नकली सपनों के स्मार्ट शहर

Submitted by Hindi on Mon, 08/22/2016 - 11:12
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शुक्रवार, 16-31 अगस्त, 2016

स्मार्ट शहर नव-धनाढ्य वर्ग के अमीरों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारोबार के लिये बनाये जा रहे हैं। जहाँ आम आदमी के लिये सामान्य जीवन जीना और भी दूभर हो जायेगा।

.हाल ही में गुड़गाँव की सड़कों पर 16-18 घंटे के जाम ने एक बार फिर शहरों में बुनियादी सुविधाओं के सवाल को केन्द्र में ला दिया है। भारत की शहरी आबादी, जो आज लगभग 38 करोड़ है, संयुक्त राष्ट्रसंघ के एक अनुमान के अनुसार, सन 2031 तक बढ़कर 60 करोड़ होने वाली है। बेहतर नागरिक सुविधाओं और उत्तम परिवहन व्यवस्था के साथ-साथ प्रदूषण-मुक्त शहरों के निर्माण में देश के सीमित उपलब्ध संसाधनों का कैसे उपयोग हो, यह शहरी निर्माण विशेषज्ञों के लिये एक चुनौती है।

हमारे देश में ‘जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिन्यूअल मिशन’ योजना पहले से जारी थी। इसका लक्ष्य सभी शहरों का विकास करना था। फिर मोदी द्वारा शपथ लेने के एक माह के भीतर ‘स्मार्ट सिटी परियोजना’ की घोषणा करने से पता चलता है कि सरकार की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। मोदी सरकार ने मितव्ययिता की दुहाई देते हुए सभी बेहद जरूरी योजनाओं के बजट में कटौती करके उधार पर आधारित एक बेहद खर्चीला और लगभग गैर-जरूरी ‘स्मार्ट सिटी’ नामक परियोजना को आनन-फानन में हरी झंडी दिखा दी। अमेरिका की ‘स्मार्ट सिटी काउंसिल’ की भारतीय शाखा ‘स्मार्ट सिटी काउंसिल ऑफ इंडिया’ का गठन किया गया। यह योजना मात्र हमारे देश तक सीमित नहीं है। अमेरिका के योजनाकर्ताओं की मानें तो विश्व भर में लगभग 5000 स्मार्ट सिटी बनेंगे जिनमें भारत को केवल 100 आवंटित किये गये हैं।

मई, 2015 में दिल्ली में हुई स्मार्ट सिटी कान्फ्रेंस ने इन 100 शहरों के निर्माण में अगले 20 वर्षों में एक लाख बीस हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च होने का अनुमान लगाया है। अगर आज एक डॉलर 69 रुपये का है तो यह रकम लगभग 82 लाख 80 हजार करोड़ रुपये बैठती है जो हमारे जी.डी.पी. का लगभग 60 प्रतिशत है। आज जब सरकार शिक्षा, महिला एवं बाल कल्याण, स्वास्थ्य, मनरेगा, स्वच्छ पानी इत्यादि पर अपने खर्च को कम कर रही है तो यह विचारणीय मुद्दा है कि इतना सारा खर्च सरकार कैसे कर पायेगी? इसे अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों से उधार लेना पड़ेगा जो जाहिर है, अपनी शर्तों पर ही इसे देगी। ग्रीस, स्पेन और कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को विश्वबैंक और आई.एम.एफ. ने अपने कर्ज में फांसकर उनका क्या हश्र किया, यह जगजाहिर है।

सोलह जून 2015 को ग्रीस के तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेक्सिस साइप्रस ने संसद में दिये अपने भाषण में कहा था कि “ग्रीस के इस संकट के लिये आई.एम.एफ. अपराधी है, ये तमाम कर्जदार एजेंसियाँ, ग्रीस को अपमानित करना चाहती हैं।” अभी हाल में ही एडवर्ड स्नोडेन की तरह के ही एक अन्य अमेरिकी ‘जॉन पर्किंस’ की आत्मस्वीकृति उनकी पुस्तक, ‘कन्फेशंस ऑफ ऐन इकोनॉमिक हिट मैन’ में देखी जा सकती है। जॉन पर्किंस लिखते हैं, “इकोनॉमिक हिट मैन आर्थिक मामलों के वे विशेषज्ञ होते हैं जो विकासशील और अल्पविकसित देशों द्वारा लिये जाने वाले कर्ज को न्यायिक ठहराते हैं। वह विकास के ऐसे सपने दिखाने वाली परियोजनाएँ पेश करते हैं जिनके लिये बड़े कर्जे की जरूरत पड़ती है। उनका काम होता है कि गैर-जरूरी कर्जों को दिलाकर उस देश को दीवालिया करना। इससे कर्ज पाने वाला देश, कर्जदाता देशों, उनके नियंत्रण में चल रही वित्तीय एजेंसियों का स्थायी रूप से गुलाम हो जाता है इसके बाद अमेरिका को जब संयुक्त राष्ट्र-संघ में किसी प्रस्ताव को पास कराने की जरूरत होती है, उस देश में अपना सैनिक अड्डा बनाना होता है या तेल तथा इसी तरह के उस देश के प्राकृतिक, स्रोतों, सस्ते श्रम और बाजार पर कब्जे की जरूरत होती है तो वह कर्जदार देशों को इसे करने के लिये मजबूर करता है। इकोनॉमिक हिट मैन तथा कथित विकास की ऐसी परियोजनाएँ पेश करते हैं जिनको करने की विशेषज्ञता अमेरिकी कम्पनियों के पास होती है और उन्हें ही इस काम का ठेका मिलता है। कर्जदाता एजेंसियाँ, कर्ज की राशि का भुगतान अपने देश में ही अपनी कम्पनियों को कर देती हैं और इस तरह दिये गये कर्ज का पैसा उनके अपने पास ही रह जाता है।” कहना न होगा कि स्मार्ट सिटी परियोजना से भारत जैसे देशों की अपनी आजादी तक खतरे में पड़ सकती है।

भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने अपने ‘ड्राफ्ट कॉन्सेप्ट नोन ऑन स्मार्ट सिटी मिशन’ में स्मार्ट सिटी की विशेषताएँ इस तरह गिनाई हैंः “यहाँ बहुत ही उच्च स्तर पर गुणवत्तापूर्ण जीवन होगा जिसकी तुलना यूरोप के किसी भी विकसित शहर से की जा सकती है... स्मार्ट सिटी वह स्थान होगा जो निवेशकों, विशेषज्ञों और पेशेवरों को आकर्षित करने में सक्षम होगा।” ये निवेशक, विशेषज्ञ सूचना और संचार तकनीकों पर निर्भर होंगे। जाहिर है, इनके लिये 4जी कनेक्टिविटी, सुपर ब्रॉडबैंड, हाइस्पीड इंटरनेट, मुफ्त वाई-फाई, स्मार्ट सेंसर और सर्विलेंस कैमरे, ई-गर्वनेंस, आधुनिक स्मार्ट सुरक्षा व्यवस्था जिसमें लोगों के बायोमैट्रिक रिकार्ड का इस्तेमाल इत्यादि शामिल होगा, ये सब व्यवस्थाएँ हर स्मार्ट सिटी में देनी होंगी। स्मार्ट सिटी में रहने वाले हर नागरिक का डिजिटल स्वास्थ्य ब्यौरा रखा जायेगा। यहाँ विश्व भर के डॉक्टरों की सेवाएँ टी.वी. स्क्रीन पर मौजूद डॉक्टरों और उनसे वीडियो कान्फ्रेंसिंग के रूप में उपलब्ध होंगी। स्मार्ट-सिटी में मनोरंजन पार्क, खेल और संगीत के लिये जो भी स्थान विकसित किये जाएंगे उनमें प्रवेश के लिये ‘यूजर फीस’ का प्रावधान होगा।

भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति केवल 50 देशों से बेहतर और 136 देशों से खराब है। संयुक्त राष्ट्र-संघ द्वारा मई 2015 में जारी की गई ‘वर्ल्ड हंगर रिपोर्ट’ में बताया है कि दुनिया के कुल भूखों का चौथाई भाग भारत में रहता है। हम ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ में शामिल 76 देशों में 55वें पायदान पर खड़े हैं। प्रश्न यह उठता है कि आज जब दुनिया का कुपोषित हर तीसरा बच्चा भारतीय है, यहाँ स्वच्छ पानी केवल 34 प्रतिशत आबादी को उपलब्ध है, देश की आधी आबादी को अभी शौचालय उपलब्ध नहीं है, और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2012 में भारत में 98 लाख 16 हजार लोग ऐसी बीमारियों से मर गये जिनका इलाज सहज ही संभव था, ऐसी परिस्थितियों में हमारी प्राथमिकताएँ शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सस्ता भोजन होनी चाहिए न कि स्मार्ट सिटी।

सन 2008 की मंदी ने बहुराष्ट्रीय निगमों की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर कर दी थी। उसकी मुख्य वजह यह थी कि उनके उत्पादन के लिये खरीददार नहीं मिल रहे थे और आज भी उसमें कोई खास सुधार नहीं हुआ है। उत्पादित माल शेल्फों पर पड़े हैं और उन्हें खरीदने वालों की जेबें खाली हैं। स्मार्ट सिटी परियोजना का विश्वव्यापी लक्ष्य महामंदी के दलदल में फँस चुकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उबारना है।

स्मार्ट सिटी के इस अभियान का नेतृत्व अमेरिका की आई.बी.एम. और ऑप्टीकल नेटवर्क बनाने वाली कंपनी ‘सिस्को सिस्टम’ कर रही हैं। इनके साथ ही बिजली, गैस और पानी के स्मार्ट मीटर बनाने वाली ‘इटरोन’, ‘जनरल इलेक्ट्रिक’, ‘माइक्रोसॉफ्ट’, ‘ओरेकल’, स्विट्जरलैंड की ‘एजीटी इंटरनेशनल’ और ‘एबीबी’, इंग्लैंड की ‘साउथ अफ्रीका ब्रेवरीज’, जो बीयर के अलावा घरेलू उपभोक्ता सामान भी बनाती है; जापान की हिताची और तोशीबा, चीन की ‘हुआवेई’, जर्मन की ‘सीमंज’ इत्यादि सब अपना माल बेचने की उम्मीद में इस स्मार्ट-सिटी अभियान में पूरे उत्साह के साथ शामिल हैं।

. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि 17-18 फरवरी 2015 को इंडिया हैबीटाट सेंटर में आयोजित स्मार्ट सिटीज सम्मेलन के पहले सत्र में ही चर्चा का विषय था, ‘भारत में स्मार्ट सिटीज विकसित करने में अमरीकी कम्पनियों के लिये अवसर।’ नरेंद्र मोदी ने अपनी अमेरिका यात्रा पर 30 सितम्बर 2014 को जो व्हाइट हाउस से संयुक्त बयान जारी किया उसमें बराक ओबामा ने मोदी की इस बात के लिये तारीफ की कि उन्होंने अमेरिका को अजमेर, इलाहाबाद और विशाखापटनम में स्मार्ट सिटी बनाने का काम सौंपा है। इसके बाद तो स्मार्ट सिटी बनाने के लिये ‘मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग’ पर हस्ताक्षर करने वाले देशों की लाइन लग गई है। आगरा और बनारस जापान की मदद से स्मार्ट सिटी बनेंगे तो दुबई, हैदराबाद को स्मार्ट सिटी बनाना चाहता है। सिंगापुर आंध्र की राजधानी और दिल्ली को स्मार्ट सिटी बनाना चाहता है।

जिस तरह कोई बिल्डर अपनी हाउसिंग परियोजना के ग्राहकों को आकर्षित करने के लिये एक मॉडल घर का निर्माण करता है, उसी तर्ज पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने दो प्रोटोटाइप स्मार्ट सिटीज का निर्माण किया है। उनमें एक शहर बार्सीलोना है और दूसरा आबूधाबी के निकट तैयार हो रहा शहर ‘मसदर’ है। जिन शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये परियोजना के पहले चरण में चुना गया है, वहाँ के महापौर और नगर निगम के मुख्य अधिकारियों को वीडियो के द्वारा इन शहरों की चकाचौंध दिखाई जा रही है।

स्मार्ट सिटी को लेकर 16 फरवरी 2015 को हमारे प्रधानमंत्री और माईकल ब्लूमबर्ग मिले और उन्होंने ‘सिटी चैलेंज प्रतियोगिता’ का प्रबंधन अमेरिका की तथाकथित लोकोपकारी संस्था ब्लूमबर्ग फिलनथ्रॉपी को सौंप दिया। यह संस्था मीडिया मुगल माइकल ब्लूमबर्ग ने स्थापित की थी जो कि अमेरिका का दूसरा सबसे धनी व्यक्ति है। उपलब्ध सुविधाओं तथा मांग और आपूर्ति के हिसाब से इन स्मार्ट सिटीज में आवास की कीमतें ज्यादा होंगी जिसके फलस्वरूप आम आदमी खुद-ब-खुद इन शहरों में न रह सकेंगे और अगर यहाँ किसी ने कोई झुग्गी-झोपड़ी डालने की कोशिश की तो बलपूर्वक उसे बाहर कर दिया जायेगा। लब्बो-लुबाव यह कि स्मार्ट सिटी उभरते नव-धनाढ्य वर्ग के स्मार्ट लोगों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारोबार के हित में बनाये जा रहे हैं।

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