हिन्दी में विज्ञान लेखन उद्भव एवं विकास

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Source
मासिक विज्ञान पत्रिका आविष्कार, अक्तूबर, 2015

विज्ञान लेखन को सर्वकल्याणकारी और लोकनिधि बनाने के लिये लेखक का सुझाव है कि उच्चकोटि के वैज्ञानिक स्वयं हिन्दी के माध्यम से वैज्ञानिक चेतना के निर्माण हेतु लेखन करें, विज्ञान पत्रकारिता तभी वांछित उच्च शिखर पर आसीन हो सकती है। प्रस्तुत पुस्तक लोक में विज्ञान प्रसार की अपनी भूमिका में बहुत सफल होने के सारे आयामों से युक्त है। हिन्दी में विज्ञान लेखन के इतिहास विषयक अब तक जो कार्य हुए थे उन्होंने एक दृढ़ आधारभूमि तो पहले ही तैयार कर दी थी अब यह नवीनतम प्रयास उस नींव पर एक सुदृढ़ भवन की भांति स्थापित है।

सिद्धहस्त लेखक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र जी द्वारा रचित ‘हिन्दी में विज्ञान लेखन: उद्भव एवं विकास’ अपने मूल रूप में एक व्यापक शोध-प्रबंध होते हुए भी अपनी पठनीयता और आकर्षक संप्रेषणीयता के कारण कहीं भी विज्ञान विषयक रुक्ष लेखन नहीं प्रतीत होता। पुस्तक में विज्ञान लेखन के इतिहास के विविध पक्षों पर प्रकाश डालने के साथ-साथ विज्ञान लेखन के लोकोपयोगी और लोक-कल्याणकारी पक्ष को विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बनाने की ओर बल दिया गया है।

यह लेखक की सर्वसमन्वयक दृष्टि का ही परिणाम है कि वह विज्ञान लेखन और कल्पना के अंतरसंबंधों से लेकर उसके इतिहास, काल-निर्धारण, पारंपरिक ग्रंथों की खोज, विज्ञान लेखन की विविध विधाएं, तद्विषयक वर्तमान स्थिति, उसके समक्ष खड़ी चुनौतियों और संभावनाओं तथा विज्ञानसेवी संस्थाओं से लेकर पारिभाषिक शब्दावली तक के अगम सागर को पुस्तक के कलेवर में समेटने में सफल हुए हैं और वह भी अपने प्रभावशाली स्वरूप में।

पुस्तक के प्रथम अध्याय की प्रथम पंक्ति में ही लेखक की यह स्वीकारोक्ति है कि हिन्दी में विज्ञान लेखन अभी हाशिए पर है और साहित्य की अपनी प्रचुर विधाओं के कारण इस विधा विशेष को साहित्य की मूल धारा में उचित स्थान नहीं मिल सका। यह प्रश्न एक बहुत लंबे और संभवतः अनिर्णीत विमर्शों को जन्म देने वाला है। शुद्ध साहित्यिकता की कसौटी पर परखे जाने के लिये किसी भी लेखन का मौलिकता, नवीनता, सृजनात्मक तत्वों और भावसृष्टि के मापदंडों पर आकलन किया जाता है। विज्ञान लेखन को भी साहित्य-सर्जना की अन्य तमाम विधाओं जैसे-रिपोर्ताज, आलोचना, यात्रा संस्मरण आदि की भाँति एक स्वतंत्र विधा के रूप में ही स्वीकारना उचित होगा।

प्रथम अध्याय में लेखक ने स्वयं इस विषय पर लंबी चर्चा की है और अपने तथा अन्यान्य प्रबुद्ध लोगों के अभिमतों को सामने रखते हुए कहा है कि ‘विज्ञान लेखन में विज्ञान और कला दोनों का संयोग है। विज्ञान होता है रुक्ष और रूढ़ जबकि साहित्य होता है ललित, वैविध्यपूर्ण और लोकभावन।’ तथा ‘साहित्य का मुख्य कार्य है विज्ञान जैसी लोकहितैषिणी कटु औषधि को अपने रसात्मक और लोकभावन सम्पुट में भर कर सामान्य रूप से व्यापक तौर पर सेवनीय बनाना।’ इन पंक्तियों द्वारा लेखक का इस पुस्तक प्रणयन का उद्देश्य और विज्ञान लेखन के विषय में उनकी अपनी वैचारिक दृष्टि पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है।

स्पष्ट है कि विज्ञान लेखक के लिये ऐसा ही करना उचित माना गया है किन्तु फिर भी प्रश्न यह उठता है कि विज्ञान लेखक का ध्यान तथ्यात्मकता को पूरी परिशुद्धता के साथ प्रस्तुत करने पर होना चाहिए या प्रस्तुति रूपी चासनी की मिठास पर केंद्रित होना चाहिए? और यदि उत्तर विज्ञान की परिशुद्धतापूर्ण प्रस्तुति है तो बल भाषा-शैली की प्रेषणीयता पर अधिक होना चाहिए न कि साहित्यिकता पर। अंत में विज्ञान और साहित्य के मध्य के इस अनावश्यक विवाद को विराम देते हुए स्वयं लेखक ने निर्णय दिया है कि ‘लेखन की कोई भी विधा हो यदि विज्ञान के तथ्य उस विधा के मूल रूप को विकृत नहीं कर रहे हैं तो सामान्य भाव धरातल का होने पर भी उसे (साहित्य में) स्थान मिलना चाहिए।’ एक अन्य स्थान पर उन्होंने लिखा है कि जितनी शीघ्रता से (बीसवीं सदी में) वैज्ञानिक अवधारणाएं आ रही थीं उतनी शीघ्रता से कोई भाषा उन्हें शब्द नहीं उपलब्ध करा पा रही थी।

इस प्रकार सूक्ति रूप में लेखक की स्थापनाएं पुस्तक में सर्वत्र देखी जा सकती हैं। जैसे-‘विज्ञान और साहित्य में विज्ञान मूक और पंगु है। वह साहित्य की जिह्वा से बोलता है। उसके पैरों पर सवार होकर चलता है, किन्तु अपनी सूक्ष्म, विश्लेषणात्मक तथा अन्वेषणात्मक दृष्टि एवं प्रवृत्ति के कारण सदैव सजग रहता है।’ तथा ‘विज्ञान खुद कभी पूर्ण साहित्य नहीं बन सकता पर साहित्यकार उसकी उपलब्धियों को जनग्राह्य बना सकता है।’ पूरी पुस्तक में इस तरह के वाक्यांश पाठक को वैचारिक सामग्री तो उपलब्ध कराते ही हैं पुस्तक की गुणवत्ता में भी निश्चित वृद्धि करते हैं।

पुस्तक का सबसे प्रशंसनीय पक्ष यह है कि लेखक ने अपने विचारों को पूरी स्पष्टता से और पूरा बल देकर सामने रखा है। उदाहरण के लिये विज्ञान लेखन की समालोचना विषयक प्रसंग में वे पूरा बल देकर कहते हैं कि ‘स्तरीय लेखन के लिये समीक्षकों को दृढ़ होना पड़ेगा’ तथा ‘बिना उचित समीक्षा के लेखन के स्तर में परिष्कार नहीं होगा।’ इसी पुस्तक में एक अन्य स्थान पर किसी पत्रिका के हवाले से एक वाक्य उद्धृत किया गया है-‘आज के युग में कोई कितना भी बड़ा लेखक क्यों न हो, उसके पाठक कम और प्रशंसक अधिक मिलते हैं।’ इन वाक्यों से समीक्षा के संदर्भ में स्वयं लेखक की सोच पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। सत्य है कि समीक्षा पुस्तक की प्रशंसा नहीं, उसका आकलन है।

पुस्तक के अध्यायों को लेखक ने शुद्ध साहित्यिक मनःस्थिति में क्रमशः कर्षण, बीजवपन, प्रस्फुटन, और सर्वोत्थान काल जैसी संज्ञाएं दी हैं। इनमें विज्ञान लेखन के समक्ष चुनौतियों, विज्ञान लेखन का काल विभाजन, लेखन की विधाओं, पांडुलिपियों संबंधी सूचनाओं, विज्ञान लेखन के विविध आयामों और उसके सर्वतोरूपेण विकास तथा विज्ञान लेखन संबंधी भाषिक समस्याओं और प्रवृत्तियों जैसे गंभीर और वैविध्यपूर्ण प्रश्नों पर विशद चर्चा की गई है।

पुस्तक की उपादेयता को द्विगुणित करता है विज्ञान विषयक प्राचीन पुस्तकों की पांडुलिपियों के संक्षिप्त परिचय से युक्त चतुर्थ अध्याय। इसमें हस्तलिखित ग्रंथों के संबंध में स्वयं लेखक की समालोचनात्मक प्रस्तुतियां द्रष्टव्य हैं और तत्कालीन लेखन का रसास्वाद भी कराती हैं। उदाहरण के लिये मध्यकालीन गद्यात्मक लेखन के दृष्टांत स्वरूप- ‘श्रीमते रामानुजाय नमः’ वाला गद्यांश और उसी के तुरन्त बाद ‘श्री व्यास जी’ की पुस्तकों के दृष्टांत। इसी प्रसंग में लेखक का अभिमत है कि उस काल में ‘लेखन की पद्यात्मक विधा की अपेक्षा गद्यात्मक विधा उपेक्षित रही।’ वस्तुतः मध्यकाल भक्ति और रीति विषयक रचनाओं का काल है, अतः पद्य लेखन का शीर्ष पर होना तो स्वाभाविक ही है। प्रशंसनीय यह है कि उस वातावरण में भी गद्य लेखन के ये छिटपुट और अप्रतिहत प्रयास चल रहे थे।

पुस्तक के नौ अध्यायों में विज्ञान लेखन के कालक्रमानुसार और हस्तलिखित पांडुलिपियों की जो सूची प्रस्तुत की गई है उसने पुस्तक की उपादेयता को द्विगुणित किया है। कालखंडों के वर्गीकरण, विज्ञान लेखन में विषय और स्वरूप के आधार पर विधाओं का वर्गीकरण और तत्कालीन ग्रंथों की भाषा आदि पर लेखक की टिप्पणियां बहुत सटीक और तथ्यपरक हैं। प्राचीन ग्रंथों की चर्चा में प्रकारांतर से यत्र-तत्र चिकित्सीय विधियों और औषधियों की भी चर्चा हो गई है।

पुस्तक की भाषा में लेखक की अपनी साहित्यिक रुचि की छाया सर्वत्र विद्यमान है। अतः भाषा को सामान्य पुस्तकों की भांति ‘सरल-सुबोध’ की श्रेणी में रखना असंभव है। वह संस्कृतनिष्ठ है और पांडित्यपूर्ण भी। किन्तु उसका सहज प्रयोग उसे पांडित्य प्रदर्शन के आरोप से मुक्त रखता है। एक स्थान पर लेखक ने स्वयं कहा है कि ‘एक विज्ञान लेखक को साहित्य तथा विज्ञान की द्विधर्मिता के निर्वहन की तैयारी करनी चाहिए।’ इस पुस्तक में लेखक ने स्वयं यही कर दिखाने का सफल प्रयास किया है। अपनी विश्लेषणात्मकता और तथ्यों की प्रस्तुति में पुस्तक एक वैज्ञानिक की सतर्क लेखनी का परिणाम लगती है और अपनी भाषा शैली की आकर्षक संप्रेष्यता और रसोद्रेक में एक साहित्यिक की भावभूमि की उपज। आरम्भ में ही लेखक का दृष्टिकोण सर्वत्र बहुत तर्कपूर्ण रहा है।

पुस्तक की विषयवस्तु को जिस प्रकार शीर्षकों और उपशीर्षकों में विभाजित किया गया है वह उनकी वैज्ञानिक दृष्टि का परिचायक है। विज्ञान पत्रकारिता के संबंध में उनका निरीक्षण बहुत सटीक है कि विज्ञान संबंधी लेखों के संकलनों के अभाव के कारण विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी सामग्री का अध्ययन कठिन कार्य है।

पुस्तक की एक और विशेषता है अनेक संदर्भ ग्रंथों, पत्रिकाओं और विज्ञान विषयक पुस्तकों से विषयानुकूल उद्धरणों की भरमार। ये उद्धरण जहाँ एक ओर लेखक के अपने मत को संपुष्ट करते हैं वहीं उद्धरणों में समाहित सामग्री पाठकों को भी लाभान्वित करती है। एक बात और स्पष्ट करनी उचित है कि उद्धरणों की भरमार को लेखकीय मौलिकता पर प्रश्नचिह्न के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। उद्धरण की भूमिका मूल के सहायक की है।

पुस्तक के उपसंहार में लेखक की अपनी वैचारिक उद्भावनाओं का समाहार प्रस्तुत किया गया है। विज्ञान लेखन के लिये प्रस्तुत उत्साही लेखकों से उनकी यही ‘अपील’ है कि “विज्ञान लेखन की स्वस्थ साहित्यिक समीक्षा हो और साहित्यिक लेखन यदि विज्ञान के निकट हो तो उसकी निष्पक्ष वैज्ञानिक विवेचना हो।” उनका यह समन्वयक और संतुलनपरक दृष्टिकोण पुस्तक के हर भाग में दिखाई पड़ता है। कुछ बिन्दुओं पर मतभेद के अवसर आते हैं जैसे एक स्थान पर वे कहते हैं कि-‘विज्ञान साहित्य और विशुद्ध साहित्य दोनों का योग हो तो विज्ञान के उच्चस्तरीय साहित्य का सृजन और साहित्य के अतियथार्थवादी आयाम हेतु नया आकाश संभव है।’ अब साहित्य में अतियथार्थवाद को कहाँ तक प्रश्रय मिलना चाहिए यह एक अलग चर्चा का मुद्दा है। साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग आज भी साहित्य में अतियथार्थवाद को साहित्य की मंथर मृत्यु का नाम देता है। किन्तु इस पुस्तक को इस विमर्श के मंच के रूप में न देख कर विज्ञान लेखन के इतिहास के प्रस्तोता के रूप में ही देखा जाना चाहिए और उस दायित्व का निर्वहन इसमें भलीभांति हुआ है। संदर्भ ग्रंथों की वृहत सूची ने तो पुस्तक की उपादेयता में और श्रीवृद्धि की है।

विज्ञान लेखन को सर्वकल्याणकारी और लोकनिधि बनाने के लिये लेखक का सुझाव है कि उच्चकोटि के वैज्ञानिक स्वयं हिन्दी के माध्यम से वैज्ञानिक चेतना के निर्माण हेतु लेखन करें, विज्ञान पत्रकारिता तभी वांछित उच्च शिखर पर आसीन हो सकती है। प्रस्तुत पुस्तक लोक में विज्ञान प्रसार की अपनी भूमिका में बहुत सफल होने के सारे आयामों से युक्त है। हिन्दी में विज्ञान लेखन के इतिहास विषयक अब तक जो कार्य हुए थे उन्होंने एक दृढ़ आधारभूमि तो पहले ही तैयार कर दी थी अब यह नवीनतम प्रयास उस नींव पर एक सुदृढ़ भवन की भांति स्थापित है।

डॉ. मिश्र के इस वंदनीय प्रयास के लिये बारंबार साधुवाद।

सम्पर्क


डॉ. मिश्र
मंजुलिका लक्ष्मी, वाई-2-सी, 115/6, त्रिवेणीपुरम, झूंसी, इलाहाबाद-211019


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