हिमालय की जीओडायनमिक्स : चाय की मेज पर एक चर्चा (Geodynamics of Himalaya : A Discussion on Tea table)

Submitted by Hindi on Sun, 10/02/2016 - 10:47
Source
अश्मिका, जून 2005

हिमालय में भूचाल की एक पट्टी है जोकि मेन सेन्ट्रल थ्रस्ट के इर्द गिर्द फैली हुई है। दक्षिण में मेन बाउन्डरी थ्रस्ट और फूट हिल थ्रस्ट के आस-पास भूचाल की प्रक्रिया नहीं देखी गई है यद्यपि सूक्ष्म यंत्रों से भी प्रयत्न किए गए हैं। भूचाल की पट्टी में महाविनाशकारी महाभूकम्प आते हैं। हिमालय के महाभूकम्पों के लिये सीबर व आर्मब्रुस्टर ने 1986 में एक मॉडल प्रस्तुत किया था। यद्यपि यह एक सामान्य मॉडल है तथा हिमालय की जीओडाइनमिक्स को केवल मोटे तौर पर रेखांकित करता है तथापि इसे अनेक वैज्ञानिकों ने अपने शोधों में आधार के रूप में प्रयोग किया है। उधारणत: बिलहम (1995), बनर्जी व बर्गमैन (2004) ने जीपीएस डाटा के इनटरप्रेटेशन में, खत्री (1992) ने हैजार्ड के आंकलन में, ठाकुर (2004) ने भूगर्भ के आकलन में इसे आधार लिया है।

इस मॉडल के मूल गुण व सम्बन्धित प्रश्न नीचे चर्चित हैं


चित्र 1 में सीवर व आर्मब्रुस्टर का मॉडल प्रस्तुत है। इसमें प्रस्तावना है कि महा भूकम्प के समय एक लगभग होरीजोन्टल सतह पर फाल्ट बनता है। इसे डीटैचमेन्ट की संज्ञा दी गई है। इस डीटैचमेन्ट का विस्तार आउटर हिमालया से ले कर एमसीटी तक है। डिटैचमेन्ट के ऊपर सेडीमेन्ट हैं और नीचे बेसमेन्ट चट्टाने हैं। एमसीटी के उत्तरीय भाग में भारतीय प्लेट और टेथीयन स्लैब के मध्य बिना भूकम्प के आए क्रीप के माध्यम से स्लिप हो रही है। एमसीटी, एमबीटी तथा एचएफटी सब की उत्पत्ति डिटैचमेन्ट में प्रस्तावित है।

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इस मॉडल से कुछ प्रसंग उठते हैं।


1. एमसीटी के उत्तर में जो फाल्ट का भाग है और जिसके लिये अनुमान है कि यहाँ क्रीप से स्लिप हो रही है। क्रीप का अनुमान इस आधार पर किया गया है कि यहाँ भूकम्प नहीं आते हैं- क्या इसका कारण अत्यधिक तापमान है? अगर ऐसा है तो तिब्बत स्लैब जब दक्षिण की तरफ खिसकेगी तो एमसीटी की शक्ति तिब्बत स्लैब की अत्यधिक ऊष्णा के कारण क्षीण हो जाएगी। ऐसी स्थिति में एमसीटी पर महा भूकम्पों की उत्पत्ति की संभावना क्षीण हो जाएगी। क्योंकि कम स्ट्रेस पर ही स्लिप होने लगेगी और स्ट्रेस रिलीज होता जाएगा।

2. ऐसे क्या कारण हैं कि एमसीटी के दक्षिण में छाटे वे मध्यम मैग्नीटयूड के भूचाल नहीं आते हैं? क्या यहाँ की जमीन बहुत ठोस है। तथा इलास्टिक स्ट्रेन संचय हो रहा है अथवा बहुत कमजोर है और क्रीप हो रही है या कि स्ट्रेस फील्ड यहाँ पहुँच ही नहीं रही है। स्ट्रेन है ही नहीं। यह आखिरी विकल्प तो अटपटा लगता है क्यों कि डीफोरमेशन के साक्षी के रूप में कितने ही फोल्ड, भ्रंश आदि मौजूद हैं जो कि होलोसीन में ही उत्पन्न हुए हैं।

3. अनेक अध्ययनों के आधार पर बिचली तथा निचली क्रस्ट तो ऊपरी क्रस्ट के मुकाबले में काफी कमजोर पाई गई है। ऐसे में जो स्लिप क्रीप के माध्यम से एमसीटी के उत्तरी भाग में अनुमानत: हो रही है वो क्या बिचली तथा निचली क्रस्ट में हो रही है? इस प्रक्रिया का बाकी डाइनैमिक्स पर क्या असर पड़ेगा? यह विचारणीय है।

4. यह माना गया है कि भारतीय प्लेट का क्रस्ट समेत लिथोस्फीयर का अंदरूनी डिफोरमेशन कोई खास नहीं हो रहा है। इस अनुमान का आधार है वहाँ पर डीपर साइस्मिसिटी का अभाव। पर क्या यहाँ भी बीच की क्रस्ट में क्रीप की संभावना नहीं है जिसके कारण ही भूकम्पों का यहाँ अभाव है?

5. मैन्टल फलूइड्स व क्रस्टल फ्लूइड्स तथा तापमान की क्या अदाकारी है? जो कि भ्रन्श की प्रक्रिया में विशेष महत्त्वकारी सिद्ध हो सकते हैं।

यहाँ यह कहना उचित होगा कि हिमालय के उत्थान की समस्या पर कई विशिष्ठ वैज्ञानिकों ने अपने अपने मत रखे हैं। इनमें से एक और मॉडल, जोकि मोलनार (1986) ने प्रस्तुत किया है- यहाँ जबकि एमसीटी क्रस्ट को भी भंजता दिखाया है, एमबीटी क्रस्ट और ऊपर मेटा सेडीमेन्टस के विभाजन सतह पर आंका है। जबकि एफएचटी एमबीटी से ही फूटा है। अगर एमसीटी क्रस्ट को भांजता माना गया है तो लोअर क्रस्ट का भी, जोकि कमजोर है, इस प्रक्रिया में शामिल होना आपेक्षित होगा। मिडिल व लोअर क्रस्ट में चैनल फ्लो पर बहुत काम हो रहा है जो यह दर्शाता है कि इस प्रक्रिया का कितना महत्व है और जो जीओडायनमिक्स पर कितना प्रभावकारी है। यहाँ जीओकेमिकल व थर्मल पक्ष भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

चित्र 2 में एक और मॉडल दिखाया है जोकि चामंडा व सहयोगियों (2000) द्वारा प्रस्तुत है। इनमें भी बीच व नीचे की क्रस्ट में भ्रंश आंके गए हैं।

इन मॉडलों से यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि यह समस्या, इमरती की भांति, काफी उलझी हुई है और इसे सुलझाने के लिये कई प्रकार के व गहन अध्ययनों की आवश्यकता है, जोकि अभी होने बाकी हैं। पर, जैसा कि ऊपर उल्लेख है इन मॉडलों को आधार मान कर कई अहम विषयों का, जैसे कि भूचाल के खतरे, अध्ययन किया गया है। इससे यह प्रश्न लाज़िमी है कि इस मॉडल को आधार मानकर उपलब्ध निष्कर्षों की गुणवत्ता की कितनी विश्वसनीयता है। यहाँ यह याद करना उचित होगा कि जीओडायनमिक्स एक अत्यधिक नौनलीनियर अथवा अरैखिक प्रक्रिया है। ऐसे विन्यासों में ऊंट की रीढ़ एक तिनके के रखने से टूटी चरितार्थ होती है। इस युक्ति का अभिप्राय यहाँ यह है कि हिमालय की जीओडायनमिक्स को बड़ी बारीकी से अध्ययन करने की आवश्यकता है अगर हम इसकी नब्ज को ठीक-ठीक पकड़ना चाहते हैं।

Fig-2चित्र 3 में वाल्दिया (2001) का एक नक्शा दिखाया है। इसमें उन्होंने थ्रस्ट की स्थितियों की काफी विस्तार से समीक्षा की है और उनके अनुसार एमसीटी व एमबीटी क्रस्ट के काफी अन्दर से आरंभ हुए हैं जोकि युक्ति संगत लगता है। परन्तु फिर इसी प्रपत्र में उन्होंने एक अन्य चित्र में सीबर व आर्मब्रुस्टर (1986) तथा बिलहम व साथी (1995) के अनुरूप मॉडल को अपनाया है (चित्र 4) तथा अपना पहला मॉडल, जोकि इस लेखक के अनुसार अधिक उपयुक्त लगता है, को हाशिए पर छोड़ दिया है। इसी प्रकार चित्र 5 में कयाल (1996) ने अपने ही डाटा को नजरअंदाज करते हुए सी. व आ. के बहुचर्चित मॉडल को अपना लिया है। इससे यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि और तो और कुछ वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर कुछ नया, अथवा उनके अनुसार, सुधार तो प्रस्तुत करा है पर अन्तत: वे कुहनियन (1962) स्लाइड पर अपने को सीबर व आर्मब्रुस्टर के मॉडल पर पाते हैं।

Fig-3Fig-4Fig-5अब कुछ चर्चा डिटैचमेंट के लौक्ड स्थिति के बाबत : बिलहम व साथी (1995) व बैनर्जी व बर्गमैन (2002) ने अपेक्षाकृत क्षीण अथवा स्पार्स जीपीएस के आँकड़ों के आधार पर तथा सी. व आ. के मॉडल को लेकर, निष्कर्ष निकाला है कि एमसीटी के दक्षिण में डिटैचमेंट फाल्ट ताला बन्द (लौक्ड) है - अथवा वहाँ क्रीप नहीं हो रही है। पहले तो गहन (अथवा डीटेल्ड) अध्ययन का इस अनुमान पर क्या असर पड़ सकता है - यह विचारणीय है। क्या कई ऐसे संकरे स्थान हो सकते हैं जहाँ कि क्रीप होने की संभावना है तथा इन्हें पहचानने के लिये गहन जीपीएस ऑब्जरवेशन श्रृंखला लगाने की आवश्यकता है? अगर लौक्ड स्थिति वास्तविकता में है तो भी यह अपने में एक वैज्ञानिक चुनौती है। क्योंकि इस भ्रंश पर पिछले भूगर्भीय समय में अनेकानेक बार स्लिप हुई है। इस कारण यह भ्रंश पिसी हुई माइलोनाइट से भरा होगा तथा इसे बहुत कमजोर होना चाहिए। ऐसे में यहाँ क्रीप का होना कोई अनहोनी या दुर्लभ घटना नहीं होगी।

यह देखा गया है कि लौकिंग अक्सर वहाँ होती है जहाँ फाल्ट में कोई ज्योमेट्किल मोड़ आ गया हो अथवा जहाँ मैटीरियल एसपिरिटी हो। अर्थात जहाँ किसी प्रकार की रुकावट हो। पर फिर वहाँ भूकम्पों का आना आपेक्षित होता है जोकि यहाँ नहीं हो रहे हैं। फाल्ट बेन्ड तो हैं जैसे की दून रीएनट्रैन्ट अथवा हिमाचल एनट्रैन्ट हैं जिन्हें दुबे ने अध्ययन किया है। अन्य संभावनाओं पर विचारा जा सकता है जिसमें यह प्रस्ताव है कि बेसमेन्ट में हाई एंगल फाल्ट समय समय पर बनते रहते हैं जोकि विशेष तौर पर एमसीटी के आस-पास होते हैं इस आशय को ठाकुर (2004) ने प्रस्तुत किया है जैसा कि चित्र 6 में देखा जा सकता है। इस प्रदेश में ऊपरी क्रस्ट में छोटे भूकम्प आते रहते हैं जिनके फाल्टप्लेन सोल्यूशन अक्सर हाई एंगल रिवर्स फाल्ट दर्शाते हैं (सरकार व चंदर) इन भूचालों को बेसमेंट फाल्टों से जोड़कर एक सिस्टम की तरह देखा व समझा जा सकता है। इसके अनुसार (सीबर व आर्मब्रुस्टर) के बीटीफ की जोन में दो प्रक्रियाएं हो रही हैं। एक निचले भाग में जहाँ लो एंगल थ्रस्ट बनते हैं तथा उसके ऊपरी क्षेत्र में जहाँ हाइ एंगल रिवर्स फाल्ट व छोटे भूकम्प आते रहते हैं।

यह क्षेत्र लगभग 20 से 40 किमी चौड़ा है। इस क्षेत्र को कुशन क्षेत्र माना जा सकता है जहाँ स्ट्रेन इकट्ठा होने का केन्द्र बिन्दु है व अनन्त: विराट भूकम्पों के माध्यम से विसर्जित होता है। ऐसी स्थिति में एमसीटी के दक्षिण के भाग वाले डिटैचमेंट में स्ट्रेन का संचय ही नहीं होगा अथवा कम होगा और क्रीप की संभावना नहीं रहेगी या कम हो जाएगी। पर लोअर व आउटर हिमालय में जो फोल्ड व फाल्ट हैं उनकी उत्पत्ति कैसे हुई? यह भूकम्प के आने के समय स्लिप से दक्षिणी ओर की चट्टानों पर जो दबाव बनेगा उससे निर्मित होते हैं। इसके अलावा भूकम्प के आने के बाद जो स्ट्रैस रिलैक्सेशन होगा उससे भी इस प्रक्रिया में योगदान होगा। अत: महाभूकम्पों के अर्न्त समय में यहाँ स्ट्रेन संचय की संभावना नहीं है और इसी कारण से यह क्षेत्र ताला बंद प्रतीत हो सकता है। इसके अलावा धीमे भूकम्पों के रोल पर विचार करना आवश्यक है क्योंकि वे बिना विनाशकारी प्रभाव के स्ट्रेन रिलीज करने में सक्षम हैं तथा अन्य जीओलॉजिकल डिफोरमेशन भी ला सकते हैं।

Fig-6यह एक संतोष का विषय है कि वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक इन गूढ़ समस्याओं के समाधान की ओर पर्याप्त ध्यान दे रहे हैं और आशा की जा सकती है कि शीघ्र ही हमें नई जानकारियाँ उपलब्ध होंगी जिनके आधार पर हिमालय भूगर्भीय तंत्र को बेहतर समझा जा सकेगा तथा हैजार्ड रिडक्शन जैसे जनहित कार्यक्रम बेहतर वैज्ञानिक जानकारी के कारण अधिक कारगर सिद्ध हो सकेंगे।

आभार


लेखक कई विशिष्ठ वैज्ञानिकों से समय-समय पर इस विषय पर वार्तालाप द्वारा लाभान्वित हुआ है, जिनमें विशेष कर डा. दिनेशकुमार, आइरिन सरकार, रा. पेरूमल, वी. श्रीराम, अ. दुबे, एन. एस. विर्दी, वि. सी. ठाकुर, बी. रा. अरोड़ा, कुलदीप चंद्र, एवं दे. ना. अवस्थी प्रमुख हैं। इन सभी महानुभावों के समुचित योगदान व सौहार्द का मैं सहर्ष आभारी हूँ।

सम्पर्क


कैलाश नाथ खत्री
100, राजेन्द्र नगर, देहरादून



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