मूल ग्रन्थि सूत्रकृमि रोग परिचय एवं प्रबंधन

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Source
लोक विज्ञान एवं पर्यावरण पत्रिका, विज्ञान आपके लिये, अप्रैल-जून, 2015

हमारे देश में सन 1901 में ‘बारबर’ नामक वैज्ञानिक ने तमिलनाडु के देवला नामक स्थान पर सर्वप्रथम चाय की जड़ों में मूलग्रन्थि सूत्रकृमियों को देखा था। इसके बाद सन 1906 में ‘बटलर’ नामक वैज्ञानिक ने इस सूत्रकृमि को काली मिर्च के पौधों की जड़ों पर देखा, अय्यर नामक वैज्ञानिक ने सन 1926 व 1933 में इस सूत्रकृमि को क्रमशः सब्जियों व अन्य फसलों पर देखा। नींबू के पौधों की जड़ों पर इस सूत्रकृमि का संक्रमण सर्वप्रथम ‘थिरूमाला राव’ ने देखा था।

सूत्रकृमि (निमाटोड) सामान्य रूप से सूक्ष्म, कृमिसदृश, खण्डहीन, बेलनाकार, कूटगुहिक जन्तु हैं, जो मृदा में मृतभोजी रूप में या पौधों पर परजीवी रूप में पाये जाते हैं। पारदर्शी तथा चिकने शरीर वाले इस प्राणी का शरीर प्रतिरोधी उपचर्म से ढका रहता है, इसके अग्रभाग में मुख-छिद्र होता है तथा नीचे की तरफ पूँछ होती है, इसमें, नर तथा मादा अलग-अलग होते हैं, बहुत छोटे होने के कारण इनको सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा देखा जा सकता है।

इस समय विश्व में लगभग 63 प्रजातियाँ तथा दो उप प्रजातियाँ मूल ग्रन्थि सूत्रकृमियों की विद्यमान हैं जो विभिन्न फसलों/पौधों पर आक्रमण करती है। विश्व में मूल ग्रन्थि सूत्रकृमि द्वारा सर्व प्रथम सब्जियों (कद्दवर्गीय) में हानि का वर्णन सन 1855 में ‘बरकिली’ नामक वैज्ञानिक ने इंग्लैंड में किया था। हमारे देश में इस समय मूल ग्रन्थि सूत्रकृमियों की बारह प्रजातियाँ (मिलैडोगाइन इनकागनिटा, एमजवैनिका, एम. एरिनेरिया, एम. हैप्ला, एम. एफ्रिकाना, एम. ब्रिविकोडा, एम. थामिसी, एम. एक्सीग्युआ, एमग्रैमिनीकोला, एम. इण्डिका, एम. लुकनाविका तथा एमग्रैमिनिस) विद्यमान हैं, लेकिन इनमें से मुख्यतः पाँच प्रजातियाँ (एम. इनकागनिटा, एम. जवैनिका, एम. हैप्ला, एम. एरिनेरिया तथा एम. ग्रैमिनिकोला) बहुतायत में पूरे भारत वर्ष में मिलती हैं।

हमारे देश में सन 1901 में ‘बारबर’ नामक वैज्ञानिक ने तमिलनाडु के देवला नामक स्थान पर सर्वप्रथम चाय की जड़ों में मूलग्रन्थि सूत्रकृमियों को देखा था। इसके बाद सन 1906 में ‘बटलर’ नामक वैज्ञानिक ने इस सूत्रकृमि को काली मिर्च के पौधों की जड़ों पर देखा, अय्यर नामक वैज्ञानिक ने सन 1926 व 1933 में इस सूत्रकृमि को क्रमशः सब्जियों व अन्य फसलों पर देखा। नींबू के पौधों की जड़ों पर इस सूत्रकृमि का संक्रमण सर्वप्रथम ‘थिरूमाला राव’ ने देखा था।मूल ग्रन्थि सूत्रकृमि द्वारा पूरे विश्व में विभिन्न फसलों व पौधों पर लगभग 5 प्रतिशत तक की हानि आँकी गयी है। हमारे देश में विभिन्न फसलों व पौधों में लगभग 10-12 प्रतिशत की हानि का आकलन इन सूत्रकृमियों द्वारा किया गया है। वैसे विभिन्न फसलों पर हानियों का प्रतिशत अलग-अलग है, जिनमें से सर्वाधिक क्षति इस सूत्रकृमि द्वारा सब्जियों पर होती है। हमारे देश में सब्जियों में इस सूत्रकृमि द्वारा लगभग 50-90 प्रतिशत तक की क्षति दर्ज की गयी है। वहीं धान में इनके द्वारा 16-32 प्रतिशत, तम्बाकू में 59 प्रतिशत, नींबू में 40-70 प्रतिशत, दलहनी फसलों में 8 प्रतिशत व कपास में 10-15 प्रतिशत तक की हानि का आकलन है।

प्रकोप


मूल ग्रन्थि या जड़ गांठ सूत्रकृमि का प्रकोप सब्जियों, फलों, तिलहन, दलहन, चावल, औषधीय व सगन्धीय, सजावटी तथा रेशों वाली फसलों में होता है।

लक्षण


इस रोग से ग्रसित पौधे के ऊपरी भाग में पत्तियों में पीलापन, मुरझाना, फूल व फल का देर से तथा कम लगना, पौधों में बौनापन जैसे लक्षण एवं पौधों की जड़ों में जहाँ पर सूत्रकृमि रहते हैं, वहाँ गोल-गोल गाँठे बनी हुई दिखाई पड़ती हैं। सूत्रकृमि के आस-पास के वितरण के कारण खेतों में पीले, छोटे, छितराये पौधों के पैबन्द से दिखाई देते हैं। चौड़ी पत्तियों वाले पौधे दिन के समय मुरझा जाते हैं। जड़ का संक्रमित भाग मुड़ जाता है और इसके विकसित भाग पर या गाँठ पर छोटी-छोटी कई जड़ें निकल आती हैं। सूत्रकृमि अकसर जड़ ऊतकों के कार्यों में बाधा पहुँचाते हैं। जड़ें मिट्टी से उचित पोषण एवं पानी नहीं ले पाती हैं और पौधों के वायवीय भागों में उसी प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते हैं जैसे कि पोषण की कमी, सूखा, लवण की अधिकता व अन्य तनाव की परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।

जीवन चक्र


मूल ग्रन्थि सूत्रकृमि द्वारा ग्रसित गाँठ में एक या एक से अधिक प्रौढ मादा सूत्रकृमि पाये जाते हैं जो गोल, सफेद नाशपाती की तरह होती है। मादा अपने शरीर के पिछले भाग में स्थित चिपचिपे पदार्थ की थैली में अण्डे देती है। इन अण्डों से बाहर निकलकर द्वितीय स्तर के शिशु उस समय तक मृदा में गतिशील रहते हैं, जब तक उन्हें कोई उपयुक्त परपोषी नहीं मिल जाता। उचित स्थान मिल जाने पर द्वितीय स्तर के सूत्रकृमि अपनी शूकिका द्वारा जड़ों की सतह पर प्रहार करके कोशिकाभित्ति को बाँधकर उसके द्रव्य को चूसते हैं तथा अन्दर प्रवेश कर जाते हैं इसके आक्रमण तथा मुख के स्रावों के फलस्वरूप पौधों की जड़ों में विनाशकारी कोशिकीय परिवर्तन होते हैं, जिससे जड़ें फूल जाती हैं और गाँठ बना लेती हैं। प्रत्येक मादा 300-500 तक अण्डे देती है। अनुकूल परिस्थितियों में सूत्रकृमि का जीवन चक्र 30-40 दिन में पूरा हो जाता है।

प्रबंधन


मूल ग्रन्थि सूत्रकृमि स्वयं तो पौधों को हानि पहुँचाते ही हैं; साथ ही साथ इनकी शूकिका द्वारा जड़ों की सतह पर प्रहार करने से कभी-कभी उस स्थान पर दूसरे अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों (जैसे कवकों, जीवाणुओं व विषाणुओं) के आक्रमण से पोषण को बहुत अधिक क्षति हो जाती है। दूसरी बात यह है कि अभी भी कृषकों को या अन्य उत्पादकों को सूत्रकृमियों के बारे में बहुत कम जानकारी होने के कारण भी फसलों तथा पौधों में बहुत अधिक हानि होती है।

मूल ग्रन्थि सूत्रकृमि के प्रबन्धन हेतु निम्न विधियाँ प्रयोग में लाई जा सकती हैं:

1. ग्रीष्म ऋतु में 15 दिनों के अन्तराल में दो-तीन बार मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करने से अधिकांश सूत्रकृमि मर जाते हैं।

2. नर्सरी में मिट्टी पर पतली पॉलीथिन डालकर ग्रीष्म ऋतु में 3-6 हफ्ते तक मिट्टी की सिकाई भी बहुत उपयोगी पायी जाती है।

3. प्रत्यारोपण के पहले संक्रमित पौधों की जड़ों को सिस्टमिक कीटनाशी या गर्म पानी (50 डिग्री सेल्सियस ताप पर 10 मिनट तक) से उपचार भी लाभदायक पाया जाता है।

4. नीम तथा करंज की खली को सूत्रकृमि ग्रस्त खेतों में 10 कुन्टल प्रति हेक्टेयर डालने से इन सूत्रकृमियों की संख्या कम हो जाती है। इन खलियों के खेतों में सड़ने से सूत्रकृमिनाशी तत्वों का विकास होता है। इसके अलावा महुए की खली, सरसों की खली, तिल की खली तथा लकड़ी के बुरादे का प्रयोग भी सूत्रकृमियों की संख्या को कम करने में सहायक होते हैं।

5. नीम, गेंदा, धतूरा की पत्तियों का अर्क (100 प्रतिशत) का प्रयोग करने पर इन सूत्रकृमियों की संख्या बहुत कम हो जाती है।

6. फसलों के चारों ओर मेड़ों में गेंदे के पौधे को लगाने से सूत्र कृमियों की संख्या में कमी आती है, क्योंकि गेंदे के पौधों से कुछ ऐसे तत्व निकलते हैं जो सूत्रकृमियों को अरुचिकर लगते हैं।

7. गेहूँ, जौ, सरसों इत्यादि फसलें इन सूत्रकृमियों की रोधी हैं, अतः इन फसलों को फसल चक्र में रखना आर्थिक दृष्टि से हानिकारक न हो तो इस विधि को अपना सकते हैं।

8. जैव नियंत्रक कारकों जैसे-ट्राइकोडर्मा विरिडी, ट्राइकोडर्मा हारजिएनम, पेसिलोमाइसीज लिलासिनस, वाम फफूंद, वर्टीसीलियम क्लेमाइडोस्पोरियम, बिवेरिया बैसियाना, बैसिलस थ्यूरेनजिएसिस, कैटेलेरिया, एस्पर्जिलस फ्लेवस आदि के प्रयोग से मूल ग्रन्थि रोग को रोका जा सकता है।

9. मूल ग्रन्थि सूत्र कृमि का नियंत्रण रोगरोधी प्रजातियों का प्रयोग करके भी किया जा सकता है।

10. रासायनिक सूत्र कृमिनाशियों के प्रयोग से मूलग्रन्थि रोगों को रोकना महँगा पड़ता है तथा इससे पर्यावरण प्रदूषित भी होता है तथा बहुत से रासायनिक सूत्र कृमिनाशी प्रतिबन्धित भी हो गये हैं। अतः इनके प्रयोगों से बचना चाहिए। हाँ, यदि बहुत ही अधिक प्रकोप हो गया हो तब इस रोग के नियंत्रण हेतु बाजार में उपलब्ध रासायनिक सूत्र कृमिनाशियों का प्रयोग किया जा सकता है।

सम्पर्क


डॉ. हेमलता पंत
वैज्ञानिक, सोसाइटी ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेस एंड रुरल डवलपमेंट, झूँसी, इलाहाबाद (उ.प्र.)-211019, ई-मेल : pant_hemlata@yahoo.co.in


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