केदारनाथ त्रासदी के कहे-अनकहे पन्ने

Submitted by Hindi on Mon, 08/08/2016 - 09:43
Source
दैनिक जागरण, 07 अगस्त, 2016

.केदारनाथ त्रासदी को तीन साल पूरे हो चुके हैं। घाटी से दुख-दर्द, राज्य सरकार की उदासीनता और उपेक्षा, कॉरपोरेट जगत की गलतियों और त्रासदी के समय मुसीबत में फँसे लोगों की मदद के लिये स्थानीय लोगों ने जो दिलेरी, जांबाजी और हिम्मत दिखाई, उसकी कहानियाँ अब भी लोगों ने काफी कम सुनी है। राज्य सरकार अब भी केदारनाथ में विध्वंस के उस पैमाने से इनकार कर रही है, जिस मात्रा में नदी ने यहाँ तबाही मचाई थी। उत्तराखण्ड में पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों को भी सरकार नजरअंदाज कर रही है। उजड़ी हुई केदारनाथ की घाटी अब भी डराती है। हालाँकि मंदिर को फिर खोल दिया गया है, केदारनाथ का महत्व स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने के लिये काफी मशहूर हैं। लेखक और पत्रकार हृदयेश जोशी की किताब ‘रेज ऑफ द रिवर’ यानी नदी का क्रोध इसी त्रासदी के तमाम पहलुओं की कही-अनकही बातों के पन्ने खोलती है।

यह किताब हिंदी में उनकी इसी विषय-वस्तु पर आई किताब ‘केदारनाथ तुम क्यों चुप रहे’ का अंग्रेजी रूपांतरण है। जिसने एक प्रत्यक्षदर्शी के तौर पर भयानक त्रासदी पर राज्य सरकार की नाकामी, लाचारी और समय पर राहत उपाय मुहैया नहीं कराने को देखा है। उत्तराखण्ड में आई इस जल प्रलय ने हजारों लोगों की जानें तो ली हीं, साथ ही इस प्रदेश को भी कमोबेश बर्बाद कर दिया था।

हृदयेश की यह किताब दिलचस्प कमेंट्री के अंदाज में लिखी गई है। वह उत्तराखण्ड में भयानक त्रासदी के बाद वहाँ पहुँचने वाले व्यक्तियों में थे। उन्होंने इस आपदा पर लगातार यहाँ से टीवी चैनल के लिये रिपोर्टिंग की। सनसनीखेज रिपोर्टिंग के इस दौर में हृदयेश जोशी ने बड़े संवेदनशील ढंग से इस त्रासदी के विभिन्न पहलुओं को पकड़ा, पेश किया और यह समझने की कोशिश की कि आखिर हिमालय जैसी विराट यह त्रासदी क्यों घटित हुई। अगर इस आपदा को याद करें तो कहा जाना चाहिए कि हिमालय में ऐसी तबाही कभी किसी ने देखी नहीं थी। पहाड़ ढह-ढहकर गिरते रहे, नदियाँ अपने वेग से बड़ी-बड़ी इमारतों को मलबों में बदलती हुई साथ बहाती ले गई। सैकड़ों वर्ग मील का इलाका जैसे शमशान में बदल गया। रिपोर्टिंग का वह दौर बीत जाने के बाद भी केदारनाथ के सवाल हृदयेश जोशी का पीछा करते रहे। केदारनाथ त्रासदी के रेडीमेड जवाबों से वह संतुष्ट नहीं थे। आखिरकार उन्होंने अपने शोध को और विस्तार दिया और इस पर एक पूरी किताब लिख डाली।

किताब जितना सामयिक ब्योरे से दो-चार होती है, उतना ही यह पड़ताल भी करती है कि आखिर यह त्रासदी क्यों घटित हुई। तमाम दूसरी आपदाओं की तरह उत्तराखण्ड की आपदा के बीज भी मानव जनित ही थे। लंबे संघर्ष के बाद जब वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड नया राज्य बना तो पहाड़, जंगल और पानी को अक्षुण्ण रखने का वादा था, यानी इनसे खिलवाड़ नहीं करने की बात। इसके बाद भी बड़ी संरचनाएं बननी शुरू हो गई। पहाड़ खोदे जाने लगे। पेड़ बड़े पैमाने पर कटने लगे। प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग शुरू हो गया।

वर्ष 2001 में राज्य टूरिज्म ने उत्तराखण्ड को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करना शुरू किया, जिससे पिछले एक दशक में राज्य में सैलानियों की संख्या में भी जबरदस्त बढ़ोतरी हुई। वर्ष 2001 में ये संख्या अगर एक करोड़ थी तो वर्ष 2010 में बढ़कर तीन करोड़ हो गई। यानी राज्य की जनसंख्या की तिगुनी। नतीजतन दूरदराज में तेजी से होटल्स, रेस्टोरेंट्स, ज्यादा दुकानें और पार्किंग लाट ने जगह लेनी शुरू कर दी।

नदियों पर बाँध बनाने की योजना हो गई। सड़कों का जाल बिछने लगा, लेकिन भारी वाहन और जबरदस्त ट्रैफिक से सड़कें चरमराने लगीं। उत्तराखण्ड में पहाड़ों पर निर्माण बढ़ते ही जा रहे थे, तो सबसे खराब बात यह हुई कि मिट्टी की पकड़ क्षमता कमजोर होने के साथ पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया। रोज-ब-रोज बड़े भूस्खलन होने लगे। खतरे की घंटी लगातार बज रही थी, बस किसी का ध्यान ही नहीं था। वर्ष 2011 के मानसून में जब नदियों में पानी बेतहाशा बढ़ा। संकरे हो गए किनारे उसे संभाल नहीं पाए। किनारे संकरे होने की वजह थी अतिक्रमण। प्रबल वेग से आए पानी ने पहले किनारों को लपेटे में लिया, फिर आगे बढ़ चला। बढ़े हुए पानी ने सबकुछ आगोश में ले लिया। जहाँ से यह निकला, तबाही निशान छोड़ने लगा। सच कहें तो आपदा इंतजार ही कर रही थी। देखते ही देखते नदियों के बढ़े पानी ने सबकुछ अपने आगोश में ले लिया।

हादसे का शिकार केवल सैलानी ही नहीं हुए, बल्कि उत्तराखण्ड के लोग भी हुए। लालच और राजनीतिक नेतृत्व की अदूरदर्शिता के चलते राज्य को खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया था। यह किताब हादसे के बाद भारतीय सेना के सबसे जोखिम वाले हवाई राहत अभियान के बारे में भी बताती है। किताब पहाड़ को खोखला करने वाली नीतियों के साथ उन बिंदुओं पर भरपूर प्रकाश डालती है। एक अध्याय केवल यह बताता है कि किस तरह हादसे के लिये प्लेटफार्म तैयार किया गया। अन्य अध्याय में पहाड़ी समुदाय के लोगों के उन आंदोलनों के बारे में बताया गया है, जिसमें वे प्रकृति, पेड़ों को बचाए रखने के लिये एकजुट होते हैं। अंतिम अध्याय मॉडल ग्रोथ की बात करता है, जिसमें कोई बड़े बाँध नहीं होंगे। जिम्मेदार सड़क निर्माण, आर्गेनिक खेती, महिला सशक्तीकरण, वैविध्य पर्यटन, वेस्ट मैनेजमेंट, प्लास्टिक पर प्रतिबंध और आने वालों के लिये ग्रीन टैक्स जैसे प्रावधानों की बात है।

इस किताब के माध्यम से लेखक ने यह बताने की कोशिश की है कि केदारनाथ की वास्तविक स्थिति क्या है? यह किताब एक तरह से केदारनाथ जैसे पर्यटन स्थलों की अव्यवस्था को उजागर कर रही है। पर्यावरण प्रेमियों को यह किताब खूब पसंद आयेगी।

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