सागर की खनिज सम्पदा

Submitted by Hindi on Thu, 10/13/2016 - 14:29
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अश्मिका, जून 2012

पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत भाग समुद्र से ढका हुआ है, जिसकी औसतन गहराई 3,630 मी. है। प्रशांत महासागर की मेरियाना खाई सबसे गहरी है, इस खाई की गहराई 11,516 मी. है। इन आँकड़ों से आप सागर की गहराई तथा विशालता का अनुमान लगा सकते हैं।

हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी की संरचना कई प्रकार के तत्वों से हुई है। ये सभी तत्व पृथ्वी के बाहरी सतह पर ठोस अवस्था तथा अंदरूनी भाग में गर्म पिघले हुए द्रव्य के रूप में पाये जाते हैं। पृथ्वी की बाहरी परत का करीब 98 प्रतिशत भाग आठ प्रकार के तत्वों से बना हुआ है। जैसे ऑक्सीजन, सिलीकॉन, अल्यूमिनियम, लोहा, कैलशियम, सोडियम, पोटेशियम तथा मैगनीशियम। परन्तु यह सभी तत्व ज्यादातर रासायनिक संघटन के रूप में पृथ्वी पर पाये जाते हैं, जिनको हम ‘खनिज’ कहते हैं। परिभाषानुसार, खनिज प्राकृतिक रूप में उपलब्ध अकार्बनिक तत्व हैं जिनकी निश्चित आणविक संरचना, रासायनिक संघटन तथा भौतिक गुण होते हैं। हाँलाकि प्राकृतिक गैस तथा पेट्रोलियम को भी हम खनिज पदार्थ मानते हैं। हमारी पृथ्वी पर करीब 2000 प्रकार के खनिज उपलब्ध हैं। जो भूगर्भ शास्त्री खनिज पदार्थों के विषय में शोध तथा अनुसंधान करने मे संलग्न हैं उन्हें “मिनरलॉजिस्‍ट” कहते हैं। क्या आप जानते हैं कि 16वीं शताब्दी में जियोरजियस एग्रीकोला, जिनको “फादर ऑफ मिनरलॉजी” कहा जाता है, पेशे से डॉक्‍टर थे। एग्रीकोला ने वैज्ञानिक तरीके से पृथ्‍वी की संरचना को समझा तथा भूविज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया। इसलिए उन्‍हें “फोर फादर ऑफ जियोलॉजी” भी कहते हैं।

इस लेख का उद्देश्य आपका ध्यान सागर में पाई जाने वाली खनिज संपदा की ओर आकृष्ट कराना है। बचपन में हम दादी और नानी से समुद्र मंथन की कहानी सुना करते थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार सुरों और असुरों को समुद्र मंथन करने पर बहुत सारे मोती, जवाहरात और अमृत प्राप्त हुआ था। इस कथा से हमें यह ज्ञात होता है कि आदिकाल से ही मानव जाति सागर के संसाधनों का उपयोग भिन्न-भिन्न प्रकार से किया करती थी।

पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत भाग समुद्र से ढका हुआ है, जिसकी औसतन गहराई 3,630 मी. है। प्रशांत महासागर की मेरियाना खाई सबसे गहरी है, इस खाई की गहराई 11,516 मी. है। इन आँकड़ों से आप सागर की गहराई तथा विशालता का अनुमान लगा सकते हैं।

सागर में पाई जाने वाली खनिज सम्पदा की सूची बहुत लम्बी है। सागर बहुत प्रकार के प्राकृतिक संसाधनों का भंडार घर है जैसे खनिजों में तेल, प्राकृतिक गैस, धातु तथा रसायन इत्यादि भोजन में मछली, केकड़ा, झींगा इत्यादि तथा ऊर्जा में समुर्द्री लहरें, तरंगें, ज्वारभाटा इत्यादि। इसके अलावा सागर हमारे पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन तथा मौसम को भी नियंत्रित करते हैं। सागर का उपयोग यातायात यानि माल वाहक जहाज और यात्रियों को यथास्थान पहुँचाने के लिये होता है तथा सागर के तटीय क्षेत्र पर्यटन तथा मनोरंजन के लिये विकसित किये जाते हैं।

वैज्ञानिक सागर से संबंधित शोध तथा सूचना प्राप्त करने के लिये अनुसंधान जहाज का उपयोग करते हैं, जोकि नवीन उपकरणों से सुसज्जित होते हैं। वैज्ञानिक इन्हीं विशेष प्रकार के जहाजों के माध्यम से समुद्र के तल से एकत्रित शैल तथा तलछट के नमूनों का विश्लेषण प्रयोगशाला में करते हैं। जैसा कि हम जानते हैं सागर अपने गर्भ में अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ तथा अन्य संसाधन समेटे हुए हैं। हाँलाकि यह सभी संसाधन भूमि पर भी पाये जाते हैं, परन्तु तेजी से बढती हुई विश्व की आबादी और हमारे सुख सुविधाओं की ओर बढ़ते आकर्षण ने हमें सागर मंथन के लिये प्रेरित किया है। खनिज संसाधनों की पुनः भरपाई होने में करोड़ों वर्ष लग जाते हैं। इसलिये उनको गैर अक्षय संसाधन कहा जाता है। सागर/महासागर ढेर सारी अमूल्य निधि तथा सम्पत्ति अपने गर्भ में समेटे हुए हैं। परन्तु हमारे मस्तिष्क में यह प्रश्न उभरता है कि आखिर इस सागरीय सम्पदा पर किस राष्ट्र का खनन करने का अधिकार है।

इस गुत्थी को सुलझाने के लिये संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1967-1982 के बीच तीन संगोष्ठियाँ आयोजित की। आखिरकार इस संदर्भ में ‘‘समुद्र के संयुक्त कानून के देशों के सम्मेलन’’ पर 1982 में हस्ताक्षर हुए। इस सभा में सागरीय सम्पदा को भली-भाँति संरक्षण करने के लिये नियम और कानून की चर्चाएं हुईं। इन्हीं नियमों के तहत सागर को कई भागों में बाँटा गया। जिन राष्ट्रों की सीमाएँ समुद्र से घिरी हुई हैं, उनको 200 नॉटिकल माइल (1 नॉटिकल माइल = 1.852 कि. मी.) तक सागर की सम्पदा को ढूंढने तथा उनके दोहन करने की अनुमति प्रदान की गई है। इस क्षेत्र को अनन्य आर्थिक क्षेत्र कहते हैं।

हम अब विस्तार से सागर से प्राप्त होने वाले खनिज पदार्थों के विषय में चर्चा करेंगे। मैग्नीज़ पिंड अथवा नाड्यूल्स समुद्री तल के काफी बड़े हिस्से में काले रंग के आलू जैसी वस्तुओं से ढके हुए हैं। इनके विकास की दर बहुत धीमी है। ये औसतन एक लाख वर्ष में कुछ ही मिलीमीटर बढते हैं। ये पिंड कुछ धातुओं के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं जैसे कि मैग्नीज, ताँबा, निकिल, जस्ता इत्यादि। तेल तथा प्राकृतिक गैस सागर के तलछट में इकट्ठा रहते हैं। यह वहीं बनते हैं जहाँ मरे हुए सूक्ष्म जीवाश्मों का जैव पदार्थ, मिट्टी के साथ समुद्री तल पर अधिक दबाव तथा तापमान के कारण, तेल तथा प्राकृतिक गैस में परिवर्तित हो जाता है। वर्तमान जीवन में हम इसके बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। भारत मे बहुत सारे तेल एवं प्राकृतिक गैस के अपतटीय क्षेत्र हैं जैसे कि बाम्बे हाई, गल्फ ऑफ कैम्बे, कावेरी, कृष्णा गोदावरी तथा महानदी।

बहुत कम तापमान तथा उच्च दबाव पर प्राकृतिक गैस जल के अणुओं से संधि करके गैस हाइड्रेट बनाते हैं। यह सागरीय खनिज सम्पदा से जुड़ा हुआ नवीन नाम है। संभवत: आने वाली पीढ़ियाँ इसका उपयोग प्राकृतिक गैस के उत्पादन में करेंगी।

प्लेसर डिपोजिट के अंतर्गत वे खनिज पदार्थ आते हैं। जिनका घनत्व ज्यादा होता है। इनको भारी खनिज भी कहते हैं। यह भारी खनिज नदियों द्वारा समुद्र में आते हैं। समुद्री तटों पर इन भारी खनिजों का जमावड़ा होता रहता है। कालांतर में यह ‘प्लेसर डिपोजिट’ सोना, हीरा, जस्ता, लोहा और रेडियोधर्मी खनिज जैसे थोरियम, यूरेनियम आदि के प्रमुख स्रोत माने जाते हैं। भारत के तटीय क्षेत्रों पर ‘प्लेसर डिपोजिट’ बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं। फास्फोराइट खनिज 1000 मी. की गहराई पर सागर में पाया जाता है। फास्फोराइट समुद्री तल पर फास्फोरस के अकार्बनिक अवक्षेपण से बनता है। इसका उपयोग उर्वरक तथा फास्फोरस यौगिक बनाने में होता है।

साधारण नमक, जिसका उपयोग पूरी मानवजाति आदिकाल से करती रही है, सागर की देन है। अधिकांश नमक हमें सागर से ही प्राप्त होता है। और भी बहुत से खनिज पदार्थ हैं जो सागर की देन हैं। अक्सर आपने लोगों को अँगूठी में लाल मणि पहने देखा होगा, जिसे ‘मूँगा’ कहते हैं। इसका उपयोग ज्योतिष गृह शान्ति के लिये बताते हैं। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि मूंगा मणि हम ‘कोरल’ नामक समुद्री जीव से निकालते हैं। अतः सागर में पाये जाने वाले खनिज पदार्थ अनगिनत हैं। अभी वैज्ञानिक सागर से संबंधित संसाधनों को और अधिक जानने तथा पता लगाने के लिये अनुसंधान कार्यों में संलग्न हैं। संभवतः भविष्य में खनिज संसाधनों की पूर्ति के लिये हमारी निभर्रता सागर पर और बढ़ जायेगी।

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मीनल मिश्रा
इग्नू, नई दिल्ली


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