पर्यावरण एवं वनवासी जीवन

Submitted by Hindi on Sun, 12/04/2016 - 15:07
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Source
विज्ञान गंगा, जनवरी-फरवरी, 2014

भारत का अधिकांश भाग जंगलों से आच्छादित रहा है। यहाँ की आदिवासी जन-जातियों का मुख्य रूप से निवास गिरि कंदराओं तथा दुर्गम पहाड़ियों के मध्य होता था। जन-जातियाँ देश के कई राज्यों में छिटपुट मिलती हैं। विशेषतौर पर पहाड़ी स्थानों में इनकी बस्तियाँ रही हैं। उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड तथा बिहार में इनके जत्थे निवास करते रहे हैं। सोनभद्र और चंदौली तथा मिर्जापुर कई जन-जातियाँ निवास करती हैं जिनमें कुछ प्रमुख हैं- गोंड़, पनिका, अगरिया, भूइया, चेरो, मझवार, कोरवा, धांगर, बहगा, धरकार, खरवार घासिया, पठारी एवं कोल आदि ये जातियाँ घनघोर जंगलों के इर्द-गिर्द अनेक अभावों के बीच अपनी पुरुषार्थी प्रवृत्ति एवं साहसी गुणों के आधार पर निवास करती हैं। घास, चकवड़ और महुआ ही इनका भोजन होता रहा है। पत्थर के बने औजार जैसे- फावड़ा, कुदाल, चाकू, तीर, धनुष आदि इनके जीवन-यापन के अच्छे साधन रहे हैं।

प्रकृति की सुषमा और खूँखार जंगली जानवरों के बीच इनका रहन-सहन एक सामान्य सी बात होती रही है। मिट्टी और पत्थर के छोटे-छोटे घर जिन पर फूस व पत्तियों की छाजन तथा घर के अंदर इन्हीं चीजों के बने बर्तन इनकी जीवन सामग्री हुआ करती थी। ये झुंड बनाकर साथ-साथ रहते थे। जंगली जानवरों का शिकार और पेड़-पौधों के फल-फूल, कंद-मूल आदि खाकर, चूओं से निकले हुए जल को पीते थे, न उनके लिये किसी बीमारी का भय था और न उन्हें भौतिक संपन्नता से पूर्ण जीवन की ललक थी। इन्हीं जातियों में सभी प्रकार के कार्यों को संपन्न करने की इनकी एक अनोखी व्यवस्था थी। दिनभर नाचना, गाना, कूदना, फांदना और प्रकृति की गोद में पर्वतों की तलहटी और शिलाओं, गुफाओं में जीवन बिताते हुए प्रकृति की शक्तियों में इनका पूरा विश्वास रहता था। धार्मिक अवसरों पर आमोद-प्रमोद के समय दारू, मुर्गा इनका व्यंजन होता था। इनके मचलने, ठुमकने, रूठने और मनाने की शैली बड़ी प्रभावशाली होती रही है। इनमें अगरिया जाति तरह-तरह के लोहे और पत्थर के अद्भुत औजार बनाती थीं। कोरवा जाति अपने विशेष प्रकार के तीर धनुष से खूँखार जानवरों पर निशाना लगाकर मार डालती थीं और उसे अपना भोजन बनाती थीं।

आदिवासियों का विशेष लगाव पेड़-पौधों तथा नदी नालों और पत्थर के जलस्रोत (चुहाड़ या चुआ) से होता था। जंगलों की लकड़ियाँ इनके जीवन की प्रमुख आधार होती थीं। इन्हीं लकड़ियों से वे वाद्य यंत्र बनाते थे और शिकार किये गये जानवरों की खाल से बाजा, डफली, ढोल, मानर आदि बनाते थे जिसका प्रयोग उत्सवों के अवसर पर या मनोरंजन के लिये करते थे। आपस में इनका ताल-मेल बहुत ही अच्छा होता था। इनके नृत्य-करमा, शैला, डोमकच, अगरही, नटुआ, कोल, दहकी आदि परस्पर स्त्री और पुरुष दोनों के आपसी सामंजस्य से पूर्ण होते थे।

करमा नृत्यइनके धार्मिक उत्सवों में वृक्षों की डालियों का विशेष महत्त्व होता था। करमा नृत्य तो करम के पौधे को प्रतीक मानकर उसके चतुर्दिक हाथ में हाथ मिलाकर पुरुष स्त्रियाँ दोनों झूम-झूम कर नाचते गाते थे। पेड़ों के महत्त्व पर इस गीत को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है- ‘‘पेड़ न रहि हैं त लड़का कइसे जियहंइ, अउर का ऊ खइहँइ।’’

इनका लगाव शहरों एवं संपन्न स्थानों से बहुत कम होता था। ये प्रकृति के वास्तविक पुत्र रहे हैं। इनकी वीरता, पुरुषार्थ, एकता, अनुकरणीय होती थी। ये अध्यात्मिकता से भी ओत-प्रोत होते थे। इन्हें अपने इष्टदेव पर काफी भरोसा होता था। ये बधउत, शिव दुर्गा, काली, जिरही के घोर उपासक होते थे। इनकी जीवनगाथा कुछ अद्भुत प्रकृति की रही है। सच पूछा जाय तो जीवन एक भ्रम और भटकाव है क्योंकि ये वनवासी जातियाँ भटकने वाली थीं। इनमें स्वार्थ कम और परमार्थ ज्यादा दिखाई देता था जो मानव जीवन के मूल्यों पर केंद्रित है। प्रकृति के साथ ही रहना और उसे ही भोगना इनका जीवन था। बदलते परिवेश में अपने को बदलने का एक अलग जज्बा होता रहा है। सामाजिक और सांस्कृतिक पर्वों में भी धीरे-धीरे इनका बदलाव देखा जाने लगा। धर्म पालन, गौ, स्त्री और बाल रक्षा, शरणागत की रक्षा भगौड़े और विपन्न शत्रु की अबध्यता, विनम्रता, साहस, सत्य निष्ठा, न्यायप्रियता वनवासियों का प्रमुख गुण था जो धीरे-धीरे भौतिकता में बदलने लगा।

तत्वत: वनवासियों की जीवनशैली, लोक जीवन, लोकगीत, लोकनृत्य, उत्सव, धार्मिक अनुष्ठान, लोक-कथायें, लोक-गाथाएं सभी प्रकृति के समस्त पर्यावरणी कारकों पर आधारित और उनकी उपस्थिति में त्रिगुण शैली पर आधारित होते रहे हैं। मनोरंजन, फसलों का रोपण, उनकी कटाई आदि अवसरों पर भी मिल-जुलकर जल, पृथ्वी, वायु अग्नि और आकाश को साक्षी मानकर उसे पूर्ण करते रहे हैं। करमा नृत्य जो प्रमुख घसिया जाति का होता है उसमें ‘‘करम’’ वृक्ष के डाली को उत्सव पूर्वक वन से लाते हैं और आंगन में गाड़कर स्त्री-पुरुष सभी एक साथ गोले में हाथ से हाथ मिलाकर पैर में लोहै के कड़े, कमर में गुरिया की पेट, घुटने तक की धोती, पगड़ी, बण्डी पहन कर पुरुष तथा झुल्ला और साड़ी पहनकर स्त्रियाँ बड़े उमंग के साथ गाती हैं और पुरुषों के हाथ में मानर और कसनहटी रहती है। हाथ में मशाल लिये भी एक आदमी खड़ा रहता है और करम देव के लिये निम्नलिखित गीत गाते हैं-

हे करम देवता, तोहार नामें रहली उपासे।
हे करम देवता, हो आज चल अंगनवां में ठाढ़।।


वनवासियों की पहचान उनके पहनावे और आभूषणों से होती है। स्त्रियों में आभूषण स्वरूप गोदना अंग-अंग में विद्यमान रहते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक इनके संस्कार बड़े दृढ़ विचारधारा से युक्त होते रहे हैं। इनकी न्याय व्यवस्था भी बड़ी कठोर और पंचायत द्वारा संपन्न की जाती रही है। टोना-टोटका में भी प्रकृति का सहारा वे लिया करते थे। प्रत्येक संस्कार उनकी अपनी भाषा, शैली, लोक गाथाओं के आधार पर निर्धारित गीतों के माध्यम से पूर्ण होता रहा है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि वनवासीजन वीर, बहादुर, स्वस्थ्य, ईमानदार, कर्तव्यपरायण, चरित्रवान, कार्यकुशल, आज्ञापलक, वचन व धुन के पक्के, घर परिवार व समाज के प्रति जिम्मेदार, दहेज और नशाखोरी आदि कुरीतियों के विरोधी और जीवन के प्रति जागरूक होते रहे हैं। नदी सभ्यता, अरण्यों, गुफाओं की सभ्यता आधुनिक जीवन में अतीव उपयोगी सिद्ध हो सकती है और वर्तमान के लोगों को इन चीजों से प्रेरणा लेनी चाहिए।

यद्यपि वर्तमान वैश्विक जीवन और भौतिकतावादी व्यवस्था ने प्रकृति की समस्त व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर डाला है जिसमें मुख्य कारण विकास की धारा की अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा है जिसका प्रभाव ज्यादातर कमजोर और दबे कुचले लोगों पर विशेष रूप से पड़ा है। पर्यावरणीय प्रदूषण ने भारत के कोने-कोने में सामाजिक, प्राकृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक, चारित्रिक, संस्कारिक सभी पक्षों को विदीर्ण कर जीवन मूल्यों को उद्वेलित कर मानवीय मूल्यों को हीन दशा में पहुँचा दिया है जिसमें यदि कोई विशेषतौर पर प्रभावित हुआ तो वे हैं बेचारे वनवासी। जबकि ये वनवासी, आदिवासी जातियाँ ही भारत की पहचान रहे हैं और मानव जीवन के प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। नदियों को बाँधने, वृक्षों को काटने, वनौषधियों को विनष्ट करने, पहाड़ों के गर्भ में छिपे बहुमूल्य खनिजों को स्वार्थ एवं निजी आर्थिक विकास की भेंट चढ़ाने के कारण पूरी धरा की प्राकृतिक सुषमा विदीर्ण हो गयी जिससे न केवल वनवासी ही पूर्णतया प्रभावित हुए वरन पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, सभ्यता, संस्कृति, लोक-जीवन, लोक-संगीत सभी विनष्ट होते चले जा रहे हैं जिससे लोकतंत्र की अपूर्णीय क्षति हो रही है। समय रहते सभी वस्तुओं की पुनर्स्थापना का कोई सुदृढ़ मार्ग ढूँढ़ कर नये भारत का ऐतिहासिक निर्माण करने की आवश्यकता है जिसमें देश में व्याप्त प्रदूषणों यथा- जल, वायु, ध्वनि, मानसिक प्रदूषणों की दिशा बदलने की परम आवश्यकता है। वनवासी जातियों की देश की संपन्नता और कृषि की सफलता हेतु लोकगीत का एक दृश्य देखें जो उनकी संकल्पना का आधार होता था-

कमजोरन क बल बनल जाई हो।
तब ई धरती सरग बनि जाई हो।।
दुई चारि क लाठी होला एक जनि क बोझा।
बइदा ओइके रोग बतावै भूत बतावै ओझा।
अइसन दिन कबहूं लुकाई हो।
तब ई धरती सरग बनि जाई हो।।
अलग-अलग काती क जब तनी ताना बाना।
एकइ जगहे रखाई जब कूटि-कूटि के दाना।
ओही में सबके हिस्सा बंटाई हो।
तब ई धरती सरग बनि जाई हो।।
भिखमंगा जब कतहूं न दिखाई।
हमहन क दुन्नउ हाथ जगरनाथ सब बनाई।
अउरउ हरियर फसल लहलहाई हो।
तब पूरी धरती सरग बनि जाई हो।।


यह लोक गीत वनवासियों, आदिवासियों, जन-जातियों के समुन्नत भारत के भविष्य की संकल्पना का द्योतक है। किंतु पर्यावरणीय प्रदूषण ने उन्हें उनकी जीवन शैली, उनकी मूल्यपरक जीवन की झांकी आदि सभी को झकझोर कर उन्हें दिशाहीन कर दिया है जो देश के स्वर्णिम ऐतिहासिक संकल्पना पर प्रश्न चिन्ह निर्मित करता है। आज देश के प्रत्येक नर-नारी, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, अभियंता, साहित्यकार, पत्रकार, कथाकार, धार्मिक अनुष्ठानों में लगे साधु-महात्मा सभी को गंभीर चिंतन कर एक नये भारत का निर्माण करने की आवश्यकता है जिससे भारत की अस्मिता सुरक्षित रहे।

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