मौसम की विविधता का सरसों की फसल पर प्रभाव (Effect of weather variability on Mustard crop)

Submitted by Hindi on Mon, 08/29/2016 - 16:55
Source
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


मौसम की विविधता का सरसों की फसल पर प्रभाव जानने के लिये भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के रिसर्च फार्म पर सरसों की किस्मों को भिन्न-भिन्न समय पर बोया गया। इस प्रयोग में फसल के विभिन्न चरणों का अवलोकन किया गया। सभी वृद्धि पैरामीटर जैसी लीफ एरिया इंडेक्स, बायोमास, क्लोरोफिल घटक का सरसों की विभिन्न प्रजातियों पर मौसम की विविधता में अध्ययन किया गया। ये सूचकांक अक्टूबर में बोयी गई फसल की तुलना में कम पाये गये। नवम्बर में बोयी गई फसल में पैदावार तथा तेल की प्रतिशत मात्रा कम पायी गई। चेपा का आक्रमन भी सभी किस्मों में नवम्बर में बोई गई फसल पर अक्टूबर में बोयी गई फसल की तुलना में ज्यादा पाया गया था। नवम्बर में बोयी गई फसल की पैदावार में अक्टूबर में बोयी गयी फसल की तुलना में 15 से 60 प्रतिशत की कमी पायी गई। ऊष्मा इकाईयों जैसे हीलो थर्मल यूनिट, फोटो थर्मल यूनिट तथा जी डी डी का संचयन अक्तूबर में बोयी गई फसल में नवम्बर में बोयी गई फसल की तुलना में अधिक पाया गया। परिणामस्वरूप सरसों की उपज तथा तेल प्रतिशतता में वृद्धि दर्ज की गई। मौसम की फसल की उपज बढ़ोतरी में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है इसलिये मौसमीय तत्वों का अध्ययन करके हमें किसी भी फसल की उपयुक्त किस्म की बुवाई का उपयुक्त समय ज्ञात करना चाहिए।

Abstract


Field experiments were conducted at research farm of IARI, New Delhi to observe the effect of weather variability on mustard crop at different stages of growth. Different varieties of mustard were sown on different dates to generate the different weather conditions for different phenological stages of the crop. All growth parameters, leaf area index, biomass and chlorophyll content were measured in all the varieties under different weather conditions. Observations were also taken for the aphid infestation. Results showed that the leaf area index, biomass and chlorophyIl content has less value in November sown crop as compared to October sown crop. This reduces the yield and percentage oil quantity in November sown crop as compared to October sown crop. The aphid infestation was also found to be more in november sown crop as compared to October sown crop because of favourable weather conditions. The temperature was found to be higher during grain filling stage in November sown crop. Therefore the seed yield was reduced by 15 to 60 percent in different varieties in November sown crop as compared to October sown crop. The heat unit such as heilo thermal unit, photo thermal unit and GDD was found to be more accumulated in October sown crop as compared to November sown crop. This results in more yield and percentage oil in mustard. Weather has major role in the yield of any crop, therefore for obtaining maximum yield produce, sowing of any variety of crops can be done after studying the weather parameters.

प्रस्तावना


कृषि उत्पादन में मौसम की मुख्य भूमिका होती है। कृषि उत्पादन की सफलता सामान्य मानसून एवं अनुकूल मौसम पर निर्भर करती है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम विविधता में लगातार बढोत्तरी हो रही है। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अनगिनत तकनीकियों का विकास किया जा रहा है। लेकिन इनकी सफलता असामान्य मौसम में बढ़ोत्तरी की वजह से कम हो रही है। मानसून के देरी से आने तथा साथ ही जल्दी खत्म होने की वजह से फसलों की पैदावार गिर जाती है। किसी भी फसल का कृषि उत्पादन अनुकूल मौसम पर निर्भर करता है। अधिकतर कृषि कार्य मौसम के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। किसी भी फसल की उपज की गुणवत्ता पर मौसम की विविधता का प्रभाव पड़ता है। फसल की जैविक और भौतिक प्रक्रियाओं पर तापमान का भी बहुत प्रभाव पड़ता है।

मौसम की विविधता का कृषि कार्यों से काफी गहरा संबंध होता है। फसलों की पैदावार तथा गुणवत्ता में जलवायु परिवर्तन के कारण कमी पायी जाती है। भारत मे उगायी जाने वाली फसलों के उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन का काफी असर पड़ता है क्योंकि फसल के बीजों के अंकुरण से लेकर पकने तक एक उपयुक्त मौसम की जरूरत पड़ती है जो कम से कम एक निश्चित अवधि तक होना चाहिए। यदि अंकुरण के समय उपयुक्त तापमान नहीं मिला तो अंकुरण ठीक से नहीं होता है। इससे दाना बनने की अवधि में कमी आ जाती है परिणामस्वरूप उत्पादन में कमी आती है साथ ही उत्पादन की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है।

किसी भी फसल की जैविक और भौतिक प्रक्रिया पर तापमान का प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के तौर पर सरसों को सर्दियों में बोया जाता है। यदि फली तथा बज बनने के दौरान 2-3 डिग्री सेल्सियम तापमान ज्यादा हो जाता है तो फसल की उपज में महत्त्वपूर्ण कमी आती है। बुवाई का समय फसल में वनस्पति और प्रजनन चरण की लंबाई को संशोधित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मौसम परिवर्तन के प्रभाव को कम करने हेतु बुवाई के समय में परिवर्तन करना पड़ता है।

सामग्री एवं विधि


भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के अनुसंधान फार्म पर यह प्रयोग किया गया। इस प्रयोग में सरसों की तीन प्रजातियों पूसा गोल्ड, पूसा जयकिसान तथा पूसा गोल्ड को लिया गया तथा बुवाई की तीन तिथियों 14 अक्टूबर 2011, 31 अक्टूबर 2011 तथा 16 नवम्बर 2011 को की गईं। किसी भी फसल की अधिकतम उपज के लिये हम फसल मौसम तथा कीटों की आपसी निर्भरता के आधार पर किसी फसल की बुवाई का उचित समय निर्धारित कर सकते हैं। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के अनुसंधान फार्म में एक प्रयोग किया गया। जिससे फसल के विभिन्न चरणों को भिन्न-भिन्न वातावरण मिल सके। बढोतरी के सभी सूचकांक पत्ती क्षेत्रफल सूचकांक, बायोमास, हरित तत्व सूचकांक नापे गये, चेंपा तथा अन्य बीमारियों का असर भी देखा गया तथा फसल के भिन्न-भिन्न चरणों का अवलोकन किया गया।

परिणाम एवं विवेचना


मौसम की विविधता का फसल वृद्धि पर प्रभाव: पत्ती क्षेत्रफल सूचकांक का बुवाई के बाद भिन्न-भिन्न समय पर अवलोकन किया गया (चित्र 1) तथा अध्ययन से पता चला है कि पत्ती क्षेत्रफल सूचकांक की मात्रा सभी तारीखों में बोयी गई फसलों में सबसे ज्यादा पूसा जयकिसान में उससे कम पूसा बोल्ड में तथा सबसे कम पूसा बोल्ड में पाया गया 31 अक्टूबर तथा 16 नवम्बर को बोयी गई फसल का अधिकतम पत्ती क्षेत्रफल सूचकांक में 14 अक्टूबर को बोयी गई फसल की तुलना में पूसा बोल्ड में 33 एवं 34 प्रतिशत की कमी, पूसा जयकिसान में 29 एवं 36 प्रतिशत की कमी तथा पूसा बोल्ड में 24 एवं 26 प्रतिशत की कमी पायी गई।

इसी प्रकार बायोमास में भी देरी से बोयी गई फसल में जल्दी बोयी गई फसल की तुलना में कमी पायी गई (चित्र 2)। बायोमास की मात्रा सभी तारीखों में बोयी गई फसल में सबसे ज्यादा पूसा जयकिसान में उसके बाद पूसा बोल्ड में तथा सबसे कम पूसा गोल्ड में पाया गया 31 अक्टूबर तथा 16 नवम्बर को बोयी गई फसल के बायोमास में 14 अक्टूबर को बोयी गई फसल की तुलना में पूसा गोल्ड में 20 एवं 53 प्रतिशत की कमी, पूसा जयकिसान में 33 एवं 64 प्रतिशत की कमी तथा पूसा बोल्ड में 28 एवं 63 प्रतिशत की कमी पायी गई। फसल की देर से बुवाई करने से हरित लवक सूचकांक में भी कमी पायी गई इसकी मात्रा 14 अक्टूबर को बोयी गई फसल में सबसे ज्यादा पायी गई (चित्र 3)। सरसों को फसल पर चेंपा कीट का आक्रमण सबसे ज्यादा पूसा गोल्ड पर पाया गया तथा सबसे कम आक्रमण पूसा जयकिसान पर पाया गया (चित्र 4)।

मौसम की विविधता का सबसे सरसों की उपज पर प्रभाव: सरसों की उपज पर मौसम की विविधता का बहुत प्रभाव पड़ता है। देर से बोयी गई फसल की उपज में सबसे ज्यादा कमी पायी गई 14 अक्टूबर तथा 31 अक्टूबर को बोयी गई फसल में तेल की मात्रा में पूसा जयकिसान तथा पूसा गोल्ड में 6 प्रतिशत की तथा पूसा बोल्ड में 4 प्रतिशत की कमी पायी गई। (सारणी 1)।

 

सारणी 1 - सरसों में तेल की प्रतिशत मात्रा पर मौसम की विविधता का प्रभाव

किस्में

14 अक्टूबर 2011 की बुवाई  

31 अक्टूबर 2011 की बुवाई

16 नवम्बर 2011 की बुवाई

पूसा गोल्ड

34.1

33.3

32.2

पूसा जयकिसान

35.3

35.0

33.2

पूसा बोल्ड

34.9

34.6

33.4

 

31 अक्टूबर तथा 16 नवम्बर को बोयी गई फसल की उपज में 14 अक्टूबर को बोयी गई फसल की तुलना में पूसा गोल्ड में 14 एवं 64 प्रतिशत की कमी, पूसा जयकिसान में 0.4 एवं 37 प्रतिशत कमी, पूसा बोल्ड में 9 एवं 36 प्रतिशत की कमी पायी गई (चित्र 5)।

इस अध्ययन में विकिरण उपयोग क्षमता पर भी मौसम की विविधता का असर देखा गया और पाया गया कि देर से बुवाई करने से विकिरण उपयोग क्षमता में कमी आती है (सारणी 2)। इसका प्रभाव पैदावार पर भी पड़ता है 31 अक्टूबर तथा 16 नवम्बर को बोयी गई फसल की विकिरण उपयोग क्षमता में 14 अक्टूबर को बोयी गई फसल की तुलना में पूसा गोल्ड में 13 एवं 26 प्रतिशत की कमी, पूसा जय किसान में 4 एवं 29 प्रतिशत की कमी तथा पूसा बोल्ड में 6 एवं 35 प्रतिशत की कमी पायी गई। फसल उगाने का पूरा समय 14 अक्तूबर को बोयी गई फसल में सबसे ज्यादा 150 दिन बोल्ड में पाया गया (चित्र 6)। फसल के विभिन्न चरणों के दौरान अधिकतम व न्यूनतम तापमान का बुवाई की विभिन्न तिथियों पर प्रभाव का अध्ययन किया गया (चित्र 7)।

Fig-1,2Fig-3,4Fig-5Fig-6Fig-7

 

सारणी 2 - सरसों की फसल में विकिरण उपयोग क्षमता पर मौसम की विविधता का प्रभाव

बुवाई के बाद का समय

 

14 अक्टूबर 2011 की बुवाई

 

31 अक्टूबर 2011 की बुवाई

 

16 नवम्बर 2011 की बुवाई

 

पूसा गोल्ड

पूसा जयकिसान

पूसा बोल्ड

पूसा गोल्ड

पूसा जयकिसान

पूसा बोल्ड

पूसा गोल्ड

पूसा जयकिसान

पूसा बोल्ड

40

3.99

4.15

4.09

3.40

4.05

4.02

3.23

3.56

3.85

70

3.89

4.99

4.37

3.77

4.19

4.04

3.38

4.02

3.70

100

4.59

5.73

5.65

4.01

5.50

5.33

2.19

3.52

2.94

130

2.19

2.78

2.68

1.48

1.65

1.63

1.02

1.24

1.32

 

इस अध्ययन से यह ज्ञात हुआ कि नवम्बर में बोयी गई फसल के वृद्धि पैरामीटर तथा उपज अक्तूबर में बोयी गई फसल की तुलना में कम पाए गए। जिससे नवम्बर में बोयी गई फसलों में पैदावार तथा तेल की प्रतिशत मात्रा कम पायी गई। चेपा का आक्रमण भी सभी किस्मों में नवम्बर में बोयी गई फसल पर अक्तूबर में बोयी फसल की तुलना में ज्यादा था। इसका कारण देर से बोयी गई फसल में पैदावार के लिये जो वातावरण मिला वह चेंपा के लिये उपयुक्त था। साथ ही बीज बनते समय नवम्बर में बोयी गई फसल के लिये तापमान अधिक पाया गया, जो बीज बनने के लिये उपयुक्त नहीं था इसीलिये नवम्बर में बोयी गई फसल की उपज में 36 से 64 प्रतिशत की कमी पायी गई। अन्य अध्ययनों में भी यह पाया गया कि यदि सरसों की बुवाई में देरी की गई तो उसकी उपज में महत्त्वपूर्ण कमी आती है।

उपरोक्त अध्ययन से यह भी पता चला है कि फसल की पैदावार पर संचित ऊर्जा इकाइयों का प्रभाव पड़ता है। अक्तूबर में बोयी गई फसल में संचित हैलो थर्मल इकाई, फोटो थर्मल इकाई तथा जी डी डी नवम्बर में बोयी गई फसल की तुलना में ज्यादा संचित हुआ, जिससे पैदावार (किग्रा/हेक्टेयर) तथा तेल की प्रतिशत मात्रा में बढ़ोत्तरी पायी गई। मौसम की फसल की उपज बढ़ोत्तरी में काफी बड़ी भूमिका है। इसीलिये पिछले कई सालों में मौसमीय तत्वों का अध्ययन करके हमें किसी भी फसल की उपयुक्त किस्म की बुवाई का उपयुक्त समय ज्ञात करना चाहिए, जिससे हम अधिक पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

संदर्भ
1- Krishnamurthy L & Bhatnager VB, Growth analysis of rainfed mustard (Brassica juncea L.,) Crop Res..,15 (1) (1998) 43-53.

2- Morrison MJ, Mc Vetty, P B F & Search R., Effect of altering plant density on growth characteristics of summer rape. Can J. Plant Sci., 70 (1990) 139-149.

3- Nanda R, Bhargava S C & Tomar D P S, Rate and duration of siliqua and seed filling period and their relation to seed yield in Brassica spp. Indian J. Agric. Sci., 64 (1994) 227-232.

4- Rohilla HR, Singh H, Yadava T P & Singh H, Seasonal abundance of aphid pests on rapeseed-mustard crop in Haryana. Annals Agri. Bio. Res., 1 (1-2) (1996) 75-78.

5- Roy S & Charkravarty N V K, Effect of variable weather conditions on leaf area, biomass and seed yield in Brassica spp., J of Agric Physics, 2(1) (2002) 29-32.

6- Vashisth Ananta, Chakravarty NVK, Bhagavati G & Sharma PK, Effect of variable weather conditions on aphid infestation and crop growth of Mustard crop. Journal of Agrometeorology, 13 (1) (2011) 75-76.

7- Verma SN, Singh OP & Nema K K , Effect of dates of sowing on the incidence of mustard aphid and its parasites in Madhya Pradesh, Indian J. Agric. Res., 27 (2) (1993) 76-80.

सम्पर्क


Ananta Vashisth, Ravindra Singh & AK Jain
Division of Agricultural Physics, Indian Agricultural Research Institute, New Delhi 110012

कृषि भौतिकी संभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नर्इ्र दिल्ली 110012

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