दुर्लभ जल पक्षियों और जैव विविधताओं के संरक्षक हैं नम भूमि

Submitted by Hindi on Sat, 10/29/2016 - 10:36
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विज्ञान गंगा, जुलाई-अगस्त, 2015

भारत अपनी असाधारण जैव विविधताओं के लिये सारी दुनिया में एक विशेष स्थान रखता है। जैव विविधताओं के क्षेत्र में यह एशिया का दूसरा और विश्व का सातवें क्रम का देश है। यहाँ जलीय प्राकृतिक आवासों के संसाधन अत्यन्त समृद्ध और विस्तृत हैं। आज के तमाम विकसित संचार साधनों के बावजूद इसके बारे में देश के बहुत थोड़े लोगों को ही जानकारी है।

.भारत में इस प्रकार की भूमि राष्ट्र की सकल भूमि के 3.4 प्रतिशत भू-भाग पर फैली हुई है। यद्यपि वैश्विक स्तर पर ये नम भूमि पृथ्वी की सतह के 6.4 प्रतिशत हिस्से पर काबिज हैं। भारत में प्राकृतिक नम भूमि हिमालय की ऊँचाइयों पर स्थित झीलों, मुख्य नदी प्रणालियों के बाढ़ वाले मैदानी क्षेत्रों, शुष्क एवं अर्द्धशुष्क इलाकों के दलदली क्षेत्रों लैगून, बैक वाटर श्रेणी तथा नदी मुखों पर स्थित सदाबहार दलदली क्षेत्रों, प्रवाल शैलमालाओं और समुद्री नम भूमि के रूप में पाई जाती हैं।

नम भूमि अनेक विशेषताओं से समृद्ध हैं। ये अद्वितीय जैविक सम्पदाओं से सम्पन्न होती हैं। इनमें उतले और आमतौर पर गतिशील जल की परिस्थितियों वाले विविध श्रेणी की वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं की उपस्थिति पाई जाती है। नम भूमि की गणना सबसे समृद्ध पारिस्थितिक तंत्र की श्रेणी में होती है। पारिभाषिक रूप में भौमिक एवं जलीय प्रणाली के बीच की परिवर्ती भूमि, जिसमें मौलिक जलस्तर सतह के करीब पाया जाता है या जहाँ भूमि छिछले पानी से ढ़की रहती हैं, नम भूमि की श्रेणी में आती हैं।

पारिस्थितिकीय दृष्टि से नम भूमि का अपना विशेष महत्व है। पृथ्वी की सतह के मात्र छ: प्रतिशत हिस्से पर फैलाव के बावजूद ये नम भूमि सामान्य भूमि से कहीं अधिक उत्पादक होती हैं। इस श्रेणी की भूमि का अपना एक समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र होता है। इसमें अनेकों तरह की उपयोगी वनस्पतियों के साथ ही कई प्रकार के जीव-जन्तु भी पाये जाते हैं।

सम्यक जानकारी के अभाव में नम भूमि को मच्छरों वाली अनुपयोगी भूमि के रूप में कूड़े-कचरे के निस्तारण वाले भूखण्ड के रूप में लिया जाता है। इस अव्यवहारिक सोच के चलते कई नम क्षेत्र खत्म हो गये हैं और कई समाप्त होने के कगार पर हैं। इस स्थिति के चलते कई नम क्षेत्रों की हालत अत्यन्त खराब है, जिससे पक्षियों और वनस्पतियों के ह्रास के चलते ऐसे क्षेत्रों की पर्यावरणीय स्थिति लगातार बिगड़ रही है। यद्यपि वैश्विक स्तर नम भूमि सम्बन्धी विशेषताओं के चलते बढ़ती चेतना ने हालात में बदलाव की आशाओं को भी बल प्रदान किया है।

दुर्लभ जल पक्षियों और जैव विविधताओं के संरक्षक हैं नम भूमिनम भूमि क्षेत्रों में जल पक्षी भोजन, आवास के साथ ही अपने जीवन क्रम की अन्य प्रक्रियाएँ भी पूरी करते हैं। इनके प्रजनन, घोसला, निर्मोचन नम क्षेत्रों में ही सम्पन्न होते हैं। इन पक्षियों की प्राकृतिक बनावट नम और जलीय क्षेत्र में जीवन-यापन के लिये सर्वथा अनुकूल होती है।

इन जल पक्षियों की बनावट ताजे पानी से लेकर समुद्र तटीय आवासों तक रहने लायक होती हैं। इनके झिल्लीदार पैर के पंजे, पानी के भीतर से भोजन खोज लेने में सक्षम चोंच और शिकार पकड़ने के लिये पानी में डुबकी लगाने की क्षमता इनकी सामान्य विशेषताएँ होती हैं। इस प्रकार के पक्षियों में बत्तख, हंस, पनडुब्बी, मुर्गाबी, स्टार्क, हेरोन, बगुला, आइबिस, स्नूबिल, जलकौवा, पेलिकन, फ्लेमिंगों, सारस, जलकुक्कुट, कूट, जलमुर्गी और किंगफिशर इत्यादि जल पक्षी शामिल हैं।

हमारे देश में लगभग 310 प्रजाति के पक्षी नम भूमि क्षेत्र में निवास करते पाये जाते हैं। इनमें 130 प्रवासी और 130 जल पक्षी अप्रवासी हैं। इन जल पक्षियों में 173 अप्रवासी प्रजातियाँ हैं। इनमें से 53 स्थाई प्रवासी हैं। 38 आंशिक अप्रवासी और शीतकालीन प्रजातियाँ हैं।

दुर्लभ जल पक्षियों और जैव विविधताओं के संरक्षक हैं नम भूमिनम भूमि क्षेत्रों के लिये जलीय पक्षियों का अपना विशेष महत्त्व है। ये नम भूमि क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र के महत्त्वपूर्ण घटक होने के साथ ही इस क्षेत्र के निवासियों के सामाजिक और सांस्कृति क्रिया-कलापों को भी प्रभावित करते हैं। ये जल पक्षी अपनी बनावट और झुण्डों में मनमोहक दृश्य उपस्थित करते हैं। वास्तव में नम भूमि क्षेत्र में पाये जाने वाले ये जल पक्षी प्रकृति की अनुपम कलाकृति के सदृश होते हैं।

इतनी विशेषताओं के बावजूद इन जल पक्षियों पर मानव दृष्टि अच्छी नहीं रही है, जो आज भी जारी है। मानवीय हस्तक्षेप के चलते ही कई जल पक्षियों का अस्तित्व आज खतरे में है। संकट में पड़े इन जल पक्षियों के सम्बन्ध में अध्ययन से पता चलता है कि 242 प्रजातियों में से 82 प्रजातियाँ एशिया में पाई जाती हैं, जिनमें से 39 भारत में हैं। इनमें प्रमुख हैं पेंटेड स्टॉर्क (माइक्टेरिया ल्यूकोसेफाला), डार्टर (एनहिंगा मेलानोगास्टर), स्पॉट बिल्ड बेलिकन (पेलेकेनस फिलिपेनिंसिस), लेसर एडजुटेंट (लेप्टोटिलोस जावानिकस) तथा भारतीय स्किमर जो पहले दक्षिण पूर्व एशिया के नम भू-क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पाये जाते थे, लेकिन आज इनकी संख्या बहुत तेजी से घट रही है।

दुर्लभ जल पक्षियों और जैव विविधताओं के संरक्षक हैं नम भूमिवर्तमान में नम भूमियाँ दुनिया की सबसे अधिक संकट वाली भूमियों में से है। इस स्थिति का प्रभाव भारतीय नम भूमियों पर भी पड़ा है। तेजी से बढ़ती मानव आबादी इसका सबसे बड़ा कारण है। विकास की अनियोजित दशा और दिशा जलग्रहण क्षेत्रों के अनुचित उपयोग के चलते नम भूमि का क्षेत्रफल लगातार घटता जा रहा है। नम भूमियों के घटाव में उद्योग, कृषि एवं शहरी विकास की भूमिका बहुत अधिक है। नम भूमि के घटाव के लिये प्राथमिक प्रदूषक, तलछट, उर्वरक, मानव-मल, जन्तु अवशिष्ट, कीटनाशक और भारी धातुएँ बड़े पैमाने पर जिम्मेदार हैं।

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