पवित्र वन : प्रकृति संरक्षण की प्राचीन परंपरा

Submitted by Hindi on Sat, 12/03/2016 - 11:28
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Source
विज्ञान गंगा, 2013

उपरोक्त कारणों से विघटित पवित्र वनों में अनेक स्थानों पर विज्ञातीय (exotic) पौधों की प्रजातियाँ तेजी से फैलती हैं जिनके फलस्वरूप इन वनों में उपस्थित देशज प्रजातियाँ धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। अंतत: इन वनों की जैवविविधता का ह्रास हो रहा है जिसके लिये ये जाने जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि पीढ़ियों से संरक्षित इन प्राकृतिक धरोहरों की सुरक्षा की जाय। इस दिशा में वैज्ञानिकों का योगदान महत्त्वपूर्ण होगा यदि वे अपने शोधों द्वारा इस प्राचीन परंपरा को वैज्ञानिक आधार प्रदान करें और पवित्र वनों के संरक्षण में सहायक बनें।

प्रकृति संरक्षण प्राचीन काल से आदिवासियों की संस्कृति का एक अटूट अंग रहा है। इसके मूल में उनकी प्रकृति पर निर्भरता एवं उसके प्रति उनका सम्मान है। प्रकृति प्रेम के द्वारा वे अपने को पूर्वजों और ईश्वर से जुड़ाव का अनुभव करते हैं। इस प्रकार की परंपरा कबीलों में रहने वाले मूल निवासियों में विश्व के विभिन्न देशों में आज भी पायी जाती है। इनमें पौधों जीव-जन्तुओं, यहाँ तक कि प्राकृतिक स्थान जैसे झील, पर्वत, नदी इत्यादि को पवित्र मानकर संरक्षित किया गया है। इसे आज भी शिकार एवं वनजन्य वस्तुओं पर निर्भर (Hunter gatherer) समुदायों के धार्मिक अनुष्ठानों में देखा जा सकता है। जंगली पशु-पक्षी, शिकार के औजार और शिकारी की पूजा इनके धार्मिक अनुष्ठानों में देखने को मिलती है।

भारतवर्ष के विभिन्न भागों में आदिवासियों की एक बड़ी संख्या निवास करती है। ये समुदाय अपने आस-पास के वनों को पवित्र मानते हुए उनका संरक्षण करते हैं। भारत में यह परंपरा अति प्राचीन है जिसका उल्लेख वैदिक ऋचाओं में भी मिलता है अनेक पौधों की प्रजातियाँ जैसे पीपल, तुलसी, रुद्राक्ष, कदम्ब, अशोक आदि पवित्र माने जाते हैं। अनेक पौधों का प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में होता है। वनों, जलाशयों को स्थानीय देवी देवताओं को समर्पित करने की परंपरा रही है।

आदिवासियों में प्रकृति पूजा की एक महत्त्वपूर्ण परंपरा वनों के संरक्षण के रूप में दिखाई देती है। इसमें गाँव के पास स्थित वन के एक भाग को इस विश्वास के साथ संरक्षित किया जाता है कि इनमें पूर्वजों और स्थानीय देवी-देवताओं का निवास होता है। इस कारण इन्हें पवित्र माना जाता है और इनमें किसी प्रकार का विध्वंसक कार्य वर्जित होता है। केवल समय-समय पर परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है। इस प्रकार के वनों को पवित्र वन (Sacred grove) कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने इन वनों को परिभाषित करने का प्रयास किया है। ह्यूगीज और चंद्रन (1998) के अनुसार लैंडस्केप (Landscape) का वह भाग जिसमें उस स्थान की भूसंरचना एवं वनस्पति का एक हिस्सा जिसे वहाँ के आदिवासियों का संरक्षण प्राप्त है, पवित्र वन कहा जाता है। इस स्थान को स्थानीय लोग अपने पूर्वजों एवं अदृश्य ईश्वरीय शक्ति से जुड़ाव का माध्यम मानते हैं। अत: इसकी पवित्रता अक्षुण्ण रखने के लिये इसमें सामान्यत: मनुष्यों का प्रवेश वर्जित होता है। इन वैज्ञानिकों के मतानुसार ये वन शायद आदि मानव के ‘‘प्रथम देवालय’’ थे। इस प्रकार के वनों के अवशेष ग्रीस में पाये जाते हैं। इन अवशेषों के अध्ययन से आभास होता है कि वन के एक भाग को पत्थरों से घेरकर सुरक्षित रखा जाता था। इन्हें ग्रीक भाषा में ‘‘टेमीनॉस’’ (Temenos) अथवा Cut-off or demarcated place कहा जाता था।

पवित्र वनों के इतिहास का अध्ययन करने वाले दो भारतीय वैज्ञानिक, प्रोफेसर माधव गाड़गिल और वर्तक (1975), इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मानव मन में अक्षुण्ण (Virgin) वन की परिकल्पना लगभग 3000-5000 वर्ष ईसा पूर्व की है जब मनुष्य शिकार और वनों से प्राप्त वस्तुओं पर निर्भर था। इस समय मनुष्य ने खेती करना नहीं सीखा था। ऐसा संभव है जब मनुष्य ने जंगलों को जलाकर खाली भूमि में खेती प्रारंभ किया हो उस समय वनों के छोटे-छोटे हिस्सों को अपने पूर्वजों और स्थानीय देवी-देवताओं को समर्पित किया हो। सामान्यत: ये वन जलसह (Watershed) क्षेत्र में स्थित होते थे जहाँ से उन्हें वर्षभर जल उपलब्ध था। अत: शायद यह मान्यता रही होगी कि इन वनों में निवास करने वाले देवी-देवताओं की कृपा से उन्हें जल उपलब्ध होता है। कुछ मानव पुरावेत्ता (Anthropologist) जैसे कलाम (1995) का विचार है कि ये वन एक प्राचीन परंपरा का फल है जिसके फलस्वरूप एक ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था का जन्म हुआ जिसमें कबीलाई लोग अपने धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्य इन वनों के पास करने लगे क्योंकि उनकी मान्यता थी कि यहाँ पूर्वजों की आत्मा और स्थानीय देवी-देवता निवास करते हैं। कारण जो भी रहा हो आज भी विश्व के विभिन्न देशों में पवित्र वनों की उपस्थिति मनुष्य के प्रकृति प्रेम और उसके संरक्षण की भावना की ओर इंगित करती है।

विश्व में पवित्र वनों का वितरण


धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक विभिन्नताओं के बावजूद विश्व के अनेक देशों में पवित्र वन, पवित्र जलाशय, पवित्र स्थान जैसी मान्यतायें पायी जाती हैं। ह्यूगीज और चंद्रन (1998) और मल्होत्रा आदि (2007) के अनुसार अफ्रीका, एशिया, यूरोप, एस्ट्रो-पैसिफिक क्षेत्र और अमेरिका महाद्वीप में इनकी उपस्थिति दर्ज की गई है। अफ्रीका में ये सियरा लियोन, घाना, आईवरी कोस्ट, नाईजीरिया, ओल्ड केलावार, ज़िम्बाब्वे, दक्षिणी अफ्रीका, मिस्र और केनिया में पाये जाते हैं। एशिया महाद्वीप में पवित्र वन भारतवर्ष, कोरिया, जापान, थाईलैंड और इंडोनेशिया से वर्णित हैं। ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनसे पता चलता है कि प्राचीन काल में जर्मनी, ब्रिटेन, इटली और फिनलैंड में भी पवित्र वन थे। ऐस्ट्रोपैसिफिक क्षेत्र न्यूजीलैंड और पॉलीनेशिया में भी इनके उपस्थित होने के प्रमाण मिले हैं। अमेरिका के मूल निवासियों में भी यह प्रवृत्ति अनेक स्थानों पर उनके द्वारा संरक्षित वृक्ष समूहों (Grove) के रूप में परिलक्षित होती है। प्रारंभ में यूरोप से आये अप्रवासियों ने वृक्ष समूहों को स्थान-स्थान पर संरक्षित किया जिन्हें बाद में लड़ाई में मारे गये अप्रवासी सैनिकों एवं लोकप्रिय नेताओं के नाम पर समर्पित किया।

भारतवर्ष के पवित्र वन


भारत के लगभग 18 प्रदेशों में पवित्र वन पाये गये हैं जिनकी अनुमानित संख्या तालिका आगे दी गयी है। इनकी अधिक संख्या देश के दक्षिणी-पश्चिमी राज्यों जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और केरल में है। पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मेघालय में भी इनकी संख्या काफी अधिक है। यद्यपि पूरे देश के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं परंतु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इनकी संख्या 1,00,000 से 1,50,000 के बीच हो सकती है। अभी तक 13,720 पवित्र वन वर्णित हैं।

पवित्र वनों के क्षेत्रफल में काफी भिन्नता पाई जाती है। इनका क्षेत्र कुछ वृक्षों के समूह से लेकर सैकड़ों हेक्टेयर का हो सकता है। सामान्यत: इनका क्षेत्र 0.001-40 हेक्टेयर के बीच पाया गया। ये अधिकांशत: आदिवासी बहुल क्षेत्रों में हैं। देश के विभिन्न राज्यों में पाये जाने वाले इन वनों को अनेक स्थानीय नामों से जाना जाता है। विभिन्न राज्यों में पाये जाने वाले पवित्र वनों का स्थानीय नाम आगे दिया गया है।

 

भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में उपस्थित पवित्र वनों की संख्या एवं उनका अनुमानित क्षेत्रफल

(स्रोत : मल्होत्रा 1998, मल्होत्रा आदि 2001)

क्र. सं.

प्रदेश

संख्या

अनुमानित क्षेत्रफल (हे.)

1.

आंध्र प्रदेश

1550

-

2.

अरुणाचल प्रदेश

58

-

3.

असम

40

-

4.

कर्नाटक (कुर्ग)

1214

2407

5.

केरल

2000

500

6.

गुजरात

29

200

7.

उत्‍तर प्रदेश / उत्‍तराखण्‍ड

6

5500

8.

हरियाणा

248

-

9.

हिमाचल प्रदेश

11

-

10.

मध्‍य प्रदेश

275

-

11.

महाराष्ट्र

2333

3570

12.

मणिपुर

531

756

13.

मेघालय

91

26326

14.

उड़ीसा

322

50

15.

राजस्‍थान

10

158

16.

सिक्किम

56

-

17.

तमिलनाडु

462

-

18.

पश्चिम बंगाल

867

-

 

 

विभिन्‍न राज्‍यों में पवित्र वन का स्‍थानीय नाम

राज्‍य

स्‍थानीय नाम

मध्‍य प्रदेश

सरना, देव

महाराष्ट्र

देवराय, देवराथी

बिहार

सरनास

राजस्‍थान

ओरान्‍स

कर्नाटक

देवर्वन, देवराकॉडू, रूलीदेवराकॉडू, नागवन

तमिलनाडु

कोविलकाडू

केरल

कॉबू

हिमाचल प्रदेश

देव वन

मेघालय

की लॉ लिंग्‍डोह, की लॉ किंटांग

झारखण्‍ड

सरना, जोहेरथान

मणिपुर

लाई उमांग

गोवा

देवराय, देवगल, देवरन, देव वन

छत्‍तीसगढ़

मातागुड़ी, देवगुड़ी, गांवदेवी

 

पवित्र वनों से जुड़ी मान्यताएं


इनसे जुड़ी मान्यताओं में काफी विभिन्नता मिलती है परंतु अधिकांश स्थानों पर ये वन स्थानीय देवी-देवताओं को समर्पित होते हैं, जैसे केरल में सर्प देवताओं, देवी भगवती, वन देवी और बंगाल में देवी दुर्गा को समर्पित होते हैं। मणिपुर में मेतेई समुदाय इन वनों में अपने पूर्वजों की आत्माओं का निवास मानते हैं जो इनके पूरे समुदाय को प्रभावित करने की शक्ति रखते हैं। मेघालय में खासी जनजाति इनमें ‘‘की रिंक्यू की बासा’’ (Ki Rying kew ki Basa) रक्षक (Protector) का निवास मानते हैं जो पूरे गाँव के लोगों और जानवरों की विपत्तियों से रक्षा करता है। गोवा में मैंग्रोव स्वैम्प के वनों में मगरमच्छ की स्थानीय लोग पूजा करते हैं क्योंकि ये परभक्षी मछलियों को खा जाते हैं जिनसे मछलियों का उत्पादन काफी बढ़ जाता है।

इन वनों को धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक दृष्टि से तीन प्रमुख समूहों में रखा जा सकता है।

(1) पारंपरिक पवित्र वन ये स्थानीय देवी-देवताओं और पूर्वजों को समर्पित होते हैं जिनकी किसी मूर्त वस्तु जैसे पत्थर की शिला के रूप में पूजा की जाती है। (2) मन्दिर वन - इन वनों में विभिन्न देवी-देवताओं का मंदिर होता है। ये सामान्यत: संरक्षित होते हैं। (3) कहीं-कहीं श्मशान स्थल अथवा कब्रगाह चारों ओर से संरक्षित वन से घिरा होता है। इनकी संख्या अत्यंत सीमित है।

पवित्र वनों का धार्मिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व


देवी-देवताओं की समर्पित वनों का आदिवासियों के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन से गहरा संबंध होता है। देवताओं को प्रसन्न करने के लिये वार्षिक अनुष्ठान और समारोह आयोजित किये जाते हैं जिनमें पशुओं की बलि दी जाती है। किन्हीं-किन्हीं स्थानों पर फल-फूल भी चढ़ाये जाते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इन वनों में उपस्थित देवी-देवताओं के आर्शीवाद पर समुदाय की सुख समृद्धि निर्भर होती है और इन वनों को नुकसान पहुँचाने वाले को देवी-देवताओं द्वारा विभिन्न प्रकार से दण्डित किया जाता है।

धार्मिक अनुष्ठानों के अतिरिक्त इन वनों का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व है। अनेक त्यौहार इन वनों के पास सामूहिक रूप से मनाये जाते हैं। शादि आदि अन्य सामाजिक कार्य इन्हीं के पास आयोजित किये जाते हैं। गाँव के लोग बीमारी से बचाव एवं स्वस्थ रहने के लिये प्रार्थना करते हैं। व्यापार अथवा नौकरी के लिये गाँव से बाहर जाने वाले व्यक्ति यहाँ आकर अपनी सफलता और सुरक्षा के लिये प्रार्थना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि अच्छी वर्षा, अच्छी खेती की उपज एवं लाभकारी आर्थिक गतिविधियाँ वनों में उपस्थित पूर्वजों के आर्शीवाद से ही संभव होती हैं।

पवित्र वनों की जैव विविधता एवं पारिस्थितिक महत्त्व


सामान्यत: छोटे-छोटे क्षेत्रफल में फैले इन वनों में पौधों और जीव जंतुओं की प्रजातियाँ बहुतायत संख्या में पायी जाती हैं। अनेक प्रजातियाँ जिनका अस्तित्व संकट में है अथवा जो विलुप्त होने के कगार पर हैं उनके लिये ये वन शरणस्थली का कार्य करते हैं। इन वनों में पौधों की सामुदायिक संरचना जटिल होती है। इन वनों में पौधों, जीव-जन्तुओं और पर्यावरण के पारस्परिक क्रियाओं से असंख्य सूक्ष्म आवासों (Micro habitat) का निर्माण होता है जिनमें विविध प्रकार के जीवधारी निवास करते हैं। मेघालय की जयन्तिया पहाड़ियों में स्थित पाँच छोटे-छोटे पवित्र वनों में लगभग 550 प्रकार के पुष्पी और अपुष्पी पौधों की प्रजातियाँ पाई गई हैं। इनमें शैवाल, कवक और ब्रायोफाइटा समूह के पौधे शामिल नहीं हैं। इनमें अनेक स्थानिक, दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियाँ भी हैं।

इसके अतिरिक्त इनमें खाने योग्य और औषधीय महत्त्व की प्रजातियाँ भी पाई गई हैं जिनका प्रयोग यहाँ के निवासी विभिन्न रोगों के उपचार के लिये पीढ़ियों से करते आ रहे हैं। जैव विविधता के भंडार के अतिरिक्त ये वन अनेक बहुमूल्य सेवायें प्रदान करते हैं जिनसे आस-पास के निवासी लाभान्वित होते हैं। ये स्थानीय जलवायु के साथ-साथ जलचक्र को प्रभावित करते हैं। वर्षाजल के बहाव को कम करके उसका मिट्टी में अवशोषण बढ़ाते हैं जिसके कारण स्थानीय जल स्रोतों से वर्ष भर पानी उपलब्ध होता है। ये मिट्टी के क्षरण को कम करते हैं तथा इनके भीतर स्थित झरनों आदि से निकला जल आस-पास के खेतों की उर्वराशक्ति बढ़ाता है। इन वनों से स्थान का प्राकृतिक दृश्य अत्यंत मनोरम और दर्शनीय होता है अत: सौंदर्यपरक दृष्टि से मूल्यवान होते हैं। ऐसे स्थान शैक्षणिक कार्यों एवं इको-पर्यटन के लिये भी अत्यंत उपयुक्त हैं।

भारतवर्ष में पवित्र वनों कि स्थिति


यह अत्यंत दुख का विषय है कि प्रकृति संरक्षण की प्राचीन विश्व परंपरा धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है जिसके फलस्वरूप जैव-विविधता बहुल ये वन नष्ट हो रहे हैं। यद्यपि अलग-अलग क्षेत्रों अथवा स्थानों में अलग-अलग कारक इन वनों के विघटन के लिये जिम्मेदार हैं, परंतु सभी का किसी न किसी रूप में मनुष्य से संबंध है। कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखत है :

1. आधुनिक शिक्षा ने सदियों से चली आ रही पवित्र वनों से जुड़ी मान्यताओं में विश्वास को कम किया है। इनसे जुड़ी मान्यताओं को अंधविश्वास के रूप में देखा जाने लगा है।

2. प्रारंभिक प्रकृति पूजा का स्वरूप धीरे-धीरे बदल गया। उसकी जगह मंदिरों ने ले लिया। देश के कई भागों में जैसे-जैसे ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार होता गया उन स्थानों पर इन वनों के विघटन की प्रक्रिया तेज हो गई।

3. पिछले लगभग दो सौ वर्षों में व्यापारिक वानिकी का काफी विकास हुआ है जिसके फलस्वरूप आदिवासियों का वनों पर से अधिकार समाप्त होने से अनेक स्थानों पर ये वन नष्ट हो गये। उनका स्थान विभिन्न प्रजातियों के बागानों (Plantation) ने ले लिया।

4. तेजी से विकसित होता हुआ शहरीकरण एवं उससे जुड़ी विकास की गतिविधियाँ भी कुछ हद तक इनके नष्ट होने में सहायक हुई है।

5. कुछ स्थानों पर इन वनों से सूखे पत्ते, सूखी लकड़ियाँ, औषधीय पौधे और धार्मिक कार्यों के लिये कुछ वृक्षों को काटने की अनुमति होती है। कहीं-कहीं जानवरों के चरने की अनुमति होती है जो इन वनों को क्षति पहुँचाते हैं।

6. कुछ राज्यों में भूमि सुधार लागू होने से इनकी संख्या कम हुई है अथवा उनका क्षेत्रफल छोटा हो गया है।

उपरोक्त कारणों से विघटित पवित्र वनों में अनेक स्थानों पर विज्ञातीय (exotic) पौधों की प्रजातियाँ तेजी से फैलती हैं जिनके फलस्वरूप इन वनों में उपस्थित देशज प्रजातियाँ धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। अंतत: इन वनों की जैवविविधता का ह्रास हो रहा है जिसके लिये ये जाने जाते हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि पीढ़ियों से संरक्षित इन प्राकृतिक धरोहरों की सुरक्षा की जाय। इस दिशा में वैज्ञानिकों का योगदान महत्त्वपूर्ण होगा यदि वे अपने शोधों द्वारा इस प्राचीन परंपरा को वैज्ञानिक आधार प्रदान करें और पवित्र वनों के संरक्षण में सहायक बनें।

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