ओडिशा का भूविज्ञान

Submitted by Hindi on Thu, 10/20/2016 - 12:55
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Source
अश्मिका, जून 2015

भारतीय प्रायद्वीप से दक्षिण पूर्वी छोर पर स्थित समुद्र तट पर बसा ओडिशा यूँ तो कालाहांडी की अति गर्मी के कारण जाना जाता है, पर यहाँ विकास की असीम संभावनाएं हैं। इस राज्य में अर्थव्यवस्था सुधारने हेतु प्राकृतिक संसाधन एवं खनिज हैं, उद्योगों के लिये ईंधन है, कृषि के लिये मृदा है तथा सिंचाई एवं ऊर्जा उत्पादन हेतु जल है। नदियों में नदी महानदी, ब्राह्मणी एवं वैतरणी के साथ इस राज्य से होकर बहती है। छोटे बड़े नदी नालों को समुद्र में मिलने से पहले रोककर, बाँध बनाये जा रहे हैं अतः भविष्य में जल संसाधन प्रचुरता में पीने एवं पौधों के लिए उपलब्ध रहेगा तथा हरित आवरण क्षेत्र का तापमान कम करने में मदद देगा।

Fig-1यदि महानदी तथा उसके उत्तर में बहने वाली ब्राह्मणी नदी को ध्यान से मानचित्र पर देखा जाए तो ये नदियाँ समुद्र में मिलने से पहले उत्तर की ओर बहना शुरू करती हैं, तत्पश्चात पूर्व की ओर जाकर डेल्टा बनाती हैं। वास्तव में यह स्थिति उस क्षेत्र की शैल श्रृंखलाओं की उत्तरोन्मुख गति की सूचक है (चित्र-1)। यह गति एक भ्रंश की उपस्थिति के कारण है (चित्र-2)। इंडियन प्लेट की यूरेशियन प्लेट की ओर गति के बारे में हम सब जानते हैं। पूर्व काल में जब कान्टिनेन्टल ड्रिफ्टिंग हो रही थी तब गोन्डवाना लैण्ड से टूटकर लंका सहित भारतीय उपमहाद्वीप दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़कर यूरेशियन प्लेट से जा टकराया (चित्र-3) ग्लोब मानचित्रण द्वारा इस परिस्थिति को बेहतर समझा जा सकता है (चित्र-4)। भारत एवं इन्डोनेशिया को अलग करने वाली प्लेट सुमात्रा फाल्ट लाइन (चित्र-5) के कारण एक दूसरे से अलग होती मानी जाती है पर इस फाल्ट लाइन के गंगा यमुना के बाढ़ जनित मैदान में सिद्ध करना एक जोखिम भरा कार्य है (चित्र-6)। भारत को उत्तरी व दक्षिणी भागों में विभक्त करने वाले संरेखण का आधार सोन नर्मदा लीनियामेन्ट अथवा तापी नर्मदा रिफ्ट सिस्टम या सी आई एस सेन्ट्रल इंडियन सूचर है। यह माना जाता है कि यह लीनियामेन्ट आज भी सूक्ष्म रूप से गतिमान हो सकता है तथा महानदी एवं ब्राहमणी की उत्तर की ओर गति इस लीनियामेन्ट के कारण ही प्रभावी हो रही है।

Fig-2भारतीय महाद्वीप का अवलोकन करने पर इसमें विभिन्न चलित पट्टियाँ दिखाई देती हैं जैसे सुदूर दक्षिण में धारवाड़ चलित पट्टी (धारवाड़ मोबाइल बेल्ट), ईस्टर्न घाट चलित पट्टी तथा अरावली दिल्ली चलित पट्टी। इस चलित पट्यिों के कारण ही ये क्षेत्र भूकम्प से प्रभावित होने पर खतरनाक भी हो सकते हैं। जबकि इन्हीं पट्टियों के बीच का भाग जैसे धारवाड़, क्रेटॉन, बस्तर क्रेटॉन, सिंहभूमि क्रेटॉन तथा अरावली-दिल्ली-बुन्देलखण्ड क्रेटॉन भूकम्पीय दृष्टि से सुरक्षित माने जाते हैं। इन क्रेटान्स के ऊपर विन्ध्यन, छत्तीसगढ़, खेरियार, इन्द्रावती व कड़प्पा प्रोटीरोजोइक प्लेटफार्म के अवसादी शैल हैं। जिनके ऊपर गोन्डवाना तथा डैक्कन वोल्केनिक अवस्थित हैं।

Fig-3Fig-4Fig-5Fig-6ओडिशा की मुख्‍य शैलें पूर्वी घाट चलित पट्टी व उसके आस-पास की शैल हैं जो समुद्र के नजदीक उच्च ताप व आद्रता के कारण अधिकांशतः अवक्षेपित हैं। उत्तर में सिंहभूमि क्रेटान एवं ईस्टर्न घाट मोबाइल बेल्ट की संधि सीमा महानदी ग्राबन के रूप में दृष्टिगत है। दक्षिण मध्य भाग में गोदावरी ग्रेबन है तथा सेन्ट्रल इंडियन सूचर के दक्षिण में स्थित महानदी व गोदावरी ग्राबन के बीच नागवल्ली वंशधारा शियर जोन ओडिशा का एक मुख्य कमजोर संरेखण हैं। (चित्र-2)। पूर्वी घाट चलित पट्टी मुख्यतः तीन प्रकार के शैलों से बनी है जैसे चारनोकाइट, खोन्डालाइट एवं ग्रेनाइट नाइस एवं मिग्मेटाइट। ओडिशा के पश्चिमी छोर पर स्थित बस्तर क्रेटान है जो जगह-जगह पर किम्बरलाइट एवं लेम्प्रोइट से बिद्व होकर हीरे की प्राप्ति का एक सुलभ स्थान हो सकता है। (चित्र-8)। इस बस्तर क्रेटान एवं पूर्वी घाट चलित पट्टी के बीच का लम्बा पतला क्षेत्र ट्रान्जिशन जोन कहलाता है जिनमें उभय पक्ष के गुण पाये जाते हैं। पश्चिम से पूर्व की ओर चलें तो क्रेटान मैदान बनाता है। जबकि ट्रान्जिशन जोन के शैल पूर्वी घाट पर्वत माला बनाते हैं। जिनके साथ पूर्वी तथा पश्चिमी चार्नोकाइट, खोन्डालाइट एवं ग्रेनाइट नाइस व मिग्मेटाइट की उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम को संरेखित पट्टियां हैं (चित्र-2)।

Fig-7ओडिशा लौह संसाधनों के बड़े भंडार, बाक्साइट व क्रोमाइट के क्षेत्र में धनी है। राज्य में निकिल, मैग्नीज, कैसिटेराइट एवं लौह युक्त मैग्नेटाइट की प्रचुरता है। पूर्वी घाट चलित पट्टी पर साधारणतया ग्रेविटी हाई परिस्थितियां हैं। क्रेटानों के साथ इनका ग्रेविटी ग्रेडियन्ट काफी ढलाव लिये है अर्थात पूर्वी घाट मोबाइल बेल्ट के नीचे ज्यादा गुरुत्वाकर्षण वाला पदार्थ है। वैज्ञानिकों के अनुसार कई बार डक्टाइल डिफार्मेशन एवं टेक्टानिक चालन गुरुत्व सघनता का कारण बनता है। कैल्क सिलिकेट ग्रेन्यूलाइट तथा मैग्नीशियम एल्यूमिनियम युक्त ग्रेन्यूलाइट अत्यधिक तापमान में होने वाले कायान्तरण का द्योतक है। सम्भवतः इन्हीं गुणों के कारण पूर्व से हीराकुण्ड में हीरे पाये जाने के कारण बाँध का यह नाम प्रचलन में आया।

ओडिशा राज्य में लगभग 73% प्रीकैम्ब्रियन शैलें हैं। गोन्डवाना सुपर ग्रुप की 8% एवं 19% चतुर्थ कल्पीय शैल व रेत भंडार हैं। राज्य की कुछ भूवैज्ञानिक उपलब्धियाँ निम्नानुसार हैं।

1. तालचीर बोल्डर बेड तथा पूर्व गोन्डवाना हिमयुग की पहचान एवं तालचीर व ईब नदी घाटी के कोयले के भंडारों की खोज।
2. एल्यूमिनियम युक्त लैटेराइट व बाक्साइट की खोज।
3. उच्च स्तरीय कायान्तरित अवसादी शैलों का नामांकरण कालाहांडी की खोण्ड जनजाति के नामानुसार खोण्डालाइट करना।
4. मयूरभंज के गुरूमहिसिनी एवं बादाम पहाड़ क्षेत्र में मुख्य लौह अयस्क की खोज।
5. बरीपदा के समीप टर्शियरी शैलों की पहचान।
6. मैग्नीज अयस्क का वर्गीकरण।
7. चार्नोकाइट शैल का अध्ययन।
8. बोगाई के उन्झर के लौह अयस्कों का मानचित्रण।
9. गंगपुर ग्रुप के मेटा सेडिमेन्ट्स का अध्ययन।
10. पश्च चतुर्थ कल्पीय ज्वालामुखीय राख का ओडिशा का नदी घाटियों में पाया जाना।

सम्पर्क


कौमुदी जोशी
भा. भू. सं., भुवनेश्वर


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