जलविद्युत परियोजनाओं से छलनी होते हिमालय के पहाड़

Submitted by Hindi on Sat, 07/02/2016 - 12:25

400 मेगावाट विष्णुप्रयागवैसे भी उत्तराखण्ड में 558 छोटी एवं बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। कुछ पर निर्माण कार्य आरम्भ हुआ तो लोगों के विरोध और 2013 की आपदा के कारण निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं की पोल खुल गई। यह भी जग जाहिर है कि जहाँ-जहाँ जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण चल रहा था, वहाँ-वहाँ प्राकृतिक उथल-पुथल ज्यादा ही हुई। भले सत्ता में बैठे लोग अपने-अपने तर्क बुनते हों मगर आपदाओं का केन्द्र बिंदु निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं का ही क्षेत्र था। यही नहीं जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध के कई और कारण भी हैं। कोई बिना पर्यावरण की स्वीकृति के निर्माण कर रहा है तो किसी के डीपीआर में कुछ है और स्थानीय कार्य कुछ और ही हो रहे हैं। इसका जीता-जाता उदाहरण सिंगोली भटवाड़ी निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजना है। यह परियोजना इस प्रचलित स्थान पर बन ही नहीं रही है। यह तो रयाड़ी-चप्द्रापुरी में बन रही है। यही वजह है कि 24 छोटी-बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का काम पिछले कई वर्षों से लटका पड़ा है।

जल विद्युत परियोजनाउल्लेखनीय हो कि उत्तराखण्ड में 24 छोटी-बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का काम पिछले कई वर्षों से लटका पड़ा है। गैर सरकारी संगठनों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का कहना है कि इन परियोजनाओं की वजह से पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। 2013 की त्रासदी के लिये भी वे काफी हद तक जलविद्युत परियोजनाओं को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। एनजीटी और कुछ संगठनों की आपत्तियों के बाद ऐसे मामले अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। एनजीटी का कहना है कि वन एवं पर्यावरण के प्रावधानों के अनुपालन के बाद ही इन परियोजनाओं को मंजूरी मिलनी चाहिए। हालाँकि केंद्र, राज्य सरकार और उत्तराखण्ड जलविद्युत निगम ने अदालत में हलफनामा दाखिल करके कहा है कि परियोजनाओं के निर्माण में सभी प्रावधानों का पालन किया जा रहा है।

दरअसल, उत्तराखण्ड सरकार ने वर्ष 2005 से 2010 के बीच दो दर्जन से अधिक जलविद्युत परियोजनाओं की मंजूरी दी। तीस हजार करोड़ की लागत वाली इन परियोजनाओं के पूरा होने से 2944.80 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। गैर सरकारी संगठनों की ओर से एक-एक कर 24 छोटी-बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का मामला अदालत में पहुँचा दिया। इस प्रकरण में एनजीटी भी शामिल हो गई। और अदालत के आदेश पर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने विशेषज्ञों की 12 सदस्यीय समिति गठित की। कई महीनों के अध्ययन के बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को दे दी। अब मंत्रालय की ओर से यह रिपोर्ट अदालत को सौंप दी गई है।

 

जलविद्युत परियोजनाओं का मामला अदालत में विचाराधीन है। परियोजनाओं को मंजूरी देते समय सभी निर्धारित प्रावधानों का परीक्षण किया गया है। अदालत का फैसला आने के बाद ही इन परियोजनाओं का भविष्य तय हो सकेगा। - एसएन वर्मा (प्रबंध निदेशक, उत्तराखण्ड जलविद्युत निगम)

 

(लेखक एनएफआई के फैलो)ज्ञात हो कि जिन परियोजनाओं का काम लटका है, उसमें बाल गंगा- दो, झाला कोटी, भैरव घाटी, जालद्रीगढ़, सियानगढ़, ककोरागढ़, कोटलीभेल, कारमोली, जाढ़गंगा, रामबाड़ा, कोटलीभेल-दो, अलकनंदा, खिराव गंगा, उर्गम - दो, लाटा तपोवन, मालारीझेलम, जेलमतमक, तमकलाटा, भयंदरगंगा, ऋषिगंगा एक और दो, बिराहीगंगा - एक, गोहना ताल जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।

- 2944.80 मेगावाट की परियोजनाओं पर खर्च होने हैं 30,000 करोड़
- केंद्र, राज्य सरकार 2005-06 में दे चुकी हैं कई योजनाओं की मंजूरी

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

.
प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

नया ताजा