भावी विकास का आधार - महासागर

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विज्ञान गंगा, 2013

समस्त ब्रह्मांड में अभी तक पृथ्वी ही एक ऐसा ज्ञात ग्रह है जहाँ जीवन विविध रूपों में रचा-बसा है। पृथ्वी ग्रह पर जीवन का अस्तित्व यहाँ उपस्थित विभिन्न जटिल व नाजुक प्रणालियों या पारितंत्रों के आपसी समन्वय व संतुलन का परिणाम है। वैसे देखा जाए तो पृथ्वी पर जीवन मुख्यत: तीन तंत्रों स्थलमंडल, वायुमंडल और महासागरों या समुद्रों की सहभागिता के कारण संभव हुआ है।

भावी विकास का आधार - महासागरमहासागर पृथ्वी पर जीवन का प्रतीक है। पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ महासागरों से माना जाता है। महासागरीय जल में ही पहली बार जीवन का अंकुर फूटा था। आज महासागर असीम जैवविधता का भंडार है। जीवन और महासागरों के तालमेल को जानने से पहले हम महासागरों की उत्पत्ति को समझने की कोशिश करते हैं। पृथ्वी पर जल और जल से भरे विशाल महासागरों का अस्तित्व भी करोड़ों वर्षों तक चली क्रियाओं का परिणाम है। पृथ्वी के जन्म के समय यानी करीब साढ़े चार अरब वर्ष पहले यहाँ न तो महासागर थे और न ही जीवन। आरम्भिक समय में तो पृथ्वी का तापमान इतना अधिक था कि बारिश का पानी तुरंत ही भाप बन जाता था। जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान कम होता गया, वायुमंडल में फैली हुई नमी जल में बदल कर अनवरत वर्षा के रूप में पृथ्वी पर गिरने लगी। इस प्रकार वर्षा का जल पृथ्वी के गड्ढों में इकट्ठा होने लगा। इस प्रक्रिया के करोड़ों वर्षों तक जारी रहने के उपरांत महासागरों का जन्म हुआ। इस प्रकार हमारी पृथ्वी का लगभग एक तिहाई भाग पानी से घिर गया और शेष भाग ऊँचाई पर स्थित होने के कारण आज के द्वीपों के रूप में अस्तित्व में आया।

हमारी पृथ्वी का लगभग 70 प्रतिशत भाग महासागरों से घिरा है। महासागरों में पृथ्वी पर उपलब्ध समस्त जल का लगभग 97 प्रतिशत जल समाया है। महासागरों की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि पृथ्वी के सभी महासागरों को एक विशाल महासागर मान लिया जाए तो उसकी तुलना में पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक छोटे द्वीप से प्रतीत होंगे। मुख्यतया पृथ्वी पर पाँच महासागर हैं जिनके नाम हैं- प्रशांत महासागर, हिंद महासागर, अटलांटिक महासागर, उत्तरी ध्रुव महासागर और दक्षिणी ध्रुव महासागर।

महासागरों के नीचे भी धरती है, अत: जिस प्रकार धरती पर पर्वत एवं खाईयां हैं, वैसी ही महासागरों में विभिन्न स्थलाकृतियां हैं। समुद्र का तल अनेक प्रकार का होता है। उसमें पहाड़ियां, द्वीप, समतल मैदान, सागर की उठान, निमग्न द्वीप या गयोट शामिल होते हैं। महासागरों के तल को मुख्य रूप से तीन भागों महाद्वीपीय शेल्फ, महाद्वीपीय ढाल और वितल में बाँटा जाता है। महाद्वीपीय शेल्फ तट से लगा क्षेत्र होता है जिस पर भूमि का प्रभाव पड़ता है। नदियों के जल के साथ आने वाले तत्वों से यह क्षेत्र पौष्टिक तत्वों से समृद्ध रहता है। सूर्य के प्रकाश और पौष्टिक तत्वों की पर्याप्तता के कारण इस क्षेत्र में जीवों और वनस्पतियों की प्रचुरता होती है। परंतु मनुष्य के क्रियाकलापों का सबसे अधिक प्रभाव भी इसी क्षेत्र पर पड़ता है। आज महासागरों के तटीय क्षेत्र समुद्र के सबसे प्रदूषित क्षेत्र हैं।

अपने आरंभिक काल से आज तक महासागर जीवन के विविध रूपों को संजोए हुए हैं। पृथ्वी के विशाल क्षेत्र में फैले अथाह जल का भंडार होने के साथ महासागर अपने अंदर व आस-पास अनेक छोटे-छोटे नाजुक पारितंत्रों को पनाह देते हैं जिससे उन स्थानों पर विभिन्न प्रकार के जीव व वनस्पतियां पनपती हैं। समुद्र में प्रवाल भित्ति क्षेत्र ऐसे ही एक पारितंत्र का उदाहरण है जो असीम जैवविविधता का प्रतीक है। इसी प्रकार तटीय क्षेत्रों में स्थित मैंग्रोव जैसी वनस्पतियों से संपन्न वन समुद्र के अनेक जीवों के लिये नर्सरी का काम करते हुए विभिन्न जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं।

समुद्र और मौसम


धरती का मौसम निर्धारित करने वाले कारकों में महासागर प्रमुख हैं। समुद्री जल की लवणता और विशिष्ट ऊष्माधारिता का गुण पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करता है। यह तो हम जानते ही हैं कि पृथ्वी की समस्त ऊष्मा में जल की ऊष्मा का विशेष महत्त्व है। जितनी ऊष्मा एक ग्राम जल के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि करेगी, उससे एक ग्राम लोहे का तापमान दस डिग्री बढ़ाया जा सकता है। अधिक विशिष्ट ऊष्मा के कारण समुद्री जल दिन में सूर्य की ऊर्जा का बहुत बड़ा भाग अपने में समा लेता है। इस प्रकार अधिक विशिष्ट ऊष्मा के कारण समुद्र ऊष्मा का भण्डारक बन जाता है जिसके कारण विश्व भर में मौसम संतुलित बना रहता है या यू कहें कि जीवन के लिये औसत तापमान बना रहता है। मौसम के संतुलन में समुद्री जल की लवणता जीवन के लिये एक वरदान है।

पृथ्वी पर जलवायु के बदलने की घटना और समुद्री जल का खारापन आपस में अन्त: संबंधित हैं। यह तो हम जानते ही हैं कि ठंडा जल, गर्म जल की तुलना में अधिक घनत्व वाला होता है। समुद्र में किसी स्थान पर सूर्य के ताप के कारण जल के वाष्पित होने से उस क्षेत्र के जल के तापमान में परिवर्तन होने के साथ वहाँ के समुद्री जल की लवणता और आस-पास के क्षेत्र की लवणता में अंतर उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण गर्म जल की धाराएं केवल इस कारण उत्पन्न होती हैं कि समुद्र का जल खारा है। क्योंकि यदि सारे समुद्रों का जल मीठा होता तो लवणता का क्रम कभी न बनता और जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने वाली धाराएं सक्रिय न होतीं। परिणामस्वरूप ठंडे प्रदेश बहुत ठंडे रहते और गर्म प्रदेश बहुत गर्म। तब पृथ्वी पर जीवन के इतने रंग न बिखरे होते क्योंकि पृथ्वी की असीम जैवविविधता का एक प्रमुख कारण यह है कि यहाँ अनेक प्रकार की जलवायु मौजूद है और जलवायु के निर्धारण में महासागरों का महत्त्वपूर्ण योगदान नकारा नहीं जा सकता है।

लहरों का संसार


संसार के महासागरों में लगभग 33 करोड़ घन मील पानी समाहित है। हम जानते ही हैं कि पानी की बूँद-बूँद से जीवन पोषित होता है। महासागरों का नाम आते ही हमारे दिमाग में पानी की बड़ी-बड़ी लहरों का दृश्य आता है। समुद्र की ऊपरी पर्त सूर्य की गर्मी से गर्म होती रहती है और हवाओं द्वारा उसका मंथन होता रहता है जिसके परिणामस्वरूप किनारों पर लहरों का जन्म होता है।

वास्तव में पानी की लहरें महासागरों की गतिशीलता को अभिव्यक्त करती हैं। महासागरों में लहरें उनकी सतह पर चलने वाली हवाओं के कारण बनती हैं। लेकिन लहरों के माध्यम से जल एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जाता जैसा कि धाराओं के माध्यम से होता है। लहर तो जल की ऊपर नीचे होने वाली गति मात्र है। हवा की गति सामान्य होने पर लहरों की ऊँचाई 2 से 5 मीटर तक होती है लेकिन वायु का वेग अधिक होने पर 10 से 12 मीटर तक ऊँची लहरें उठती हैं। लहरें वायुमंडल और महासागर के आपसी समन्वय का परिणाम होती हैं। महासागरों में जीवन की विविधता में महासागरीय धाराओं का योगदान अहम है। जल के ऊपर या नीचे उठने के कारण विभिन्न पोषक तत्व एक स्थान से दूसरे स्थान तक वितरित होते रहते हैं जिसके परिणामस्वरूप समुद्र में जीवन चलता रहता है।

.समुद्र की ऊपरी परत जीवन के लिये सबसे उत्पादक क्षेत्र है। इसी क्षेत्र में सूर्य की रोशनी के सहयोग से पानी के खनिजों से पादप प्लवकों द्वारा कार्बनिक पदार्थों का निर्माण होता है जो खाद्य श्रृंखला की पहली कड़ी होते हैं। मोटे तौर पर महासागरों का जल दो पर्तों में बाँटा जा सकता है। महासागर की ऊपरी पर्त का आयतन समस्त महासागरीय जल का लगभग दो प्रतिशत होता है। सूर्य के ताप और हवाओं के प्रभाव वाली यह पर्त विभिन्न महासागरीय गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका रखती है। ऊपरी पर्त से पानी भाप बन कर पूरी पृथ्वी पर मीठे पानी के रूप में बरसता है। ये पानी थल पर जीवन का पोषण करते हुए नदियों-नालों के रूप में पुन: महासागरों में आ मिलता है और अपने साथ लाता है कई प्रकार के खनिज व लवण। महासागरों की लवणता लाखों वर्षों की इसी प्रक्रिया का ही परिणाम है। वैसे समुद्री ज्वालामुखी जैसी गतिविधियाँ भी समुद्री लवणता में अपना योगदान देती हैं।

अत: समुद्र में आपस में अंत: संबंधित कई प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप नमक व अन्य खनिजों का संतुलन बना रहता है और जिससे समुद्र में जीवन निरंतर चलता रहता है। इस पर्त की तुलना में निचली पर्त जो अधिकतर महासागरीय जल को रखती है, उसमें प्राय: तापमान नियत बना रहता है। निचली पर्त का तापमान -1 (शून्य से एक डिग्री नीचे) से लेकर 5 डिग्री सेल्सियस के आस-पास होता है। एक अनुमान के अनुसार निचली पर्त के पानी के एक परमाणु को ऊपरी पर्त तक पहुँचने के लिये लगभग 1000 साल का इंतजार करना पड़ता है। इस पानी का उद्गम ध्रुवीय प्रदेशों में उपस्थित ऊपरी पर्त का पानी है जो कम तापमान के कारण अधिक घनत्व का होता है। इस पानी की लवणता भी स्थिर होती है। समुद्र के ऊपरी व निचली पर्त के बीचों-बीच एक और क्षेत्र होता है जो ऊपरी और निचले क्षेत्र के पानी के लिये एक अवरोधक का कार्य कर उन्हें आपस में मिलने से रोकता है। इस मध्य क्षेत्र में तापमान गहराई की ओर बहुत तेजी से कम होता जाता है और हम जानते हैं कि ठंडे पानी का घनत्व गर्म पानी की अपेक्षा अधिक होता है। परिणामस्वरूप, बीच का यह क्षेत्र ऊपरी पर्त के गर्म पानी व निचली पर्त के ठंडे पानी को आपस में मिलने से रोकता है।

समुद्र में जीवन


भावी विकास का आधार - महासागरविशिष्ट स्थ्लाकृति व समुद्री जल के विशेष गुणों के कारण समुद्र में पृथ्वी की अपेक्षा अधिक संख्या में जीव-जंतु मिलते हैं, अर्थात समुद्र भी जैवविविधता का अथाह भंडार अधिक है। समुद्र में यद्यपि जीवों का घनत्व पृथ्वी की तुलना में अलग हो सकता है लेकिन समुद्र के तल और सतह यानि सभी स्थानों पर जीव-जंतु पाए जाते हैं। इसके अलावा समुद्र में जीवों की विशेषताएँ पृथ्वी की तुलना में बहुत अधिक हैं। समुद्र में जीवन को तीन विभिन्न बायोम क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है। समुद्र में ऊपरी पर्त यानि सतह से 200 मीटर तक सूर्य के ताप और हवाओं के प्रभाव के कारण जीवन अधिक पाया जा सकता है। यह क्षेत्र कार्बन को सूर्य की रोशनी में जैविक पदार्थों में बदलने के हिसाब से सबसे अधिक उत्पादक क्षेत्र हैं। इस क्षेत्र के जीव सूर्य के प्रकाश का उपयोग कर अपने लिये भोजन स्वयं बना लेते हैं। कई लोग समुद्र के इन क्षेत्रों की तुलना उत्पादन के स्तर पर थल पर उपस्थित वर्षा वनों से करते हैं।

200 मीटर से अधिक गहराई वाले क्षेत्र में जीवन की मात्रा ऊपरी पर्त की तुलना में कम होती है। समुद्री क्षेत्र में जीवन का सबसे दिलचस्प पहलू महासागरों की गहराई में स्थित जीवन से जुड़ा है। वास्तव में यह आश्चर्य का विषय है कि इतनी गहराई में भी जीवन विविध रूपों में मिलता है। इस क्षेत्र के जीवों के पोषण में ऊपरी क्षेत्र में रहने वाले जीवों का योगदान होता है। समुद्र की ऊपरी पर्त में रहने वाले जीवों के मृत अवशेष गहराई में स्थित जीवों के लिये पोषक तत्वों की वर्षा के रूप में गिरते रहते हैं जिनमें गहराई में रहने वाले जीवों का जीवन चक्र चलता रहता है। यहाँ न तो सूर्य का प्रकाश पहुँचता है और यहाँ पादप प्लवक जैसे प्राथमिक उत्पादक जीव भी अनुपस्थित होते हैं। यानि कि यहाँ एक पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का अभाव है परंतु फिर भी यहाँ जीवन पाया जाता है।

समुद्र की अथाह गहराई में विशेष कर जहाँ पर ज्वालामुखी हलचल या गर्म पानी के स्रोत हैं वहाँ जीवन को फलते-फूलते देखना हैरानी की बात है। परन्तु यहाँ खाद्य श्रृंखला की शुरुआत ऐसे जीवाणुओं से होती है जो पानी में घुले रसायनों से ऊर्जा प्राप्त कर प्राथमिक उत्पादक की भूमिका निभाते हैं यहाँ ट्यूब वार्म व श्रिम्प जैसे जीव जंतु पाए जाते हैं। समुद्र की गहराई में जहाँ प्रकाश नहीं पहुँचता है वहाँ जीवन चलाने के लिये कुछ जीवों द्वारा एक वैकल्पिक प्रणाली विकसित कर ली गई है जिसके कारण यह क्षेत्र जीवन के बहुरंगी रंगों से सरोबार होता है।

समुद्र में जीव न केवल आगे और पीछे वरन ऊपर और नीचे भी गति कर सकते हैं। समुद्र में तीन प्रकार के जीव मिलते हैं - एक तो वो जो तैरते रहते हैं और दूसरे वो जो पानी में डोलते रहते हैं। तैरने वाले जीवों को तरणक और जल में डोलने वाले जीवों को प्लवक या प्लैंक्टान एवं समुद्र के तल पर या उसके पास रहने वाले जीवों को नितलीय जीव कहते हैं। तरणक और प्लवक जीवों में विभेद करना आसान नहीं है। उदाहरण के लिये मछलियों के बच्चे प्लवक होते हैं और बड़े होकर तरणक बन जाते हैं। प्राय: तरणक और प्लवक जीव खुले समुद्र में रहते हैं। नितलीय और तरणक जीव अपेक्षाकृत बड़े आकार के होते हैं। समुद्री जीवों में प्लवक श्रेणी के जीवों की बहुलता होती है। हाँ, विकास के क्रम में पहले जीव समुद्र से धरती पर आए और पुन: समुद्र में ही लौट गए। सील, व्हेल, और वालरस जैसे स्तनधारी जीव इसी के उदाहरण हैं, परंतु समुद्र का जीव होने के बाद भी आज जीवन की कुछ प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिये इन जीवों को समुद्र के किनारों पर ही लौटना पड़ता है।

समुद्र और प्राकृतिक संसाधन


समुद्र में उपलब्ध संसाधनों को मुख्य रूप से चार भागों में रखा जाता है। पहले वर्ग में वे खाद्य पदार्थ हैं जो मानवों को खाने या पशुओं के चारे के रूप में समुद्र से उपलब्ध हो सकते हैं। दूसरे वर्ग में नमक सहित कई अन्य रसायन हैं। तीसरे वर्ग में समुद्री जल से प्राप्त होने वाले पदार्थ और पेट्रोलियम व कई अन्य रसायन शामिल हैं। चौथे वर्ग में समुद्र में उठने वाले ज्वार-भाटे व लहरों से प्राप्त ऊर्जा एवं समुद्र में लवणता के अंतर से प्राप्त होने वाली ऊर्जा शामिल हैं।

समुद्र प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों का असीम स्रोत है। समुद्र में उपलब्ध शैवाल भी एक महत्त्वपूर्ण खाद्य स्रोत है। कुछ प्रकार के शैवालों में आयोडिन उपस्थित होता है। कुछ शैवालों का उपयोग उद्योगों में भी किया जा सकता है। समुद्री जल अत्यंत समृद्ध संसाधनों में से एक है। समुद्री जल से औद्योगिक उपयोग के 40 से अधिक तत्व निकाले जा सकते हैं। काँच, साबुन और कागज बनाने के काम में आने वाले गूदे के लिये सोडियम सल्फेट का उपयोग किया जाता है, जिसे बहुत अधिक मात्रा में समुद्र के जल से निकाला जाता है। प्रतिवर्ष भारत में समुद्री जल से नमक निकालने के बाद बचे भाग में से लगभग चार लाख टन मैग्नीशियम सल्फेट, करीब 70 हजार टन पोटेशियम सल्फेट और सात हजार टन ब्रोमीन निकाला जा सकता है। मतलब यह कि समुद्री जल के संबंध में आम के आम और गुठलियों के भी दाम वाली कहावत सटीक बैठती है। समुद्र के तल पर छोटे-छोटे गोले के रूप में मैग्नीज, लोहा, तांबा, कोबाल्ट व निकल जैसे अन्य खनिज पड़े होते हैं। वर्तमान में विश्व के कुछ देश समुद्र की अथाह खनिज संपदा के दोहन के लिये सरल व सुविधाजनक तकनीक के विकास में कार्यरत हैं।

महासागर नमक का विशाल स्रोत हैं। नमक के अलावा, महासागरों में लगभग सौ तत्व और होते हैं। समुद्री जल में मिलने वाले कुछ प्रमुख पदार्थों में मैग्नीशियम, सल्फर, पोटेशियम, ब्रोमाइड व कार्बन हैं और समुद्री जल में सोना भी मिलता है लेकिन बहुत ही नगण्य मात्रा में। समुद्री जल में घुले हुए या उसमें तैरते हुए तत्वों के अतिरिक्त कई गैसें भी पाई जाती हैं। जल में घुली हुई गैसों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण गैस ऑक्सीजन है इस ऑक्सीजन का प्रयोग जल में रहने वाले अरबों पौधे और जीव सांस लेने के लिये करते हैं। ऑक्सीजन के अलावा नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड गैसें भी समुद्री जल में घुली रहती हैं। पानी में घुली कार्बन डाइऑक्साइड गैस समुद्री जीवों के काम आती है। पादप वर्ग प्रकाशसंश्लेषण की प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग कर स्वयं के लिये व अन्य जीवों के लिये भोजन का निर्माण करता है।

खनिज सम्पदा के अलावा समुद्र से असीमित ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। समुद्र से ऊर्जा प्राप्त करने के कई स्रोत हैं। समुद्र नवीकरणीय या गैर परम्परागत ऊर्जा का अच्छा स्रोत साबित हो सकता है। ज्वार-भाटे और लहरों में छिपी ऊर्जा को किसी प्रकार से यदि उपयोग में लाया जाए तो विश्व की समस्त ऊर्जा आवश्यकताएं पूरी हो सकती हैं। फ्रांस व रूस जैसे कुछ देशों में ज्वार-भाटे से बिजली पैदा की जा रही है। समुद्र में चलने वाली हवा और उसके जल की धाराओं की ऊर्जा का प्रयोग भी टर्बाइन चलाने और बिजली पैदा करने के लिये किया जा सकता है। कुछ वर्ष पूर्व समुद्री जल में लवणता की विभिन्नता के आधार पर बिजली प्राप्ति की तकनीक विकसित की जा रही है। इसके अलावा जल की विभिन्न तहों में तापमान की भिन्नता के कारण समाहित ऊर्जा, भविष्य में ऊर्जा का अच्छा स्रोत साबित हो सकती है।

भारत एक महत्त्वपूर्ण समुद्र तटीय राष्ट्र है यद्यपि हमारे देश का क्षेत्रफल पृथ्वी के क्षेत्रफल की तुलना में केवल ढाई प्रतिशत है लेकिन संसार की कुल आबादी का लगभग पंद्रह प्रतिशत भारत में रहता है। इस कारण भारत के लिये समुद्र का अधिक महत्त्व होना चाहिए। भारत विशाल समुद्री तटरेखा रखता है जिसका आर्थिक व जैवविविधता की धरोहर के रूप में उचित उपयोग किया जा सकता है। मैंग्रोव जैसे लवणसह वनस्पति क्षेत्र और प्रवाल भित्ति जैसे समृद्ध जैवविविधता वाले क्षेत्र भारतीय समुद्रीय क्षेत्र की विशेषता हैं। भारतीय समुद्री क्षेत्र खनिज संपदा और जैवविविधता से समृद्ध होने के अलावा भारत की ऊर्जा आवश्यकता को भी पूरा कर सकता है।

महासागरों का बढ़ता खतरा


वर्तमान में मानवीय गतिविधियों का प्रभाव समुद्रों पर दिखाई देने लगा है। महासागरों के तटीय क्षेत्रों में दिनोंदिन प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। जहाँ तटीय क्षेत्र विशेष कर नदियों के मुहानों पर सूर्य के प्रकाश की पर्याप्तता के कारण अधिक जैवविविधता वाले क्षेत्रों के रूप में पहचाने जाते थे, वहीं अब इन क्षेत्रों के समुद्री जल में भारी मात्रा में प्रदूषणकारी तत्वों के मिलने से वहाँ जीवन संकट में है। तेलवाहक जहाजों से तेल के रिसाव के कारण एवं समुद्री जल के मटमैला होने पर उसमें सूर्य का प्रकाश गहराई तक नहीं पहुँच पाता, जिससे वहाँ जीवन को पनपने में परेशानी होती है और उन स्थानों पर जैवविविधता भी प्रभावित होती है। यदि किसी कारणवश पृथ्वी का तापमान बढ़ता है तो महासागरों की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता में कमी आएगी जिससे वायुमंडल में गैसों की आनुपातिक मात्रा में परिवर्तन होगा और तब जीवन के लिये आवश्यक परिस्थितियों में असंतुलन होने से पृथ्वी पर जीवन संकट में पड़ सकता है। समुद्रों से तेल व खनिज के अनियंत्रित व अव्यवस्थित खनन एवं अन्य औद्योगिक कार्यों से समुद्री पारितंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पर्यावरण संरक्षण के लिये प्रतिबद्ध संस्था अंतर-सरकारी पैनल (इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज, आईपीसीसी) की रिपोर्ट के अनुसार मानवीय गतिविधियों से ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री जल स्तर में वृद्धि हो रही है और जिसके परिणामस्वरूप विश्व भर के मौसम में बदलाव हो सकते हैं।

भावी विकास का आधार - महासागरपृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति महासागरों में ही हुई और आज भी महासागर जीवन के लिये आवश्यक परिस्थितियों को बनाए रखने में सहायक हैं। महासागर पृथ्वी के एक तिहाई से अधिक क्षेत्रों में फैले हैं। इसलिये महासागरीय पारितंत्र में थोड़ा सा परितर्वन पृथ्वी के समूचे तंत्र को अव्यवस्थित करने की सामर्थ्य रखता है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विश्व की लगभग 21 प्रतिशत आबादी महासागरों से लगे 30 किलोमीटर तटीय क्षेत्र में निवास करती है इसलिये अन्य जीवों के साथ-साथ मानव समाज के लिये भी प्रदूषण मुक्त महासागर कल्याणकारी साबित होंगे। इसके अलावा पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने वाले पारितंत्रों में समुद्र की उपयोगिता को देखते हुए यह आवश्यक है कि हम समुद्री पारितंत्र के संतुलन को बनाए रखें ताकि पृथ्वी पर जीवन की ज्योति जलती रहे।

पृथ्वी ग्रह को अन्य ग्रहों से जो पदार्थ अलग करता है वह है समुद्रों का पानी, जिसने उसकी 70 प्रतिशत सतह को ढक रखा है। यदि पृथ्वी की सतह हर जगह समतल होती तो पूरी पृथ्वी पर समुद्र की गहराई 2500 मीटर होती। समुद्र पृथ्वी पर जीवन के प्रतीक हैं। समुद्र में ही जीवन की शुरुआत हुई और आज भी वहाँ जैवविविधता की अधिकता है। समुद्र सूक्ष्मजीव से लेकर पृथ्वी के सबसे विशालकाय जीव ब्लू व्हेल का निवास स्थान है। जीवन की विविधता को संजोए हुए समुद्र पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण तंत्र है। पृथ्वी पर ऊर्जा का संचरण एक स्थान से दूसरे स्थान तक करने में समुद्रों की अहम भूमिका है। समुद्र को पृथ्वी का ऊष्मागृह और कार्बन डाइआॅक्साइड गैस का भंडारगृह भी कहा जाता है।

समुद्र जल का प्रत्येक कण हमें एक कहानी सुनाने की चेष्टा करता है। इन जल कणों का इतिहास अनादि और अंततः हो सकता है। ये बूँदे कभी उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव में जमी बर्फ के रूप में रही हों या उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में भाप के रूप में उपस्थित रही हों। जल की इस हलचल का कारण सूर्य है। भूमि की तरह महासागरों की ऊष्मा का आधार भी सूर्य ही है। महासागरों में सबसे अधिक ऊष्मा ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होती है और सबसे कम ध्रुवीय क्षेत्रों में। महासागरों में तापमान का प्रभाव समुद्री जल की लवणता, उसमें घुली हुई गैसों और उसके अन्य रासायनिक गुणों पर दृष्टिगोचर होता है। तापमान के अधिक होने पर समुद्री जल में घुली गैसों की मात्रा कम हो जाती है। वर्तमान में वैश्विक गर्माहट यानि ग्लोबल वार्मिंग के चलते ध्रुवीय बर्फ के पिघलने के कारण समुद्रों के जलस्तर में वृद्धि दर्ज की गई है।

समुद्र की सतह पर जो जलवाष्प बन कर उड़ जाता है उसके दो लाभ होते हैं, एक तो यह कि जब वह वाष्प वायुमंडल में फैलती है तो ऊष्मा समुद्र से दूर हट जाती है और दूसरा यह कि वायुमंडल में यह भाप ऊष्मा को इकट्ठा करती है। यह तो हम जानते ही हैं कि वाष्प के रूप में जल सामान्य जल की तुलना में अधिक गतिशील होता है। इस प्रकार जो ऊष्मा एक स्थान पर जल में समा जाती है वह वायु के वेग से दूर-दूर के स्थानों तक पहुँच जाती है और इस प्रकार धरती पर ताप का वितरण होता रहता है।

अगर किसी कारण से समुद्रों में जीवन रूक जाए तो हमारे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा तिगुनी हो जाएगी। समुद्र के असंख्य जीवन अपने शरीर की संरचना में कार्बन का उपयोग करते हैं जिसके परिणामस्वरूप समुद्र के ऊपरी जल व वायुमंडल की अपेक्षा लगभग 45 गुना कार्बन समाया हुआ है। पृथ्वी का 70 प्रतिशत हिस्सा समुद्र ही है लेकिन अभी इसके कई रहस्यों से पर्दा उठना बाकी है।

असल में महासागर हमारे भावी विकास के आधार हैं। लेकिन हमें इस बात को याद रखना होगा कि भूमि पर बढ़ते दबाव को देखते हुए महासागरों के संसाधनों का समुचित एवं मितव्ययता के साथ उपयोग करें ताकि महासागर दोहन का शिकार न बनने पाएँ। असल में इस पृथ्वी पर महासागर जीवन को चलायमान बनाए रखने वाले कारकों में सबसे प्रमुख है इसलिये हमें इनके संरक्षण के साथ ही इनके मूल स्वरूप को बनाए रखने में अपना योगदान देना होगा।

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