पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में जैव-विविधता का महत्त्व

Submitted by Hindi on Tue, 11/15/2016 - 10:53
Source
लोक विज्ञान एवं पर्यावरण पत्रिका, विज्ञान आपके लिये, अप्रैल-जून, 2015

भारत जैव-विविधता संपन्न देश है। दुनिया की कुल भूमि के 2.4 प्रतिशत भूमि का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत की जैव-विविधता में 8 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। देश की जलवायु तथा उसकी भौगोलिक स्थिति उसे जैव-विविधता संपन्न देश बनाती है। भारत की गिनती दुनिया की कुल 12 ‘विराट जैव-विविधता’ (मेगाडाईवरसिटी) वाले देशों में से होती है।

जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है। सदाबहार (कैथरेन्थस रोसियस) नामक पौधे में ट्राइ-नाइट्रो-टालुइन जैसे घातक विस्फोटक को विघटित करने की क्षमता होती है। सूक्ष्म-जीवों की विभिन्न प्रजातियाँ जहरीले बेकार पदार्थों की साफ-सफाई में सहायक होती हैं।

जैव-विविधता क्या है ?


जैव-विविधता (बायो डायवर्सिटी) जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जोकि प्रजातियों में, प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है। जैव-विविधता शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वाल्टर जी. रासन ने 1985 में किया था। जैव-विविधता तीन प्रकार की होती हैं। (i) आनुवंशिक विविधता, (ii) प्रजातीय विविधता तथा (iii) पारितंत्र विविधता। प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवंशिक विभिन्नता को आनुवंशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। यह आनुवंशिक विविधता जीवों के विभिन्न आवासों में विभिन्न प्रकार के अनुकूलन का परिणाम होती है। प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है। किसी भी विशेष समुदाय अथवा पारितंत्र (इकोसिस्टम) के उचित कार्य के लिये प्रजातीय विविधता का होना अनिवार्य होता है। पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाले पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं, जिसमें प्रजातियों का निवास होता है। पारितंत्र विविधता विविध जैव-भौगोलिक क्षेत्रों जैसे झील, मरुस्थल, ज्वारनदमुख आदि में प्रतिबिम्बित होती है।

शीतोष्ण क्षेत्रों की तुलना में उष्णकटिबंधीय क्षेत्र जैव-विविधता संपन्न होते हैं। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में जैव-विविधता की संपन्नता के निम्नलिखित कारण हैं :

1. उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की जलवायु शीतोष्ण क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा स्थिर रही है। इसलिये उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में स्थानीय प्रजातियाँ अपने निवास क्षेत्र में बनी रहीं, जबकि शीतोष्ण क्षेत्रों में जलवायु की अस्थिरता के कारण प्रजातियों का बिखराव अन्य क्षेत्रों में होता रहा।

2. उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ज्यादा सौर ऊर्जा की उपलब्धता के कारण समुदायों की उत्पादकता बढ़ जाती है, जो विभिन्न प्रकार की प्रजातियों के अस्तित्व में सहायक होती है।

3. शीतोष्ण क्षेत्रों की तुलना में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के समुदाय पुराने हैं। इसलिये उनको विकास के लिये अधिक समय मिला है, फलस्वरूप प्रजातियों में स्थानीय अनुकूलन ज्यादा हुआ है।

4. उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का गर्म तापमान एवं उच्च आर्द्रता बहुत सी प्रजातियों के सफल जीवन हेतु अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं, जो शीतोष्ण क्षेत्रों में जीने में असमर्थ होती हैं।

5. उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में नाशीजीवों (पेस्ट), परजीवियों एवं बीमारियों का ज्यादा दबाव होता है, जिसके फलस्वरूप किसी एक प्रजाति का प्रभुत्व स्थापित नहीं हो पाता है। ठीक इसके उलट शीतोष्ण क्षेत्रों में ठण्ड के कारण नाशीजीवों, परजीवियों एवं बीमारियों का दबाव कम होता है, जिससे एक प्रजाति अथवा कुछ प्रजातियों का प्रभुत्व स्थापित हो जाता है, फलस्वरूप अन्य प्रजातियाँ विस्‍थापित हो जाती हैं।

जैव-विविधता का महत्त्व


जैव-विविधता का मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। जैव-विविधता के बगैर पृथ्वी पर मानव जीवन असंभव है। जैव-विविधता के विभिन्न लाभ निम्नलिखित हैं :

1. जैव-विविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। विभिन्न प्रकार की फसलें जैसे गेहूँ, धान, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी, अरहर, चना, तोरिया, मसूर आदि से हमारे भोजन की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, जबकि कपास जैसी फसल हमारे कपड़े की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। सागवान, साल, शीशम आदि जैसे वृक्ष की प्रजातियाँ निर्माण कार्यों हेतु लकड़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। बबूल, शिरीश, सफेद शिरीश, जामुन, खेजरी, हल्दू, करंज आदि वृक्षों की प्रजातियों से हमारी ईंधन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, जबकि शिरीश, घमार, सहजन, शहतूत, बेर, बबूल, करंज, नीम आदि वृक्षों की प्रजातियों से पशुओं के लिये चारा संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

2. जैव-विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक होती है। हरित क्रान्ति के लिये उत्तरदायी गेहूँ की बौनी किस्मों का विकास जापान में पाये जाने वाली नारीन-10 नामक गेहूँ की प्रजाति की मदद से किया गया था। इसी प्रकार धान की बौनी किस्मों का विकास ताइवान में पाये जाने वाली डी-जिओ-ऊ-जेन नामक धान की प्रजाति से किया गया था। 1970 के प्रारम्भिक वर्षों में विषाणु के संक्रमण से होने वाली धान की ग्रासी स्टन्ट नामक बिमारी के कारण एशिया महाद्वीप में 1,60,000 हेक्टेयर से भी ज्यादा फसल को नुकसान पहुँचाया था। धान की किस्मों में इस बिमारी के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने हेतु मध्य भारत में पायी जाने वाली जंगली धान की प्रजाति ओराइजा निभरा का उपयोग किया गया था। आई आर 36 नामक विश्व प्रसिद्ध धान की किस्म के भी विकास में ओराइजा निभरा का उपयोग किया गया है।

3. वानस्पतिक जैव-विविधता औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। एक अनुमान के अनुसार आज लगभग 30 प्रतिशत उपलब्ध औषधियों को उष्णकटिबंधीय वनस्पतियों से प्राप्त किया जाता है। उष्णकटिबंधीय शाकीय वनस्पति सदाबहार विनक्रिस्टीन तथा विनव्लास्टीन नामक क्षारों का स्रोत होता है, जिनका उपयोग रक्त कैंसर के उपचार में होता है। सर्पगंधा पादप रेसर्पीन नामक महत्त्वपूर्ण क्षार का स्रोत होता है, जिसका उपयोग उच्च-रक्तचाप के उपचार में किया जाता है। गुगल नामक पौधे से प्राप्त गोंद का उपयोग गठिया के इलाज में किया जाता है। सिनकोना वृक्ष की छाल से प्राप्त कुनैन नामक क्षार का उपयोग मलेरिया ज्वर के उपचार में किया जाता है। इसी प्रकार आर्टिमिसिया एनुआ नामक पौधे से प्राप्त आर्टिमिसिनीन नामक रसायन का उपयोग मस्तिष्क मलेरिया के उपचार में होता है। जंगली रतालू (डायसकोरिया डेल्टाइडिस) से प्राप्त डायसजेनीन नामक रसायन का उपयोग स्त्री गर्भनिरोधक के रुप में होता है।

4. जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है। सदाबहार (कैथरेन्थस रोसियस) नामक पौधे में ट्राइनाइट्रोटालुइन जैसे घातक विस्फोटक को विघटित करने की क्षमता होती है। सूक्ष्म-जीवों की विभिन्न प्रजातियाँ जहरीले बेकार पदार्थों की साफ-सफाई में सहायक होती हैं। सूक्ष्म-जीवों की स्यूडोमोनास प्यूटिडा तथा आर्थोबैक्टर विस्कोसा में औद्योगिक अपशिष्ट से विभिन्न प्रकार के भारी धातुओं को हटाने की क्षमता होती है। पौधों की कुछ प्रजातियों में मृदा से भरी धातुओं जैसे कॉपर, कैडमियम, मरकरी, क्रोमियम के अवशोषण तथा संचयन की क्षमता पायी जाती है। इन पौधों का उपयोग भारी धातुओं के निस्तारण में किया जा सकता है। भारतीय सरसों (ब्रैसिका जूनसिया) में मृदा से क्रोमियम तथा कैडमियम के अवशोषण की क्षमता पायी जाती है। जलीय पौधे जैसे जलकुम्भी, लैम्ना, साल्विनिया तथा एजोला का उपयोग जल में मौजूद भारी धातुओं (कॉपर, कैडमियम, आइरन एवं मरकरी) के निस्तारण में होता है।

5. जैव-विविधता में संपन्न वन पारितंत्र कार्बन डाइ ऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते हैं। कार्बन डाइ आक्साइड हरित गृह गैस है जो वैश्विक तपन के लिये उत्तरदायी है। उष्णकटिबंधीय वनविनाश के कारण आज वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है, जिसके कारण भविष्य में वैश्विक जलवायु के अव्यवस्थित होने का खतरा दिनोंदिन बढ़ रहा है।

6. जैव-विविधता मृदा निर्माण के साथ-साथ उसके संरक्षण में भी सहायक होती है। जैव-विविधता मृदा संरचना को सुधारती है, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है। जैव-विविधता जल संरक्षण में भी सहायक होती हैं, क्योंकि यह जलीय चक्र को गतिमान रखती है। वानस्पतिक जैव-विविधता भूमि में जल रिसाव को बढ़ावा देती है, जिससे भूमिगत जलस्तर बना रहता है।

7. जैव-विविधता पोषक चक्र को गतिमान रखने में सहायक होती है। वह पोशक तत्त्वों की मुख्य अवशोसक तथा स्रोत होती है। मृदा की सूक्ष्मजीवी विविधता पौधों के मृत भाग तथा मश्त जन्तुओं को विघटित कर पोषक तत्वों को मृदा में मुक्त कर देती है जिससे यह पोषक तत्व पुनः पौधों को प्राप्त होते हैं।

8. जैव-विविधता पारितंत्र को स्थिरिता प्रदान कर पारिस्थितिक संतुलन को बरकरार रखती है। पौधे तथा जन्तु एक दूसरे से खाद्य शृंखला तथा खाद्य जाल द्वारा जुड़े होते हैं। एक प्रजाति की विलुप्ति दूसरे के जीवन को प्रभावित करती है। इस प्रकार पारितंत्र कमजोर हो जाता है।

9. पौधे शाकभक्षी जानवरों के भोजन के स्रोत होते हैं, जबकि जानवरों का मांस मनुष्य के लिये प्रोटीन का महत्त्वपूर्ण स्रोत होता है।

10. समुद्र के किनारे खड़ी जैव-विविधता संपन्न ज्वारीय वन (मैंग्रोव वन) प्राकृतिक आपदाओं जैसे समुद्री तूफान तथा सुनामी के खिलाफ ढ़ाल का काम करते हैं।

11. जैव-विविधता के विभिन्न सामाजिक लाभ भी हैं। प्रकृति अध्ययन के लिये सबसे उत्तम प्रयोगशाला है। शोध, शिक्षा तथा प्रसार कार्यों का विकास प्रकृति एवं उसकी जैव-विविधता की मदद से ही संभव है। इस बात को साबित करने के लिये तमाम साक्ष्य हैं कि मानव संस्कृति तथा पर्यावरण का विकास साथ-साथ हुआ है। अतः सांस्कृतिक पहचान के लिये जैव-विविधता का होना अति आवश्यक है।

12. जैविक रूप से संपन्न वन पारितंत्र वन्य-जीवों तथा आदिवासियों का घर होता है। आदिवासियों की संपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति वनों द्वारा होती है। वनों के क्षय से न सिर्फ आदिवासी संस्कृति प्रभावित होगी, अपितु वन्य-जीवन भी प्रभावित होगा।

भारत की जैव-विविधता


भारत जैव-विविधता संपन्न देश है। दुनिया की कुल भूमि के 2.4 प्रतिशत भूमि का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत की जैव-विविधता में 8 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। देश की जलवायु तथा उसकी भौगोलिक स्थिति उसे जैव-विविधता संपन्न देश बनाती है। भारत की गिनती दुनिया की कुल 12 ‘विराट जैव-विविधता’ (मेगाडाईवरसिटी) वाले देशों में से होती है। भारत में 45,000 वनस्पतियों की प्रजातियाँ पायी जाती हैं, जो विश्व के कुल 7 प्रतिशत वनस्पतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं; जबकि देश में जन्तुओं की कुल 75,000 प्रजातियाँ पायी जाती हैं, जो विश्व के कुल 6.5 प्रतिशत जन्तुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। देश की 33 प्रतिशत वनस्पतियों तथा 62 प्रतिशत जन्तु देश के लिये स्थानिक हैं अर्थात ये दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं पाये जाते हैं। देश की कुल 45,000 वनस्पति प्रजातियों में 5,000 प्रजातियाँ शैवालों की, 20,000 प्रजातियाँ कवकों की, 1,600 प्रजातियाँ लाइकेन्स की, 2,700 प्रजातियाँ ब्रायोफाइट्स की, 600 टेरिडोफाइट्स की तथा 15,000 पुष्पीय पौधों की प्रजातियों की पहचान तथा वर्णन अब तक किया गया है। देश की पुष्पीय पौधों की प्रजातियाँ दुनिया के लगभग 12 प्रतिशत पुष्पीय पौधों का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुल 15,000 पुष्पीय प्रजातियों में से लगभग 1,000 प्रजातियाँ लुप्तप्राय श्रेणी में पहुँच चुकी हैं।

जहाँ तक जन्तुओं की विविधता का सवाल है, भारत 60,000 कीटों, 1,700 मछलियों, 1,200 पक्षियों, 540 सरीसृपों, 200 जलथलचारी, 6,500 अकशेरूकी 1,000 मोलस्का तथा 5,000 स्तनपायी प्रजातियों का घर है, जिसमें से 62 प्रतिशत जलथलचारी तथा 32 प्रतिशत सरीसृप भारत के लिये ‘स्थानिक’ (ईण्डेमिक) हैं। देश पशु विविधता में भी संपन्न है। मवेशियों की 27, भेड़ों की 40, बकरियों की 22 तथा भैसों की 8 देशी नस्लें भारत में उपलब्ध हैं।

भारत, का उत्तर-पूर्व, पश्चिमी घाट, पश्चिमी तथा उत्तरी-पश्चिम की हिमालय ‘स्थानिकता’ (ईण्डेमिजम) में संपन्न हैं। कम से कम 200 स्थानिक प्रजातियाँ अण्डमान तथा निकोबार द्वीप समूह में पायी जाती हैं। भारत ने दुनिया को 167 प्रजातियों के पौधों के साथ 320 जंगली प्रजातियों तथा पालतू पशुओं के विभिन्न प्रजातियों को दिया है। गन्ना, पटसन, कटहल, अदरक, छोटी इलायची, काली मिर्च, हल्दी, बांस, भैंस, ऊँट तथा मिथुन की उत्पत्ति भारत में हुयी है। भारत में कृषि की परम्परागत फसलों में धान, अनेक दूसरे अनाज, सब्जियाँ और फलों की 30,000 से 50,000 प्रजातियाँ हैं। इन पौधों की सबसे अधिक विविधता, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, उत्तरी हिमालय और पूर्वोत्तर की पहाड़ियों के भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में भी है। दुनिया के कुल 18 जैव-विविधता के ‘मुख्यस्थल’ (हॉट स्पॉट्स) हैं, जिनमें से 2 भारत में पाये जाते हैं। पश्चिमी घाट तथा पूर्वी हिमालय देश में जैव-विविधता के दो ‘मुख्यस्थल’ हैं।

सम्पर्क


डॉ. अरविन्द सिंह
ओल्ड डी/3, जोधपुर कॉलोनी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी-221 005, उत्तर प्रदेश, ई-मेल : arvindsingh_bhu@hotmail.com


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