सिंधु जल संधि - भारत का सबसे मजबूत हथियार

Submitted by Hindi on Thu, 10/13/2016 - 15:36
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लाइव मिंट डॉट कॉम से साभार, अनुवाद प्रभात खबर

.उड़ी के सैन्य ठिकाने पर हुए सीमा पार के खूनी आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिये पहले जैसा रुख अपनाये रखना मुश्किल होगा। मोदी के सत्ता संभालने के बाद से पाकिस्तान की शह पर उड़ी जैसे अनेक हमले हो चुके हैं। अन्य हमले अफगानिस्तान के हेरात, मजार-ए-शरीफ और जलालाबाद में तथा भारत में गुरदासपुर, ऊधमपुर, पठानकोट और पंपोर में हुए हैं।

इन सभी हमलों पर भारत की प्रतिक्रिया में एक बात जरूर थी- केवल बात और कोई कार्रवाई नहीं। यह रुख मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों के रवैये से कतई अलग नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय नेतृत्व बाइबिल की इस उक्ति का पालन करता रहा है- ‘सभी मनुष्यों को तुरंत सुनना चाहिए, पर उन्हें धीरे-धीरे बोलना और क्रोधित होना चाहिए।’

आतंक के जरिये पाकिस्तान के छद्म युद्ध के खिलाफ विभिन्न सरकारों के ठोस और कठोर रणनीति के नहीं अपनाने के कारण भारत अपने से छोटे पड़ोसी द्वारा आतंकित और चोटिल होता रहा है। आदत से लाचार पाकिस्तान को लगता है कि भारत की ओर से ठोस बदले की कार्रवाई की जगह निपट लेने लायक प्रतिक्रिया का सामना कर उसे नुकसान पहुँचाया जा सकता है। अब भारतीय जनता का धैर्य जवाब दे रहा है और सरकार पर यह दबाव बढ़ रहा है कि वह पाकिस्तान पर लगाम लगाने के लिये कुछ ठोस पहल करे। भारत के पास कई सैनिक, आर्थिक और कूटनीतिक रास्ते हैं, जिनके इस्तेमाल से वह पाकिस्तान को उसकी हरकतों की भरपाई के लिये धीरे-धीरे मजबूर कर सकता है। रणनीतिक रूप से एक परमाणु शक्ति संपन्न देश के अपारंपरिक युद्ध का मुकाबला प्रभावी रूप से अपारंपरिक युद्ध से ही किया जा सकता है। यह बिल्कुल साफ होना चाहिए कि पाकिस्तान भारत के विरुद्ध युद्ध में अधिक खतरे में है और भारत के पास उस देश को दबाने के लिये कहीं अधिक मजबूत आर्थिक और कूटनीतिक संसाधन हैं।

भारत के लिये पानी सबसे मजबूत हथियार


यदि भारत 1960 के सिंधु जल समझौता को रोक दे, तो वह पाकिस्तान के रवैये में सुधार के लिये पानी को सबसे मजबूत हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। भारत के साथ किये गये हर द्विपक्षीय समझौते के वादों से पाकिस्तान मुकरा है, चाहे वह शिमला समझौता हो या फिर अपनी जमीन का इस्तेमाल सीमा पार आतंक के लिये नहीं होने देने का करार हो। ऐसे में भारत को जल समझौते का सम्मान क्यों करना चाहिए? जब पाकिस्तान शिमला समझौते से मुकरता है, तो वह जल संधि को भी कमजोर करता है। वह भारत से किसी एक संधि के पालन की मांग नहीं कर सकता है, जबकि वह उस शांति समझौते का उल्लंघन कर रहा हो जो नदी जल में साझेदारी के साथ सभी शांतिपूर्ण सहयोगों का आवश्यक आधार है।

दुनिया की सबसे एकतरफा जल संधि


सिंधु जल संधि दुनिया का सबसे अधिक एकतरफा और असमान पानी समझौता है, जो नदियों के पानी को भारत द्वारा अपने ही राज्य जम्मू-कश्मीर के औद्योगिक और कृषि उत्पादन के लिये उपयोग करने से मना करता है। जम्मू-कश्मीर की मुख्य नदियों- चेनाब, झेलम और सिंधु- और उनकी सहायक नदियों के जल को पाकिस्तानी उपयोग के लिये आरक्षित कर दिया गया है, जबकि भारत की संप्रभुता राज्य के दक्षिण में बहती सिंधु बेसिन की तीन नदियों- ब्यास, रावी और सतलुज- तक सीमित कर दी गई है। प्रभावी तौर पर इस समझौते में सिंधु तंत्र की छह नदियों के कुल पानी का महज 19।48 फीसदी ही भारत के लिये रखा गया है।

सिंधु नदी जल विवादविवाद निपटारे के लिये बने इस संधि के प्रस्तावों को लगातार उल्लिखित कर भारत पर दबाव बनानेवाला पाकिस्तान इस समझौते की पहले से ही अवहेलना करता आ रहा है। ऐसे तरीकों से जल युद्ध छेड़ने का यह खतरा है कि वह पलट कर ऐसा करनेवाले को ही नुकसान पहुँचा सकता है।

अधिकार और उत्तरदायित्व में संतुलन ही दो देशों के बीच सद्भावनापूर्ण और कानून-आधारित सहयोग का मुख्य तत्व होता है। लेकिन, सिंधु बेसिन में पाकिस्तान बिना किसी उत्तरदायित्व के अधिकार चाहता है। वह उम्मीद करता है कि उसे भारतीय पानी इसी तरह से निर्बाध मिलता रहे, भले ही वह उसके सैन्य अधिकारी भारत को आतंकवादी निर्यात करते रहें, और उसकी सरकार भारत के पानी ‘वर्चस्व’ के विरुद्ध दुष्प्रचार करती रहे तथा हर विवाद के अन्तरराष्ट्रीयकरण की कोशिश करती रहे।

सिंधु जल संधि भारत के गले की हड्डी बन गई है। यदि पाकिस्तान को उसके छद्म युद्ध को जारी रखने से रोकने की इच्छा भारत रखता है, तो उसे जल संधि के भविष्य को पाकिस्तान के आतंक-विरोधी प्रतिबद्धता से जोड़ना होगा, और पाकिस्तान इसमें असफल होता है, तो यह संधि टूट जानी चाहिए। इस साल के शुरू में पाकिस्तानी सीनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर सिंधु जल संधि की समीक्षा की बात कही है। यह प्रस्ताव भारत के लिये एक मौका है जब वह अधिक संतुलित और ईमानदार संधि के लिये फिर से बातचीत की शुरुआत कर सकता है, और यदि पाकिस्तान इसके लिये मना करता है, तो भारत मौजूदा संधि के प्रस्तावों का पालन करना रोक सकता है। अन्तरराष्ट्रीय कानून में किसी तरह के सक्षम व्यवस्था की अनुपस्थिति में भारत को कोई भी पाकिस्तान के उस रवैये पर चलने से नहीं रोक सकता है जिसमें वह द्विपक्षीय समझौतों की अवहेलना करता रहता है।

अन्तरराष्ट्रीय संबंधों में छल-कपट, चतुराई और तत्परता से अक्सर उन लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सकती है, जोकि सीधे बल प्रयोग से संभव नहीं है। भारत बिना सीधे बल प्रयोग के पाकिस्तान को घुटनों पर ला सकता है। पाकिस्तान को दबाने के लिये सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक तौर-तरीकों के मिले-जुले इस्तेमाल से भारत को एक शांत युद्ध छेड़ना चाहिए, ताकि इस अर्द्ध-असफल देश से मौजूद खतरे को खत्म किया जा सके, जिसने हमारे धैर्य को कायरता कह कर उसका मखौल उड़ाया है।

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ब्रह्मा चेलानी
प्रोफेसर, सेंटर फॉर, पॉलिसी रिसर्च


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