तापमान में वृद्धि जलवायु परिवर्तन और वर्तमान राजनीति

Submitted by Hindi on Tue, 08/30/2016 - 12:05
Source
यूथ पाठशाला, जून 2016

औद्योगिक विकास के वर्तमान स्वरूप ने शहरीकरण पर जोर दिया जिसके चलते गाँवों से लोगों का पलायन हुआ और नगरों में कंक्रीट के जाल बिछ गए। कृषि योग्य भूमि पर गगनचुम्बी इमारतों का अंधाधुंध तरीके से निर्माण हुआ। इसके लिये कहीं पेड़ों को काटकर जंगलों का विनाश कर दिया गया तो कहीं आबादी को बसाने के लिये नदियों के किनारों को पाट दिया गया। उत्तराखण्ड के पर्यटन स्थलों केदारनाथ और नैनीताल में आवासीय होटलों की संख्या दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ी। परिणामस्वरूप एक छोटे से भू-भाग पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया। बनारस के मेहंदीगंज में कोल्ड ड्रिंक्स की एक कम्पनी ने भूजल स्तर को गिरा दिया और धन बल की बदौलत वहाँ के जातीय समीकरण का बहुत अच्छे ढंग से इस्तेमाल किया।

.वर्तमान में देश के हर राज्य से लू और सूखे की खबरें आ रही हैं। केवल महानगरों का ही तापमान नहीं बढ़ा है बल्कि छोटे-छोटे गाँव और नगर भी तापमान में वृद्धि से प्रभावित हुए हैं। वर्ष 1992 में ब्राजील के रिओडीजेनारियो शहर में तत्कालीन विश्व नेताओं ने बढ़ते तापमान और प्रकृति में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती हुई मात्रा पर नियंत्रण करने हेतु कार्रवाई करने का आह्वान किया था। पहले ग्लेशियर्स पिघल रहे थे और समुद्री जलस्तर के बढ़ने के संकेत मिले थे। लेकिन आज तो नदियाँ सूख गई हैं और कुछ नदियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं।

औद्योगिक विकास के वर्तमान स्वरूप ने शहरीकरण पर जोर दिया जिसके चलते गाँवों से लोगों का पलायन हुआ और नगरों में कंक्रीट के जाल बिछ गए। कृषि योग्य भूमि पर गगनचुम्बी इमारतों का अंधाधुंध तरीके से निर्माण हुआ। इसके लिये कहीं पेड़ों को काटकर जंगलों का विनाश कर दिया गया तो कहीं आबादी को बसाने के लिये नदियों के किनारों को पाट दिया गया। उत्तराखण्ड के पर्यटन स्थलों केदारनाथ और नैनीताल में आवासीय होटलों की संख्या दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ी। परिणामस्वरूप एक छोटे से भू-भाग पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया। बनारस के मेहंदीगंज में कोल्ड ड्रिंक्स की एक कम्पनी ने भूजल स्तर को गिरा दिया और धन बल की बदौलत वहाँ के जातीय समीकरण का बहुत अच्छे ढंग से इस्तेमाल किया। जल जंगल और जमीन की राजनीति की बात करने वाले भी आधुनिक पूँजीवादी राजनीति के शिकार हो गए।

स्वदेशी की संकल्पना और ग्राम स्वराज्य की जगह अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके विकास की एक नई कहानी रची गई। यह विकास एक खास वर्ग के लिये केन्द्रित था। आधुनिक पूँजी ने गाँवों को और भी विकल्पहीन बना दिया, जिसके कारण लघु और कुटीर उद्योग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाए। मजबूरन बहुत बड़ी आबादी शहरों की तरफ पलायन करने को विवश हुई। जिसके कारण शहरों के इंफ्रास्ट्रक्चर और संसाधनों पर बोझ बढ़ा। प्रदूषण में बढ़ोत्तरी हुई और जल की कमी की समस्या में इजाफा हुआ। कुछ सरकारों ने नदियों की दिशा भी बदली, इस वजह से उनके प्राकृतिक प्रवाह का दायरा प्रभावित हुआ। जिसके चलते बाढ़ और सूखे की स्थितियाँ निर्मित हुईं। जलवायु परिवर्तन पर बहुत सारे मंचों पर केवल बातें हुईं। इसमें एक विकसित, विकासशील और अविकसित देशों का एक नया विवाद पैदा हुआ। कार्बन उत्सर्जन पूर्व में एक व्यापक मुद्दा बना, लेकिन उसके बाद विश्व नेताओं ने इसपर ज्यादा जोर नहीं दिया। बढ़ती हुई जनसंख्या एक समस्या है परन्तु उस जनसंख्या को सही राह दिखाने की भी जरूरत है। जनसंख्या नियंत्रण के लिये बहुत सी राजनीतिक, सामाजिक और चिकित्सकीय कोशिशें की गईं, परन्तु इसमें आंशिक सफलता ही मिली। समाज का बहुसंख्यक वर्ग अभी भी गाँव में ही रहता है और शिक्षा की रोशनी से कोसों दूर है। उन्हें शिक्षित किए जाने की जरूरत है ताकि वे सरकार द्वारा किये गये प्रयासों को जान सकें।

पूरे विश्व में गर्मी सारे पुराने रिकॉर्ड्स तोड़ रही है। पहले पारा जब 40 डिग्री ऊपर पहुँचता था तो त्राहिमान मच जाती थी, लेकिन आज स्थिति यह है कि देश के मैदानी इलाके की अधिकांश जगहों में पारा लगभग 44 डिग्री से ऊपर पहुँच गया है। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कई शहरों और कस्बों का तापमान लगभग 50 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया। तापमान के लिये विख्यात टिटलागढ़ और बाड़मेर से भी ज्यादा तापमान राजस्थान के फलौदी में रिकॉर्ड किया गया और अधिकारिक घोषणा भी की गई कि तापमान 51 डिग्री है। गर्मी में इतनी बढ़ोत्तरी किस वजह से हुई है यह जनमानस के लिये एक सवाल खड़ा करता है। विकास के रुख को देखकर हमने अपनी रफ्तार तो बढ़ाई परन्तु कुछ मुख्य मुद्दों को नहीं समझा। भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व समुदाय इस त्रासदी से पीड़ित है।


वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण एक व्यापक विचार विमर्श की बिंदु है। बहुत सारे सामाजिक मुद्दों के साथ प्रकृति और भावी पीढ़ी के लिये संसाधनों को संचरण करने के लिये एक व्यापक नीति की जरूरत है लेकिन वर्तमान पीढ़ी में इसे लेकर कोई जागरूकता नहीं है क्योंकि कोई सामाजिक राजनीतिक अभियान पर्यावरण केन्द्रित नहीं है। पहले चिपको आन्दोलन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन हुआ तो युवाओं को कुछ पता भी चलता था। लेकिन उपभोग वादी संस्कृति ने युवाओं को प्रकृति से काफी दूर कर दिया है। ग्रामीण समाज को छोड़ दें तो भी महानगरीय जीवन में इसके प्रति खास उत्सुकता नहीं दिखाई देती है।

पिछले 20 सालों में कल-कारखाने हजारों की संख्या में लगाए गए, शहरों का विस्तार हुआ, लाखों किलोमीटर लम्बी सड़कें बन गईं। रेल लाइनों का विस्तार हुआ। निश्चित तौर पर अन्य विकासशील देशों के मुकाबले हम आगे बढ़ गए हैं। परन्तु हमें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा है। आदिवासी राज्यों झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर जल, जंगल और जमीन का दोहन हुआ है इस वजह से जलवायु परिवर्तन भी हुआ है। मानव इच्छा की पूर्ति हेतु लाखों एकड़ खेती योग्य भूमि पर उद्योग स्थापित किये गये हैं। वन भूमि और हरियाली की बलि चढ़ा दी गई।

अगर वर्तमान सरकारें इस विषय पर ध्यान देतीं और पहाड़ों से लेकर मैदानी भागों तक पर्यावरण का ध्यान रखतीं तो पर्यावरण और विकास के बीच तालमेल बनाया जा सकता था। यदि ऐसा होता तो न ही मौसम में बदलाव आता और न ही जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव होता। प्रदूषण और तापमान में वृद्धि के कारण भारत में सड़कों पर वाहनों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी होना भी है। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़े हैं परन्तु वाहनों की संख्या में कमी नहीं आई है। दिन प्रतिदिन नए वाहन सड़कों पर आ रहे हैं लेकिन पुराने वाहनों को नहीं हटाया गया। आज तक कितने पुराने वाहनों को सड़क से हटाया गया यह संख्या किसी के पास उपलब्ध नहीं है।

अन्तरराष्ट्रीय सड़क सुरक्षा मापदंडों के अनुसार 15 साल से ज्यादा पुराना कोई भी वाहन सड़क पर नहीं होना चाहिए। ये नियम भारत पर भी लागू होते हैं। एक अध्ययन के अनुसार वर्तमान में देश की सड़कों पर जितनी माल वाहक और सवारी गाड़ियाँ दौड़ रही हैं उसमें से 50 प्रतिशत से ज्यादा 20 साल से भी पुरानी हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति ने ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुखों को भोगने की इच्छा का सूत्रपात किया है। परिणामस्वरूप प्रत्येक सुविधा का यांत्रिकीकरण हो गया। गर्मी से बचने के लिये लोगों ने वातानुकूलित यंत्रों का सहारा लिया। साग-सब्जी और घर में खाद्य पदार्थों के संरक्षण के लिये रेफ्रिजरेटर का उपयोग बढ़ गया, इस वजह से वातावरण में क्लोरो-फ्लोरो कार्बन और ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ गई। ग्लोबल वार्मिंग घटने की जगह बढ़ गई है। मानव निर्मित यंत्रों ने और उसके अधिकाधिक उपभोग ने पर्यावरण के सामने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी का अभाव है।

महाराष्ट्र के लातूर में हाल ही में ट्रेन से पीने का पानी भेजा गया। बुन्देलखण्ड के झाँसी में भी यही हाल है। गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ में भी पीने के पानी की बहुत कमी है। वर्तमान में यह भी देखा गया है कि कुछ क्षेत्रों में पानी का स्तर एकदम निचले स्तर या कहें पेंदी तक पहुँच गया है। जल का व्यापक दोहन हुआ है जिसके चलते नदियों और बाँधों का जलस्तर बहुत नीचे आ गया है, हाल ही में सूखे की स्थिति पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी संज्ञान लिया है। अतिवृष्टि और अनावृष्टि दोनों ही देश के लोगों के लिये समस्या बन गई हैं। देश के कुछ राज्यों को लगातार सूखे का सामना करना पड़ रहा है वहीं दूसरी तरफ कुछ इलाके बाढ़ की वजह से बेहाल हैं। जंगलों की व्यापक पैमाने पर कटाई की गई है। जिसके कारण वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया में कमी आई है जो कि तापमान बढ़ने के लिये जिम्मेदार है। सरकारी कार्यक्रमों में वृक्षारोपण की बात की गई है लेकिन लगता है वह भी लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की वजह से सफल नहीं हो पाई। विकास जरूरी है लेकिन पर्यावरण का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। दोनों के बीच संतुलन बनाना हमारी आपकी जिम्मेदारी है।

लगता है कि लोग चेर्नोबिल त्रासदी को भूल गए हैं। भारत के भोपाल में मिथाइल आइसो साइनाइड गैस के रिसाव की वजह से हुई त्रासदी को भूल गए हैं, राजस्थान के जल पुरुष श्री राजेन्द्र सिंह कहीं शांति के बियाबान में चले गए। अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र के एक गाँव से जल संग्रहण और प्रकृति की रक्षा का जो प्रण किया था वह दिल्ली के रामलीला मैदान में आकर राजनीति की बलि चढ़ गया। नर्मदा बचाओ आंदोलन की सामाजिक नेत्री मेधा पाटकर भी आज चुप बैठी हैं। लगता है तमाम प्रयास के चिंतक राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता कहीं वनवास में चले गए हैं। पर्यावरण और प्रदूषण के मुद्दों पर इतनी शांति कभी भी नहीं थी। इन परिस्थतियों में प्राकृतिक संरक्षण की कवायद खतरे में मालूम पड़ती है। मानव निर्मित और प्राकृतिक त्रासदी से विश्व का सम्पूर्ण जनमानस प्रभावित है। फिलिपींस में हाल ही में आई बाढ़ एक उदाहरण है। ब्राजील में भी प्राकृतिक कारणों से एक खतरनाक बीमारी पनपी है। भारत के पंजाब में नाइट्रोजन उर्वरक के इस्तेमाल के कारण नवजात शिशु भी बीमारियों से पीड़ित हो रहे हैं।

.वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण एक व्यापक विचार विमर्श की बिंदु है। बहुत सारे सामाजिक मुद्दों के साथ प्रकृति और भावी पीढ़ी के लिये संसाधनों को संचरण करने के लिये एक व्यापक नीति की जरूरत है लेकिन वर्तमान पीढ़ी में इसे लेकर कोई जागरूकता नहीं है क्योंकि कोई सामाजिक राजनीतिक अभियान पर्यावरण केन्द्रित नहीं है। पहले चिपको आन्दोलन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन हुआ तो युवाओं को कुछ पता भी चलता था। लेकिन उपभोग वादी संस्कृति ने युवाओं को प्रकृति से काफी दूर कर दिया है। ग्रामीण समाज को छोड़ दें तो भी महानगरीय जीवन में इसके प्रति खास उत्सुकता नहीं दिखाई देती है। परिणामस्वरूप पर्यावरण सुरक्षा महज एक सरकारी एजेंडा बनकर रह गया है। जबकि यह पूरे समाज से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। जब तक समाज और समाज के विभिन्न अंगों में माँ, माटी और मनुष्य के प्रति स्वाभाविक लगाव पैदा नहीं होगा तब तक पर्यावरण संरक्षण एक दूर का सपना बना रहेगा।

विकास नए यंत्रों और दूरसंचार के माध्यमों ने भी युवाओं को अपनी संस्कृति और प्रकृति से दूर किया है। पृथ्वी को पहले माता का दर्जा प्राप्त था और आज पृथ्वी महज उपभोग के संसाधन जुटाने का माध्यम बन गई है। सभी धर्मों में प्रकृति, जंगल और जानवरों के प्रति कोई न कोई धार्मिक रीतियों का समावेश था, परन्तु आज का युवा उन संस्कारों और सिद्धान्तों से बहुत दूर है। भारत के बारे में सोचें तो भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया था जोकि आज कहीं भी दिखाई नहीं देता है। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के अनेक अंगों जैसे वृक्षों को पूज्य मानकर पूजा जाता था। पीपल और वटवृक्ष को पवित्र मानकर पूजा जाता था। जल, वायु, अग्नि को भी आराध्य मानकर उनकी पूजा की जाती थी। लेकिन अब मानव और प्रकृति के बीच के सम्बन्ध की यह कड़ी विलुप्त होती जा रही है।

संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से न्यूनीकरण का खतरा भी उत्पन्न हो गया है। समस्या यह है कि भावी पीढ़ी के लिये कोई प्राकृतिक विरासत शेष बचेगी या नहीं। आज लोग साफ पानी खरीदकर पी रहे हैं यदि ऐसा ही चलता रहा तो लोग पीठ पर ऑक्सीजन के सिलेंडर लेकर चलने लगेंगे, क्योंकि खुली हवा में साँस लेना दूभर हो जाएगा। अतः जलवायु परिवर्तन पर एक सशक्त नीति निर्धारण के साथ-साथ लोगों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिये कदम उठाना समय की माँग है।

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