क्या होता है क्यू कार्बन

Submitted by Hindi on Wed, 10/26/2016 - 14:48
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विज्ञान आपके लिये, जनवरी-मार्च, 2016

क्यू-कार्बन को कमरे के ताप और दाब पर हीरक कणों में बदला जा सकता है जो न केवल ज्यादा सस्ते और टिकाऊ होंगे बल्कि ज्यादा चमकदार भी होंगे। हालाँकि इस विधि से बड़े आकार के हीरों का निर्माण नहीं किया जा सकेगा, परंतु छोटे आकार की नैनो सुइयों, माइक्रो सुइयों, नैनोडॉट्स एवं बड़े आकार की हीरक फिल्मों का सृजन किया जा सकेगा, जिनके औषधि प्रदायन विविध औद्योगिक प्रक्रमों, उच्च ताप स्विचों के निर्माण, उच्च वोल्टता इलेक्ट्रॉनिकी आदि में व्यापक अनुप्रयोग हैं। इनके विशेष गुणों के कारण इनका उपयोग अत्यंत सुग्राही प्रदर्श प्रौद्योगिकियों में किया जा सकेगा।

क्यू-कार्बन अभी हाल ही में खोजा गया कार्बन का अति-सघन अभिनव अपररूप यानि एलोट्रोप है, जिसके अत्यंत विशिष्ट अनन्य गुणधर्म हैं। आमतौर पर लोग कार्बन के दो क्रिस्टली अपररूपों अर्थात अलग-अलग भौतिक रूपों से परिचित हैं: पहला है ग्रेफाइट, जिसका उपयोग आप पेंसिल के सिक्के के रूप में करते हैं - यह हलका, चिकना, कोमल, भंगुर, गहन सलेटी रंग का और विद्युत का चालक होता है तथा दूसरा अपररूप है हीरा, जो अपेक्षाकृत भारी, कठोर (वास्तव में अभी तक सर्वाधिक कठोर माना जाने वाला) व अचालक अपररूप है। इनके अतिरिक्त भी कार्बन के कई अन्य अपररूप पाए जाते हैं। जैसे बक-मिंस्अर फुलेरिन जो 60 कार्बन परमाणुओं की फुटबॉल जैसी संरचना है, ग्रेफीन जो कार्बन परमाणुओं की एकल-परत समतल रचना है और अक्रिस्टली कार्बन आदि। हाल ही में नाॅर्थ केरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका के वैज्ञानिकों जोहन सी. फैन डिस्टिंगुइथ्स, प्रोफेसर जगदीश नारायण और उनके अन्य सहकर्मी द्वारा एक संयुक्त शोध पत्र ‘‘कार्बन की नवीन प्रावस्था, लौह चुंबकत्व एवं हीरे में रूपांतरण’’ में कार्बन के एक नए अपररूप की खोज की घोषणा की गई है, जिसको उन्होंने क्यू-कार्बन नाम दिया है।

क्यू-कार्बन प्रकृति में नहीं पाया जाता है। जगदीश नारायण का मानना है कि नेप्चून और यूरेनस जैसे कुछ ग्रहों के क्रोड में यह विद्यमान हो सकता है। उनके इस अनुमान का आधार वे दशाएं हैं, जिनके अंतर्गत उन्होंने इसे निर्मित किया है। क्यू-कार्बन निर्माण प्रक्रम में शोधकर्ताओं ने अक्रिस्टली कार्बन की 50-500 नैनोमीटर मोटाई की एक पतली परत नीलम, कांच अथवा विशिष्ट बहुलक उच्च घनत्व पोली इथाइलीन अधः स्तरों पर चढ़ाई। फिर इसे ArF एक्साइमर लेजर स्पंदों से विकिरित किया, जैसा कि लेजर नेत्र शल्य चिकित्सा में उपयोग में लाया जाता है। अक्रिस्टली कार्बन के नैनोसेकेंड स्पंद लेजर ऊर्जा को शोषित कर पिघलने और क्वेचिंग नामक तकनीक से तुरंत अत्यंत ठंडा होने से कार्बन की यह नई अति सघन अवस्था निर्मित होती है, जिसे क्यू-कार्बन नाम दिया गया है। दरअसल, क्वेचिंग के उपयोग से निर्मित होने के कारण ही इसे क्यू-कार्बन नाम मिला।

क्यू-कार्बन के अत्यंत विशिष्ट गुण हैं, जो इसके किसी भी अन्य बिरादर में नहीं पाए जाते जैसे कि यह हीरे से भी लगभग 60 प्रतिशत अधिक कठोर है। सामान्य ताप पर भी लौह-चुंबकत्व प्रदर्शित करता है अर्थात चुंबकीय क्षेत्र लगाने पर यह चुम्बक बन जाता है और क्षेत्र हटा लेने पर भी चुंबक बना रहता है। इसके लिये क्यूरी ताप 500 डिग्री सेल्सियस है। थोड़ी ऊर्जा से ही इसके अति लघु आबंध टूट जाते हैं अतः यह विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्रा लगाने पर ऊष्मा और विद्युत का चालक बन जाता है।

थोड़े से प्रकाश में ही यह हीरे से भी अधिक तेज चमक प्रदर्शित करता है। इसके इन विशेष गुणों का आधार इसकी विशिष्ट क्रिस्टल-अक्रिस्टली मिश्रित संरचना है, जिसका लगभग 80 प्रतिशत भाग हीरेवत किंतु अपेक्षाकृत छोटी बंध लंबाई के क्रिस्टल हैं और शेष 20 प्रतिशत ग्रेफाइटवत रचना है। किन्तु न यह हीरा है, न ही ग्रेफाइट यह बिल्कुल अलग गुण सम्पन्न कार्बन का नया अपररूप है।

इसके अनन्य गुणधर्मों के कारण वैज्ञानिकों का मानना है कि इस नए पदार्थ के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक अनुप्रयोगों की संभावनाएं हैं। यद्यपि अभी तो यह विकास के शैशव काल में ही है, फिर भी इसके अनेक अनुप्रयोगों की चर्चा है और उन पर कार्य चल रहा है। क्यू-कार्बन को कमरे के ताप और दाब पर हीरक कणों में बदला जा सकता है जो न केवल ज्यादा सस्ते और टिकाऊ होंगे बल्कि ज्यादा चमकदार भी होंगे। हालाँकि इस विधि से बड़े आकार के हीरों का निर्माण नहीं किया जा सकेगा, परंतु छोटे आकार की नैनो सुइयों, माइक्रो सुइयों, नैनोडॉट्स एवं बड़े आकार की हीरक फिल्मों का सृजन किया जा सकेगा, जिनके औषधि प्रदायन विविध औद्योगिक प्रक्रमों, उच्च ताप स्विचों के निर्माण, उच्च वोल्टता इलेक्ट्रॉनिकी आदि में व्यापक अनुप्रयोग हैं। इनके विशेष गुणों के कारण इनका उपयोग अत्यंत सुग्राही प्रदर्श प्रौद्योगिकियों में किया जा सकेगा।

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राम शरण दास

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