दूसरों की गलती का खामियाजा

Submitted by Hindi on Mon, 07/18/2016 - 11:52
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सर्वोदय प्रेस सर्विस, 15 जुलाई, 2016

प्रशांत महासागर क्षेत्र में स्थित सालोमन द्वीप समूह के अनेक द्वीप बढ़ती समुद्री सतह से डूब गए हैं और अन्य कई डूबने वाले हैं। वैश्विक आकलन से तीन गुनी तेज रफ्तार से समुद्र की सतह बढ़ रही है और संकट अनुमान से बहुत पहले कहर बनकर बरपेगा। क्या हम किसी दैवीय चमत्कार की आशा लगाए हुए हैैं?

जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप मानवता के सामने प्रस्तुत सबसे बड़ी चुनौतियों में समुद्र का स्तर बढ़ना, कटाव व तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का आना शामिल है। हाल ही में दूरस्थल सालोमन द्वीप में स्थित कम से कम पाँच चट्टानी द्वीप समुद्र की सतह में वृद्धि और तटीय क्षरण की वजह से पूरी तरह से डूब गए और छः अन्य कटाव की वजह से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। ये द्वीप एक से पाँच हेक्टेयर क्षेत्रफल (समुद्र) के थे। यहाँ पर सघन वनस्पति मौजूद थी जोकि कम से कम 300 वर्ष पुरानी थी। नौतांबु द्वीप जोकि 25 परिवारों का निवास था, का आधे से अधिक रहवासी इलाका डूब चुका है और सन 2011 से अब तक समुद्र 11 घर लील गया है। यह पहला वैज्ञानिक तथ्य है जोकि ‘इन्वायरमेंट रिचर्स लैटर्स’ में प्रकाशित हुआ है। इससे यह साबित हुआ है कि प्रशांत क्षेत्र में जो तमाम किस्से जलवायु परिवर्तन और वहाँ के निवासियों पर पड़ रहे नाटकीय प्रभावों को लेकर सुनाई दे रहे हैं, उनमें सच्चाई है।

विश्व के लिये चेतावनी


प्रशांत क्षेत्र के पूर्व में तटीय जलमग्नता के खतरों को लेकर हुए अध्ययन एवं परीक्षणों में पाया गया था कि यह द्वीप वास्तव में समुद्र सतह वृद्धि के जोखिम से तारतम्य बैठा लेंगे और कई बार तो उनमें विस्तार भी हो सकता है। हालाँकि इस क्षेत्र में अध्ययन इस आधार पर किए गए थे कि यहाँ समुद्र की सतह में वृद्धि 3-5 मिलीमीटर प्रतिवर्ष होेगी जोकि मोटे तौर पर वैश्विक औसत 3 मि.मी. प्रतिवर्ष के समकक्ष बैठती है। परन्तु 20 वर्षों से सालोमन द्वीप समुद्र सतह में वृद्धि के लिये सुर्खियों में है। यहाँ पर सन 1993 से समुद्र की सतह प्रतिवर्ष तकरीबन 7 से 10 मि.मी. प्रतिवर्ष की रफ्तार यानि वैश्विक अनुमान से तीन गुना ज्यादा बढ़ रही है।

इस स्थानीय उच्च वृद्धि दर के लिये आंशिक तौर पर प्राकृतिक जलवायु विषमता जिम्मेदार है। यह उच्च दरें पूरे प्रशांत क्षेत्र में इस शताब्दी की दूसरी अर्धशताब्दी में घटी मानवीय गतिविधियों का परिणाम है। यहाँ के अनेक क्षेत्रों को इसी तरह से उच्च समुद्री सतह वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है। परंतु त्रासदी यह है कि यह सभी बहुत कम प्रदूषण उत्सर्जन करते हैं। प्राकृतिक परिवर्तन और वैश्विक आवागमन भी वैश्विक दर से ज्यादा डूब आने के लिये जिम्मेदार हो सकते हैं। अतएव हमें सालोमन द्वीपों की वर्तमान स्थिति पर गहरी नजर रखनी होगी जिससे कि समुद्र सतह में हो रहे तीव्र बदलाव को समझा जा सके। हमने 33 तटीय चट्टानी द्वीपों का अध्ययन सन 1947 से 2015 तक का हवाई एवं सेटेलाइट चित्रों के अलावा स्थानीय पारंपरिक ज्ञान, वृक्षों की रेडियो कार्बन आयु, समुद्र सतह के रिकॉर्ड, एवं लहरों के तरीकों के आधार पर किया है।

लहरों से बढ़ती हानि


सालोमन द्वीपों के अध्ययन से सामने आया कि लहरों की शक्ति की नाटकीय ढंग से तटीय क्षरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। इन द्वीपों में लहरों की उच्च ऊर्जा की वजह से तटीय क्षेत्रों में काफी महत्त्वपूर्ण दिखाई देने लगे हैं। अतएव उच्च लहरों की चपेट में आने वाले 21 द्वीपों में से पाँच पूरी तरह से लुप्त हो गए और 6 अन्य में काफी व्यापक क्षरण हुआ है। वहीं 12 अन्य द्वीप जहाँ पर उच्च लहरों का प्रभाव कम है वहाँ पर समुद्र का स्तर आनुपातिक तौर पर कम बढ़ा है।

मानवीय त्रासदी


सालोमन द्वीपों में समुद्र के किनारों में आ रहे तीव्र परिवर्तन से तट पर रहने वाले अनेक समुदायों को जोकि वहाँ पीढ़ियों से रह रहे थे, को अन्य स्थानों पर रहने जाना पड़ा है। यह सरकार द्वारा योजनाबद्ध विस्थापन नहीं है। अतएव इसे किसी अन्तरराष्ट्रीय जलवायु कोष से मदद भी नहीं मिली है। अतएव इस अस्थाई व्यवस्था हेतु उन्हें स्वयं ही खर्च वहन करना पड़ रहा है। वैसे सालोमन द्वीप में विद्यमान पारंपरिक काश्तकारी भूमि प्रणाली (निवासी प्रमाण) की वजह से इन विस्थापित परिवारों को सुरक्षा कवच प्राप्त है। वास्तविकता तो यह है कि कुछ मामलों में पूरे के पूरे समुदायों ने उन तटीय ग्रामों को छोड़ दिया जिन्हें सन 1900 के शुरूआती दशक में मिशनरियों ने बसाया था। अब उन्होंने अपने पूर्वजों केे आवागमन को समझ कर पुनः उन गाँवों में बसना प्रारंभ कर दिया है जिन्हें उनके पुरखे छोड़कर आए थे। अन्य मामलों में सब कुछ अस्थाई है।

यहाँ पर एकल परिवार छोटे-छोटे फालियों में बस रहे हैं जिन पर कि उनका पारंपरिक तौर पर आधिपत्य रहा है। ऐसे मामलों में 100-200 लोग छोटे-छोटे पारिवारिक फालियों में बट कर रह गए हैं। पाउराटा जनजाति के 94 वर्षीय सरदार सिरिलो सुटारोटी का कहना है, “समुद्र ने हमारे द्वीप में प्रवेश करना प्रारंभ कर दिया है, इसने हमें मजबूर कर दिया है कि हम समुद्र से परे पहाड़ी पर चले जाएं और वहाँ पर अपना गाँव बसाएं’’। इन गाँवों के विस्थापन के अलावा टोरो जोकि चोइसीडल प्रांत की राजधानी है, संभवतः विश्व की पहली प्रांतीय राजधानी होगी जहाँ के नागरिकों को समुद्र सतह के बढ़ने की वजह से कहीं और बसाया जाएगा।

वैश्विक प्रभाव


समुद्र की सतह में वृद्धि व लहरों के मध्य के अंर्तसंबंधों को सालोमन द्वीपों में देखा गया है और द्वीपों के पूरी तरह से विलुप्त या आंशिक विलुप्ति के कारणों का आंकलन करने के लिये और समुद्र सतह में वृद्धि एवं जलवायु परिवर्तन को लेकर किसी भी तरह की योजना बनाने में आधुनिक विज्ञान के साथ ही साथ स्थानीय आंकलन एवं पांरपरिक ज्ञान को बराबर का महत्व दिया जाना चाहिए। स्थानीय समुदाय की आंतरिक क्षमता और उनकी तकनीकी क्षमता को सम्मान देकर ही हम उनके समृद्ध ज्ञान को समझ पाएंगे और तभी अनुकूलता के प्रयासों को सफलता मिल पाएगी।

सालोमन द्वीप राष्ट्रीय आपदा परिषद के अध्यक्ष मेल्चोइर मताकी का कहना है, हमें अंततः हरित जलवायु कोष (ग्रीन क्लाइमेट फंड) जैसे विकास साझेदारों एवं अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली से मदद की अपील करनी ही होगी। इसमें जलवायु परिवर्तन से सालोमन द्वीपों पर पड़ रहे प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन भी शामिल है। विगत दिनों सालोमन द्वीपों की सरकार ने प्रशांत क्षेत्र के 11 अन्य छोटे द्वीप राष्ट्रों के साथ मिलकर न्यूयार्क में पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। वैश्विक प्रयासों को लेकर इन द्वीप राष्ट्रों में सकारात्मकता का भाव है। यह बदलाव का बिंदु भी हो सकता है। अब हमें देखना होगा कि ग्रीन क्लाइमेट फंड को जो करोड़ों-करोड़ डॉलर देने का वायदा किया गया है, वह सालोमन द्वीपों जैसे तमाम राष्ट्रों की कितनी मदद करेगा।

उपरोक्त लेख के लेखक सिमोन अल्बर्ट, एलिस्टर ग्रिनहाम, बाडिन गिब्स, जोविअर लीओन एवं जॉन चर्च दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध हैं और इन सबने सम्मिलित रूप से वर्षों तक सालोमन द्वीपों की डूब का गहन अध्ययन किया है।

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