भारत में पर्यावरण के प्रति बढ़ती चेतना

Submitted by Hindi on Tue, 05/17/2016 - 12:53
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योजना, 15 जून, 1993

प्रदूषण को नियंत्रण करने वाले उपकरण लगाने तथा सघन इलाकों से प्रदूषण पैदा करने वाले उद्योगों को स्थानांतरित करने के लिये इस समय अनेक वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाते हैं। जिन वस्तुओं पर उत्पादन तथा सीमा शुल्क की रियायत दी जाती है उनकी समीक्षा की जाएगी। इससे प्रदूषण रोकने वाली प्रौद्योगिकीयों के विकास को प्रोत्साहन मिलेगा और उत्पादों के लिये मांग और बढ़ेगी।

भारत की आबादी का एक बड़ा भाग हालाँकि गरीबी और निरक्षरता से ग्रस्त है फिर भी पारिस्थितिकी के प्रति उनकी जानकारी ने हमारी वनस्पति और वन्य जीवों को समृद्ध बनाने में योगदान किया है। उदाहरण के लिये राजस्थान के गाँवों में बिश्नोई लोग अपने क्षेत्र में शिकार करने या वृक्षों को काटने की अनुमति नहीं देते। ‘बिश्नोई’ का शाब्दिक अर्थ होता है- उन्तीस और इस समुदाय के लोग पर्यावरण संरक्षण के उन्तीस नियमों का पालन करते हैं। राजस्थान के बड़े भू-भाग में फैले मरूस्थल में बिश्नोई गाँवों की छवि कुछ अलग ही है।

1730 ई. में जोधपुर के निकट इन गाँवों में सैकड़ों स्त्रियों तथा बच्चों ने वृक्षों को बचाने के लिये अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। वृक्षों को काटने वालों से बचाने के लिये वे वृक्षों से चिपक गए और इस प्रकार उन्होंने वृक्षों के लिये अपना बलिदान कर दिया। विख्यात ‘चिपको आंदोलन’ की संभवतः यहीं से शुरूआत हुई जो लोगों द्वारा प्रारम्भ किए गए पर्यावरण सुरक्षा का सर्वाधिक सफल उदाहरण है।

भारत के लोग प्राचीन समय से ही प्रकृति के उपासक रहे हैं। हमारे धर्मग्रंथों में प्रकृति के प्रति उनके गहन प्रेम तथा सम्मान की ये भावनाएँ अभिव्यक्त हुई हैं। पौधों को जल देने, पक्षियों तथा जीव-जन्तुओं को खिलाने आदि जैसे धार्मिक कर्मकांड सभी प्रकार के जीवों की दूसरे पर निर्भरता के द्योतक हैं।

सरकार ने पर्यावरण को खराब होने से रोकने तथा भावी पीढ़ियों के लिये इसे सुरक्षित रखने केे लिये सतत प्रयास किया है। भारत ऐसा पहला विकासशील देश है। जिसने बाजार में बेचे जाने वाले पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों पर लेबल लगाने की पहल की है। ‘ईको मार्क’ हासिल करने के लिये उत्पादकों (निर्माताओं) को भारतीय मानक ब्यूरों के पास आवेदन करना होगा कि वह शुल्क भुगतान पर ‘मटका’ चिन्ह इस्तेमाल करने की अनुमति दे। पर्यावरण सम्बंधी प्रकाशित सिद्धान्तों के अनुरूप प्रत्येक उत्पाद की जाँच की जायेगी तथा उसे प्रमाणित किया जायेगा।

पर्यावरण मित्र उत्पादों के रूप में ‘लेबल’ लगाने की प्रणाली शुरू करना पर्यावरण को स्वच्छ रखने की भारत की वचनबद्धता का प्रतीक है। कोई भी उत्पाद जिसे तैयार करने, इस्तेमाल करने या निबटान करने में होने वाली हानि कम से कम हो, ऐसे उत्पाद को पर्यावरण-मित्र के रूप में माना जा सकता है।

इस वर्ष के प्रारम्भ में सरकार ने प्रदूषण को कम करने के बारे में अपनी बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय नीति की घोषणा की जिसमें औद्योगिक कारखानों के लिये पर्यावरण का वार्षिक लेखा अनिवार्य रूप से कराने और प्रदूषण नियंत्रण के लिये अपेक्षाकृत बढ़िया प्रौद्योगिकीयाँ अपनाने के लिये अनेक वित्तीय प्रोत्साहन देने का प्रावधान किया है जिनमें स्रोत पर प्रदूषण को रोकना, उपलब्ध सर्वोत्तम प्रौद्योगिकी तथा व्यवहारिक तकनीकी समाधानों को विकसित करना तथा उनका उपयोग करना, यह सुनिश्चित करना कि प्रदूषण पैदा करने वाला ही जुर्माना देगा तथा इसे नियंत्रित करने हेतु प्रबन्ध करना, अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों तथा नदी के विस्तार की ओर विशेष ध्यान देगा तथा निर्णय करने के मामले में जनता को शामिल करना।

प्रदूषण को नियंत्रण करने वाले उपकरण लगाने तथा सघन इलाकों से प्रदूषण पैदा करने वाले उद्योगों को स्थानांतरित करने के लिये इस समय अनेक वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाते हैं। जिन वस्तुओं पर उत्पादन तथा सीमा शुल्क की रियायत दी जाती है उनकी समीक्षा की जाएगी। इससे प्रदूषण रोकने वाली प्रौद्योगिकीयों के विकास को प्रोत्साहन मिलेगा और उत्पादों के लिये मांग और बढ़ेगी।

न्यायाधिकरण


एक उल्लेखनीय बात यह है कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय राष्ट्रीय पर्यावरण न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) बनाने की दिशा में प्रयासरत है जो लोगों द्वारा जुर्माने के लिये किए गए दावों के मामलों को निपटाएगा। यह ट्रिब्यूनल एक ऐसी एजेंसी के रूप में कार्य करेगा जो देश में पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाली या औद्योगिक आपदाओं के कारण लोगों को हुई क्षति के बारे में हाल ही में बनाए गए कानून-सार्वजनिक दायित्व अधिनियम के कार्यान्वयन और उस पर निगरानी का काम करेगा।

ट्रिब्यूनल का एक प्रमुख कार्य उन व्यक्तियों के लिये क्षतिपूर्ति की मात्रा तथा अंतरिम राहत का निर्धारण करना है जो उद्योग द्वारा इस्तेमाल किए गए खतरनाक रसायनों के जहरीले असर तथा औद्योगिक विनाश के शिकार हो गए हैं। न्यायाधिकरण ऐसे हानिकारक पदार्थों द्वारा पर्यावरण को हुई क्षति के बारे में ऐसी शिकायतों पर विचार करेगा तथा पर्यावरण को हुई ऐसी क्षति के कारण प्रभावित लोगों के दावों की रकम का निर्धारण करेगा।

भारतीय पर्यावरण मंत्रालय ने एक और नया कदम उठाया है। उसने राष्ट्रीय पर्यावरण आयोग के गठन का प्रस्ताव किया है जो पर्यावरण से सम्बद्ध विभिन्न कानूनों के वैधानिक, सामाजिक और अन्य पहलूओं का अध्ययन करेगा तथा उन कानूनों में संशोधन के सुझाव भी देगा।

1. इस वर्ष 2 जून को पर्यावरण तथा विकास के बारे में राष्ट्रीय संरक्षण नीति एवं नीति वक्तव्य जारी किया गया जिसमें ‘‘हमारे राष्ट्रीय जीवन तथा हमारी विकास प्रक्रिया के ढाँचे में पर्यावरण सम्बंधी बातों को शामिल करने’’ की बात कही गयी है। यह वक्तव्य केन्द्र तथा राज्यों तथा पेशेवर और गैर-सरकारी संगठनों तथा शैक्षणिक ये ऐजेन्सियाँ पर्यावरणीय प्रहारी की तरह कार्य करेगी तथा सम्बन्धित मामलों में शासन व न्यायालय को सहयोग देगी। इन निकायों में पर्यावरणीय जीवविज्ञान, रसायनिक एवं अभियन्त्रण विज्ञान, भूगोल, कृषि, अर्थशास्त्र तथा चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञ होने चाहिए होने चाहिये। इन्हें पूर्ण स्वायत्त किन्तु नियंत्रित होना चाहिये।

2. यद्यपि अधिनियम 1986 के सेक्शन 6 (2) (ब) में प्रदूषकों की छूट सीमा सम्बंधी प्रावधान हैं किन्तु ‘शोर’ के सम्बन्ध में कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया।

3. ‘पर्यावरणीय संप्रभाव आंकलन’ (ई.आई.ए.) को उपयुक्त रिपोर्ट बनाकर केन्द्रीय या राज्य मंडलों के अनापत्ति प्रमाण पत्र हेतु आवश्यक आधार निर्धारित किया जाना चाहिये।

4. वर्तमान नियमों के साथ भूमि प्रयोग तथा कृषि व वन भूमि से सम्बन्धित नियम बनाकर प्रभावी किये जाने चाहिये।

5. पर्यावरण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद का गठन कर उसे नियमित रूप से सम्बंधित शोध या पर्यावरण वैज्ञानिक, पर्यावरण रसायन, पर्यावरण अधिकारी, पर्यावरण विषविज्ञानी तथा अन्य शोध पदों हेतु पात्रता परीक्षा आयोजित करने का कार्य सौंपा जाना चाहिये। पर्यावरण जीवविज्ञान, परिस्थितिकीय व पर्यावरण प्रबंध को व्यवहारिक व व्यवसायिक विषय घोषित किया जाना चाहिये।

6. आवश्यक समय अन्तराल में पर्यावरण/पारिस्थितिक तकनीकी आदि से सम्बंधित पदों के लिये राष्ट्रीय स्तर पर ‘‘भारतीय पर्यावरण सेवा परीक्षा’’ का आयोजन भारतीय वन सेवा, भारतीय सांख्यकी सेवा, भारतीय भूवैज्ञानिक सेवा आदि की तरह किया जाये।

7. पर्यावरणीय नियमों और विधानों के जंगल तैयार करना किसी समस्या का समाधान नहीं बल्कि इसके लिये एकीकृत नई तथा सुव्याख्यित ‘राष्ट्रीय पर्यावरण नीति’ की आवश्यकता है, जिसे एक संपूर्ण अधिनियम के तहत मान्य किया जाए।

8. इन नियमों के सही प्रभावीकरण के लिये राष्ट्रीय पर्यावरण, सुरक्षा प्राधिकरण (नेपा) के अन्तर्गत पर्यावरणीय न्यायालय स्थापित किए जाएं।

9. आर्थिक दंड समाप्त किया जाना चाहिए क्योंकि अपराधी प्रायः पूँजीपति होता है।

10. जनजागरण का रुख भावनापरक न होकर वैज्ञानिक आधार पर होना चाहिये। इसके लिये ‘वैज्ञानिक वृद्धि की राजनैतिक अभिलाषा’ की जरूरत है ताकि सही पारिस्थितिक समाजवाद स्थापित हो सके।

आर-30 सी.एस.एम. होस्टल, आ.प्र.सा. विश्वविद्यालय, रीवा-(म.प्र.) 486083

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