भारतीय अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसेट

Submitted by Hindi on Sun, 11/06/2016 - 09:17
Source
विज्ञान गंगा, अक्टूबर-दिसम्बर, 2015

28 सितंबर 2015 को सुबह 10 बजे भारत का पूर्णतः खगोलिक अध्ययन के लिये समर्पित पहला उपग्रह ‘एस्ट्रोसेट’ श्री हरिकोटा प्रमोचन केंद्र से सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेजा गया। इस उपग्रह के कुछ वैज्ञानिक उद्देश्य हैं, जैसे कि:

भारतीय अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसेट1. युग्मित तारक तंत्रों में उच्च ऊर्जा प्रक्रमों को समझना, जिनमें न्यूट्रॉन तारे तथा ब्लैक होल भी शामिल है।
2. न्यूट्रॉन तारों के चुंबकीय क्षेत्रों का आकलन करना।
3. हमारी मंदाकिनी आकाश गंगा के परे विद्यमान तारक तंत्रों में तारक उद्गम क्षेत्रों और उच्च ऊर्जा प्रक्रमों का अध्ययन करना।
4. आकाश में अल्पकाल के लिये दीप्त एक्स किरण स्रोतों का संसूचन करना।
5. ब्रह्मांड के पराबैंगनी क्षेत्र का सीमित गहन क्षेत्र सर्वेक्षण करना।

एस्ट्रोसेट का विवरण


एस्ट्रोसेट एक घनाभ आकृति (1.96m ×1.75m×1.30m) का उपग्रह है, जिसका मोचन क्षण द्रव्यमान 1513 किलोग्राम और शुष्क द्रव्यमान 1470 कलोग्राम है। इसमें दो सौर-विन्यास लगे हैं जो 2100 वाट विद्युत शक्तिजनित करते हैं और दो लिथियम आयन बैटरियाँ हैं जिनमें प्रत्येक की धारिता 36 एम्पियर घंटा है। सूर्य, उपग्रह में लगे तारक संवेदक और घूर्णाक्षिस्थायी इसका विन्यास संदर्भ निर्धारित करेंगे। इसका ‘रुख एवं कक्षा नियंत्रक तंत्र (एओसीएस), प्रतिक्रिया-पहियों, चुंबकीय बल-आघूर्ण प्रदायकों तथा प्रणोदकों की सहायता से इसकी कक्षा और विन्यास को बनाए रखने में सहायता करेंगे।

प्रमोचन के 22 मिनट बाद ही यह उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से 650 किलोमीटर ऊपर विषुवत रेखीय तल से 608’ का कोण बनाती हुई अपनी कक्षा में स्थापित कर दिया गया। एक-एक कर इसके दोनों सौर पैनल खुल गए और इसने कार्य करना शुरू कर दिया। यह दिन में पृथ्वी के 14 चक्कर लगाएगा और लगभग 420 गिगाबिट्स डाटा बंगलुरु स्थित तीन संरेखन केंद्रों को भेजेगा। इनमें पृथ्वी से नियंत्रण और निदर्शन का कार्य इसरो दूर मापन, संरेखन और कमान नेटवर्क (आईएसटीआरएसी) करेगा तथा आईएसआर के ही संरेखन एवं डाटा आग्रहण केंद्र तथा भारतीय गहन अंतरिक्ष नेटवर्क (आईडीएसएन) उपग्रह पर ध्यान रखने और डाटा प्राप्त करने का कार्य करेंगे।

एस्ट्रोसेट में लगे कार्यकारी यंत्र


एस्ट्रोसेट, हब्बल टेलिस्कोप की भांति ही एक टेलिस्कोपीय उपग्रह है, बस यह उससे अपेक्षाकृत बहुत छोटा, कम क्षमता का और कम समय के लिये रहने वाला उपग्रह है। यह भारत के लिये अंतरिक्ष में कई खिड़कियां खोलता है। इसकी सहायता से हम पराबैंगनी और एक्स किरण स्रोतों का भी अध्ययन कर सकेंगे। इस कार्य के लिये इसमें निम्नलिखित उपकरण लगाए गए हैं:

पराबैंगनी चित्रण टेलिस्कोप


एक युगल टेलिस्कोप असेम्बली है जो विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम के दृश्य, पराबैंगनी तरंग परिसर में प्रेक्षण लेने में सक्षम है। इसकी संरचना साथ के चित्र में दर्शाई गयी है। यह टेलिस्कोप एक साथ तीन तरंगदैर्घ्य परिसरों: 130-180 नैनोमीटर, 180-300 नैनोमीटर एवं 320-530 नैनोमीटर में चित्र लेने के लिये तैयार किया गया है। दृश्य क्षेत्र 28 इंच व्यास का एक वृत्त है तथा विभेदन पराबैंगनी परिसरों के लिये 1.8 इंच तथा दृश्य परिसर के लिये 2.5 इंच है। एक घूमते पहिए पर लगे फिल्टरों की सहायता से विद्युत चुंबकीय तरंग परिसर का चयन किया जाता है। इसके अभिदृश्यक का व्यास 40 सेंटीमीटर है।

मृदु X-किरण चित्रण टेलिस्कोप


इसमें लगभग वोल्टर-1 विन्यास में (प्रभावी क्षेत्रफल 120 वर्ग सेंटीमीटर) स्वर्णलेपित शंक्वाकार पत्र दर्पणों के 41 समकेंद्रित कोषों का फोकसनकारी विन्यास और फोकस पर एक गहन क्षीणता सीसीडी कैमरा लगा है जो 03-8.0 KeV बैंड में एक्स किरणों का उपयोग कर चित्र निर्मित करता है। यह सीसीडी कैमरा लगभग -800 सैल्सियस पर कार्य करता है जिसके लिये ताप-वैद्युत शीतलीकरण का उपयोग किया जाता है।

लार्ज एरिया एक्स-रे प्रोपोर्शनल काउंटर्स (एलएएक्सपीसी) :


एक तीन सह-संरेखित सर्वसम यंत्रों का समूह है जिसके द्वारा 3-80 KeV के विस्तृत ऊर्जा बैंड में निम्न विभेदन एक्स-किरणों का आग्रहण काल और स्पैक्ट्रम अध्ययन किया जाएगा। प्रत्येक एलएएक्सपीसी का बहु-तंतु बहुल परत विन्यास है और यह 10×10 का दृश्य क्षेत्र आच्छादित करता है। इस टेलिस्कोप का प्रभाव क्षेत्रफल 6000 वर्ग सेंटीमीटर है।

कैडमियम-जिंक टेल्युरॉइड इमेजर


यह एक कठोर एक्स किरण चित्रण यंत्र है। इसमें 10-150 KeV ऊर्जा परिसर में काम करने वाला लगभग 500 वर्ग सेंटीमीटर प्रभावी क्षेत्रफल का पिक्सलकृत कैडमियम-जिंक टेल्युराइड संसूचक विन्यास लगा है, जिसकी दक्षता लगभग 100 प्रतिशत और अत्युच्च ऊर्जा विभेदन क्षमता है। स्पेक्ट्रममितीय अध्ययनों के अतिरिक्त इसका काम 100-300 KeV ऊर्जा परिसर के दीप्त गैलेक्टिक एक्स किरण स्रोतों का सुग्राही ध्रुवण मापन भी होगा।

स्कैनिंग स्काई मॉनीटर (एसएसएम) :


इस गैस-पूरित आनुपातिक गणित्र में प्रतिरोधक तार धनाग्र का कार्य करते हैं। तार के दोनों सिरों के निर्गम आवेश का अनुपात एक्स किरण अन्योन्य क्रियाओं की अवस्थिति बताता है और संसूचक में चित्रण तल प्रदान करता है। पूरा मॉनीटर तीन स्थिति संवेदी गणित्रों का समुच्चय है, जिनमें प्रत्येक के साथ एक-एक विमीय कोडित मास्क लगा है जिसकी झिर्रियों की शृंखला आकाश की छाया संसूचक पर बनाती है, जिससे आकाश के दीप्ति वितरण का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

आवेशित कण मॉनीटर (सीपीएम) :


एलएएक्स, एसएक्सटी और एसएसएम के प्रचालन के नियंत्रण के लिये एस्ट्रोसेट में एक आवेशित कण मॉनीटर लगाया गया है। अपनी प्रत्येक परिक्रमा में 15-20 मिनट एस्ट्रोसेट साउथ एटलांटिक एनॉमली (एसएए) क्षेत्र में बिताएगा, जिसमें इसे निम्न ऊर्जा इलेक्ट्रॉनों और प्रोटॉनों के तीव्र प्रवाहों का सामना करना होगा जो संसूचकों को क्षति पहुँचा सकते हैं और आनुपातिक गणित्रों को क्षीण कर सकते हैं। इनकी रक्षा के लिये सीपीएम से प्राप्त डाटा उच्च वोल्टता को कम या शून्य कर सकता है। एस्ट्रोसेट पूरी तरह एक भारतीय उपग्रह है जिसका निर्माण निम्नलिखित अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से किय गया है :

1. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (आईएसआरओ)
2. टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (टीआईएफआर), मुंबई
3. भारतीय खगोलिकी संस्थान (आईआईए), बंगलुरु
4. रमन अनुसंधान संस्थान (आरआरआई), बंगलुरु
5. खगोलिकी एवं खगोल भौतिकी का अंर्तिश्वविद्यालयी केंद्र (आई यूसीएए), पुणे
6. भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी), मुंबई
7. मूलभूत विज्ञानों का सत्येंद्र नाथ बोस राष्ट्रीय केंद्र, कोलकाता
8. कनाडियाई स्पेस एजेंसी
9. यूनिवर्सिटी ऑफ लीकेस्टर

इसका प्रक्षेपण लांच वेहिकिल पीएसएलवी के द्वारा इसके 31वें मिशन के रूप में किया गया। पीएसएलवी-सी3 के इस मिशन में एस्ट्रोसेट के साथ अन्तरराष्ट्रीय उपभोक्ताओं के छह छोटे उपग्रह भी अंतरिक्ष में भेजे गए, इनमें शामिल थेः

1. इन्डोनेशिया का 76 किलोग्राम का एलएपीएएन-ए2
2. कनाडा का 14 किलोग्राम का एनएलएस-14 (ईवीए)
3. यूएसए के 28 किलोग्राम के चार एलईएमयूआर उपग्रह

एस्ट्रोसेट के प्रक्षेपण के साथ भारत ने अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। न केवल हम कम खर्च में गहरे अंतरिक्ष में उतर रहे हैं, बल्कि विश्व से इस क्षेत्र संबंधी अपनी निपुणता का लोहा भी मनवा रहे हैं। चन्द्रयान और मंगलयान के हमारे अनुसंधानों ने यह साबित किया है कि हमारा छोटा कदम भी मानवता को मीलों आगे ले जाता है। निश्चित ही ऐसा ही एस्ट्रोसेट के साथ भी होगा।

सम्पर्क


श्री राम शरण दास
49/4, वैशाली, गाजियाबाद (यूपी), ई-मेल : rsgupta_248@yahoo.co.in


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