कृषि और अर्थव्यवस्था जरूरत नए नजरिए की

Submitted by RuralWater on Tue, 09/06/2016 - 11:37

आजादी मिलते वक्त तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में खेती की हिस्सेदारी आधी से ज्यादा थी। लेकिन विकास के तेज पहिए ने अब कृषि की हिस्सेदारी घटा दी है। पिछले साल तक जीडीपी में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी देने वाली कृषि इस साल पिछड़ गई है। हाल ही में संसद में वित्त मंत्रालय द्वारा पेश आँकड़ों के मुताबिक पहली बार ऐसा हुआ है कि देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर से कम है। इतिहास का स्मृति दिवस हर बार हमें विगत में झाँकने का मौका देता है। इसी बहाने हम अपनी कामयाबियों के साथ ही अपनी असफलताओं की पड़ताल करते हैं और उनसे उबरने की दिशा में विचार मंथन के साथ ही नई राहों की पड़ताल करते हैं।

स्वतंत्रता दिवस की याद हम अपनी नाकामयाबियों की ही कुछ ज्यादा चर्चा करते रहे हैं। यह होना भी चाहिए, क्योंकि गाँधीजी ने आजादी के वक्त हर भारतीय की आँख का आँसू पोंछने का जो सपना देखा था, वह पूरा नहीं हो पाया है। 2004 के आँकड़ों पर आधारित योजना आयोग की एक समिति ने जो रिपोर्ट दी थी, उसके मुताबिक देश में दुनिया के स्तर के मुताबिक 26 करोड़ 90 लाख लोग ऐसे हैं, जिनके पास दो हजार रुपए या उससे ज्यादा रोजाना खर्च करने की हैसियत है।

यही लोग भारत के अब महान उपभोक्ता हैं। कांग्रेस के सांसद और पूर्व मंत्री मणिशंकर अय्यर कहते हैं कि भारत में आई आर्थिक तरक्की ने इस विशाल मध्य या उच्च मध्यवर्ग को जन्म दिया है और आज अर्थव्यवस्था में इस वर्ग का बेहतरीन योगदान है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि योजना आयोग की इसी अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी इस निष्कर्ष पर पहुँची थी कि इस विशाल खाओ-पियो मध्य वर्ग के बावजूद 83 करोड़ 70 लाख लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें रोजाना बामुश्किल बीस रुपए या उससे कम पर गुजारा करना पड़ता है।

मणिशंकर अय्यर का अनुमान है कि यह संख्या अब तक नब्बे करोड़ तक जा पहुँची होगी। जाहिर है कि हमारा आर्थिक विकास तो हुआ है, लेकिन वह विकास बेमेल है। इसीलिये हम सफल होकर भी असफल हैं।

हालांकि सरकार का दावा है कि अगले वित्त वर्ष में हमारी विकास दर साढ़े आठ प्रतिशत तक हो जाएगी, जबकि अभी यह 7.2 प्रतिशत ही है। लेकिन जिस ढर्रे पर हम आगे बढ़ रहे हैं, तय है इससे यह असमान विकास में खास अन्तर नहीं आने वाला है। इसलिये हमें चाहिए कि ऐसी योजनाएँ बनाएँ और उन्हें लागू कर सकें, जिनके चलते विकास की यह असमानता दूर हो।

आजादी मिलते वक्त तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में खेती की हिस्सेदारी आधी से ज्यादा थी। लेकिन विकास के तेज पहिए ने अब कृषि की हिस्सेदारी घटा दी है। पिछले साल तक जीडीपी में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी देने वाली कृषि इस साल पिछड़ गई है।

हाल ही में संसद में वित्त मंत्रालय द्वारा पेश आँकड़ों के मुताबिक पहली बार ऐसा हुआ है कि देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर से कम है। इस आँकड़े के मुताबिक 2009-10 के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का योगदान 7,19,975 करोड़ रुपए यानी करीब 16.1 प्रतिशत है, जबकि कृषि, वानिकी व फिशिंग का योगदान 6,51,901 करोड़ रुपए यानी 14.6 प्रतिशत है।

यहाँ पर हमारी अर्थव्यवस्था की बिडम्बना एक बार फिर जाहिर हो जाती है। दुनिया के किसी और देश में उद्योग और सेवा क्षेत्र बढ़ता है तो वहाँ रोजगार के साधन भी बढ़ते हैं। लेकिन भारत में उलटा है। देश में करीब 58 करोड़ लोगों की रोजी सीधे कृषि से ही जुड़ी हुई है। यानी आम किसानों की हालत अभी भी दूसरे सेक्टर की तुलना में खराब है।

कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा का कहना है कि हमें इस ओर ध्यान देना चाहिए। वैसे भी हमारी जनसंख्या हर साल डेढ़ प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। यानी हर साल करीब दो करोड़ खाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन्हें खिलाने के लिये हमें जमीन भी ज्यादा चाहिए। लेकिन आँकड़े बताते हैं कि कृषि योग्य भूमि में 17 प्रतिशत तक की कमी आ गई है। यानी पहले की तुलना में कम जमीन पर ज्यादा लोगों को खिलाने का दायित्व बढ़ गया है। इसीलिये हरित क्रान्ति के सूत्रधारों में से एक रहे कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामिनाथन अब दूसरी हरित क्रान्ति की वकालत कर रहे हैं।

कृषि पर ज्यादा जनसंख्या की निर्भरता कम करने के साथ ही उद्योग और सेवा क्षेत्र में ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया कराकर ही भावी भारत को सबल बनाया जा सकेगा।

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