ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)

Submitted by Hindi on Thu, 07/28/2016 - 16:32
Source
अनुसंधान (विज्ञान शोध पत्रिका), 2015

प्रदूषण


वातावरण में उपस्थित ऐसे तत्व या कण जो उसकी शुद्धता को प्रभावित करते हैं प्रदूषक कहलाते हैं और उनकी उपस्थिति से जो वातावरण दूषित होता है उसी को प्रदूषण कहते हैं। प्रदूषण का असर जीव-जन्तुओं पर तो होता ही है साथ ही साथ वह तमाम निर्जीव वस्तुओं पर भी बुरा प्रभाव डालता है।

प्रदूषण का कारण


यद्यपि प्रदूषण अनेक कारणों से होता है परंतु शहरीकरण और औद्योगीकरण ही इसके प्रमुख कारण हैं।

ध्वनि प्रदूषण


अप्रिय या कर्कश ध्वनि, जो हानिकारक भी हो, ध्वनि प्रदूषण कहलाती है।

ध्वनि प्रदूषण के स्रोत


यातायात के साधन, कलकारखाने, लाउड स्पीकर, घरेलू उपकरण (बाल सुखाने वाली मशीन, ग्राइंडार, मिक्सी, ब्लेंडर, दूरदर्शन, स्टीरियो, वैक्यूम क्लीनर, एयर कंडीशनर, कूलर, वाद्य यंत्र) पालतू जीव (कुत्ते) आदि।

ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव


1. अधिक समय तक ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव में रहने पर कानों में सनसनाहट, आंतरिक कानों की क्षति, असंतुलन और अंतत: बहरापन हो जाता है।

2. इसकी वजह से थकान, अनिद्रा, क्रोध, ग़लतियाँ अव्यवहारिक आचरण दृष्टि गत होते हैं।

3. ध्वनि प्रदूषण की वजह से वैसोकान्सट्रिक्सन रिफ्लेक्स पैदा होता है जो रक्त के बहाव को कम करता है।

4. ध्वनि प्रदूषण की वजह से आँख की पुतली बढ़ जाती है और दृष्टि दोष उत्पन्न होता है।

5. गेस्ट्रिक सीक्रेशन को कम करता है।

6. चक्कर आना और डायस्टोलिक ब्लड प्रेसर में बढ़ोत्तरी होती है।

7. कार्डियोवैस्कुलर इंजरी अल्सर इन्फेक्शन की संभावनाओं का बढ़ना और रिप्रोडेक्टिव प्रॉबलम्स ध्वनि प्रदूषण के कारण हो सकती है।

8. ध्वनि प्रदूषण की वजह से एड्रीनेलिन रक्त संचार में पहुँचने लगता है। लगातार एड्रीनेलिन का बनना चिड़चिड़ापन, घबराहट, स्नायु उतकों में तनाव, थकान, आवेश और चिंता का कारण बनता हैं।

9. हृदय रोगियों के लिये शोर अत्यंत हानिकारक होता है क्योंकि यह सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड पर दबाव डालता है और जिसकी वजह से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है।

10. लगातार होने वाले शोर से रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ जाती है जिसकी वजह से रक्त वाहिनियाँ संकुचित हो जाती हैं परिणामत: व्यक्ति हृदय घात का शिकार हो सकता है।

11. मृत बच्चों का जन्म या कम वजन के बच्चों का जन्म प्राय: एयर पोर्ट के नजदीक रहने वाली महिलाओं में देखने को मिलता है।

12. ध्वनि प्रदूषण की वजह से रक्त का बहाव उलटी दिशा में डाइजेस्टिव आर्गेन, त्वचा, दिमाग से होने लगता है। मुँह भी सूख जाता है।

13. इसकी वजह से अनिद्रा, अति तनाव, यकृत रोग, व्यवहारिक तथा भावनात्मक दबाव, चक्कर आना, अति पसीना आना आदि लक्षण पाये जाते हैं।

14. इओसिनोफीलिया, हाइपरग्लाइसीमिया, हाइपोग्लाइसीमिया, हाइपोकैल्सीमिया आदि बीमारियाँ ध्वनि प्रदूषण के कारण हो सकती हैं।

15. सुपरसोनिक वायुयान सोनिक बूम का कारण होते हैं जिसकी वजह से खिड़कियों के शीशे टूट जाते हैं तथा मकान को भी क्षति पहुँच सकती है यही नहीं इसकी वजह से गर्भपात की संभावना भी बनती है।

ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम


1. ध्वनि प्रदूषण को उसके उद्गम स्थान पर ही नियंत्रित करें।

2. इसके लिये ध्वनि प्रदूषण पैदा करने वाली मशीनों में परिवर्तन करके या उनके विकल्प तैयार करके। जैसे शोर करने वाले पंखों में ब्लेड की संख्या बढ़ा कर साथ ही उनकी रोटेशनल स्पीड को घटाकर लेकिन हवा के बहाव को कम किये बिना।

3. शोर करने वाली मशीनों को इंसुलेटिंग मैटीरियल से कवर करके। मशीनों को पैड के उपर लगा कर।

4. इयरपफ पहन कर व्यक्ति ध्वनि प्रदूषण से खुद को बचा सकता है।

5. शोर करने वाले भारी वाहन का मार्ग बदल कर उन्हे शहरी सीमा से दूर रख कर।

6. शोर रहित दो पहिया, चौपहिया वाहन बनाकर।

7. नियम बना कर।

8. सरकारी गाड़ियों पर हूटर्स और सायरन का प्रयोग घटा कर।

9. रैली और धरना प्रदर्शन को शहरी सीमा में प्रतिबंधित करके।

10. शोर करने वाले पटाखों का प्रयोग घटा कर।

11. धार्मिक स्थलों पर लाउड स्पीकरों के प्रयोग को कम कर के।

12. वृक्षारोपण के द्वारा। वृक्ष ध्वनि प्रदूषण को कम करने में सहायक होते हैं वे अवरोधक का काम करते हैं। दीवाल उठाकर भी ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

13. शोर करने वाली मशीनों में तेल ग्रीस का प्रयोग करके।

ध्वनि प्रदूषण को मापने की यूनिट को डेसिबिल कहते हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने विभिन्न क्षेत्रों में जो इसके अनुमन्य मानक तय किये हैं वे इस प्रकार हैं-

 

 

दिन में

रात में

औद्योगिक क्षेत्र

75 डेसीबल

65 डेसीबल

व्यावसायिक क्षेत्र

65 डेसीबल

55 डेसीबल

आवासीय क्षेत्र

55 डेसीबल

45 डेसीबल

शांत क्षेत्र

45 डेसीबल

35 डेसीबल

 

संदर्भ
1. शुक्ला, आर. एस. एवं चंदेल, पी. एस. (2006) ए टेक्स्ट् बुक आफ प्लांट इकोलॉजी, मु. पृ. 1-544 एस. चांद एण्ड कम्पनी लि., नई दिल्ली।

2. मणिवसकम, एन. (1984) एनवायरनमेंटल पाल्यूशन, मु. पृ. 1-160 नेशनल बुक ट्रस्ट आफ इंडिया, नई दिल्ली।

3. देसवाल, एस. एवं देसवाल, ए. (2009) एनवायरनमेंट इकोलॉजी, मु. पृ. 1-741, धनपतराय एण्ड कम्पनी प्रा. लि., नई दिल्ली।

4. डे, ए. के. (2004) एनवायरनमेंटल केमेस्ट्री, मु. पृ. 1-406, न्यू ऐज इंटरनेशनल प्रा. लि. पब्लिशर्स, नई दिल्ली।

5. अस्थाना, डी. के. एवं अस्थाना, मीरा (1984) ए टेक्स्ट बुक आफ एनवायरमेंटल स्टडीज, मु. पृ. 1-460, एस. चांद एण्ड कम्पनी लि., नई दिल्ली।

6. शर्मा, पी. डी. (2002) इकोलॉजी और एनवायरनमेंट, मु. पृ. 1-643, रस्तोगी पब्लीकेशन, मेरठ।

7. अंजनेयूलू, वाई. (2005) इन्ट्रोडक्शन टू एनवायरमेंटल सांइस, मु. पृ. 1-745, बी. एस. पब्लीकेशन्स, हैदराबाद।

उदय शंकर अवस्थी
वनस्पति विज्ञान विभाग, बीएसएनवी पीजी कॉलेज, लखनऊ-226001, यूपी, भारत

प्राप्त तिथि- 16.03.2015, स्वीकृत तिथि- 25.04.2015

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