स्वच्छ जलीय झींगा पर डिटर्जेंट का दुष्प्रभाव (Effect of detergent, Linear Alkyl benzene sulphonate on gills of freshwater prawn, Macrobrachium lamarrei)

Submitted by Hindi on Sun, 05/29/2016 - 14:11

सारांश


प्रस्तुत शोध में डिटर्जेंट (अपमार्जक), लीनियर एल्काइल बेंजीन सल्फोनेट (एल.ए.एस.) द्वारा स्वच्छ जलीय झींगा, मैक्रोब्रेकियम लैमेराई के गिल पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का अध्ययन किया गया है। 0.755मिग्रा./ली.(96 घंटे एल.सी.50 का 25%) डिटर्जेंट के गिल पर पड़ने वाले 10 दिन, 20दिन व 30 दिन के उपरान्त दृष्टिगत प्रभाव-क्रमशः गिल पट्टिकाओं में शोथ, अत्यधिक श्लेष्माश्रावण, गिल क्यूटिकिल का टूटना, हाइपरप्लेसिया, अन्तर पट्टिकास्थान में कमी, ऊतकक्षय व हीमोसाइट की अधिकता प्रमुख है। हीमोसाइट संरचना विभेद, केन्द्रक का फूलना व टूटना तथा अन्तरपट्टिकास्थान में एकत्रीकरण मुख्य रूप से 30 दिन के उपरान्त दिखाई देते हैं। समस्त दुष्प्रभाव डिटर्जेंट सम्पर्क की समयावधि के सापेक्ष पाये गये। उक्त शोध पत्र में डिटर्जेंट विषालुता की संभावित क्रिया विधि की विवेचना भी की गयी है।

Abstract


Present paper deals with effect of detergent, Linear Alkyl benzene sulphonate on gills of freshwater prawn, Macrobrachium lamarrei. Prawns were exposed to 0.755mg/L (25%of 96hLC 50) of detergent for 10, 20 & 30 50 days showed effects on gills mainly, inflammation, distension, excessive mucous secretion, erosion of cuticle, necrosis, hyperplasia, reduction of interlameller space, heavy influx of haemocytes etc. Degenerative changes, loss of histoarchitecture, deformed haemocytes along with nuclear pyknosis and Karyorrhexis were observed after 30 days of exposure. Severity of effects was found duration dependent. Possible mechanism of detergent toxicity has also been discussed.

प्रस्तावना


आधुनिक समय में स्वच्छता के संदर्भ में अतिवादी दृष्टिकोण के चलते विभिन्न प्रकार के डिटर्जेंट के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई है। प्राकृतिक स्वच्छता संसाधनों के अलावा, संश्लेषित उत्पादों में लीनियर एल्काइल बेन्जीन सल्फोनेट (लैब्स) का प्रयोग अत्यधिक बढ़ा है। पहले यह माना जाता था कि ये डिटर्जेंट जैव-अपघटकीय है तथा इनकी विषालुता अत्यन्त कम है। लैब्स, एनआयोनिक डिटर्जेंट है जो कि जलीय तन्त्र यथा तालाब, पोखर, झील, नदी इत्यादि में मिलने पर जलीय जन्तुओं व पौधों पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। डिटर्जेंट के दुष्प्रभावों का अध्ययन अधिकतर मछलियों के संदर्भ में किया गया है (एबील 1974, बैरडक 1965, राय 1989, मिश्र इत्यादि 1985, ब्राइनी इत्यादि 1989, हुआॅग एवं तपाले 2011, जैन इत्यादि 2011, ओगीलीका इत्यादि 2011, जैन इत्यादि 2013क, 2013ख) परन्तु स्वच्छ जलीय क्रस्टेशिया वर्ग के जन्तु व अन्यअकशेरूकी, जो कि विषालुता के संदर्भ में अतिसंवेदनशील है, के ऊपर इस प्रकार के अध्ययनों की कमी है (शर्मा एवं शुक्ल 1990, मुरूथन्यागम इत्यादि 1997, स्टैकैनोनी एवं अबीसा 2011, शुक्ल इत्यादि 2012)। स्वच्छ जलीय झींगा, मैक्रोबे्रकियम लैमेराई (क्रस्टेशिया-डीकापोडा) लखनऊ व उसके आसपास वर्षानुवर्ष पाया जाता है तथा यह एक आदर्श जैव सूचक की भूमिका निभाने में सक्षम हो सकता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए डिटर्जेंट, लीनियर एल्काइल बेन्जीन सल्फोनेट के दुष्प्रभावों का अध्ययन मैक्रोब्रेकियम लैमेराई के गिल पर किया गया है।

संसाधन एवं प्रयोग विधि


स्वच्छ जलीय झींगा, मैक्रोब्रेकियम लैमेराई (क्रस्टेशिया-डीकापोडा) का संचयन गोमती नदी, लखनऊ (उ.प्र.) के आसपास से मछुआरों की मदद से किया गया तत्पश्चात् उन्हें प्रयोगशाला में 20 ली. क्षमता वाले शीशे के जलपात्रों में रखा गया (वर्मा इत्यादि 2012)। प्रयोग से पूर्व झींगा समूह का 5-7 दिन प्रयोगशाला में अनुकूलन किया गया। डिटर्जेंट, लीनियर एल्काइल बेन्जीन सल्फोनेट को सोडियम कार्बोनेट की सहायता से पी.एच.-7.0 पर मानकीकृत कर उसका मानक विलयन तैयार किया गया (लाल इत्यादि, 1983)। प्रयोग हेतु प्रयुक्त जल के भौतिक-रासायनिक गुण निम्न थे-

पी.एच. - 7.3±0.2, तापक्रम - 26±200से., घुलित आॅक्सीजन - 7.0±0.1 मिग्रा./ली., कुल कठोरता - 268±2.5 मिग्रा./ली.

प्रयोग हेतु दो जलपात्रों में 20ली. जल रखा गया। एक में डिटर्जेंट की 0.755 मिग्रा./ली. मात्रा (96 घंटे एल. सी.50 का 25%) घोली गयी तथा दूसरे जल पात्र को जिसमे केवल जल था, नियन्त्रित समूह माना गया। दोनों जलपात्रों में 20-20 झींगे रखे गये तथा उन्हें वायु पम्प की सहायता से घुलित ऑक्सीजन निरन्तर उपलब्ध करायी गयी। प्रति तीसरे दिन झींगों को भोजन दिया गया व डिटर्जेंट का परीक्षण विलयन बदला गया। नियन्त्रित व परीक्षण समूह से झींगों के गिल को क्रमशः 10, 20 व 30 दिन उपरान्त विच्छेदन द्वारा निकाल कर बोइन्स फिक्सेटिव में 24 घंटे फिक्स किया गया, तत्पश्चात सामान्य माइक्रोटोमी विधि द्वारा ऊतकों के पैराफिन ब्लाक बनाकर 5-6 μ मोटाई के सेक्शन काटे गये व इनका हैरिस हीमोटाक्सिलिन वइओसिन विधि से रंजन किया गया। परिपूर्ण स्लाइड्स को ओलिम्पस सूक्ष्मदर्शी द्वारा अध्ययन किया गया तथा छाया चित्र लिए गये। परीक्षण समूह की स्लाइडों की नियंत्रित समूह से तुलनाकर प्रभावों की गणना की गयी। प्रयोग को तीन बार दोहराया गया।

परिणाम एवं विवेचना


स्वच्छ जलीय झींगा, मैक्रोबे्रकियम लैमेराई में आठ जोड़े गिल पाये जाते हैं, जो कि कैरापेस के नीचे दोनों पाश्र्व सतहों पर 8-8 की संख्या में व्यवस्थित होते हैं। गिल का निर्माण तिकोने गिल आधार व उस पर दोनों ओर किताब के पन्नों की तरह गिल पट्टिकाओं से होता है। यह संरचना, पैलीमान (पटवर्धन 1937) व मैक्रोब्रेकियम दयानम (सेन इत्यादि 2008) के समान है (चित्र 1 व 2)। डिटर्जेंट, लीनियर एल्काइल बेन्जीन सल्फोनेट गिल पर उल्लेखनीय प्रभाव डालता है। परीक्षण समूह में 10दिन के उपरान्त (चित्र-3व4) गिल पट्टिकाओं में शोथ, श्लेष्मा का अधिक श्रावण व अन्तरगिल पट्टिका स्थान में कमी महत्वपूर्ण प्रभाव है। इस अवस्था में गिल में हीमोलिम्फ कणिकाओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि देखी गयी है।

20 दिन के उपरान्त (चित्र-5 व 6) गिल पट्टिकाओं की उपचर्म (क्यूटिकिल) का टूटना, अत्यधिक श्लेष्मा का श्रावण, हाइपरप्लेसिया व गिल के शीर्षस्थ भाग का फूलना प्रमुख है। इस अवस्था में कहीं-कहीं ऊतक परिगलन (नेक्रोसिस) भी दृष्टिगोचर होता है तथा हीमोसाइट के केन्द्रक का फूलना (पिकनोसिस) व उसकी झिल्ली का टूटना (कैरियोरेक्सिस) भी अधिकांशतः देखा गया है। गिल पट्टिकाओं के ऊतकों के गलने से हीमोसाइट अन्तरपट्टिकास्थान में निकलकर जमा होने लगते हैं तथा अन्तर पट्टिकास्थान अत्यन्त कम रह जाता है। 30 दिन के उपरान्त (चित्र 7 व 8) सभी प्रभावों की तीव्रता बढ़ जाती है। गिल में व्यापक ऊतक अद्यः पतन (डीजेनरेशन) व परिगलन (नेक्रोसिस) के कारण ऊतकीय संरचना लगभग समाप्त हो जाती है। मृत ऊतक गिल पट्टिकाओं के बीच-बीच पाये जाते हैं तथा अधिकांश हीमोसाइट की संरचना प्रभावित पायी जाती है। उक्त सभी प्रभाव डिटर्जेंट सम्पर्क की समयावधि के सापेक्ष पाये गये हैं। नियन्त्रित समूह में गिल में कहीं-कहीं शोथ के अतिरिक्त अन्य कोई प्रभाव नहीं पाये गये।

पानी में घुलित डिटर्जेंट सर्वप्रथम त्वचा व गिल के सम्पर्क में आकर उसे प्रभावित करता है। अत्याधिक श्लेष्मा का श्रावण आविषों के प्रति एक प्रतिक्रिया है, जो विषालुता के प्रभाव को कम करने का प्रयास है। इस प्रकार के प्रभाव अन्य जन्तुओं, पीड़कनाशी व भारी धातुओं के संदर्भ में भी देखे गये हैं (मिश्र इत्यादि 1985, सेन इत्यादि 2008, शुक्ल इत्यादि 2012) जो कि इस अध्ययन से समानता दर्शाते है। डिटर्जेंट जल में घुलने पर उसका पृष्ठतनाव कम कर देते हैं फलस्वरूप घुलित ऑक्सीजन का गिल द्वारा पूर्णरूप से उपयोग नहीं हो पाता तथा जन्तुओं का श्वसन बाधित होकर उनको बेचैनी होती है व उनके व्यवहार में परिवर्तन आ जाते हैं (बैरडच इत्यादि 1965, राय 1989, वर्मा इत्यादि 2012, कैम्बेल व तपाले 2011)। डिटर्जेंट वसाघोलक होने के कारण कोशिका झिल्लियों को नष्ट कर गिल ऊतकों में शोथ व परिगलन उत्पन्न कर गिल की दीवारों को तोड़ देते हैं फलस्वरूप हीमोलिम्फ कणिकायें अन्तरपट्टिका स्थान में एकत्रित होने लगती हैं व जन्तुओं का श्वसन व अन्य जैवरासायनिक क्रियायें प्रभावित होती हैं। इस प्रकार के प्रभाव मछलियों व अन्य जन्तुओं पर भी देखे जा चुके हैं (एबील 1974, मिश्र इत्यादि 1985, स्टेफेनोनी इत्यादि 2011, जैन इत्यादि 2013क, 2013ख) जो कि प्रस्तुत अध्ययन के परिणामों से अपनी समानता दर्शाते हैं। डिटर्जेंट के प्रभाव से एसिड फास्फेटेज एन्जाइम की वृद्धि होती है (त्रिवेदी इत्यादि 2001, मरूथन्यागम इत्यादि 1997, शर्मा व शुक्ल 2008) जो कि कोशिका-गलन, ऊतक-मृत्यु व कोशिकीय संरचना क्षय का कारण होता है।एसिड फास्फेटेज लाइसोसोम में पाया जाने वाला एन्जाइम है जो कि फास्फेट इस्टर बन्ध को तोड़कर कोशिका-क्षय में सहायक होता है। झींगा के गिल ऊतकों के व्यापक क्षय के संदर्भ में उक्त एन्जाइम की भूमिका भी संभावित हो सकती है।

इस शोध के परिणाम यह प्रदर्शित करते हैं कि डिटर्जेंट लीनियर एल्काइल बेन्जीन सल्फोनेट स्वच्छ जलीय झींगा के गिल की ऊतकीय सरंचना व उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित कर इनके जीवन को संकट में डालते हैं। स्वच्छ जलीय झींगा जलजीव-पालन उद्योग का महत्त्वपूर्ण घटक है एवं अर्थोपार्जन व विदेशी मुद्रा प्राप्त करने का महत्त्वपूर्ण साधन है। अतः डिटर्जेंट के अंधाधुंध उपयोग पर विचार करने की आवश्यकता है। स्वच्छ जलीय झींगा विषालुता के प्रति अति संवदेनशील होने के कारण डिटर्जेंट इत्यादि के संदर्भ में जैव-सूचक की भूमिका निभाने में सक्षम हो सकता है।

आभार


शोधकर्ता, डाॅ. सुधीश चन्द्र, विभागाध्यक्ष एवं डाॅ. जी. सी. मिश्र, प्राचार्य, बी. एस. एन. वी. पी. जी. काॅलेज लखनऊ व विभागाध्यक्ष, प्राणि विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ की सहायता व प्रोत्साहन के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।

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Chayachitra

स्नातकोत्तर प्राणि विज्ञान विभाग, बी. एस. एन. वी. पी. जी. काॅलेज, लखनऊ (उ.प्र.)-226001, भारतप्राणि विज्ञान विभाग, नवयुग कन्या महाविद्यालय, लखनऊ (उ.प्र.)-226004अ. प्रा. प्रोफेसर, प्राणि विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ(उ.प्र.)-226007, sanjiveshukla@gmail.com

Sanjive Shukla1, Richa Shukla and U.D. Sharma
P. G. Department of Zoology B.S.N.V. P. G. College, Lucknow-226001(U.P.) IndiaDepartment of Zoology, Navyug Kanya Mahavidyalaya, Lucknow-226004Retd. Professor, Department of Zoology, University of Lucknow-226007sanjiveshukla@gmail.com

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