सिलिकोसिस : धूल में मौजूद सिलिका के कारण होने वाला व्यवसायजनित रोग

Submitted by Hindi on Fri, 07/29/2016 - 09:51
Source
अनुसंधान (विज्ञान शोध पत्रिका), 2015

यह रोग सिलिका मिश्रित धूल के संपर्क के कारण होता है। इसलिए व्यक्ति जितने लम्बे समय तक सिलिका मिश्रित धूल के संपर्क में रहता है, उतना ही अधिक इस रोग के चपेट में आता है। ऐसा तभी होता है जब उनका कार्य स्थल ऐसा हो, जहाँ पर उन्हें चट्टानों को तोड़ना हो, रेत एकत्रित करना हो, पत्थर, अयस्क आदि को तोड़ना या बारीक चुरा करना शामिल होता है। इन सभी कार्यों में सिलिका उत्सर्जित होती है। यह कल्पना करना कितना असहज कर देता है कि कोई रोग व्यवसाय से संबंधित होता है। लेकिन यह सच है ‘सिलिकोसिस’ नामक रोग व्यवसाय से संबंधित होता है जोकि धूल में मौजूद सिलिका के कणों के कारण मनुष्यों में हो सकता है। भले ही इस रोग के बारे में आज बात की जा रही हो परंतु यह रोग अत्यंत पुराना है। यह रोग क्षेत्र विशेष में नहीं सिमटा होता है, बल्कि यह पूरे विश्व में व्याप्त है और हर साल इसके चलते हजारों लोगों की जानें जाती हैं।

सिलिकोसिस रोग की भयावहता- सिलिकोसिस पुरातन समय से अनेक नामों से जाना गया है, जिसमें माइनर्स थेसिस, ग्राइंडर्स अस्थमा, पॉटर्स रॉट कुछ प्रमुख नाम हैं। यह फेफड़ों से जुड़ा एक रोग होता है। सिलिकोसिस नाम का सर्वप्रथम प्रयोग 1870 में अचिले विस्कोन्ती (जो की एक वकील थे) ने किया था। इस रोग के इतिहास पर नजर डालें तो यह पता चलता है कि 16वीं शताब्दी में अग्रिकोला ने लिखा था, कि यूरोप के कर्पेथेइओन नामक पर्वत की खदानों में कई महिलाओं ने 7-7 पतियों से शादी की और वे सभी पुरूष सिलिको-तपेदिक के कारण कम उम्र में मर गए थे। उत्तरी थाइलैंड में एक पूरे गाँव को विधवाओं का गाँव कहा जाता है, क्योंकि वहाँ पर बहुत लोग इस बीमारी की वजह से मर गए थे। सिलिकोसिस फेफड़ों की एक लाइलाज बीमारी है, जो धूल में मौजूद मुक्त सिलिका के कणों को अंत:श्वसन करने के कारण होती है।

यह बीमारी होने के बाद इसमें सुधार होने की संभावना नहीं रहती मगर इस रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यह रोग सिलिका मिश्रित धूल के संपर्क के कारण होता है। इसलिए व्यक्ति जितने लम्बे समय तक सिलिका मिश्रित धूल के संपर्क में रहता है, उतना ही अधिक इस रोग के चपेट में आता है। ऐसा तभी होता है जब उनका कार्य स्थल ऐसा हो, जहाँ पर उन्हें चट्टानों को तोड़ना हो, रेत एकत्रित करना हो, पत्थर, अयस्क आदि को तोड़ना या बारीक चुरा करना शामिल होता है। इन सभी कार्यों में सिलिका उत्सर्जित होती है। इसके अतिरिक्त खदानों, काँच के कारखानों, मृत्तिका आदि जगहों पर होने वाले कार्यों में भी सिलिका मिश्रित धूल के कणों के संपर्क में आते हैं। बालू विस्फोट एक सबसे खतरनाक प्रक्रिया है, जिसमें सिलिकोसिस होने का सबसे अधिक खतरा रहता है।

तीव्र विस्फोट में अगर निकलने वाले मलबे में सिलिका हो तो सिलिकोसिस होने की संभावना रहती है। सूखी खुदाई, रेत या कंक्रीट को साफ करना, दबाव में वायु का प्रयोग आदि जैसी प्रक्रियाएं धूल के बादलों का निर्माण करते हैं। ये धूल के बादल श्वसन से फेफड़ों तक सिलिका पहुँचाने में सहायक होते हैं। सिलिका के 3 स्वरूप होते हैं- स्फटिक, सूक्ष्म स्फटिक और अक्रिस्टलीय। मुक्त सिलिका शुद्ध सिलिकोन डाइऑक्साइड होता है।

सिलिकोसिस के कारण फेफड़ों में तन्तुमयता और वातस्फिति होती है। सिलिकोसिस का प्रकार और उसकी उग्रता इस बात पर निर्भर करती है कि सिलिका के संपर्क में रोगी कितने समय तक रहा है। सिलिकोसिस जीर्ण, त्वरित और तीक्ष्ण आदि रूप में पहचाना जाता है। सिलिकोसिस से ग्रसित व्यक्तियों को तपेदिक होने की संभावना भी होती है, तब इसे सिलिको तपेदिक कहते हैं। श्वसन के कार्यों की क्षमता में कमी बड़े पैमाने पर तन्तुमयता और वातस्फिति होने से होती है। इसके साथ कभी-कभी दिल का दौरा भी मौत का कारण बनता है। हमारे देश में राष्ट्रीय खनिक स्वास्थ्य संस्थान सिलोकोसिस के रोगियों की पहचान और रोग का निदान करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

हाल ही में इस संस्थान ने राजस्थान के करौली जिले में 101 लोगों की जाँच में पाया कि उनमें से 78.5 प्रतिशत लोग सिलोकोसिस पॉजिटिव थे। माइन लेबर प्रोटेक्शन कम्पैग्न ट्रस्ट ने भी जोधपुर में 987 सिलोकोसिस पॉजिटिव मामलों को चिह्नांकित किया था। सिलोकोसिस का शीघ्र निदान कर पाना डॉक्टरों के लिये कठिनाई का विषय होता है, क्योंकि इसके लिये उन्हें प्रशिक्षण और विशिष्टता की जरूरत होती है और सिलिकोसिस के लक्षण तपेदिक से बहुत ज्यादा मिलते-जुलते होने से गलत निदान होने की संभावना बनी रहती है।

सिलिकोसिस की रोकथाम के लिये नियोक्ता द्वारा किये जाने वाले उपाय-

1. वायु में स्फटिक सिलिका की नियमि जाँच करना जिसके संपर्क में खनिक रहते हैं।

2. स्फटिक सिलिका के संपर्क को कम करने के लिये गीली खुदाई करवाना, सिलिका के निकास के लिये स्थानीय खुलाव करना तथा धूल के उत्सर्जन को कम करना।

3. कर्मचारियों को सुरक्षात्मक कपड़े, मास्क, फव्वारे आदि मुहैया कराना।

4. कर्मचारियों को सिलिका और उसके स्वास्थ्य पर होने वाले खतरे से आगाह करना।

5. कर्मचारियों को सुरक्षा के सामान के सही उपयोग हेतु प्रशिक्षण देना।

6. निर्देश चिह्नों का प्रयोग कर कर्मचारियों को सिलिका और उसके जोखिम से अवगत कराना।

7. समय-समय पर कर्मचारियों की स्वास्थ्य जाँच करवाना। सारे सिलिकोसिस पॉजिटिव मामलो की सूचना स्वास्थ्य विभाग को देना।

इन उपायों को यदि हर नियोक्ता अपनाये तो हम सब मिलकर इस खतरनाक रोग को अपने समाज से दूर हटा पाएंगे और एक स्वस्थ समाज के निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकेंगे।

संदर्भ
1. प्लांट, जेन ए. वाउलवोलिस, निक एवं रग्नार्सदोत्तिर, के. वाला (2012) पॉल्यूटेंट्स, ह्यूमन हेल्थ एण्ड द इन्वायरंमेंट : ए रिस्क बेज्ड एप्रोच, जॉन वाइली एण्ड सन्स, पृ. 273।

2. यूनाइटेड स्टेट्स ब्यूरो आफ माइन्स, बुलेटिन, यू. एस. जी. पी. ओ. 1995, खण्ड-476-478, पृ. 63।

3. रोजेन, जी. (1943) द हिस्ट्री आफ माइनर्स डिसीजेज : ए मेडिकल एण्ड सोशल इंटरप्रेटेशन, न्यूयॉर्क, शॉमन, मु. पृ. 459-476

4. निओश हैजार्ड रिव्यू, हेल्थ इफेक्ट्स आफ आक्यूपेशनल एक्सपोजन टू रिस्पायरेबल क्रिस्टलाइन सिलिका, डी.एच.एच.एस. 2002-129, पृ 23।

5. वाइजमैन, डी. एन. बैंक्स, डी. ई. (2003) सिलिकोसिस, इण्टरस्टिशियल लंग डिसीज, चतुर्थ संस्करण, लंदन, बी.सी. डेकर इंक, पृ. 391

6. वेग्नर, जी. आर. (1997) एज्बेस्टोसिस एण्ड सिलिकॉसिस, लान्सेट, खण्ड- 349 (9061), मु. पृ. 1311-1315।

सम्पर्क


सचिन नरवड़िया
वैज्ञानिक बी, विज्ञान प्रसार, सी-24, कुतुब संस्थागत क्षेत्र, नई दिल्ली-110016, sachin@vigyanprasar.gov.in


प्राप्त तिथि : 17.04.2015, स्वीकृत तिथि : 07.05.2015

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