बुन्देलखण्ड और अकाल का परिप्रेक्ष्य

Submitted by RuralWater on Mon, 06/20/2016 - 12:09
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‘बिन पानी सब सून’ पुस्तिका से साभार, 5 जून 2016

 

अकाल और उसके बाद

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया, सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर, छिपकलियों की गस्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त


दाने आए घर के अन्दर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन से ऊपर, कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आँखें, कई दिनों के बाद

कौए ने खजुलाई पाँखें कई दिनों के बाद

बाबा नागार्जुन

सूखा और अकाल आज बुन्देलखण्ड की पहचान बन गई है। लेकिन बुन्देलखण्ड हमेशा से ऐसा नहीं था। यहाँ गाँव-गाँव में पानी से लबालब तालाब थे। बेतवा, केन, धसान और ब्योरमा नदी का प्रवाह तथा बारहमासी नाले यहाँ के जीवन और आजीविका को संचालित करते थे। यहाँ की जमीन खाद्यान, फलों और पपीते की खेतों के लिये उपयोगी रही है।

जंगल में महुआ, हर्र, बेहड़ा। आँवला, आम, बैर, करोंदा, चारौली जैसे कीमती फल देने वाले पेड़ मौजूद रहे हैं। कीमती लकड़ी के सागौन व सरई जैसे पेड़ आज भी यहाँ दिखाई देते हैं। यह क्षेत्र लोहा, सोना, चाँदी, शीशा, हीरा, पन्ना आदि से समृद्ध रहा है। यहाँ चूना पत्थर भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।

विंध्य पर्वत पर पाई जाने वाली चट्टानों के नाम उसके आसपास के स्थान के नामों से प्रसिद्ध है जैसे- मांडेर का चूना का पत्थर, गन्नौर गढ़ की चीपें, पन्ना का चूना का पत्थर, विजयगढ़ की चीपें इत्यादि। बुन्देलखण्ड पान के उत्पादन के लिये भी प्राचीन काल से विख्यात है। यहाँ हर साल करीब पाँच से छह करोड़ रुपए के देशावरी पान का निर्यात होता है। उत्तर प्रदेश का ललितपुर और मध्य प्रदेश का छतरपुर पान के उत्पादन के लिये जाना जाता था।

बुन्देलखण्ड का भौगोलिक क्षेत्र लगभग 700000 वर्ग कि.मी. है। जो कि उसे एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में उकेरती है।

इसमें मध्य प्रदेश के 6 और उत्तर प्रदेश के 7 जिले शामिल हैं। किन्तु ऐतिहासिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद आज यह सूखाग्रस्त है। यहाँ खेती के लिये पानी नहीं है, पेट भरने के लिये अनाज नहीं, प्यास बुझाने को पानी नहीं है और हाथों को रोजगार नहीं है। रोजगार की तलाश में लोग पलायन कर रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह सवाल महत्वपूर्ण रूप से सामने आता है कि बुन्देलखण्ड की यह दशा कैसे हुई? हमारी कौन सी नीतियाँ और कौन सी कार्यं प्रणाली इसके लिये जिम्मेदार है?

बताया जाता है कि बुन्देलखण्ड में 12000 से अधिक तालाब हुआ करते थे। आज इनमें से सिर्फ 1300 तालाब ही शेष रह गए हैं, बाकी तालाब या तो भूमाफियाओं के चंगुल में आकर रिहायशी कॉलोनियों में तब्दील कर दिये गए या किसी के फार्महाउस में बदल दिये गए।

कई तालाबों के आसपास की जमीन पर कब्जा कर उन्हें बाँध दिया गया है, जिस कारण बारिश का पानी तालाबों में इकट्ठा होने के बजाय इधर-उधर बहकर नष्ट हो जाता है। दरअसल सूखा गए सतही पानी को वापस संजोने की संजीदा कोशिश की जगह इंजीनियरों की रुचि हमेशा ही भूजल खींचने वाली मशीनों में ज्यादा रही है।

मनरेगा के तालाबों में पानी आने के रास्ते नहीं हैं। नहरों में पहले ही धूल उड़ रही है। इससे बुन्देलखण्ड में सिंचाई और पेयजल का नया संकट खड़ा हो गया है। बुन्देलखण्ड में औसतन 70000 लाख टन धन मीटर पानी हर साल वर्षा द्वारा उपलब्ध होता है। किन्तु इसका अधिकांश भाग तेज प्रवाह के साथ निकल जाता है।

केन्द्रीय सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के भौंमजल सांख्यिकी 1985 के अनुसार बुन्देलखण्ड में 131021 लाख घन मीटर जल प्रतिवर्ष उपलब्ध रहता है। इस विशाल भण्डार में केवल 14355 लाखा घन मीटर जल का ही उपयोग किया जाता है। शेष 116666 लाख घन मीटर पानी प्रतिवर्ष अछूता ही रह जाता है। यानी पूरी क्षमता का 10.95 प्रतिशत ही उपयोग में लिया जाता है।

सतही जल का संचयन ही यहाँ की खेती, मवेशी व समृद्धि का आधार रहा है। जल की समृद्धि का आधार होते हैं- नदी, तालाब, मेड़बन्दियाँ और जंगल चन्देलों ने इन्हीं को समृद्ध कर यहाँ की समृद्धि कायम रखी। ध्यान देने की बात है कि जहाँ नदी, तालाब व जंगल पर हमला सबसे ज्यादा हुआ, वहीं आत्महत्याएँ हुई- दमोह, टीकमगढ़, बांदा, महोबा, हमीरपुर और चित्रकूट करीब 70 हजार लोगों के अकेले इसी इलाके से पलायन का आँकड़ा है।

यह बुन्देलखण्ड का वह हिस्सा है, जहाँ के जंगल आज पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुके हैं। खनन पर कोई नियंत्रण नहीं है। तालाबों पर बड़े पैमाने पर कब्जे हैं। भूजल स्तर में प्रतिवर्ष 5 से 50 सेमी. तक की गिरावट आ रही है। समझने की बात है कि अंग्रेजों के आने के बाद का पहला बड़ा अकाल यहाँ क्यों आया?

यूँ बुन्देलखण्ड में अकाल का जिक्र मोहम्मद बिन तुगलक के भारत प्रवेश के वक्त भी मिलता है। किन्तु इतिहास प्रमाण है कि बुन्देलखण्ड में अकाल का पहला सबसे बुरा व लम्बा दौर तब आया, जब 19वीं सदी में अंग्रेजों ने जंगलों का अधिग्रहण किया। सन 1865 से 1889 तक का अकाल और फिर पूरी 20वीं सदी बुन्देलखण्ड के हिस्से में अकाल-ही-अकाल लाई। समझना होगा कि 950 मिमी. औसत की वार्षिक वर्षा कम नहीं होती।

राजस्थान व गुजरात में बुन्देलखण्ड से काफी कम बारिश के कई इलाके हैं, लेकिन कम पानी के बावजूद उन्होंने अपने मवेशी, जंगल व चारागाहों को मरने नहीं दिया।

बुन्देलखण्ड में पिछले कुछ सालों में बरसात बहुत कम हुई किन्तु जो भी बारिश हुई, उसके पानी को सहेजने के लिये तालाब नहीं है। पुराने तालाब मिट्टी से भरने लगे और नए तालाब ठीक से बने नहीं। जो तालाब बन रहे हैं उनमें कई जलग्रहण क्षेत्र से बाहर है, यानी उनमें पानी नहीं रुकता। इस तरह तालाब के जरिए पानी को सहेजने की परम्परा खत्म होती चली गई।

इसका असर भूजल के रिचार्ज पर पड़ा और मवेशियों तथा लोगों के उपयोग के लिये जरूरी पानी गायब होता चला गया। पानी के संकट के साथ ही खेती की लागत में बढ़ोत्तरी ने किसानों की कमर तोड़ दी। नए बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रचार-प्रसार का असर यहाँ भी हुआ और लोगों ने कर्ज लेकर खेती शुरू की। अवर्षा, पाला और इल्लियों के कारण फसल उपज नहीं दे पाई, किन्तु कर्ज पर ब्याज दिन-पर-दिन बढ़ता गया। इस दशा में कई किसानों ने हताश होकर आत्महत्या जैसे कदम उठाए और कई सीमान्त किसान और मजदूर पलायन को विवश हो गए।

बुन्देलखण्ड पिछले 21 वर्षों से सूखे की मार झेल रहा है। यहाँ तालाब, कुएँ तथा हैण्डपम्प साल के दस महीने सूखे रहते हैं। भूजल अत्यन्त नीचे जाकर भी गिरावट से थमने का नाम नहीं ले रहा। नदियाँ बरसात के दिनों में भी अपने बाँधों को क्षमता के अनुसार भर नहीं पा रही। खेती अनुपजाऊ हो चली है। अस्सी के दशक के अन्त में यहाँ से बड़े पैमाने पर लोग पलायन करने लगे और उन्नसवीं सदी पूरी होते-होते यहाँ का बड़ा और मंझौला किसान कर्जदार हो गया था।

गरीबी और कुपोषण के चलते बच्चों की मौतें तथा कर्जदाताओं का कर्ज अदा न कर पाने के कारण उनके द्वारा आत्महत्या की खबरें सन 2001 से आने लगी थी। सन 2006-07 में भूजल के नीचे जाने से गाँवों तथा शहरों में पेयजल का संकट गहरा गया। ये सभी समस्या आज न सिर्फ कायम है, बल्कि ज्यादा गम्भीर रूप लेने लगी है।

बुन्देलखण्ड में पिछले लगभग एक दशक में सबसे अच्छी वर्षा 2012 और 2013 में ही हुई। बाकी के साल अल्प वर्षा के रहे। 2013 का साल अति वर्षा का रहा और 2012-13 में भी आँधी-तूफान और ओलावृष्टि ने फसलों का काफी नुकसान किया। यानि कह सकते हैं कि बुन्देलखण्ड में किसानों के लिये पिछला दशक अच्छा नहीं रहा है। 1 0-1 2 सालों से अल्प वर्षा और कभी-कभार अति वर्षा और ओलावृष्टि की मार झेलते-झेलते बुन्देलखण्ड के किसान और किसानी दोनों टूट गए हैं।

आज बुन्देलखण्ड में किसान और खेतीहर मजदूर सबसे बुरे दौर में हैं। आये दिन सूखी फसलों को देखकर सदमे से किसानों की मौत हो रही है। इस साल के सूखे में पूरे बुन्देलखण्ड के गाँवों में कई खेत खाली छोड़ दिये गए। कुछ इलाकों में जो थोड़ी बहुत फसल हो भी गई थी, ओलावृष्टि ने उसे नष्ट कर दिया है। चर्चा में यह बात सामने आई कि सर्वेक्षित क्षेत्र में मुश्किल से 5 से 20 प्रतिशत किसानों की फसल खेत से घर पहुँच पाई है।

कुदरत की मार से जूझ रहे किसानों के साथ ही बेजुबान जानवरों की तो शामत आ गई है। सूखी धरती पर घास का तिनका-तिनका सूख जाने की वजह से चारे का भयानक अकाल है। लगातार अवर्षा के कारण धरती सूखी और पथरीली हो गई है। ऐसे में कटीली घासें ही उग पा रही हैं। अच्छी घासों का उगना असम्भव हो चला है। भूख से त्रस्त गायें और बकरियाँ कटीली घासों को भी खा रही हैं। इस तरह की घास उनकी सेहत को गम्भीर नुकसान पहुँचा रही है और पशुओं में लकवा जैसी बीमारी फैलने की आम शिकायत आ रही है।

यहाँ लोगों के लिये खाने से ज्यादा गम्भीर पानी का संकट हो चुका है। ज्यादातर गाँवों के ट्यूबवेल और हैण्डपम्प सूख चुके हैं। कुएँ बहुत पहले ही जवाब दे चुके हैं। भूजल की स्थिति बद-से-बदतर हो चुकी है। केन्दीय भूजल बोर्ड ने कहा है कि बुन्देलखण्ड में भूजल स्तर रोजाना 3-6 इंच गिर रहा है।

कहीं-कहीं तो जलस्तर 400 फीट से भी नीचे पहुँच चुका है यह स्पष्ट है कि बुन्देलखण्ड की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सर्वाधिक सम्पन्न रही है। उसमें अकाल और सूखे का कोई स्थान नहीं था। किन्तु प्राकृतिक संसाधनों, जलस्रोतों तथा असमान वितरण ने इस क्षेत्र को अकाल की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है।

सरकार द्वारा घोषित राहत पैकेज के बाद भी यह अकाल से मुक्त होता दिखाई दे रहा है। अकाल की इस परिस्थिति में राहत के कुछ तात्कालिक प्रयास तो करने ही होंगे, किन्तु इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से सीख हासिल कर दूरगामी प्रयास भी आवश्यक है। तभी बुन्देलखण्ड को अकाल और सूखे से मुक्त किया जा सकेगा।


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