कुदरत की सीख

Submitted by Hindi on Sat, 09/03/2016 - 10:43
Source
दैनिक जागरण, 30 अगस्त, 2016

ईंधन निर्माण की कृत्रिम विधि पर मुकुल व्यास के विचार

यदि हम पृथ्वी पर हाइड्रोजन धातु निर्मित करने में कामयाब हो जाते हैं तो हम सौरमंडल को और बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और इस क्रम में कुछ नई चीजों का निर्माण भी कर सकते हैं।

पौधे सूरज की रोशनी के जरिये पानी, कार्बन डाइऑक्साइड और खनिजों से ऑक्सीजन तथा कार्बनिक पदार्थों का निर्माण करते हैं। इस प्रक्रिया को हम फोटोसिंथेसिस अथवा प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं। बहुत से वैज्ञानिक सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलने की इस कुदरती प्रक्रिया को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। हार्वर्ड में ऊर्जा विज्ञान के प्रोफेसर डेनियल नोसेरा और उनकी सहयोगी पमेला सिल्वर ने कृत्रिम प्रकाश-संश्लेषण का एक ऐसा सिस्टम बनाया है जो प्राकृतिक प्रक्रिया से ज्यादा प्रभावी है। उन्होंने विशुद्ध कार्बन डाइऑक्साइड का प्रयोग करके 10 प्रतिशत की एफिसिएंसी दिखाई है जो प्राकृतिक प्रकाश-संश्लेषण से बेहतर है। प्राकृतिक विधि में सिर्फ एक प्रतिशत सौर ऊर्जा का ही प्रयोग हो पाता है। बिल गेट्स ने एक बार कहा था कि ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिये हमें एक दिन प्रकाश-संश्लेषण जैसी विधि अपनानी पड़ेगी और हमें पौधों से ज्यादा कुशलता दिखानी होगी। यदि हमें खनिज ईंधनों पर निर्भरता कम करनी है तो नोसेरा की टीम द्वारा विकसित कृत्रिम प्रकाश-संश्लेषण की विधि का एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है।

कृत्रिम प्रकाश-संश्लेषण से तरल ईंधन बनाने के लिये सौर ऊर्जा, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड की आवश्यकता पड़ती है। नोसेरा और उनकी टीम कुछ उत्प्रेरकों की मदद से पानी को ऑक्सीजन और हाइड्रोजन में विखंडित करती है। इसके पश्चात जैविक इंजीनियरिंग से परिवर्तित एक खास बैक्टीरिया को हाइड्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड से पोषित किया जाता है। यह बैक्टीरिया हाइड्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड को तरल ईंधन में बदल देता है। कई कंपनियाँ हाइड्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड से ईंधन निर्मित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन इसके लिये वे एक ऐसे बैक्टीरिया का प्रयोग कर रही हैं जो हाइड्रोजन के बजाय कार्बन मोनोक्साइड या कार्बन डाइऑक्साइड की खुराक लेता है। नोसेरा का सिस्टम कम तापमान और कम लागत पर काम करता है और इसकी एफिसिएंसी भी ज्यादा है। नई टेक्नोलॉजी के व्यावसायिक होने में अभी कई वर्षों की देरी है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि वैकल्पिक ईंधन के लिये हमें ऐसे उपायों को अपनाना पड़ेगा।

एक अन्य प्रयोग में कुछ वैज्ञानिक एक सामान्य धातु को एक बहुमूल्य धातु में बदलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वे प्राचीन कीमियागरों की तरह शीशे को सोने में बदलने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, बल्कि हाइड्रोजन गैस को एक ऐसी अवस्था में परिवर्तित कर रहे हैं जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। वैज्ञानिकों ने शक्तिशाली लेजर, विद्युत तरंगों और अत्याधुिनिक उपकरणों की मदद से हाइड्रोजन को ठोस धातु में बदलने की कोशिश की है और वे अपने लक्ष्य के काफी करीब पहुँच गए हैं। यदि वे सफल रहे तो मनुष्य के लिये नई तकनीकों का रास्ता खुल जाएगा। हाइड्रोजन सबसे सरल तत्व है। इसकी संरचना में सिर्फ एक प्रोटॉन और एक इलेक्ट्रॉन होता है। तारों में यह गैस बहुतायत में होती है। यह धीरे-धीरे आपस में जुड़ कर हीलियम गैस में परिवर्तित होती है। इसी प्रक्रिया में आगे चलकर भारी तत्वों का निर्माण होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ठोस हाइड्रोजन एक आदर्श सुपरकंडक्टर बन सकता है। सुपरकंडक्टर एक ऐसा पदार्थ है जिसमें बिजली का प्रवाह बिना किसी रुकावट के होता है। यदि हम पृथ्वी पर हाइड्रोजन धातु निर्मित करने में कामयाब हो जाते हैं तो हम सौरमंडल को और बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और इस क्रम में कुछ नई चीजों का निर्माण भी कर सकते हैं।

(लेखक विज्ञान विषयों के जानकार हैं)

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