सूखे जलाशयों में 15 दिनों में पानी ले आया रिटायर इंजीनियर

Submitted by Hindi on Mon, 07/18/2016 - 10:11
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दैनिक भास्कर, 20 जून, 2016

कुएँ, बावड़ी, पहाड़ी जलाशय, तालाब आदि पर हमारी निर्भरता थी। इनका ध्यान नहीं रखने से इनमें पानी के स्रोत बंद हो गए। इन पर कार्य किया जाए तो पानी फिर आएगा और हरियाली लौट आएगी। हरियाली से बारिश ज्यादा होगी। साथ ही गिरते भूजल स्तर पर भी रोक लगेगी।

देश में प्राकृतिक जलस्रोतों में तेजी से कमी आ रही है। इन्हीं स्रोतों पर निर्भर आबादी के सामने पीने के पानी का बड़ा संकट है। ऐसे में राजस्थान के रिटायर्ड सिविल इंजीनियर राजदीप शर्मा ने इन्हें बचाने का बीड़ा उठाया। अपनी विशेष तकनीक के जरिए उन्होंने अब तक पाँच सूखे जलाशयों को लबालब पानी से भर दिया। वे दोबारा नहीं सूखे। हाल ही में अरावली की पहाड़ियों पर एक ऐसे स्थान पर वे महज 15 दिन में ही पानी ले आए, जो 20 साल से सूखा पड़ा था। शर्मा ने विशेष तकनीकी के आधार पर पाया कि यहाँ के जलस्रोत को फिर से खोला जाए तो पानी आ सकता है। पानी निकालने के लिये जगह की पहचान की। करीब दस फीट तक मिट्टी निकालने के बाद इस स्थान पर पानी की बूँदे निकलने लगी। चट्टानों के बीच की मिट्टी हटाई तो पानी का रिसाव बढ़ गया। नली लगाई तो पतली धार से पानी आने लगा। यहाँ बारिश के समय बहने वाला झरना अधिक समय बहेगा।

इंजीनियर शर्मा ने बताया कि पहाड़ों पर चट्टानों के बीच की खाली दरारों में भरी रेत व मिट्टी एक तरह से पानी की नसें की तरह कार्य करते हैं। इन्हीं में रिसकर पहाड़ों से पानी आता है। अनदेखी से यह सिस्टम बंद हो जाते हैं और वहाँ के जलाशय सूख जाते हैं। सूखे पड़े जलाशय में चींटी और अन्य तरह के जीव के बिल हो, तो जमीन के अंदर नमी की सम्भावना बनती है। इसका अर्थ यह है कि पहाड़ी क्षेत्र में जलस्रोत है। ऐसे ही कुछ और कारणों से वे जल स्रोत होने का पता लगाते हैं।

टनल बनाते समय पानी रिसा तो होल बनाकर कुएँ तक ले गए


अलवर जिले में जिंदौली की सुरंग बनाते समय उन्होंने पहाड़ों में जलस्रोतों में पानी के आने की तकनीक सीखी। 1996 में पहाड़ की तलहटी में सुरंग निकालते समय खुदाई करते तो पानी का रिसाव होता मिलता। इससे सुरंग बनाने में दिक्कत आती। इसे रोकने के लिये उन्होंने विशेष व्यवस्था की। इसके तहत टपकते पानी को नलियों के माध्यम से कुएँ में लाए। कुएँ को रीचार्ज किया। इसके लिये विशेष होल बनाए।

यहाँ सूख चुका था पानी, फिर ले आए 1998: जिंदोली की घाटी से निकले पानी को विशेष होल बनाकर कुएँ तक ले गए और रिचार्ज किया।

 

2002

पहाड़ी भाग में बनी करणी माता की सूखी बावड़ी के पानी के स्रोत खोले। इससे बावड़ी में अब तक पानी है।

2006

भर्तृहरि धाम में एक आश्रम में छोटी टंकी बनाकर उसे पहाड़ी के पानी से भरने की व्यवस्था की।

2007

सूख गए किशन कुंड के जलस्रोत को फिर शुरू किया। किशन कुंड में भी अब तक पानी है।

 

पुराने जलाशयों में फिर पानी लौट सकता है


कुएँ, बावड़ी, पहाड़ी जलाशय, तालाब आदि पर हमारी निर्भरता थी। इनका ध्यान नहीं रखने से इनमें पानी के स्रोत बंद हो गए। इन पर कार्य किया जाए तो पानी फिर आएगा और हरियाली लौट आएगी। हरियाली से बारिश ज्यादा होगी। साथ ही गिरते भूजल स्तर पर भी रोक लगेगी। - राजदीप शर्मा, रिटार्यड सिविल इंजीनियर

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