वायु-प्रदूषण : समस्या और समाधान

Submitted by Hindi on Thu, 11/03/2016 - 16:46
Source
विज्ञान गंगा, जुलाई-अगस्त, 2015

वायु प्रदूषणवातावरण में बढ़ते वायु-प्रदूषण के भयावह दुष्प्रभाव से अब भारत में नाना प्रकार के रोगों के आक्रमण की पदचाप सुनाई देने लगी है। नवजात शिशुओं के आकार और भार में कमी, निर्धारित समय से पूर्व ही जन्म (प्री- मेच्योर बर्थ) और मानसिक विकास में अबोध जैसी समस्यायें भी वायु प्रदूषण के फलस्वरूप बढ़ रही हैं। चिकित्सकों ने चेतावनी दे दी है कि यदि वायु-पूदषण बढ़ता रहा और उसे नियंत्रित न किया गया तो भविष्य में स्थिति अत्यंत भयावह होने वाली है। वायु-प्रदूषण के कारण होने वाली यह नई समस्यायें फेफड़े के सामान्य रोगों, दमा और हृदय रोगों के अतिरिक्त होंगी।

सामान्यतौर पर भारत के छोटे बड़े सभी नगर वायु-प्रदूषण की चपेट में हैं, किन्तु राजधानी दिल्ली की दशा सर्वाधिक चिंतनीय है। दिल्ली में वायु-प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक पाया गया है। विशेषज्ञों का निश्चित मत है कि ऐसा कोई भी कारक जो अंग विकास में बाधक होता है उसका दुष्प्रभाव गर्भस्थ शिशु और नवजात शिशुओं पर भी निश्चित रूप से होता है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘‘नवजात शिशुओं में तंत्रिका नलिका (न्यूरल ट्यूब) और रीढ़ रज्जु (स्पाइनल कॉर्ड) का ठीक तरह से निर्माण न हो पाना। चिंतनीय तथ्य यह है कि ऐसा उन माताओं के शिशुओं में भी देखा जाता है जो मातायें आहार में पोषक तत्व लेती रहती हैं तथापि उनके गर्भस्थ भ्रूण प्रभावित होते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य जन्मजात न्यूनताएं भी आम हैं।’’ उपरोक्त विचार डॉ. नीलम क्लेर द्वारा व्यक्त किए गए हैं जो ‘सर गंगाराम हॉस्पिटल’ के नियोनैटोलॉजी विभाग की अध्यक्षा हैं। पिछले दिनों ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ की मीटिंग में वायु- प्रदूषण और नवजातों की गड़बड़ियों के पारस्परिक संबंध के विषय में गहन चर्चा की गई थी।

वायु प्रदूषण‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज’ की रिपोर्ट के अनुसार वायु-प्रदूषण के कारण समय से पूर्व कालकवलित होने वालों की संख्या भारत में छ: लाख बीस हजार तक पहुँच चुकी है। दिल्ली में वायु में सूक्ष्म कणिकीय पदार्थों की अत्यधिक मात्रा होने के कारण ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ तथा अन्य वैश्विक संस्थाओं द्वारा दिल्ली की गणना विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में की गई है।

सर गंगाराम अस्पताल तथा भारत के जन स्वास्थ्य संस्थान (पब्लिक हेल्थ फाउण्डेशन आॅफ इण्डिया) के परस्पर सहयोग से विशेष रूप से उन माताओं के आस-पास की वायु की गुणवत्ता का अध्ययन किया गया जिन्होंने 2007-2012 के बीच शिशुओं को जन्म दिया था। इस अध्ययन को उद्देश्य वायु-प्रदूषण और शिशुओं के भार पर उसके पड़ने वाले दुष्प्रभाव के पारस्परिक संबंध का पता लगाना था।

शिशुओं के अतिरिक्त कम आयु के बालक, वयस्क और वृद्ध लोग भी वायु-प्रदूषण की इस मार को झेल रहे हैं। चिंता का विषय यह है कि इस नगरीय प्रदूषित वायु से स्वास्थ्य को कितना खतरा है इसे भली-भांति समझते हुए भी लोग उसके प्रति उदासीन हैं। सरकार तब भी उदासीन थी जब दिल्ली वासियों को बाहर निकलने के बाद प्रदूषित वायु का स्पर्श होने से आँखों में जलन होने लगती थी और आज भी उदासीन है जब अधिकांश लोग सांस रोगों से आक्रांत हैं। ये सारी स्थितियां भयावह और चिंताजनक तो हैं, परंतु दृढ़ इच्छाशक्ति और सतत प्रयत्न से वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना आज भी असंभव नहीं है। विश्व के अनेक देशों ने अपने यहाँ वायु प्रदूषण को कम करने के उपायों और कानूनों के माध्यम से काफी सफलता प्राप्त की है। वास्तविक आवश्यकता सरकार और आम जनता, दोनों में प्रबल इच्छाशक्ति की है। इस दृष्टि से सर्वप्रथम वायु प्रदूषण के कारकों को समझना बहुत आवश्यक है। ये कारण हैं :

वायु प्रदूषण1. हरित गृह गैसें, यथा कार्बन डाइआॅक्साइड, मीथेन, काला कार्बन, नाइट्रस आॅक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स।

2. सूक्ष्म कणिकीय पदार्थ, यथा सल्फर डाइआॅक्साइड, नाइट्रोजन के आॅक्साइड्स, उड़नशील/वाष्पीय कार्बन यौगिक, अमोनिया, कार्बन मोनो आॅक्साइड, ओजोन आदि।

3. मोटर एवं अन्य वाहनों से निकला धुआँ, सड़क की धूल, भवन निर्माण का मलबा और हानिकारक रसायन, सूखी पत्तियों के जलने से निकला धुआँ, बेंजीन, भारी धातुएं आदि।

आईए अब एक नजर उन रोगों पर डाल लें जो वायु-प्रदूषण के कारण साधारणतया बच्चों, युवाओं और वृद्धजनों को रोगग्रस्त करते हैं -

1. बच्चों को होने वाले रोगों में हैं- फेफड़ों का कम विकसित होना, निमोनिया, ब्रांकाइटिस और दमा (अस्थमा)।

2. युवाओं को होने वाले रोगों में है- दमा, फेफड़े का कैंसर और फेफड़ों या फुफ्फुस द्वारा सांस लेने में अवरोध।

3. वृद्धों में दमा, सांस नली के संक्रमण का बार-बार होना, हृदय रोग और लकवे का बढ़ता हुआ खतरा आदि।

चिकित्सा विज्ञान में हो रही प्रगति के बावजूद वर्तमान में संपूर्ण विश्व में वायु-प्रदूषण द्वारा मरने वालों की संख्या 8 मिलियन प्रतिवर्ष तक पहुँच चुकी है। यदि समय रहते वायु-प्रदूषण को नियंत्रित करने के उचित उपाय न किए गए तो स्थिति कितनी भयावह और त्रासद हो सकती है, उसकी आज हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं।

इस संदर्भ में यदि हम केवल दिल्ली की ही बात करें तो एक बड़ा कड़वा सच सामने आता है। वस्तुत: इस संबंध में उस समय कोई सार्थक कदम नहीं उठाए गए जब वायु-प्रदूषण की चपेट में आकर प्रारंभिक दौर में सांस रोगों और आँखों में जलन के रोगियों की संख्या वहाँ बढ़ने लगी थी। अब धीरे-धीरे लोगों को बात समझ में आ रही है जब बच्चे, युवा तथा वृद्धजन सभी इसकी चपेट में आ रहे हैं।

क्यों हो रही है हवा खराब 2वायु-प्रदूषण की समस्या कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे प्रयास करके समाप्त न किया जा सके। विश्व के अनेक नगरों ने दिखा दिया है कि किस प्रकार वायु-प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है। यदि हम वायु-प्रदूषण के प्रति वास्तव में गंभीर हैं तो हमें कुछ अलोकप्रिय कदम उठाने होंगे। ये कदम लगभग वैसे ही होंगे जैसे इंग्लैंड, सिंगापुर और चीन ने उठाये हैं। वास्तव में ‘राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण’ (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की आज्ञा के अनुसार 15 वर्ष पुरानी मोटर गाड़ियों के सड़कों पर चलने पर प्रतिबंध की व्यवस्था है, किंतु वाहन मालिक और परिवहन एजेंसियां इस प्रतिबंध को हटाने के लिये या लागू न करने देने के लिये अवरोध उत्पन्न कर रही हैं।

पहले इन तथ्यों की चर्चा करनी आवश्यक है जिनके आधार पर यूके, सिंगापुर और चीन ने वायु-प्रदूषण पर नियंत्रण पाने में सफलता प्राप्त की है। यूरोपियन यूनियन ने निर्दिष्ट वायु गुणवत्ता के मानकों की अवहेलना करने के लिये यूनाइटेड किंगडम के सम्मुख 300 मिलियन पाउण्ड की कड़ी दंड राशि की चेतावनी दी है। यदि वह यूरोपियन यूनियन के निर्देशों को न मानकर एक वर्ष तक वायु-प्रदूषण में मुख्य भूमिका वाले नाइट्रोजन के आॅक्साइडों की अवहेलना करता रहता है तो उसे आर्थिक दंड के साथ-साथ कानूनी कार्यवाहियों को भी झेलना पड़ेगा। अत: लंदन के नगर प्रमुख बोरिस जान्सन का विचार है कि वहाँ सप्ताह में एक दिन मोटर-गाड़ियों के आवागमन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाए जैसा कि जकार्ता ने रविवार को अधिक भीड़ वाले क्षेत्रों में किया है।

इस दिशा में पहल करते हुए लंदन ने 2008 में एक कड़ा कदम उठाकर अधिकारियों, आम लोगों और व्यापारियों के विरोध के बावजूद एक निम्न उत्सर्जन क्षेत्र नीति (लो एमिशन जोन पॉलिसी) लागू कर दी। इस नीति के तहत उन कारों, बसों, लॉरियों और अन्य वाहनों को भारी दंड दिया गया, जिन्होंने निम्न उत्सर्जन मानक का पालन नहीं किया था। ग्रेटर लंदन की मोटर-गाड़ियों के परिवहन (ट्रांसपोर्ट) का प्रबंध करने वाली समिति ‘ट्रांसपोर्ट फॉर लंदन’ इस नीति के क्रियान्वयन पर अपनी सतर्क दृष्टि रखती है। वहाँ विशेष कैमरों के माध्यम से उन वाहनों के नम्बर प्लेट का छायाचित्र उतार लिया जाता है जो वायु में प्रदूषण फैलाते हैं।

यूके के अतिरिक्त जर्मनी में भी एक ऐसा सफल नियामक तंत्र है जिसके माध्यम से वे प्रदूषणकारी वाहनों की पहचान कर लेते हैं और उन्हें दंडित करते हैं।

.सिंगापुर विश्व का सर्वप्रथम ऐसा नगर है जिसने ‘इलेक्ट्रॉनिक रोड प्राइसिंग’ की नीति लागू की है। यह कार्यक्रम सितंबर 1998 में प्रभावी हुआ। इसके लिये प्रत्येक वाहन में एक ‘स्मार्ट कार्ड’ लगा दिया गया है। यदि वाहन ऐसे क्षेत्र में पहुँच जाता है, जहाँ अत्यधिक भीड़ होती है जिसके कारण वाहन की गति धीमी हो जाती है तो उस वाहन की पहचान हो जाती है। परिणामस्वरूप, उसे भीड़ में ‘जाम’ या अवरोध बढ़ाने का दोषी मान लिया जाता है और ऐसी अवस्था में वाहन में लगे ‘स्मार्ट कार्ड’ से स्वत: दण्ड स्वरूप एक राशि काट ली जाती है। वास्तविकता यह है कि सिंगापुर में एक कार रखना अत्यधिक खर्चीला है। इसके दो कारण हैं। एक तो कारों पर टैक्स बहुत ज्यादा है और पुन: कार का स्वामित्व प्राप्त करने के लिये लगभग उतनी ही राशि देनी पड़ती है जितना कार का प्रारम्भिक मूल्य होता है। देश में इस प्रकार की नीति अपनाकर सिंगापुर सरकार ने वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाने में भारी सफलता प्राप्त की है।

पिछले कुछ वर्षों में जब चीन में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुँच गया तो चीन की सरकार ने भी इस संबंध में कुछ कठोर कदम उठाये हैं। चीन की ‘सेंटर फॉर साइंस एण्ड एन्वायरन्मेंट’ ने सन 2012 में दो लाख चार हजार कारों के खरीद की ही अनुमति दी, जबकि सन 2010 में आठ लाख कारों की खरीद हुई थी। इस प्रकार उठाए गए कठोर कदम अपरोक्ष रूप से वायु-प्रदूषण को रोकने में बहुत सहायक होते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि लंदन, जर्मनी, सिंगापुर और चीन में वायु-प्रदूषण के संबंध में कुछ कठोर और अलोकप्रिय कदम उठाने से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है। यदि विश्व के कुछ देश ऐसा कर सकते हैं तो हम भारत में भी इस दिशा में क्यों नहीं कदम बढ़ा सकते?

कुछ भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि भारत (दिल्ली) में ‘निम्न उत्सर्जन जोन’ अंकित कर पाना संभव ही नहीं है क्योंकि लोग अधिक टैक्स भी नहीं देना चाहते हैं और नियंत्रण संबंधी ऐसी हर नीति के विरुद्ध आंदोलन करने को तैयार रहते हैं। फिर भी वे आशावादी हैं और मानते हैं कि एक शुरुआत तो की ही जा सकती है। यह तो निश्चित है कि वायु प्रदूषण को कम करने का कोई सरल, सुविधाजनक और लोकप्रिय तरीका नहीं हो सकता। कुछ ऐसे कड़े नियम, कानून ही थोड़े बहुत सकारात्मक परिणाम दे सकते हैं। भारत में निम्न उत्सर्जन क्षेत्र या भीड़-भाड़ या जाम के लिए टैक्स वसूलना निश्चित रूप से आसान नहीं होगा। इसकेलिये एक सुदृढ़ और सुव्यवस्थित जन परिवहन तंत्र की ही व्यवस्था पहली शर्त है। किंतु इसकी शुरुआत के लिये गाड़ियों की पार्किंग हेतु अधिक शुल्क तो वसूला ही जा सकता है। ‘अर्बन एमीशन इन्फो’ के निदेशक शरत गुट्टीकुंडा का भी यही मत है कि कार्यान्वयन के प्रथम चरण के रूप में ऐसा करना ही उचित होगा।

सबसे आवश्यक है 15 वर्ष पुराने वाहनों का सड़कों पर चलने पर प्रतिबंध लगाना। वायु प्रदूषण पर प्रतिबंध की दृष्टि से यह तरीका बहुत प्रभावी सिद्ध होगा। एक अनुमान के अनुसार इस कदम से वायु प्रदूषण में 30 से 40 प्रतिशत की कमी की संभावना है। प्रदूषण पर नियंत्रण की दृष्टि से हमें व्यर्थ पदार्थ यथा कूड़े-कचरे को उन स्थानों पर जलाने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए जहाँ उनके रिहायशी क्षेत्रों में एकत्र करके जला दिया जाता है और प्रदूषित वायु वहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य को हानि पहुँचाती है। उस स्थान विशेष में वायु प्रदूषण कई गुना बढ़ जाता है क्योंकि कूड़े में पॉलीथीन समेत अनेक प्रकार के विषाक्त अपशिष्ट भी शामिल होते हैं। वायु प्रदूषण पर रोक लगाने के लिये गुट्टीकुंड जी का यह भी सुझाव है कि दिल्ली में बसों की संख्या चौगुनी कर दी जानी चाहिए जिससे लोग निजी वाहनों (कारों) का कम से कम उपयोग करें। इससे सड़क पर वाहनों की संख्या में भी कमी आयेगी और भीड़-भाड़ की समस्या का भी एक सीमा तक समाधान हो जायेगा।

कोलम्बिया के नगरों में पेट्रोल की बिक्री पर 20 प्रतिशत सरचार्ज लगाने से परिवहन तंत्र में काफी सुधार आया है। किंतु दिल्ली और भारत के अन्य बड़े नगरों में जहाँ पेट्रोल और डीजल के दामों को लेकर आये दिन हाय-तोबा मची रहती है वहाँ 20 प्रतिशत का सरचार्ज लागू करना आसान नहीं होगा।

सीएसई के ‘शुद्ध वायु कार्यक्रम’ की अध्यक्ष अनुमिता राय चौधरी का कहना है कि दिल्ली की जनता परिवहन तंत्र के चरम विस्फोट की प्रतीक्षा में लगातार वायु-प्रदूषण की मार नहीं झेल सकती। वाहनों के पार्किंग के मूल्य को बढ़ाकर लागू करने के लिये ऐसे कठोर कदम अब तुरंत उठाने होंगे। दिल्ली भीड़-भाड़ भरे स्थानों के लिये वाहनों से भारी शुल्क वसूलने पर भी विचार कर सकती है। तब ऐसे स्थानों में लोग जाने से बचने का प्रयास करेंगे। यदि दिल्ली की जनता वायु प्रदूषण से मुक्ति पाने के प्रति गंभीर है तो उन्हें गाड़ियों की पार्किंग मूल्य में वृद्धि को स्वीकार करना ही होगा।

परिवहन तंत्र की अराजकता के अतिरिक्त वायु प्रदूषण के विभिन्न कारणों में एक अन्य प्रमुख कारण है मौसम परिवर्तन जो इन दिनों सारे संसार की चिन्ता का विषय है। मौसम परिवर्तन के प्रभाव से फसलोत्पादन में तो कमी आती है और वायु प्रदूषण में भी वृद्धि होती है। वर्तमान में संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन सर्वाधिक प्रदूषणकारी देश हैं। एक उबरता हुआ विकासशील देश होने के कारण सारी दुनिया की निगाहें आज भारत की ओर हैं और भारत से इसमें अग्रगामी भूमिका निभाने की अपेक्षा है। आशा की जानी चाहिए कि इस वर्ष (2015) पेरिस में मौसम परिवर्तन पर होने वाले विश्वव्यापी सम्मेलन में अन्य मुद्दों के साथ वायु प्रदूषण को कम करने के लिये सार्थक उपाय भी सामने आयेंगे। पिछले वर्ष (2014) के दिसम्बर माह में लीमा में हुई विभिन्न देशों की संगोष्ठी के परिणाम सकारात्मक हैं। भारत के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर ने भी मौसम परिवर्तन में संबंधित निर्णयों से भारत की संतुष्टि जतायी है।

संक्षेप में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाने का दूसरा अर्थ है उन सभी रोगों से मुक्ति जिनकी प्रारंभ में ही चर्चा की जा चुकी है। श्वांस नली, फेफड़ों, त्वचा और शिशुओं पर होने वाले दुष्प्रभावों तथा तरह-तरह की प्रत्यूर्जता से पीड़ित लोगों के हित में न केवल सरकार को गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए बल्कि स्वयं जनसामान्य को अपने छोटे-छोटे प्रयासों से प्रदूषण निवारण को एक जनजागृति का स्वरूप देने का प्रयास करना चाहिए। सरकार द्वारा सुरक्षा के उपायों का अक्षरश: पालन करवाना आज के युग की आवश्यकता है। ‘वायु-प्रदूषण मुक्त भविष्य’ अब केवल भारत ही नहीं पूरे विश्व का नारा होना चाहिए।

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