शिवाजी के स्वराज में पानी और पर्यावरण की चिन्ता

Submitted by RuralWater on Fri, 09/30/2016 - 12:01
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भारतीय राजव्यवस्था में मिट्टी के बाँधों व तालाबों के निर्माण का विशेष महत्त्व है। पेयजल के लिये कुएँ बावड़ी और कृषि आधारित सभी कार्यों के लिये बड़े जलाशयों का निर्माण हर सुशासन में होता है। उस दौर में सैनिक भी शान्ति के समय खेती करते थे। उन दिनों किसानों से कुल उपज का 33 फीसदी कर के रूप में लिया जाता था। बंजर भूमि पर यह दर कम थी। लेकिन कई ऐसे प्रसंग भी सामने आते हैं, जब अकाल या फसलें खराब होने पर उदारता से किसानों को अनुदान और सहायता दी जाती रही। इसके साथ ही खेती को नए क्षेत्रों में बढ़ाने के लिये किसानों को लगान मुक्त जमीनें भी बाँटी गई। इन दिनों पर्यावरण राज्य मंत्री अनिल माधव दवे की किताब चर्चा में है, जो बताती है कि साढ़े तीन सौ साल पहले शिवाजी के राजकाज में उन्होंने पानी और पर्यावरण को खासी तवज्जो दी थी। किताब में शिवाजी के कार्यकाल के दौरान किये गए पानी और पर्यावरण के साथ उन दिनों खेती की स्थिति और शिवाजी के शासन काल में हुए खेती के सुधारों पर भी विस्तार से बात की गई है।

उनका राज्य छोटे से भू-भाग खासतौर से महाराष्ट्र तक उत्तर में सूरत से पूना, दक्षिण पश्चिम में समुद्र तटीय प्रदेश दक्षिण पूर्व में सतारा, कोल्हापुर, बेलगाँव और थारवार तक तथा दक्षिण में जिंजी और उसके आसपास कायम था। 1630 से 1680 के कुल जमा जीवन में शिवाजी 1670-80 तक ही अपने राज्य पर शासन कर सके।

1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक किया गया। लेकिन इस छोटे से समय में भी सुशासन और जन केन्द्रित शासन के कारण वे आज तक पहचाने जाते हैं। उन्होंने बरसाती पानी को रोकने और उसको सहेजने के लिये मिट्टी के बाँध और बड़े तालाब बनवाए और पेड़ काटने पर सख्त पाबन्दी लगाई। उनके शासन में ही पहली बार 1670 में अन्नाजी दत्तो ने व्यापक स्तर पर भू-सर्वेक्षण करवाया। अष्ट प्रधान की व्यवस्था में उन्होंने किसानों पर ध्यान देने के लिये अलग से व्यवस्था की।

इसी किताब के पृष्ठ 61 पर उल्लेख मिलता है कि शिवाजी के समय में कृषि की स्थिति पूरी तरह से बारिश आधारित थी। इसलिये हमेशा अतिवृष्टि और अल्पवर्षा का डर बना रहता था। भारत जैसे कृषि प्रधान देश का राजा कृषि के महत्त्व को समझें और उसके लिये योग्य दिशा में प्रयत्न करें यह अनिवार्य है।

शिवाजी ने कृषि भूमि प्रबन्धन जल संग्रह और उसके विविध पक्षों पर गहन विचार कर व्यवस्थाएँ खड़ी की थी। बारिश का पानी रोका जाये, उसका उपयोग साल भर तक पशुपालन और खेती के विभिन्न कार्यों के लिये किया जाये इसका उनका सदैव आग्रह रहता था। महाराष्ट्र के पुणे शहर में स्थित पर्वती के नीचे अम्बील ओढा नामक झरने पर शिवाजी ने स्वयं बाँध बनवाया था, जिसे आज भी देखा जा सकता है। इसी प्रकार उन्होंने पुणे के पास कोंडवा में भी बाँध बनवाया था।

भारतीय राजव्यवस्था में मिट्टी के बाँधों व तालाबों के निर्माण का विशेष महत्त्व है। पेयजल के लिये कुएँ बावड़ी और कृषि आधारित सभी कार्यों के लिये बड़े जलाशयों का निर्माण हर सुशासन में होता है। उस दौर में सैनिक भी शान्ति के समय खेती करते थे।

उन दिनों किसानों से कुल उपज का 33 फीसदी कर के रूप में लिया जाता था। बंजर भूमि पर यह दर कम थी। लेकिन कई ऐसे प्रसंग भी सामने आते हैं, जब अकाल या फसलें खराब होने पर उदारता से किसानों को अनुदान और सहायता दी जाती रही। इसके साथ ही खेती को नए क्षेत्रों में बढ़ाने के लिये किसानों को लगान मुक्त जमीनें भी बाँटी गई।

किसानों को बीज, पानी और मवेशियों की जरूरत के लिये आसान ऋण भी मुहैया कराया जाता था। बड़ी बात यह है कि उन्होंने किसानों को जमींदारी और जागीरदारी के आतंक से मुक्त कराने के लिये रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू की। दक्षिण और मुगलकालीन व्यवस्था की भी अच्छी बातों को उन्होंने अंगीकार किया।

शिवाजी की पर्यावरण दृष्टि बहुत समृद्ध थी। इस किताब के पृष्ठ 162 पर उल्लेख है कि शिवाजी ने शासकीय आज्ञा पत्र जारी कर प्रजा में यह आदेश पहुँचाया था कि जहाँ तक सम्भव हो सके, सूखे और मृत हो चुके पेड़ों के ही प्रयोग से विभिन्न कार्य पूरे किये जाएँ। नौसेना के लिये जहाज निर्माण हेतु ठोस व अच्छी लकड़ी की आवश्यकता होती है।

स्वराज्य के जंगलों में सागौन के जो वृक्ष हैं, उनमें से जो अनुकूल हों, अनुमति के साथ काटे जाएँ। ज्यादा आवश्यकता होने पर अन्य राज्य या देशों से अच्छी लकड़ी खरीद कर लाई जाये। स्वराज के जंगलों में आम व कटहल के पेड़ हैं, जो जलपोत निर्माण में काम आ सकते हैं; परन्तु उन्हें हाथ न लगाया जाये, क्योंकि यह ऐसे पेड़ नहीं है, जो साल-दो-साल में बड़े हो जाएँ। जनता ने उन पेड़ों को लगाकर अब तक अपने बच्चों की तरह पाल-पोस कर बड़ा किया है। ऐसे पेड़ काटने से उनके पालकों को कष्ट पहुँचेगा।

किसी को दुखी कर दिया जाने वाला कार्य और उसे करने वाले थोड़े ही समय में समाप्त हो जाते हैं तथा प्रदेश के मुखिया को प्रजा पीड़ा की हाय झेलनी पड़ती है। वृक्षों को काटने से हानि भी होती है। इसलिये आम व कटहल जैसे फलदार वृक्ष कभी न काटे जाएँ। कोई एकाध पेड़ जो जीर्ण-शीर्ण या वृद्ध हो गया हो उसे उसके मालिक की आज्ञा से ही काटा जाये। साथ ही उसके मालिक को क्षतिपूर्ति की राशि भी दी जाये। जोर-जबरदस्ती बगैर अनुमति के कोई पेड़ न काटा जाये।

कृषि का उत्पादन बढ़ाने और शासन पर भार कम करने के लिये शिवाजी ने अपने सैनिकों को वर्षाकाल के समय कृषि कार्य में लगाने का प्रावधान किया। शान्ति के समय यह किसान किले के नीचे अथवा अपने-अपने गाँव में कृषि भूमि पर खेती करने जाते थे।

वर्षा समाप्ति पर विजयादशमी के दिन सैनिक गाँव की सीमा का लंघन कर फिर से एकजुट होते और अगले सात-आठ महीने के लिये मुहिम पर चले जाते हैं। श्रम का कृषि में विनियोग और कृषि कार्य पूर्ण होने पर उसका रक्षा व्यवस्था में उपयोग का यह तरीका अपने आप में राष्ट्रीय श्रम प्रबन्धन का अनूठा उदाहरण था, क्योंकि भारतीय कृषि पूरी तरह वर्षा पर आधारित थी।

कीट पतंगों और अन्य प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता था तो ऐसे अवसर पर राज्य की ओर से लगान वसूली में छूट दी जाती थी। यहाँ भी शिवाजी ने एक अभिनव व्यवस्था खड़ी की। उनके राज्य में किसानों को विभिन्न कारणों से हुए नुकसान की भरपाई नगद नहीं दी जाती थी, आक्रमणकर्ताओं के कारण हल बक्खर व बैलगाड़ी जैसे कृषि योजनाओं की टूट-फूट होने पर उधार के बदले औजार ही उपलब्ध कराए जाते थे। और इन सब का उद्देश्य होता था किसान की कृषि क्षमता को बनाए रखना।

स्वराज के शासक मानते थे कि नगद उपलब्ध कराई गई राशि का उपयोग व्यक्ति के द्वारा अन्य कामों में भी किया जा सकता है लेकिन सामग्री तो उपयोग के लिये ही होती है। इससे दोहरा नुकसान होता है, एक राज्य का खर्च होता है और दूसरा किसान कृषि पैदावार को यथावत रखने के या बढ़ाने में सक्षम नहीं हो पाता, अतः शासन को सहायता देने के साथ कृषि उत्पादन क्षमता बनाए रखने पर भी समान मात्रा में सोचना चाहिए।

शिवाजी ने स्वराज में जागीरी प्रथा को खत्म कर दिया था कम कर दिया था वह धार्मिक व सामाजिक कार्य को छोड़कर अन्य किसी भी उद्देश्य से राज्य की भूमि को बाँटना उचित नहीं समझते थे। उनकी मान्यता थी कि भूमि तो राज्यलक्ष्मी है, उसका विभाजन कैसे हो सकता है। शिवाजी अपने राज्य में विभिन्न प्रकार की पैदावार का आग्रह करते थे।

एक जैसी खेती फसल चक्र में असन्तुलन पैदा करती है। इस वैज्ञानिक दृष्टि को वे सूक्ष्मता से जानते थे। स्वस्थ भूमि - स्वस्थ उत्पादन व स्वस्थ पर्यावरण के लिये पैदावार में विविधता का आग्रह उनके समकालीन किसी अन्य शासन की राज्य कृषि व्यवस्था में देखने को नहीं मिलता। शिवाजी ने विशेष आदेश निकालकर फलदार वृक्षों को लगाने का आग्रह किया साथ ही यह सूचना भेजी कि फलों की बिक्री से पहले उसके 30% फल राजकोष का भाग रहेंगे।

इस किताब की प्रस्तावना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुशासन को लेकर काफी महत्त्व के मुद्दे उठाए हैं। वे लिखते हैं– 'प्रजा केन्द्रित विकास ही सुशासन का मूल तत्व है इतिहास गवाह है कि जब-जब जन सामान्य को विकास का केन्द्र और साझीदार बनाया गया तब-तब उस राज्य ने सफलता और समृद्धि की ऊँचाइयों को छुआ है। प्रजा की भागीदारी के बिना किसी भी राज्य में प्रगति नहीं हो सकती हमारे सभी महानायकों ने इस तथ्य को अच्छी तरह से जाना और समझा। सदियों पहले ऐसे ही महानायक थे छत्रपति शिवाजी महाराज वह एक कुशल प्रशासक, सफल शासक थे। उन्होंने सुशासन के आधार पर समाज की स्थापना कर इस देश के इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।'

इस तरह यह किताब शिवाजी के स्वराज सुशासन के बहाने इस विषय को मजबूती से उठाती है कि एक शासक को अपने तई समाज के हित में किस तरह पानी और पर्यावरण जैसे समाज के बड़े वर्ग से वास्ता रखने वाले बिन्दुओं पर समग्र और दूरंदेशी विचार रखते हुए काम करने की महती जरूरत है।

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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