आर्सेनिक-दूषित पानी पीने का बच्चों पर प्रभाव

Submitted by Hindi on Sun, 05/22/2016 - 10:35
Source
Indian Journal of Public Health, July-September, 2012

सारांश


आर्सेनिक-दूषित पानी पीने के कारण चिर कालिक आर्सेनिक-विषाक्तता भारत समेत विश्व-भर में एक बड़ा पर्यावरणीय स्वास्थ्य संकट रही है। हालांकि वयस्कों के स्वास्थ पर इस चिरकालिक आर्सेनिक-विषाक्तता के प्रभाव पर काफी सारी जानकारी उपलब्ध है लेकिन बच्चों पर इसके प्रभाव की जानकारी बहुत कम है। उपलब्ध साहित्य की समीक्षा बच्चों में समस्या को दर्शाने के लिये पहले से उपलब्ध सामग्री की समीक्षा की गयी है। पुरानी आर्सेनिक-विषाक्तता का बच्चों के स्वास्थ पर प्रभाव और विशेषकर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर वैज्ञानिक प्रकाशनों की भी समीक्षा की गयी है। त्वचा सम्बंधी विकृतियों का फैलाव, जैसे- रंजकता (पिगमेंटेशन) में बदलाव और केरोटोसिस पुरानी आर्सेनिक-विषाक्तता के लक्षण हैं, जो दुनिया के विविध क्षेत्रों में आर्सेनिक के सम्पर्क में आए बहुत से बच्चों में अलग-अलग है। चिली में आर्सेनिक के सम्पर्क में आये बच्चों में फेफड़े से सम्बंधित पुरानी बीमारियाँ, जिनमें पुल्मोनरी इन्टरस‌‍टिटअल फाइब्रोसिस (फेफड़ों के मध्य संयोगी उत्तकों का मोटा या जख्मी हो जाना।) तक शामिल है, पायी गयी। थाईलैंड, बांग्लादेश और भारत में आर्सेनिक के सम्पर्क में आये बच्चों पर किये गए अध्ययन में उनके बौद्धिक क्रियाकलापों में इसके दुष्प्रभाव को दर्ज किया गया। बच्चों में आर्सेनिक के मिथाइलीकरण का पैटर्न परिवारों में संचित होता है और भाई-बहनों में सह-सम्बन्धित होता है जो अनुवांशिक आधार पर आर्सेनिक मिथाइलीकरण में विविधता के प्रमाण प्रस्तुत करता है। आर्सेनिक-दूषित पानी पीने के कारण लम्बे समय से चली आ रही आर्सेनिक-विषाक्तता के चलते बच्चों में गम्भीर बीमारियाँ होती हैं। जिस वजह से त्वचा पर घाव, फेफड़ों की बीमारियाँ और बौद्धिक क्रियाकलापों में गड़बड़ी पैदा होती है।

आर्सेनिक दुनिया के विभिन्न भागों में बहुत से जलभृत (एक्विफायर) आर्सेनिक से प्रदूषित पाए गए हैं। इनमें से ज्यादातर जलभृत भारत, बांग्लादेश, ताइवान और उत्तरी चीन के विशाल क्षेत्र में मिले हैं। लाओस, कम्बोडिया, म्यांमार, पाकिस्तान, नेपाल और वियतनाम जैसे एशियाई देश इससे प्रभावित हैं। हंगरी, मैक्सिको, संयुक्त राज्य अमरीका, चिली और अर्जेंटीना ऐसे अन्य देश हैं जहाँ से आर्सेनिक के चलते भूजल के प्रदूषित होने की उल्लेखनीय खबरें प्राप्त हुई हैं। भारत में पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और असम इसके प्रभाव में हैं। मानव अध्ययन से इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं कि अकार्बनिक आर्सेनिक को लम्बे समय तक ग्रहण करने के चलते वयस्कों में चर्म रोग तथा त्वचा, मूत्राशय और और फेफड़े का कैंसर सहित कई तंत्रों के रोग उभर आते हैं।

त्वचा सम्बंधी विकृतियों जैसे रंजकता (पिगमेंटेशन) में बदलाव और केरोटोसिस को बहुत पहले से ही वयस्कों में लम्बे समय तक आर्सेनिक ग्रहण करने के विशेष लक्षण के रूप में जाना जाता है, इस प्रकार के रोग आर्सेनिक-दूषित पानी पीने वाले लोगों के स्वास्थ्य में सामान्यतः पाए जाने वाले प्रभाव हैं। आर्सेनिक के कारण होने वाली रंजकता और केरोटोसिस काफी ख़ास है। पानी की बूँद के आकार के रंगहीन धब्बे, फैले हुए गहरे भूरे रंग के धब्बे या छाती और शरीर के अन्य अंगों में त्वचा के रंग का गहरा होना अतिरंजकता के लक्षण हैं। आर्सेनिकोसिस रोग से विरंजक धब्बे (ल्यूकोमिलेनोसिस) भी होते हैं। सामान्य केरोटोसिस तलवे और हथेलियों दोनों में सूजन के रूप में उभरता है जबकि गांठदार केरोटोसिस में तलवे और हथेलियों में कई सारे केरोटिक घाव हो जाते हैं। त्वचा के घाव गम्भीर सार्वजनिक स्वाथ्य समस्या को प्रकट करते हैं क्योंकि केरोटोसिस का बढ़ जाना बहुत कष्टप्रद होता है और इस विकृति के कारण गाँवों में सामाजिक अलगाव तक झेलना पड़ सकता है। कैंसर के विपरीत जिसे बढ़ने में दशकों लग जाते हैं त्वचा के ये घाव सामान्य तौर पर आर्सेनिक के सम्पर्क में आने के शुरूआती 5-10 सालों में ही सामने आ जाते हैं।

हालाँकि महामारी विज्ञान के सीमित आँकड़े ही मौजूद हैं लेकिन वयस्कों में आर्सेनिक-दूषित पानी पीने के परिणामस्वरूप दिखाई देने वाली बीमारी के अन्य लक्षणों में कमजोरी, कंजाक्तिवाईटिस (नेत्र सम्बंधी रोग) हिपेटोमिगेली, पोर्टल उच्च रक्तचाप (पेट, आंत और अग्न्याशय की रक्त वाहिकाओं में उच्च रक्तचाप), फेफड़ों के रोग, पोलीन्यूरोपैथी, अंगों में सूजन, इस्कीमिक (स्थानिक-अरक्तता सम्बंधी) हृदय सम्बंधी रोग, रक्तवाहिका सम्बंधी रोग, उच्च रक्तचाप, और एनीमिया शामिल हैं।

आर्सेनिक-दूषित पानी पीने के चलते लम्बे समय तक आर्सेनिक ग्रहण करने से फेफड़ों पर होने वाले गैर-हानिकारक प्रभाव के बारे में सत्तर के दशक के शुरुआत में चिली में बच्चों पर किये गए अध्ययन की शुरूआती रिपोर्ट उपलब्ध है। रोजेनबर्ग ने उन पाँच बच्चों का पोस्टमार्टम किया जिनमें लम्बे समय से चले आ रहे आर्सेनिक-विषाक्तता के लक्षण के साथ-साथ रंजकता और/या केरटोसिस भी था। पाँच में से चार बच्चों के फेफड़ों के उत्तकों के परीक्षण से सभी में विकृति पायी गयी और दो में हलकी ब्रोन्किइक्टेसिस के साथ पुल्मोनारी इन्टरस‌‍टिटअल फाइब्रोसिस पाया गया। एन्तोफगास्ता, चिली में 1976 में विभिन्न समुदायों के बीच किये गए सर्वे में 144 स्कूली बच्चे अर्सेनिक सम्बंधी त्वचा के घाव से ग्रसित पाए गए। जाँचकर्ताओं ने आगे बताया कि जिन बच्चों को त्वचा में घाव थे उनमें से 38.8 प्रतिशत बच्चों में लम्बे समय से खाँसी की शिकायत पायी गयी जबकि सामान्य त्वचा वाले बच्चों में यह प्रतिशत 3.1 था।

आर्सेनिक दूषित पानी पीने के कारण बच्चों में त्वचा पर उसके प्रभावों के फैलने की सूचना दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल, भारत में 1995-96 में महामारी विज्ञान के अध्ययन से मिली थी। उन लड़के-लड़कियों (नौ साल से कम उम्र) में रंजकता और केरटोसिस के लक्षण पाए गए जो 50 ग्राम प्रति लीटर आर्सेनिक के सम्पर्क में आये, हालांकि वयस्कों की तुलना में यह बहुत कम है। नौ साल से कम उम्र की 536 लड़कियों में से 9 (1.7 प्रतिशत) और 613 लड़कों में से 12 (1.9 प्रतिशत) पानी में भारी मात्रा में आर्सेनिक की मौजूदगी के चलते रंजकता के शिकार थे। केरटोसिस के मामले में यह आँकड़ा लड़कियों और लड़के में क्रमशः 1 (0.2 प्रतिशत) और 3 (0.48 प्रतिशत) था। पश्चिम बंगाल, भारत में 11 साल से कम उम्र के 6695 बच्चों पर किये गए एक अन्य अध्ययन के अनुसार 114 (3.7 प्रतिशत) बच्चे आर्सेनिक के कारण चर्म रोग से ग्रसित पाए गए। बांग्लादेश में 11 साल से कम उम्र के 4877 बच्चों में से 298 (6.11 प्रतिशत) बच्चों में आर्सेनिक-दूषित पानी पीने के चलते त्वचा सम्बंधी घाव दर्ज किये गए। हालांकि वातानाबे और अन्य लोगों द्वारा उत्तरी बांग्लादेश के दो गाँवों में रहने वाले 4 से 15 साल की उम्र के 241 बच्चों के बीच दूषित भूजल के इस्तेमाल के चलते त्वचा के घावों का भारी मात्रा में फैलाव दर्ज किया गया।

आर्सेनिक से पीड़ित अधीन प्रमाणिकट्यूब वेल (नलकूप) के पानी में आर्सेनिक की सांद्रता आर्सेनिक का पता लगाने की सीमा से कम से लेकर 535 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के बीच पायी गयी। जिन बच्चों की जाँच की गयी उनमें से लगभग आधे बच्चों में त्वचा सम्बंधी रोग पाए गए जिन पर दवा का असर अपेक्षाकृत अस्पष्ट दिखाई दिया। एक अध्ययन में सुझाया गया कि एक ही समुदाय के वयस्कों की तुलना में बच्चों में आर्सेनिक के चर्म रोग सम्बंधी प्रभाव कुछ कम नहीं है। निम्न बॉडी मॉस इंडेक्स (बीएमआई) वाले बच्चों के अनुपात में आर्सेनिक सम्पर्क स्तर बढ़ने के साथ-साथ उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई और उपसमूहों के अन्दर दवा-प्रभाव सम्बंध को निरंतर अवलोकित किया गया। मंगोलिया, चीन के अंदरूनी हिस्सों में 19 साल से कम उम्र के ऐसे 728 बच्चों का अध्ययन किया गया जो आर्सेनिक के सम्पर्क में रहे थे जिसमें पाया गया की 12.2 प्रतिशत बच्चे आर्सेनिकोसिस से ग्रसित थे। चीन में 6 से 18 महीने की उम्र के नवजात शिशुओं में आर्सेनिक के कारण त्वचा में घाव पाए गए। कम्बोडिया में हुए एक हालिया अध्ययन में आर्सेनिक-दूषित पानी पीने वाले बच्चों में भी आर्सेनिक के चलते त्वचा में घाव पाए गए। 16 साल से कम उम्र के 27 में से 10 बच्चों (37.04) में आर्सेनिक के कारण त्वचा में घाव पाए गए। उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों में यह पाया गया है कि लम्बे समय तक आर्सेनिक सम्पर्क का बच्चों पर वही असर हुआ है जो वयस्कों पर हुआ, हालाँकि आर्सेनिक सम्बंधी चर्म रोग विभिन्न कारकों पर निर्भर करते हैं जिसमें दवा और आर्सेनिक सम्पर्क की अवधि, बच्चों के पोषण का स्तर और जातीयता शामिल है।

थाईलैंड में आर्सेनिक सम्पर्क क्षेत्र में बच्चों के बौद्धिक क्रियाकलाप पर किये गए अध्ययन की रिपोर्ट समीक्षार्थ उपलब्ध है। लम्बे समय तक आर्सेनिक सम्पर्क में रहने का बालों की सघनता के जरिये आकलन करने पर पाया गया कि विकासात्मक मंदता से सम्बंधित था जिसका निर्णय बच्चों का आईक्यू मापने के लिये वेश्लर बुद्धिमत्ता पैमाने द्वारा तय किया गया। जन्म से ही रोनपिबोन जिले में रहने वाले 6 से 9 साल की उम्र के 529 बच्चों के आँकड़ों का एकाधिक वर्गीकृत विश्लेषण किये गये। औसत आईक्यू समूह वाले बच्चों के प्रतिशत में आर्सेनिक स्तर के बढ़ने के साथ-साथ 56.8 से 40.0 की उल्लेखनीय गिरावट पायी गयी। गलतियों को समायोजित करने के बाद उन्होंने यह उल्लेखनीय सांख्यकीय सम्बंध पाया कि आर्सेनिक किसी बच्चे के आईक्यू में 14 प्रतिशत तक का अंतर पैदा कर सकता है। आर्सेनिक का असर किस हद तक है इसका आकलन करना कठिन था। यह पाया गया कि बालों की सांद्रता आर्सेनिक की औसत 2.42 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम थी। (यह सीमा 0.48 से 26.94 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम होती है।) जबकि सामान्य अवस्था में इसकी मात्रा को 1 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम माना गया है।

बांग्लादेश के अरिहज़र में आर्सेनिक सम्पर्क जल के प्रभाव और बच्चों के बौद्धिक क्रियाकलापों पर एक अन्य अध्ययन किया गया था। पीने के पानी से आर्सेनिक का जोखिम सामाजिक जनसांख्यिकीय भिन्नताताओं और पानी की शुद्धता के समायोजन के बाद यह पाया गया कि कम बौद्धिक क्रियाशीलता के साथ वेश्लर बौद्धिक स्तर (WISC) तृतीय बच्चों के लिये एक खुराक पर प्रतिक्रिया के ढंग से जुड़ा हुआ था। जिन बच्चों में जल आर्सेनिक स्तर 50 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा था उल्लेखनीय रूप से उनका प्रदर्शन जल आर्सेनिक स्तर 50 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम वाले बच्चों की तुलना में निम्न स्तर का रहा यह सम्बंध कुएँ के पानी में आर्सेनिक की तुलना में मूत्र में आर्सेनिक में आम तौर पर अधिक था। चीन के शांक्सी क्षेत्र के शान्यीं काउंटी के गाँवों में 8 से 12 साल के 720 बच्चों पर किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि उच्च आर्सेनिक समूह के बच्चों का आईक्यू स्तर सबसे निम्न था। यह अत्यधिक उल्लेखनीय है की आर्सेनिक की अति सान्द्रता बच्चों की बौद्धिकता और वृद्धि को प्रभावित करती है।

पश्चिम बंगाल में 5 से 15 साल के 351 बच्चों के बौद्धिक विकास का एक बहु-सामुदायिक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन के लिये परिवारों का चयन वहाँ के 7683 लोगों की एक सर्वेक्षित स्रोत आबादी में से किया गया था। बौद्धिक क्रियाकलाप का मूल्यांकन छह उप सेट- डब्ल्यूआईएससी, कुल वाक्य स्मरण क्षमता परीक्षण, कलर्ड प्रोग्रेसिव मेट्रिक्स (सीपीएम) टेस्ट, और पेग्बोर्ड टेस्ट पर आधारित था। सामाजिक जनसांख्यिकिक कारक की सूचना एकत्र की गयी, लम्बाई और वजन की माप की गयी। इस अध्ययन में शामिल बच्चों के मूत्र के नमूनों और उनके द्वारा पिए गए पानी में नमूनों के आर्सेनिक के स्तर को एएएस द्वारा मापा गया। आबादी के एक तिहाई में मूत्रीय आर्सेनिक सांद्रता का स्तरीकरण संभावित त्रुटियों को समायोजित करने के बाद शब्दावली परीक्षण स्कोर, चीजों को सही संयोजन परीक्षण का स्कोर और चित्र पूरा करने के परीक्षण का स्कोर विपरीत प्रवृत्ति को दर्शाता है। बौद्धिक क्रियाकलाप के स्कोरों में कमी विशेषकर शबदकोशीय और चित्र समायोजन परीक्षण के स्कोरों में कमी मूत्रीय आर्सेनिक सांद्रता में वृद्धि के साथ तो जुड़ी हुई थी लेकिन पानी की सांद्रता की विभिन्न मापों के साथ नहीं। यह ऊपरी तिहाई आबादी में आर्सेनिक के असर से सम्बंधित माध्य स्कोर में तुलनात्मक कमी से मेल खाता है- शब्दावली परीक्षण स्कोर 12.6%, चीजों को सही संयोजन परीक्षण का स्कोर 20.6%, और चित्र पूरा करने के परीक्षण का स्कोर 12.4%.बौद्धिक क्रियाकलाप और पीने के पानी में आर्सेनिक की सांद्रता के बीच किसी सम्बंध के बहुत कम प्रमाण उपलब्ध हैं। लगातार मूत्र सांद्रता जो सभी स्रोतों से जोखिम को अभिव्यक्त करता है, वह जलस्रोत की माप पर आधारित सर्वोच्च या संयुक्त जोखिम से कहीं ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होता है। बांग्लादेश के एक अध्ययन ने बताया है कि आबादी में पीने के पानी में आर्सेनिक की तुलना में मूत्र का आर्सेनिक त्वचा के घाव का कहीं ज्यादा पक्का संकेतक हो सकता है।

मनुष्य में आर्सेनिक का जैव-रूपांतरण मिथाइलिकरन प्रक्रिया के द्वारा घटित होता है। कुछ ही आँकड़े हैं जो मिथाईलीकरण की बुनावट और आर्सेनिक-जन्य रोग के बीच की कड़ी को जोड़ते हैं। पश्चिम बंगाल में किये गये एक अध्ययन में यह बताया गया कि द्वितीयक मिथाईलीकरण क्षमता वयस्कों की तुलना में बच्चों में अधिक होती है, क्योंकि जोखिम समूह में डीएमए/एमएमए अनुपात का मान वयस्कों की तुलना में बच्चों में (धनात्मक टी-टेस्ट) काफी अधिक (औसतन 4.11 की तुलना में 8.15) होता है। इसका मतलब यह कि आर्सेनिक उपापचय के मार्ग में द्वितीयक मिथाईलीकरण का चरण वयस्कों की तुलना में बच्चों में अधिक क्रियाशील होता है। इन परिणामों के आधार पर लेखकों ने सुझाव दिया कि बच्चों की तुलना में वयस्क अपने शरीर में अधिक आर्सेनिक रोक पाते हैं। इस अध्ययन से लेखकों ने दर्शाया कि एक समान दूषित पानी पीने के बावजूद वयस्कों की तुलना इन बच्चों में त्वचा के घाव नहीं पाए जाते। हालाँकि बांग्लादेश तथा चीन और कम्बोडिया में आर्सेनिक प्रभावित बच्चों में त्वचा के घाव की बड़े पैमाने पर मौजूदगी का अवलोकन जो पहले प्रस्तुत किया गया (8), (9), (11) यह बताता है कि उम्र के आलावा अन्य कारक भी किसी बच्चे में मिथाईलिकरण क्षमता से सम्बंधित हो सकते हैं।

इस बात का आकलन करने के लिए बहुत सारे अध्ययन किये गये कि क्या जैविक बहुरूपताओं के कारण आर्सेनिक जनित रोग की अभिव्यक्ति में भिन्नता के साथ आर्सेनिक मिथाइलिकरन में भिन्नता आती है या नहीं। परिवार सह-सम्बंध इस बात को तय करने में सहायक होता है कि क्या जैविक बहुरूपता के द्वारा मिथाइलिकरन प्रारूपों में भिन्नता आती है या नहीं। अगर जैविक कारक का आर्सेनिक मिथाइलिकरन क्षमता में योगदान होता है तो परिवार के अध्ययन को यह प्रदर्शित करना चाहिए कि संतानों में अपने माता-पिता की तुलना में मिथाइलिकरन गतिविधि का एक उच्च सहसम्बंध है। चुंग और अन्य लोगों ने अत्यन्त शुष्क रेगिस्तानी वातावरण में स्थित उत्तरी चिली के एक छोटे गाँव में बच्चों के अन्दर मिथाइलिकरन प्रारूप का अध्ययन किया जहाँ के सभी निवासी गाँव में आपूर्ति होने वाले एक ही प्रकार के बेहद ज्यादा आर्सेनिक प्रदूषित पानी का सेवन करते थे। ग्यारह परिवारों को इस आधार पर चयनित किया गया क्योंकि वे काफी लम्बे समय से पेयजल में काफी ऊँचे स्तर के आर्सेनिक (735-762 μg/l) के प्रभाव में थे। हर परिवार में एक माँ, एक पिता और दो बच्चे थे। लेखकों ने प्रत्येक भागीदार के मूत्र में मौजूद आर्सेनिक और इसके मिथाइलयुक्त अपापचयी (n = 44) का माप किया। अन्तर-वर्गीय सहसम्बंध गुणांक दर्शाता है कि मिथाइलिकरण पैटर्न में बदलाव के 13-52% मामले एक विशिष्ट परिवार का सदस्य होने के चलते थे। परिवार सहसम्बंध की गणना माता-पिता, बच्चे और संतान की जोड़ी के लिये की गयी थी। कुल मूत्र आर्सेनिक, आयु और लिंग को समायोजित करके गणना करने पर पाया गया कि मिथाइलिकरन प्रारूप संतान की जोड़ी में मजबूती से सहसम्बन्धित थे [InAs/metAs के लिये r = 0.78, 95% आत्मविश्वास अंतराल (CI), 0.34-0.94; MMA/DMA के लिये r = 0.82, 95% CI, 0.43-0.95], जबकि माता-पिता की जोड़ी का सहसम्बंध इसकी तुलना में निम्न (क्रमशः r = 0.18, r = −0.01) था। जब मिथाइलिकरन से अधिकतम सम्भव सम्बन्धित विशिष्ट रक्त सूक्ष्मपोषकों (मेथियोनिन, होमोसिस्टीन, फोलेट, विटामिन बी 6, सेलेनियम और विटामिन बी 12) के लिये समायोजन किए गए तो परिवार सहसम्बंध में उल्लेखनीय बदलाव नहीं पाये गये। अध्ययन से यह पुष्ट हुआ कि मिथाईलीकरण प्रारूप परिवारों में समेकित और भाई-बहनों में सहसंबद्ध होते हैं, बशर्ते आर्सेनिक मिथाईलीकरण में भिन्नता के लिये कोई आनुवंशिक आधार हों।

आर्सेनिकोसिस का बच्चों पर समाजार्थिक प्रभाव होता है। दीर्घकालिक आर्सेनिक विषाक्तता के कारण रंजकता और/या केरोटिसिस द्वारा प्रभावित बच्चे अपना मजाक उड़ाये जाने के डर से स्कूल जाने से बचते हैं। बहुधा जब परिवार का कोई सदस्य, खास कर कमाने वाला पुरुष सदस्य आर्सेनिकोसिस की चपेट में आ जाता है तो उसका इलाज बच्चों की पढ़ाई जैसे जरूरी खर्चों पर भारी पड़ता है क्योंकि जब परिवार दोनों खर्चे नहीं उठा पाता तो पढ़ाई छुड़वा दी जाती है। बच्चों को परिवार का खर्चा भी जुटाना पड़ता है, जिसके चलते वे शिक्षा से वंचित हो जाते हैं। आर्सेनिकोसिस इसके शिकार और दूसरे सदस्यों की घरेलू और बाहरी जिम्मेदारियों को बदलने के लिये भी बाध्य करता है। इस रोग और इसके इलाज का बोझ परिवार के खर्चे और परिवार चलाने के उन तौर-तरीकों पर भी प्रभाव डालता है जो रोगग्रस्त व्यक्ति के पेशे और कमाई के हिसाब से काम ज्यादा होता है।

 

 

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