विषाक्त मछलियाँ (Poisonous fish)

Submitted by Hindi on Sun, 05/29/2016 - 16:07

सारांश


अधिकांश विषाक्त मछलियाँ समुद्र तलहटी के प्रवाल द्वीपों के समीपस्थ समूहों में पाई जाती है। आविष इनके श्लेष्मा, रक्त, मांसपेशियों, जनद एवं अन्तरांगों में पाये जाते हैं। मीन विषाक्ता की मात्रा भोजन, वातावरण, समय, स्थान, प्रजननकाल आदि से सम्बंधित परिलक्षित होती है। मीन आविष विशिष्ट रसायनिक पदार्थ युक्त होते हैं तथा मनुष्य या अन्य स्तनी द्वारा खाने पर उनमें गम्भीर विपत्तिजनक लक्षण प्रकट होते हैं जो अन्ततः मृत्युकारक होते हैं। निःसन्देह मत्स्य आहार एक सुलभ, सुपाच्य पौष्टिक एवं संतुलित आहार है, किन्तु मछलियों के गुणधर्म एवं मानव उपयुक्तानुसार ही इनका चयन किया जाना चाहिए।

Abstract


Most of the poisonous fishes inhabit in deep ocean and tend to occur in large numbers around coral islands. The toxin is distributed in their mucus, blood, musculature, gonads and viscera of these fishes. Intensity of poison seem to be related with feeding, environment, time, habitat, reproductive cycle etc. Ichthyotoxins consists of specific chemicals and has been reported to cause several dangerous symptoms, leading to even death, if eatenby human beings and other mammals. Perhaps, fish is an easily available rich source of nutritious and balanced diet, yet be selected according to their characteristics and suitability as food for human beings.

मनुष्य के लिये अनाज के साथ ही मछली एक उपयुक्त एवं संतुलित आहार है। मछलियाँ विटामिन, खनिज, उच्चगुणी प्रोटीन एवं अल्प संतृप्त वसा युक्त होने के कारण एक अत्यन्त पौष्टिक आहार है। इसके अतिरिक्त मछली एक सुलभ, स्वादिष्ट, सुपाच्य आहार गुणवत्ता वृद्धि का सरल साधन है। ओमेगा-3 आयल, जो मस्तिष्क के न्यूरान की झिल्लियों में द्रवीय स्थिति उत्पन्न कर तंत्रिका संचार को सुगम बनाता है, की उपस्थिति के कारण इसे ‘ब्रेन फूड’ भी कहते हैं। अनुमान लगाया गया है कि विकासशील देशों में लगभग साठ प्रतिशत जनंसख्या प्रोटीनयुक्त भोजन हेतु मछलियों पर निर्भर है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता एवं सघन मत्स्य पालन से, सहज उपलब्धता के फलस्वरूप आज लगभग सत्तर प्रतिशत विश्व मत्स्य उत्पादन मानव द्वारा उपयोग किया जा रहा है।

सभी मछलियाँ मानव के भोजनोपयोगी नहीं होती है। विश्व में वितरित मछलियों में लगभग एक हजार से अधिक विषाक्त होती हैं। अपनी विषाक्तता के कारण वातावरण में यह कोई विशेष पारिस्थितिक समस्या उत्पन्न नहीं करती है। वह मछलियाँ जिनके ऊतक आंशिक अथक पूर्णरूपेण विषाक्त होते हैं इस समूह में समाहित है (होर तथा रैडल 1969)। कई मछलियाँ जीवाणु रोग जनकता एवं मृत्योपरांत अंतरागों के सड़ने के फलस्वरूप भी विषाक्त हो जाती है। मत्स्य विषाक्तता वस्तुतः मीन आविषता का पर्याय है। हैलस्टेड (1967) ने विषाक्त मछलियों को निम्न श्रेणियों में विभाजित किया है।

1. मीनाशन विषाक्त (इक्थियोसारकोटाक्सिक)- वह मछलियाँ जिनमें आविष उनके चर्म, मांस पेशियों या अंतरागों में पाये जाते हैं।

2. मीन विषाक्त (इक्थियोटाक्सिक)-वह मछलियाँ जिनमें आविष प्रायः इनके जनदों में सीमित होते हैं। इनकी जनद सक्रियता तथा आविष मात्रा अंतरसंबंधी होते हैं। इनसे उत्पन्न अंडे भी विषाक्त होते हैं।

3. मीन रक्त विषाक्त (इक्थियोहीमोटाक्सिक)- इन मछलियों के रक्त में आविष पदार्थ पाये जाते हैं।

4. मीन श्रावविषाक्त (इक्थियोक्रिनोटाक्सिक)- वह मछलियाँ जिनमें आविष ग्रन्थिश्राव द्वारा उत्पन्न होता है, परन्तु विशिष्ट दंश उपकरण अनुपस्थित होता है। ऐसी मछलियाँ अंतचर्म में निहित ग्रन्थियों द्वारा आविष श्रावित करती है जो अंततः वातावरण में निर्मुक्त हो जाता है।

अधिकांश मछलियाँ प्रायः प्रवालभित्ति क्षेत्रों में पाई जाती हैं। वे इन प्रवालद्वीपों के समीप ही अधिकाधिक संख्या में वास करती हैं। विषाक्त मछलियाँ ज्यादातर अप्रवासी होती हैं। कुछ मछलियों में विषाक्तता सदैव पायी जाती है, जबकि अन्य में विशिष्ट समय अथवा स्थान पर ही परिलक्षित होती है। रसेल(1965) के अध्ययन से विदित है कि मछलियों में विषाक्तता की मात्रा समय, वातावरण एवं स्थान के अनुरूप परिवर्तित होती रहती है। मीन विषाक्तता के निम्न कारण प्रतिपादित किये गये हैं-

क) प्रायः विषाक्त समुद्री पादपों को खाने के कारण।
ख) विषाक्त प्रोटिस्ट जीवों (विशेषकर डाइनोफ्लैजलेट) के अशन के कारण
ग) प्रवालो, जेलीफिश, मोलस्क, पलैलोवर्म आदि को संवरण करने के कारण
घ) समुद्र का कालुष्य/प्रदूषण
च) वातावरणीय परिवर्तन
छ विघितनाभिक एवं भारी धातुओं का समुद्र में निक्षेप
ज) अंडजनन क्रियायें
झ) त्वचा द्वारा उत्पन्न अंतःपदार्थ व उपापचय क्रियायें।
ट) चन्द्र प्रकाश की अनाश्रयता

इन विषाक्त मछलियों के खाने से विभिन्न प्रकार की निम्नांकित विषाक्तता उत्पन्न होती है-

मीनाशन विषाक्त


ऐसी विषाक्तता उन मछलियों के खाने से होती है, जिनमें विष वाह्य त्वचा, श्लेष्मा, मांस पेशियों एवम अंतरांगों में पाये जाते हैं। विशिष्ट समूह की मछलियों में विषाक्त गुणधर्म भिन्न होते है। उदाहरणार्थ-

साइक्लोस्टोम विषाक्तता - प्रायः लैम्प्रे व हैगफिश जिनके श्लेष्मा में विषाक्तता पाई जाती है, के खाने से उत्पन्न होती है। श्लेष्मा आविष के रासायनिक अथवा भेषजीय प्रवृत्ति के बारे में जानकारी नगण्य है।

इलैस्मोब्रैंक विषाक्तता- शार्क मछलियों के मांस खाने से विषाक्तता देखी की गई है। कूपर(1964) ने अंकित किया है कि टाइगर शार्क, श्वेत लैगून शार्क व अन्य के यकृत में आविष पाया जाता है। इनके खाने से मनुष्यों में जठराँत्र व तंत्रिकीय विकार शीघ्र एवं गम्भीर परिलक्षित होते है। ग्रीनलैंड में सोम्नियोसस माइक्रोसिफैलस शार्क के ताजा मांस सेवन से प्राणघातक विषाक्तता देखी गई है (बोजे,1939)। हेल्सटेड व शाल (1958) ने पाया कि ग्रे रीफ शार्क के यकृत व जनद विषाक्त होते हैं। जिनमें कोलीनइस्टरेज विरोधी पदार्थ पाये जाते है। कतिपय स्केट, रेव रैट मछलियों भी विषाक्त होती है। इलैस्मोब्रैंक विषाक्तता को जटिल एवं भिन्न हेतु विज्ञानी बताया गया है।

सिगुआटेरा विषाक्तता


लगभग 440 समुद्री विषाक्त मछलियाँ इस श्रेणी में आती हैं। ऐसी अधिकांश मछलियाँ प्रायः तलहटी में, अधिकतर लैगून व प्रवालभित्ति के आसन्न निवसित होती है। ये शैवाल, छोटी मछलियों व अन्य सूक्ष्म जीवों को खाती है (रैन्डल, 1958)। एक ही प्रजाति में प्राय बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों की अपेक्षा अधिक विषाक्त होती हैं। इन मछलियों में मांस व जनद की अपेक्षा यकृत अधिक विषाक्त होता है। वैज्ञानिकों ने मछलियों की सिगुआटेरा विषाक्तता को उनकी खाद्य श्रृंखला से सहसंबंधित माना है (रैन्डल, 1958, हेलफ्रिश व बैनर, 1963, कूपर 1964)। इन मछलियों में आविष का श्रोत तलहटी समु्रदी शैवाल लिंगबुआ मैजस्कुटा, प्लेक्टोनीमा टेरेब्रैंस से माना जाता है। ‘सिगुआटाक्सिन’ जल एवं तनु अम्ल में अघुलनशील, वसीय पदार्थहै। श्यूअर आदि(1967) ने इसे एक चतुष्क नाइट्रोजन परमाणु, एक या अधिक हाइड्राक्सिल समूह तथा साइक्लोपेन्टोन अर्धांश युक्त वसीय रासायनिक पदार्थ विश्लेषित किया है। इस समूह की मछलियों के अशन से मनुष्य में त्वरित रक्तचाप में ह्रास तथा श्वसन गति युगपत में वृद्धि उत्पन्न होती है। बैनर आदि (1963) ने स्तनी के तंत्रिका पेशीय संचारण पर सिगुआटाक्सिन के प्रभाव को इंगित किया है। अभिनव प्रायोगिक तथ्यों से प्रतीत होता है कि यह आविष वस्तुतः एन्टीकोलीनइस्टरेज से कुछ अधिक ही है (रेनर आदि 1968) जो श्वासावरोध माध्यम से मृत्युकारक होता है। इसके अतिरिक्त सिगुआटेरा आविषी मछलियों के उपयोग से स्तनधारियों में पेशीय दुर्बलता, पेशीय असमन्वयन, वमन, अतिसार, श्वसन व्यथा तथा परानुकम्पी क्रियाओंमें वृद्धि जैसे लक्षण परिलक्षित होते हैं।

टेट्राडान विषाक्तता


टेट्राडान्टीफार्मीस वर्ग की अधिकांश मछलियाँ जैसे कि पफर फिश, सन फिश, पारकूपाइन फिश, ट्रिगर फिश, स्पाइक फिश, ट्रंक फिश, फाइल फिश आदि विषाक्त होती हैं। अधिकांश मछलियों में आविष जनद, यकृत, आंत्र, त्वचा एवं मांस में समाहित होता है। उनमें आविष की उपस्थिति एवं मात्रा इनकी प्रजनन चक्र से सहसंबंधित है, तथा अधिकतम मात्रा अंडजनन के ठीक पूर्व पाई गई हे। इन मछलियों का आविष ‘टेट्राडोटाक्सिन’ (टीटीएक्स) एक एमीनोपरहाइड्रोक्यूनाजोलीन यौगिक है। (वुडवर्ड, 1964, मोशर आदि, 1964) जो अति शक्तिशाली प्रोट्रीन रहित आविष है। इन मछलियों के खाने से आविष सुगमता एवं शीघ्रता से मुख व जठरांत्र द्वारा अवशोषित कर दिया जाता है। कोइजुगी आदि (1967) ने पाया कि आविष की अल्पमात्रा भी उपभोक्ता के श्वसनगति, हृदय स्पंदन, वाहिका प्रेरक एवं वाह्यक गतिविधियों को क्रमशः समाप्त कर देता है। आलस्य, पेशीय शिथिलता,शारीरिक क्रियाओं में समन्वय का अभाव जैसे प्रारम्भिक लक्षण भी परिलक्षित होते हैं। आविष का सीधा प्रभाव फ्रीनिक तंत्रिका के माध्यम से मस्तिष्क के श्वसन संचालन केन्द्र पर होता है, जिससे श्वसन अवरोध तत्पश्चात मृत्यु हो जाती है (चेमल आदि 1962, ली, 1963)। जापान में पफर फिश एक बहुमूल्य स्वादिष्ट व्यंजन के रूप में प्रचलित है। इससे निर्मित भोजन के असन से ओंठ व जिहवा में हल्की आनन्ददायक चुनचुनाहट उत्पन्न होती है। इसकी लत से हजारों व्यक्ति अंगघातग्रस्त होकर मर जाते हैं(कांव, 1968)।

fishस्कामब्रायड विषाक्तता- स्कामब्रायडी कुल की मछलियाँ उदाहरणार्थ-टयूना, स्किपजैक, बोनिटोस, स्काम्बर आदि भी विषाक्त होती है। इन मछलियों के अनुपयुक्त परिरक्षण से एक विशिष्ट प्रकार का आविष ‘साउरीन’ इनके मांसपेशियों में बन जाता है, जो हिस्टामीन व एसिटिलकोलीन गुणसम है यद्यपि रासायनिक रूप से भिन्न है।

क्लूपिआयड विषाक्तता- हेरिंग, एन्कोवीस, टारपोंस, स्किल हेड आदि मछलियाँ भी विषाक्त होती हैं। इनमें विषाक्तता इनकी विषाक्तता इनकी खाद्य श्रृंखला से संबंधित होती है जो वर्ष के विभिन्न ऋतुओं में भिन्न होती है।

जिम्पाइलिड विषाक्तता- कैस्टर आयल व काड मछलियों में तरल मोम की अधिक मात्रा पाई जाती है जो प्रायः सेटिल व ओलिल ईस्टर युक्त होते हैं। इन मछलियों के खाने से मनुष्य में वसीय स्वेद व अतिसार के लक्षण विदित हैं।(मोरी आदि,1966)।

मीनश्राव विषाक्तता


कुछ मछलियाँ जैसे सोपफिश, बाक्सफिश आदि, त्वचा से विशिष्ट आविष पदार्थों का श्रावण करती हैं जो वातावरण में निर्मुक्त होता रहता है तथा सम्पर्क में आने वाले जीवों के लिये विपत्ति जनक एवं मृत्युकारक हो सकता है (मारेट्जकी व डेल कैस्टिलो 1967)। प्रतीत होता है कि यह श्राव मछली सम्भवतः सम्भावित आक्रामक परभक्षी को सचेत करने तथा अपने प्रतिरक्षा हेतु करती है (फ्रीफर,1962)। जल एवं कार्बनिक विलायकों में घुलनशील, तापअचल, अम्ल व क्षारीय विलयनों में स्थिर ‘आस्ट्रेसिटाक्सिन’ आविष का अध्ययन थाम्सन ने 1964 में किया।

निष्कर्ष


स्पष्टतः प्रतीत होता है कि विषाक्तता का गुण इन मछलियों को आक्रामक परभक्षियों को चेतावनी देने, स्व-सुरक्षा, आवास रक्षा, जनन वृद्धि एवं समष्टि विसर्जन हेतु सहायक एवं उपयोगी है। निःसंदेह मानवोपयोगी आठ आवश्यक एमिनोएसिड जो शरीर द्वारा संश्लेषित नहीं कियेजा सकते हैं, मछलियों में सुलभ हैं तथा भोजन के माध्यम से आसानी से ग्रहण किये जा सकते हैं, पर आवश्यकता है कि मछलियों के गुणधर्म एवं मानव उपयुक्तता व अनूकूलता के अनुसार ही उनका भोजन में उपयोग किया जाय।

आभार


अनवरत प्रोत्साहन एवं समसामयिक सुझावों हेतु लेखक, प्रो. आर. एस. टन्डन, डी. एस सी., पूर्व विभागाध्यक्ष प्राणि विज्ञान एवं डीन, विज्ञान संकाय, कुमायूँ विश्वविद्यालय का आभारी है।

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सुधीश चन्द्र
एसोसिएट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जन्तु विज्ञान विभाग, बी. एस. एन. वी. पी. जी. काॅलेज, लखनऊ(उ. प्र.)-226001, भारत, sudhish1953@gmail.com

Sudhish Chandra
Associate Professor and Head, Department of Zoology, B. S. N. V. P. G. College, Lucknow(U.P.)-226001, India, sudhish1953@gmail.com

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