वृक्ष विछोह : एक सामाजिक समस्या

Submitted by Hindi on Mon, 12/05/2016 - 12:15
Source
विज्ञान गंगा, जनवरी-फरवरी, 2014

आमने-सामने दो बड़े-बड़े बंगले हैं। लेकिन मुझे इन्हें 'घर' कहना अच्छा लगता है। मेरी समझ से घरौंदे से ही घर का स्वरूप आया होगा। 'घर' दो शब्द है 'घ' और 'र'। उसी तरह पति-पत्नी एक पुरुष, एक नारी, दोनों होते हैं एक। दोनों के सहयोग से ही बनता है एक घर। और इसी श्रेणी में आमने-सामने के दोनों 'घर' आते हैं। दोनों परिवारों ने बड़े प्रेम-सहयोग से एक साथ आमने-सामने घर बनवाया था। बीच में मात्र सड़क, आपस में अच्छा मिलना-जुलना था। धीरे-धीरे बच्चे बड़े हो गये। पैसे की दौड़ में सब ऐसे उलझे कि प्यार बरकरार रहते हुये भी समयाभाव ने दूरियाँ बढ़ा दी। परिवार से बच्चे दूर देश-विदेश कमाने चले गये। बुढ़ापे में दोनों घरों में बुढ़े, बुढ़िया रह गये। पैसा आवश्यकता से अधिक, सुख-सुविधा की सामग्री से सुसज्जित, आराम ही आराम है, किंतु आराम की जिंदगी ने दूरी बढ़ा दी है। एसी आन, टीवी आन, लोग अपने-अपने घरों में बंद। अब गाहे-बगाहे मौकों पर ही मुलाकात होती है। वरना कई-कई दिन बातों की कौन कहे एक दूसरे का चेहरा भी देखने को नहीं मिलता। बनावट की नकाब ने दूरियाँ और बढ़ा दी हैं। आवश्यकता पड़ने पर फोन और मोबाइल, कभी-कभी ई-मेल भी सहारा बनकर समाचार ले लेता है और संबंधों की इतिश्री हो जाती है। शायद इसी को प्रगति कहते हैं।

नीम का पेड़नीम का पेड़बुढ़े, बुढ़िया सोच रहे हैं, हमसे तो अच्छे हमारे घर के आमने-सामने लगे छायादार गुलमोहर के वृक्ष हैं। जो खूब बड़े हो गये हैं। दोनों पेड़ों की टहनियाँ हरे पत्तों और फूलों से भर गई हैं। वे प्रतिदिन सड़क की दूरी पार करके, इठलाती हुई, झूम-झूमकर हाथ मिलाती हैं, एक दूसरे का स्पर्श कर गलबहियां डालकर अपना सुख-दुख बाँट लेती हैं। साथ-साथ ठंडी सुगंधित बयार का आनंद भी लेती हैं।

किंतु यह क्या? कुछ दिनों से बंदरों के उत्पाद ने ऐसा त्रसित कर रखा है कि एक दिन सामने वाले बंगले (घर) के मालिक ने अपनी माली को हुक्म सुनाया 'सुनो माली गुलमोहर का पेड़ काटकर छोटा कर दो। दोनों आमने-सामने के पेड़ सट गये हैं बंदर रात दिन इस पेड़ से उस पेड़ पर कूदते रहते हैं। जीना दूभर हो गया है अब पेड़-पौधों का जमाना नहीं रहा। 'मालिक भूल गये कि इन वृक्षों का हमारे लिये क्या महत्त्व है? साहब के हुक्म अनुसार माली ने अनमने मन से पेड़ की टहनियाँ काटना शुरू कर दिया। सामने वाले घर की लॉन में बैठी महिला सुन रही थी 'पेड़ पर माली की कुल्हाड़ी का एक-एक प्रहार'। भावुक मन सोचने लगा, कुछ क्षण पूर्व जो टहनियाँ हवा में झूम रही थीं, सुख-दुख सुना रही थीं, धरा पर गिरते-गिरते अवश्य कह रही होंगी, देखो मैं तो वृक्ष से अलग होकर जा रही हूँ अब न जाने कब मिलना हो? संभवत: मिलना हो भी, तो नई कोपल के रूप में। किंतु मेरे पीछे मेरे छूटे रिश्तों का ध्यान तुम रखना, विशेष रूप से मेरे बुजुर्ग वृक्ष का। आज पेड़ से डाली, टहनी, पत्ती अलग हुए हैं, कल बंदरों के उत्पाद से तंग आकर साहब पूरा पेड़ ही न कटवा दें। फिर तो मुझे अपनी जड़ों से भी हाथ धोना पड़ेगा।

लॉन में बैठी नारी सोच रही है, क्या सारा दोष बंदरों का ही है? मानव यह क्यों भूल जाता है कि जिम्मेदार तो हम स्वयं भी हैं। चारों ओर के पेड़ काट कर कंकरीट का जंगल मानव ही तो बना रहा है। पैसे की दौड़ में मानवीय भावनाएं दफन होती जा रही हैं। धन पिपासा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। तृष्णापूर्ति के लिये धन बल पर अट्टालिकायें चहु दिशा में खड़ी हो रही हैं। नये-नये आशियानें प्रतिदिन तैयार हो रहे हैं। चारों तरफ के बाग-बगीचे, पेड़-पौधे, हरे-भरे जंगल काटे जा रहे हैं। जब पेट भरने के लिये बंदरों को फल-फूल नहीं मिलेंगे तो कहीं एक दिन ऐसा न हो कि पेट की ज्वाला से लाचार, मानव कर्म से ऊबकर ये बंदर भी नरभक्षी बन जायें और मांसाहारी बनकर मानव जाति को ही जड़ से उखाड़ दें।

दोषी कौन? सामने घर की लॉन में बैठी नारी सोचते-सोचते अपने सपनों में खो गई, जब आँख खुली तो देखा माली द्वारा काटा गया एक हरा-भरा पेड़, डाली विहीन ठूंठ खड़ा था, पत्तियों से भरी टहनियाँ धरा पर धराशायी थीं।

उधर दूसरा पेड़ हवा के झोंके से नहीं, वरन वियोग के विरह से झुका नजर आ रहा था। नारी चाहते हुए भी न कुछ कह सकी और न कुछ कर सकी, क्योंकि अब समय बदल गया है। वह जानती है कि सामने वाले पड़ोसी नहीं मानेंगे। अत:, वह दुखी मन, गुमसुम, चुपचाप पड़ोसी को कोसती हुई अपने कमरे में आकर लेट गई 'क्योंकि वह पेड़ उसका अपना न था।'

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