दम तोड़ती अच्छी योजना

Submitted by Hindi on Tue, 09/13/2016 - 11:33
Source
दैनिक जागरण, 07 सितम्बर, 2016

आदर्श ग्राम योजना पर रिजवान अंसारी के विचार

बहरहाल गाँवों को आदर्श बनाने के लिये आवश्यकता है दृढ़ इच्छाशक्ति, समन्वय व अनुशासन की और यह हर स्तर पर जनप्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों द्वारा दिखाए जाने की आवश्यकता है। इसके बूते ही सांसद आदर्श ग्राम योजना में आने वाली बाधाएँ दूर की जा सकती हैं। अभी भी कोई देरी नहीं हुई है, समय रहते यदि हमारे सांसद ग्रामीण समस्या को समझ कर उसके विकास की पहल करें तो गाँवों की तकदीर बदली जा सकती है।

सांसद आदर्श ग्राम योजना की सफलता पर सवालिया निशान लग गया है। 2019 तक प्रत्येक सांसदों को तीन-तीन गाँवों का विकास करना है, लेकिन पहले चरण में संसद के दोनों सदनों के 795 सदस्यों में से 701 सांसदों ने ही गाँवों को गोद लिया, जबकि दूसरे चरण में अब तक 90 फीसद सांसदों ने गाँवों का चयन नहीं किया है जिनमें से दो तिहाई तो केन्द्रीय मंत्री हैं। एक रिपोर्ट के आँकड़े तो बेहद चौंकाने वाले हैं। इसके अनुसार पश्चिम बंगाल के कुल 58 में से 56 सांसदों ने पहले चरण में किसी भी गाँव का चयन नहीं किया। ये आँकड़े एक तरफ सांसदों की निष्क्रियता पर सवाल खड़े करते हैं तो दूसरी तरफ सांसद आदर्श ग्राम के भविष्य पर। अगर नेशनल सैंपल सर्वे की ताजा रिपोर्ट की मानें तो सांसदों द्वारा चयनित गाँवों में अब तक तीन से चार फीसद ही विकास दिख रहा है। यह आँकड़ा हमारे सांसदों की नियत पर सवाल खड़ा कर रहा है।

गौरतलब है कि कई सांसदों ने जिन गाँवों को गोद लिया है वहाँ अब तक सिर्फ एक से दो बार गए हैं या कभी गए ही नहीं। 90 फीसद ग्रामीणों को तो यह भी पता नहीं है कि उनके गाँव को किस सांसद ने गोद लिया है। इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जिस गाँव को विकसित करने का बीड़ा सांसदों ने उठाया है उसी गाँव से वे नजरें चुराते फिर रहे हैं। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 2019 तक 2200 गाँवों का विकास करने का लक्ष्य रखा है। उनकी सोच थी कि धीरे-धीरे जब गाँवों का विकास होगा तो एक दिन भारत समग्र रूप से विकसित देशों की श्रेणी में आ जाएगा, लेकिन विपक्ष तो दूर राजग के सांसदों द्वारा ही उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। यह चिन्ता का विषय है। इससे एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि देश निर्माण की जिम्मेदारी हमारे जनप्रतिनिधि नहीं उठाएंगे तो कौन उठाएगा?

हालाँकि इस योजना के लिये अलग से धन का कोई प्रावधान नहीं है, बल्कि सांसदों से ये अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी संसदीय क्षेत्र विकास निधि का उपयोग करेंगे। अब तक भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों ने सांसद आदर्श ग्राम योजना की परियोजनाओं को वरीयता देने के लिये 23 योजनाओं को संशोधित किया है। साथ ही सांसद ग्रामीण विकास से जुड़ी अन्य केन्द्रीय योजनाओं तथा ग्राम पंचायतों को उपलब्ध कोष को समन्वित कर सकते हैं। इसमें अगर आवश्यकता हो तो कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के तहत कम्पनियों ने सामाजिक विकास के लिये जो धन रखा है, उसे जुटाने की कोशिश कर सकते हैं या फिर सांसद सामाजिक- पारमार्थिक संस्थाओं की सहायता भी ले सकते हैं। सवाल यह है कि क्या ऐसा करना इतना आसान है? योजना को लेकर सांसदों के सामने एक और चुनौती है। सांसद आशंकित हैं कि अपनी कोशिशों से वे एक गाँव को आदर्श बना देंगे तो इससे उनके चुनाव क्षेत्र के दूसरे गाँवों में ईर्ष्या का भाव पैदा होगा, जिसकी कीमत उन्हें आने वाले चुनाव में चुकानी पड़ सकती है। एक लोकसभा क्षेत्र में 700 से 800 गाँव आते हैं और यदि पाँच साल में पाँच गाँव आदर्श बन भी जाएँ तो बाकी गाँव के लोगों द्वारा सवाल खड़े करना स्वाभाविक है।

बहरहाल गाँवों को आदर्श बनाने के लिये आवश्यकता है दृढ़ इच्छाशक्ति, समन्वय व अनुशासन की और यह हर स्तर पर जनप्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों द्वारा दिखाए जाने की आवश्यकता है। इसके बूते ही सांसद आदर्श ग्राम योजना में आने वाली बाधाएँ दूर की जा सकती हैं। अभी भी कोई देरी नहीं हुई है, समय रहते यदि हमारे सांसद ग्रामीण समस्या को समझ कर उसके विकास की पहल करें तो गाँवों की तकदीर बदली जा सकती है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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