिन्ता काफी कम लोगों को है पर्यावरण लगातार बिगड़ रहा है- लेकिन उसे थामने की चिन्ता बढ़ती क्यों नहीं है? यदि समय रहते प्रदूषण की समस्या का निदान नहीं किया जाता है तो इसके दुष्परिणामों को भुगतने के लिये हमें तैयार रहना चाहिए। प्रायः औद्योगिक देशों में प्रदूषण की समस्या औद्योगिक क्षेत्रों (शहरों) तक ही सीमित है, जबकि भारत में यह समस्या गाँवों में भी मौजूद है। भारत में जल और वायु-प्रदूषण की समस्या दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण किये जा रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद औद्योगीकरण, शहरीकरण, तकनीकी विकास तथा विविधिकरण ने जल-प्रदूषण की समस्या को अत्यधिक गम्भीर बना दिया है। पर्यावरण प्रदूषण से सम्बंधित अक्सर तीन जवाब सामने आते हैंः

पहला जवाब यह है कि पर्यावरण की चिन्ता को ‘तीसरी’ दुनिया के देशों में विकास के खिलाफ ‘विकसित’ देशों की साजिश मानता है। उन्हें लगता है कि जब विकासशील देश सम्पन्न देशों के समान विकास कर लेंगे, तभी पर्यावरण कोई मुद्दा बन सकेगा।

दूसरा जवाब यह है कि हरियाली और वन्य जीव संरक्षण की बातें निरी बकवास हैं, यह गरीबों की समस्याओं से ध्यान हटाने की कोशिश है और पर्यावरण की बढ़ती आबादी की बेहतरी से कोई सम्बंध नहीं है।

तीसरा जवाब, लगातार बढ़ रही इस आबादी को ही पर्यावरण की खस्ता हालत के लिये जिम्मेदार ठहराया है।

उपरोक्त तीनों जवाब यह स्पष्ट करते हैं कि लोगों में पर्यावरण संतुलन और दूसरी प्रक्रियाओं की समझ कितनी कम है। उन तीनों जवाबों का तर्क निम्नलिखित हैः-

पहला तर्क यह है कि पर्यावरण की चिन्ता करना उन अमीर देशों का काम है, जिनके पास अपनी आबादी की हिफाजत के लिये पर्याप्त पैसा है। बिगड़ते पर्यावरण से प्रलय की कल्पना, सीमित विकास, आबादी का तेजी से बढ़ना और प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण जैसी बातों में गरीबी, भूख और बीमारी से जूझ रहे आदमी को कोई दिलचस्पी नहीं है। यह भी कहा जाता है कि पर्यावरण की चिन्ता से विकासशील देशों में विकास की गति रुक जायेगी- कहा यह भी जाता है कि पर्यावरण और विकास एक-दूसरे से जुड़े हैं।

दूसरा तर्क मानता है कि प्रदूषण से गरीबों का कोई सरोकार नहीं है। इसका जवाब यह दिया जाता है कि गरीबी पर्यावरण की कुछ ऐसी समस्याओं को जन्म देती है, जिनसे गरीबी और बढ़ती है। उदाहरणार्थ गरीब किसानों द्वारा कमजोर जमीन पर खेती करने से उसका क्षरण और भी बढ़ता है, आखिरकार इससे किसान की ही निर्धनता बढ़ती है। दूसरा उदाहरण है गरीबों के द्वारा जंगल की लकड़ी शहर ले जाकर बेचना। इससे जंगल तो नष्ट हो ही रहे हैं, जलाऊ लकड़ी की कमी हो रही है- अन्ततः इससे भी गरीबों की ही गरीबी बढ़ रही है।

तीसरा तर्क यह है कि जनसंख्या वृद्धि से पर्यावरण बिगड़ने की बात काफी पुरानी हो चुकी है। बहुत साल से ही वन पदाधिकारी जंगल नष्ट करने के लिये आस-पास के ग्रामीणों को जिम्मेवार ठहराते आये हैं। और म्यूनिसपल अधिकारी तथा राजनेता शहरों में गंदगी और बीमारियों के लिये झोंपड़पट्टी वालों को। लेकिन मूल समस्या यह नहीं है कि पर्यावरण को गरीब ही नष्ट किये जा रहे हैं। समस्या तो यही है कि संसाधनों के बँटवारे में गरीबों को उनके हिस्से से अलग-थलग कर दिया गया है।

औद्योगीकरण ने विश्व के प्रायः सभी स्थानों पर पर्यावरण की समस्या उत्पन्न कर दी है। इसके माध्यम से विश्व की 37 प्रतिशत ऊर्जा की खपत होती है और 50 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड 90 प्रतिशत सल्फर आॅक्साइड एवं विविध प्रकार के विषैले रसायन का उत्सर्जन होता है। जिससे ओजोन की सतह को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। उद्योग ने जल-संसाधन का भी दुरुपयोग किया है- जिसका दृष्परिणाम सर्वत्र देखा जा सकता है।

वर्तमान समय में विकास का एक मात्र मापदंड माना जानेवाला औद्योगिक विकास-प्रदूषण का प्रमुख स्रोत बन गया है। मोटे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि वर्तमान विकास प्रणाली में प्राकृतिक संसाधनों के विनाश की यह प्रक्रिया लगातार जारी रही तो आने वाले समय में हमारी अर्थव्यवस्था का आधार ही नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगा। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि वर्तमान में पर्यावरण प्रदूषित करने वालों को उसकी लागत नहीं वहन करनी पड़ती है- प्रभावित वर्ग दूसरा ही होता है। बाजार व्यवस्था उन लोगों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ रही है। जो कि पर्यावरण ह्रास तथा प्रदूषण से प्रभावित होते हैं। पिछले वर्षों में पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिये अनेक राष्ट्रों ने कानून बनाए हैं- परन्तु सामान्य जनता के लिये इनके अंतर्गत संरक्षण प्राप्त करना लगभग असम्भव होता है।

परिणाम


आज पर्यावरण प्रदूषण संपूर्ण विश्व में इस प्रकार अपने पैर फैला चुका है कि यदि तत्काल इस प्रक्रिया को पलटा न गया तो दुनिया के अधिकांश लोगों को 21वीं सदी में सांस तक लेना कठिन हो जाएगा। भारत में भोपाल गैस दुर्घटना और उक्रेन ने चेरनोबल परमाणु दुर्घटना इस भयावहता के ताजा उदाहरण हैं। मैक्सिकों शहर में प्रदूषण इतना अधिक बढ़ गया है कि वहाँ के निवासियों को अब शुद्ध वायु प्राप्त करने के लिये पैसे का भुगतान करना पड़ता है। मैक्सिकों शहर में अधिकतर स्थानों पर ऐसी दुकानें खुल रही हैं जो वहाँ के निवासियों को दो अमरीकी डाॅलर अर्थात 55 रु. में एक मिनट सांस लेने के लिये शुद्ध आॅक्सीजन प्रदान करती हैं। वहाँ शुद्ध वायु की आवश्यकता तब से महसूस की जाने लगी जब से किसी अन्य बीमारी की अपेक्षा सांस सम्बंधी बीमारियों के संक्रमण से अधिक मृत्यु होने लगी व मैक्सिकों शहर की पहचान सर्वाधिक प्रदूषित या गंदी वायु वाले शहर के रूप में बन गई है। उसके दुष्परिणाम का एक अन्य उदाहरण यह है कि यूनान की राजधानी एथेन्स में प्रदूषण का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया कि एक दिन 20 स्कूली बच्चे बेहोश हो गए तथा हजारों लोगों को सांस और दिल में तकलीफ के कारण अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा था।

कारक


1. पर्यावरण प्रदूषित होने का एक प्रमुख कारण भारत में हो रहे संसाधनों की कमी है, कारण कि जनसंख्या वृद्धि होने के साथ-साथ जमीन, खनिजों, कृषि उत्पादों, ऊर्जा तथा आवास की प्रति व्यक्ति उपलब्धता कम होती जा रही है।
2. तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण से पर्यावरण सर्वाधिक प्रदूषित हुआ है। उससे पेड़-पौधों के साथ-साथ जीव-जन्तु भी मरने लगे हैं।
3. आज पर्यावरण प्रदूषण का खतरा रासायनिक पदार्थों, जहरीले धुएँ आदि से उतना अधिक नहीं है जितना पृथ्वी के वायुमंडल के तापमान के बढ़ने से उत्पन्न हुआ है।
4. जंगलों का अंधा-धुंध काटा जाना तथा जनसंख्या में वृद्धि से पर्यावरण में असंतुलन पैदा हुआ है।
5. जन्तु चक्र को भी पर्यावरण प्रदूषण ने काफी हद तक प्रभावित किया है। समय पर वर्षा का न होना, भयंकर बाढ़, भूकम्प, महामारी एवं सूखा पड़ना आदि विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं का कारण पर्यावरण का प्रदूषण ही है। इससे तरह-तरह की बीमारियाँ फैलती हैं, कृषि की उपज कम हुई है- जो ऋतुचक्र की अनियमितता की वजह से हुआ है।
6. पर्यावरण प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों का अंधाधुंध उपयोग है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो परिस्थितियाँ तेजी से प्रतिकूल दिशा में बढ़ती हुई-हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी।

पर्यावरण प्रदूषण के बढ़ते उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त वायुमंडल में गैसों का बढ़ना, घटते संसाधनों पर दबाव, ऊर्जा की खपत, तटवर्ती क्षरण के खतरे जैसे कई अन्य कारण और भी हैं जिनके प्रभाव से पर्यावरण प्रदूषित होता है। पर्यावरण प्रदूषण की ऐसी सैकड़ों मिसालें दी जा सकती हैं। प्राणवायु इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि अब यह प्राणों को हरने वाली बन गई है।

समस्या


यह सर्वविदित है कि राष्ट्र का विकास उसके औद्योगिकरण पर निर्भर करता है- जो मनुष्य के उच्च रहन-सहन के लिये आवश्यक है परन्तु इस चतुर्मुखी औद्योगीकरण के फलस्वरूप पर्यावरण प्रदूषण सर्वाधिक बढ़ा है, जिसके कारण मानव जाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। सच कहा जाय, तो पर्यावरण प्रदूषण के लिये सबसे ज्यादा जिम्मेवार विकसित राष्ट्र ही हैं। भारत में भी पर्यावरण का खतरा औद्योगीकरण व अन्य कारणों से उत्पन्न हो गया है- जो अपने साथ अभिशाप के रूप में भयानक प्रदूषण लाया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पिछले वर्ष आयोजित ‘पृथ्वी सम्मेलन’ अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास की दिशा में निश्चित रूप से एक सराहनीय व प्रशंसनीय कदम है। यह अपनी तरह का पहला और सबसे बड़ा अन्तरराष्ट्रीय प्रयास था। इसका महत्त्व इस रूप में और अधिक बढ़ जाता है कि इसमें 178 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया- जिसमें 100 से अधिक राष्ट्राध्यक्ष व शासनध्यक्ष मौजूद थे। विश्वभर से आये पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने में मूल्यवान सहयोग प्रदान किया। कई मुद्दों पर विभिन्न राष्ट्रों-खासकर विकासशील व विकसित देशों के बीच मतभेद भी उभरकर सामने आए, किन्तु उन्हें सहयोग समन्वय का रवैया अपनाते हुए कई संधियों व घोषणाओं को अंतिम रूप प्रदान किया गया। इस महा-सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव श्री बुतरस घाली ने यह स्पष्ट किया कि सब देशों को मिल-बैठकर पृथ्वी की रक्षा के उपाय ढूंढने चाहिए। साथ ही, पर्यावरण के संरक्षण पर होने वाले खर्च में विकसित या औद्योगिक (अमीर) राष्ट्रों की हिस्सेदारी अधिक होनी चाहिए।

पर्यावरण प्रकृति की महान देन है इसलिए हमें अपने अस्तित्व के लिये इसे क्षति, प्रदूषण तथा शोषण में अवश्य बचाना होगा। कारण कि अगर हम प्रकृति को नष्ट करेंगे। तो एक प्रकार से हम स्वयं को ही नष्ट कर डालेंगे। पर्यावरण संरक्षण समाज के हर व्यक्ति का सामाजिक दायित्व है व्यक्ति स्तर से पर्यावरण का संरक्षण जरूरी है क्योंकि व्यक्ति ही समाज की इकाई है।

पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिये आज विश्व चिन्तित है। पर्यावरण वैज्ञानिकों को इस बात का पूरा-पूरा ख्याल रखना होता है कि पर्यावरण को शुद्ध व सुरक्षित बनाये रखने के लिये यह सामान्य जनता में जागृति या चेतना किस प्रकार जगायें। पर्यावरणविद, शिक्षा शास्त्री परामर्शदाता अथवा वैज्ञानिक, पर्यावरण का संतुलन न बिगड़ने देने के लिये सदैव सचेष्ट रहते हैं ताकि पर्यावरण प्रदूषण का खतरा प्राणिमात्र विशेषकर मनुष्यों को अपना ग्रास न बनाने पाये। इसके लिये वे विविध शैक्षणिक माध्यमों जैसे शिक्षण, प्रशिक्षण, प्रचार, शोध व प्रयोगशालाओं में बैठकर विविध प्रयोगों को अंजाम देते रहते हैं।

सुझाव


बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिये रचनात्मक दिशा प्रदान करनी होगी जिससे न तो पर्यावरण प्रदूषित हो और न ही आर्थिक सामाजिक विकास ही। हमें औद्योगीकरण के विकास को जारी रखते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पर्यावरण प्रदूषण कम से कम हो, अधिकाधिक छायायुक्त, फलयुक्त व इमारती लकड़ी वाले वृक्षों की रोपाई पर विशेष जोर देना चाहिए। वनों की अंधाधुंध कटाई पर सरकार को सख्ती बरतनी चाहिए, भूमि को बंजर होने से बचाने, पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने तथा वन रोपन हेतु सिंचाई की व्यवस्था में सुधार के लिये सघन वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए और योजना आयोग, पर्यावरण और वन विभाग, गैर परम्परागत ऊर्जा विभाग, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभागों के बीच ऐसा समन्वय हो कि ये तीनों विभाग पर्यावरण की सुरक्षा के लिये कृतसंकल्प हों।

पर्यावरणीय संरक्षण हेतु किये गये कारगर उपायों एवं प्रावधानों को हम नागरिकों द्वारा न केवल स्वागत होना चाहिए बल्कि जिम्मेवारी पूर्वक उसका पालन भी करना चाहिए। हम सभी नागरिकों का परम कर्तव्य है कि अपने स्तर से पर्यावरण संरक्षण से सम्बंधित कारगर कदम की शुरुआत व्यक्तिगत जीवन व्यवहार में भी अपनायें। मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यदि प्रत्येक नागरिक इस विषय में जागरुक हो जाए तो इस विश्व व्यापी समस्या का समाधान करना असंभव नहीं है।

ग्राम-पो.- जैतपुर, थाना- बड़हिया, जिला- मुंगेर (बिहार)

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