पानी की मार से पान पर संकट

Submitted by RuralWater on Thu, 09/22/2016 - 10:59
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गर्मियों के दिनों में तापमान 30 से 38 तक जाने लगा है वहीं अनियमित बारिश ने भी पान की खेती मुश्किल कर दी है। इस पान की बेल को न ज्यादा गर्मी सहन होती है, न बारिश और न ही ज्यादा ठंड। इसकी बच्चे से भी ज्यादा देखभाल करना पड़ता है। हालत यह है कि लाखों की लागत के बाद भी यदि फसल नहीं बचे तो किसान कंगाल हो जाता है। कई बड़े पान उत्पादक किसानों के बच्चे या तो चाय की गुमटियों पर काम कर रहे हैं या फैक्टरियों में मजदूरी। पानी की कमी से पान की खेती पर संकट खड़ा हो गया है। हालात इतने बुरे हैं कि इसे न सिर्फ मध्य प्रदेश में पान की खेती का रकबा बीते 30 सालों में तेजी से घटा है और इसकी खेती से जुड़े लोग रोजी-रोटी से महरूम हो चुके हैं, बल्कि मालवी पान के निर्यात पर भी इसका बुरा असर पड़ा है। निर्यात प्रभावित होने से प्रदेश की सरकार को हर साल डेढ़ करोड़ रुपए के राजस्व का भी नुकसान हो रहा है। यहाँ अब तक पान की खेती को बचाने के लिये किसी तरह की कोई सरकारी या गैर सरकारी पहल नहीं हुई है।

मालवी पान इन दिनों सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। हर साल करीब डेढ़ करोड़ रुपए से ज्यादा की विदेशी आमदनी कमाने वाली इस खेती पर संकट के बादल हैं। यदि अब भी ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में यह पान विलुप्त हो जाएगा। पान की खेती बहुत ही मुश्किल हालातों में की जाती है। सूखा, मौसम की मार और पानी की कमी तो है ही, सरकार का उद्यानिकी विभाग भी इसे प्रोत्साहित नहीं कर पा रहा है। इससे प्रदेश में मालवी पान का रकबा तेजी से कम होता जा रहा है।

मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में मन्दसौर जिले के भानपुरा, धार जिले के अमझेरा, इन्दौर जिले के मानपुर, हासलपुर और बेटमा सहित देवास जिले के नागदा में कुछ सालों पहले तक पान की खेती का रकबा काफी बड़ा हुआ करता था। लेकिन अब यहाँ यह घटकर 10 फीसदी से भी कम हो गया है। नागदा में कभी 150 एकड़ जमीन में पान होता था, जो अब घटकर 10 एकड़ में ही होता है। पान की खेती में काफी मेहनत कर बाँस - बल्लियों और घास से झोपड़ीनुमा टांटी बनाई जाती है, इसमें मौसम को अनुकूल करने के लिये देशज तकनीकें उपयोग में ली जाती हैं।

जानवरों और मौसम की बेरुखी से फसल को बचाने के लिये खेत की घेराबन्दी की जाती है। बाँस और पतले तारों से पूरा बाड़ा तैयार किया जाता है। और इस पर पन्नी या जूट का हरा कपड़ा छत की तरह लगाया जाता है। और खेत की जमीन पर करीब एक फीट तक मिट्टी चढ़ानी पड़ती है, इसे पनवाड़ी कहते हैं। कभी यहाँ 70 पनवाड़ियाँ हुआ करती थीं, जो अब घटकर 5 ही रह गई है। अमझेरा में 75-80 पनवाड़ियों में से अब एक भी नहीं बची। बेटमा में भी 250 में से दो-चार ही बची हैं, वे भी आखिरी साँस लेती हुई।

मालवी पान का जायका और इसके विशेष औषधीय उपयोग के कारण इसकी साख विदेशों तक में है। यह भारत से बाहर बांग्लादेश, पाकिस्तान, मलेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड सहित कई देशों तक निर्यात भी किया जाता है। करीब दस सालों पहले तक इसके निर्यात से हर साल डेढ़ करोड़ रुपए से ज्यादा की विदेशी मुद्रा भारत को मिलती रही है। लेकिन अब देश के स्थानीय बाजार में भी माँग के बावजूद इसका उत्पादन कम ही हो पा रहा है। बताते हैं कि यह पान मुँह में देर तक घुलता नहीं है और इसका स्वाद भी लज्जतदार होता है। तीखा होने से यह गर्म प्रकृति का होता है और आयुर्वेद में इसके कई गुण बताये जाते हैं।

किसान इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इलाके में पानी की कमी और अनियमित मौसम की वजह बताते हैं। कुछ सालों पहले तक मालवा का मौसम बड़ा खुशगवार हुआ करता था। यहाँ तक कि मुगल शासन के दौरान तो यहाँ की शब-ए-मालवा बड़ी मशहूर हुआ करती थी। तब यहाँ गर्मियों की रातें भी बड़ी शीतल और सुखद हुआ करती थी। लेकिन अब मौसम तेजी से अनियमित होता जा रहा है। मालवा के जिस सम शीतोष्ण में पान की खेती आसानी से होती थी, अब मुश्किल होती जा रही है। दूसरे बीते 25-30 सालों में मालवा में लगातार नलकूपों के खनन से धरती का सीना छलनी हो जाने के कारण भूजल भण्डार कम हुआ है। यहाँ जलस्तर काफी नीचे चला गया है।

नागदा में किसान बताते हैं कि उनके खेतों के पास से ही सदानीरा नागधम्मन नदी बहती रहती थी। चड़स से पर्याप्त पानी मिल जाया करता था। लेकिन अब नदी एक गन्दले नाले में बदल चुकी है। वहीं जलस्तर भी काफी नीचे चला गया है। नागदा की पनवाड़ियों के बीच ही करीब पचास से ज्यादा छोटे कुएँ और कुण्डियाँ नजर आती हैं, लेकिन अब इनमें से पाँच-दस ही बची हैं, बाकी को पाट दिया गया है। बीते जमाने में इनका इस्तेमाल खेती के काम में किया जाता रहा होगा। तब नदी के हमेशा भरे रहने से जलस्तर पर्याप्त रहता होगा। अब काम में नहीं आने से अधिकांश किसानों ने इसे जमीन में पाट दिया है।

बुजुर्ग बताते हैं कि यहाँ की आबोहवा में पान की खेती सम्भव होने से देवास रियासत के तत्कालीन राजातम्बोलियों (पान की खेती करने वालों) को यहाँ लेकर आये और उन्हें बसाने के साथ मुफ्त में जमीनें भी दीं। अब इलाके में पान की खेती आखरी साँसें गिन रही हैं। इससे कई परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है, जो पीढ़ियों से पान की खेती करते रहे हैं।

अब इन परिवारों के युवा या तो देवास की फैक्टरियों में मजदूरी कर रहे हैं या इन्दौर में कोई छोटा-मोटा धंधा। ज्यादातर बच्चे बाहर जा रहे हैं। किसान बताते हैं कि पान की खेती के लिये बदलता तापमान सबसे बड़ा खतरा है। पहले यहाँ का तापमान अधिकतम 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तक रहा करता था, जो अब बढ़कर 40 से ज्यादा होने लगा है। बहुत ज्यादा गर्मी या सर्दी में पान की फसल बर्बाद हो जाती है। इसीलिये नई पीढ़ी का इस काम में मन नहीं लगता। पान की खेती के लिये अब वैसी ढालदार जमीन भी नहीं मिल पाती।

अमझेरा के प्रेमनारायण बताते हैं कि दो बेटियों के हाथ पीले करने की चिन्ता है। पैसों की तंगी है। लगातार तीन सालों से पान की खेती खराब हो रही है। क्या करें।

राजेंद्र बताते हैं कि खेती महंगी हो रही है और दलाल भी किसानों का शोषण करते हैं। यह तकनीक भी बड़ी जटिल है। कलम लगाने, खाद देने और रासायनिक कीटनाशकों के साथ पान की खेती के लिये शेड लगाना भी महंगा काम है पर पल में मौसम बदल जाये तो करोड़ों का नुकसान हो जाता है। करीब एक एकड़ जमीन में पान की खेती में एक लाख रुपए तक खर्च हो जाता है। यह अब घाटे का सौदा होती जा रही है। सरकार कुछ मदद करें तो इससे सरकारों को भी विदेशी राजस्व मिल सकता है।

नागदा के नगजीराम मोदी की उम्र 60 के पार हो चली है लेकिन उनकी आँखों में अब गहरी निराशा है। वे कहते हैं कि बढ़ती महंगाई और उपेक्षा से पान की खेती अब खत्म होने की कगार पर आ चुकी है। वे बताते हैं कि मालवा की तासीर अब ठंडी नहीं रह गई है।

यहाँ गर्मियों के दिनों में तापमान 30 से 38 तक जाने लगा है वहीं अनियमित बारिश ने भी पान की खेती मुश्किल कर दी है।
इस पान की बेल को न ज्यादा गर्मी सहन होती है, न बारिश और न ही ज्यादा ठंड। इसकी बच्चे से भी ज्यादा देखभाल करना पड़ता है। हालत यह है कि लाखों की लागत के बाद भी यदि फसल नहीं बचे तो किसान कंगाल हो जाता है। कई बड़े पान उत्पादक किसानों के बच्चे या तो चाय की गुमटियों पर काम कर रहे हैं या फैक्टरियों में मजदूरी।

नागदा के ही राहुल मोदी बताते हैं कि उद्यानिकी विभाग भी कोई मदद नहीं करता। न कोई सलाह, न कोई योजना और न ही कोई ऋण या अनुदान। देवास के उद्यान अधिकारी को तो यह भी नहीं पता कि उनके दफ्तर से 5 किमी दूरी पर नागदा में ही पान की भी खेती हो रही है। अमझेरा के भेरुलाल तम्बोली बताते हैं कि इतनी मेहनत और रिस्क के बाद भी मुनाफा नहीं मिलने से इलाके से पनवाड़ियाँ ही खत्म हो गईं।

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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