खनिज सर्वेक्षण में सुदूर संवेदन की उपयोगिता

Submitted by Hindi on Tue, 10/04/2016 - 15:56
Source
अश्मिका, जून 2010

संपूर्ण विश्व में औद्योगीकरण, तकनीकी विकास एवं निरंतर बढ़ती आवश्यकताओं के कारण खनिजों की खपत बढ़ती जा रही है। उन्नत देशों में नई खनिज संपदा मिलने की संभावना क्षीण है और वर्तमान के भंडार तेजी से खत्म हो रहे हैं। इसलिये यह आवश्यक हो गया है कि वर्तमान की खनिज सर्वेक्षण की तकनीकों में सुधार हो तथा अपारंपरिक एवं नयी सस्ती तकनीकों को व्यवहारीकरण की कसौटी पर परखने के पश्चात तुरंत उपयोग में लाया जाये।

विज्ञान एवं तकनीक के इस निरंतर विकास के दौरान सुदूर संवेदन भू-मूल्यांकन द्वारा खनिज सर्वेक्षण के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण तकनीक साबित हुई है। अपने ‘‘आकाशीय नेत्र’’ द्वारा पृथ्वी के विशाल भूखंड को एक साथ देखने की क्षमता के कारण ऐसी बहुत सी भूवैज्ञानिक तथ्यों की जानकारियाँ प्राप्त हो जाती हैं जिनको भूवेत्ता ‘फील्ड वर्क’ के दौरान ‘संकुचित’ दृष्टि से नहीं देख पाते हैं।

सन 1972 से सैटेलाइट इमेजरी की आसान एवं निरंतर उपलब्धता ने प्राकृतिक संसाधनों के सर्वेक्षण में (जिसमें खनिज शामिल हैं) एक क्रांति सी ला दी। प्रारंभ में इमेजरी से खनिज सर्वेक्षण हेतु निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुर्इं-

क. स्थानीय एवं क्षेत्रीय फ्रैक्चर/फॉल्ट की मैपिंग
ख. खनिज संबंध ‘‘आल्ट्रेशन हैलो’’ की पहचान तथा
ग. भूविज्ञान संबंधी नई जानकारियाँ जिससे किसी स्थान की खनिज क्षमता का पुनर्मूल्यांकन किया जा सके।

सन अस्सी के दशक के उपरांत अमेरिका के अतिरिक्त फ्रांस, जापान, कनाडा एवं भारतवर्ष के विभिन्न सेटेलाइटों से बेहतर स्पैक्ट्रल एवं स्पैशियल रिजॉल्यूशन की इमेजरी की उपलब्धता ने खनिज सर्वेक्षण के कार्य को और भी गति प्रदान की है।

भूविज्ञान की अभी तक की उपलब्ध जानकारी के अनुसार खनिज सर्वेक्षण कार्य में निम्नलिखित मार्गदर्शकों (गाइड्स) की सहायता लेना आवश्यक है :

लिथोलॉजिकल गाइड : बहुत से खनिज ‘‘पेरेंट या होस्ट रॉक’’ में पाये जाते हैं। चूँकि प्रत्येक शिला/प्रस्तर और खनिज का स्पेक्ट्रल रिफ्लैक्टेन्स भिन्न संरचना के कारण अलग-अलग होता है, सुदूर संवेदन तकनीक द्वारा खनिज युक्त शिला/प्रस्तर का रिफ्लैक्टेन्स तय करने के पश्चात उस प्रकार की समस्त चट्टानों/प्रस्तरों का नक्शा कम्प्यूटर या हाथ द्वारा स्वयं बनाया जा सकता है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि पृथ्वी की सतह पर पायी जाने वाली चट्टानों के मुख्य अंशों (सिलिका, एल्युमिना तथा ऑक्सीजन) का रिफ्लैक्टेन्स विशेष पहचान वाला नहीं होता है, इसलिये मोटे तौर पर उन चट्टानों को पहचाना जा सकता है जिनमें खनिज भंडार होने की संभावना हो- उदाहरण के तौर पर यूरेनियम नहीं बल्कि उन सैंडस्टोन या कांग्लोमरेट को पहचाना और मैप किया जा सकता है जिनमें यूरेनियम खनिज होने की संभावना हो। इसी तरह किम्बरलाइट पाइप को मैप किया जा सकता है, हीरे को नहीं।

खनिज तथा उनके आल्टरेशन मिनरल गाइड के रूप में : रंगीन हवाई चित्र और सैटेलाइट इमेजरी के फाल्स कलर कम्पोजिट खनिजों और उनके आल्टरेशन को पास के क्षेत्रों से उनके रंग की तीव्रता एवं विभिन्नता के कारण आसानी से परिलक्षित करते हैं।

सर्व प्रथम लैंडसेट के थीमेटिक मैपर नामक सेंसर ने चट्टानों के मुख्य अंश-सिलीकेट्स को तो नहीं, अपितु आंशिक रूप से उपस्थित फेरस/फेरिक लोह, हाइड्रॉक्सिल तथा कार्बोनेट अवयवों को पहचानने की क्षमता दिखायी। थीमैटिक मैपर में तो केवल 7 बैंड 0.1 माइक्रॉन स्पेक्ट्रल चौड़ाई एवं 30 मीटर स्पेशियल रिजॉल्यूशन की इमेजरी उपलब्ध है, परंतु मोडिस सेंसर में 52 बैंड तथा हाइरिस सेंसर में 10 नैनोमीटर चौड़े 192 बैंड की इमेजरी उपलब्ध हो गई है। इसका सीधा मतलब है कि हाइरिस सेंसर में भूसतह पर उपस्थित सभी खनिजों को पहचानने व उनकी मैपिंग करने की क्षमता है जिससे खनिज सर्वेक्षण में भरपूर मदद मिलेगी। इसी तरह का सेंसर-एविरिस जिसमें 210 बैंड हैं और जिसे हवाई जहाज से इस्तेमाल किया गया है- खनिज सर्वेक्षण में बहुत सफल पाया गया है।

वनस्पति गाइड : वनस्पतियाँ इस धारणा के आधार पर गाइड का कार्य करती हैं कि यदि चट्टानों में खनिज है तो उससे बनने वाली मिट्टी और उस पर उगने वाली वनस्पतियों में भी उस खनिज की उपस्थिति अवश्य होगी। वनस्पतियाँ निम्नलिखित तरीकों से खनिज की उपस्थिति दर्शा सकती हैं-

(i) जब पत्तों का रंग खनिज की उपस्थिति से बदल जाये,
(ii) वनों की प्राकृतिक अनुपस्थिति या विरूपता,
(iii) वनस्पतियों का फैलाव जब लिथोलॉजिकल या स्ट्रक्चरल गाइड की तरफ इंगित करें।

पहली परिस्थिति (i) मिट्टी में तांबा, जस्ता, मैंग्नीज और क्लोरीन की उपस्थिति पत्तियों में पीलापन ला देती है जिसे सुदूर संवेदन द्वारा पहचाना जा सकता है (चित्र 1)। कुछ प्रयोगों में देखा गया है कि 0.5-0.6 माइक्रॉन रेंज (ग्रीन बैंड) में खनिज क्षेत्र पर पैदा होने वाली वनस्पतियों का रिफ्लैक्टेंस, साधारण मिट्टी पर उपस्थित उसी तरह की वनस्पति के रिफ्लैक्टेंस से अधिक होता है (चित्र 2)। कभी-कभी मिट्टी में तांबा, जस्ता आदि सम्मिश्रणों की बहुतायत से उसकी उपजाऊ शक्ति नष्ट हो जाती है। ऐसे में या तो वनस्पति वहाँ नहीं पनप पाती (ii) (चित्र 3), या उसमें विरूपता आ जाती है। सुदूर संवेदन से ऐसी परिस्थिति को आसानी से परखा जा सकता है। फॉल्ट, फ्रैक्चर और शियर जोन पर अधिक नमी की उपस्थिति से वृक्षों की लंबाई पास की अन्य वनस्पति से अधिक हो सकती है (चित्र 4) (iii), अथवा वनस्पति किसी विशेष खनिजयुक्त पत्थर (लिथोलॉजी) पर ज्यादा घनी हो सकती है (पोषक तत्वों की उपस्थिति से), जिसको सुदूर संवेदन तकनीक द्वारा सहजता से मापा जा सकता है।

विरूपण गाइड


सभी भूवैज्ञानिक जानते हैं कि दुनिया के अधिकतर खनिज फॉल्ट/ फ्रैक्चर और शियर जोन में पाये जाते हैं। चूँकि इनका स्वरूप (सीधी या लम्बी रेखायें) इमेजरी में दिखने वाले अन्य स्वरूपों (नदियाँ, खेती, सड़कों) से अलग होता है, इन लीनियामेंट्स को आसानी से मापा जा सकता है। जिन स्थानों पर वनस्पति या मिट्टी आदि के कारण खनिज युक्त स्ट्रक्चर का कुछ हिस्सा छुप जाता है, सुदूर संवेदनतकनीक के ‘‘आकाशीय नेत्र’’ सहजता से उसको भाँप लेते हैं।

भूआकृति गाइड


अनेक प्राइमरी खनिज गाइड अपनी विशेष भूआकृति (सीधी रिज या घाटी जोकि लिथोलॉजिकल या स्ट्रक्चरल कंट्रोल को इंगित करते हैं) के कारण आसानी से इमेजरी/ हवाई फोटो में देखे जा सकते हैं।

सेकेंड्री खनिज तीन तरह के होते हैं -
(i) प्लेसर खनिज भंडार



इस तरह के खनिज चूँकि वर्तमान या पूर्वकाल की नदियों, उनके और समुद्र तटों और मरूस्थलीय झीलों में पाये जाते हैं, सुदूर संवेदन तकनीक बहुत प्रभावशाली रूप में सहायक होती है। सुदूर संवेदन तकनीक बहुत प्रभावशाली रूप में सहायक होती है। सुदूर संवेदन तकनीक माइक्रोवेव (राडार) तरंगे शुष्क बालू के नीचे 5-6 मीटर तक प्रवेश कर ढकी हुई नदियों और इस तरह उनके प्लेसर भंडारों का पता लगा लेती हैं।

(ii) अवसादी खनिज भंडार


चूँकि बॉक्साइट एवं लेटराइट इत्यादि ट्रॉपिकल जलवायु क्षेत्र के पठारों पर पाये जाते हैं, इनको खोजने एवं मापने के लिये सुदूर संवेदन तकनीक बहुत उपयोगी है।

Fig-1Fig-2Fig-3Fig-4

(iii) सुपरजीन भंडार


भूजल सतह के नीचे तांबा, सीसा, जस्ता, चांदी, लोहा एवं पारा आदि खनिजों के सल्फाइड भंडार पाये जाते हैं जोकि सतह पर ऑक्सीजन के संपर्क में आने से गहरे लाल, पीले, हरे और नीले इत्यादि रंग प्रदर्शित करते हैं। इन ‘‘गोसान्स’’ को 1 मी. स्पैशियल रिजोल्यूशन की इमेजरी और रंगीन हवाई चित्रों में आसानी से देखा जा सकता है।

सुदूर संवेदन और अन्य तकनीकें


खनिज सर्वेक्षण में अनेक दशकों से एअरोमैग्नेटिक सर्वे, ग्रेविटी सर्वे, जिओकैमिकल सर्वे, सिस्मिक सर्वे तथा ड्रिलिंग आदि का प्रमुख रूप से उपयोग होता आया है। प्रत्येक सर्वे की लागत के विषय में यदि विचार किया जाये तो ज्ञात होगा कि सुदूर संवेदन ही सबसे सस्ती तकनीक है। साथ ही इसके उपयोग से खनिज भंडारों के सबसे अधिक संभावना वाले क्षेत्रों (टार्गेट एरियाज) का पता लग जाने से अन्य सर्वे के खर्च में समुचित कमी की जा सकती है।

इस तरह अंत में आसानी से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अन्य पूर्व निर्धारित (भू-सर्वे आधारित) सर्वेक्षणों की अपेक्षा सुदूर संवेदन तकनीक कम समय एवं खर्च में बेहतर परिणाम देती है। यह बात अवश्य ध्यान देने योग्य है कि यदि भौगोलिक सूचना प्रणाली का उपयोग करते हुए सुदूर संवेदन तकनीक के परिणामों को अन्य सर्वे से प्राप्त तथ्यों के साथ एकीकृत किया जाये तो नये खनिज भंडारों का सफलतापूर्वक पता लगाना अवश्यम्भावी है।

सम्पर्क


वसंत कुमार झा
76/92 राजपुर मार्ग, साकेत कालोनी, देहरादून


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