नील गायों से बचायें अपनी फसल

Submitted by Hindi on Sat, 12/10/2016 - 15:00
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Source
विज्ञान गंगा, जनवरी-फरवरी, 2014

नीलगायों की समस्या से निजात के लिये लेखक का सुझाव है कि नर नीलगायों का वंध्याकरण अभियान चलाया जाना चाहिए। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं होगा, क्योंकि नीलगाय हिरन की तरह ही बहुत तेज भागते हैं। इसके लिये उन क्षेत्रों में विभाग के कर्मचारियों की टीमें गठित की जानी चाहिए जहाँ नीलगायों की समस्या बहुत अधिक है। इसके अतिरिक्त उन्हें बेहोश करने वाली गोली मारकर तथा तत्काल उनकी नसबंदी करके छोड़ दिया जाना चाहिए। इस पूरे अभियान पर आया खर्च फसल बर्बादी से होने वाली क्षति की अपेक्षा बहुत कम होगी।

नीलगायों द्वारा फसलों को नष्ट करना वर्तमान समय में खेती-बारी की लाइलाज समस्या है। इससे देश को कितनी क्षति हो रही है, इस पर कोई विधिवत अध्ययन नहीं हुए हैं। लेकिन इतना निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि फसलों को जितना नुकसान कीड़े-मकोड़ों और बीमारियों से हो रहा है उससे कहीं ज्यादा नुकसान नीलगायों से हो रहा है।

नीलगाय घोड़े की आकृति जैसा तथा उसी तरह के डीलडौल वाला जानवर है। इसे हिंदी में नीलगाय, रोज, घड़रोज, बनरोज तथा रोजरा जैसे स्थानीय नामों से पुकारा जाता है। अंग्रेजी में इसे ब्लू बुल (Blue Bull) कहते हैं। इसका जंतु वैज्ञानिक नाम बोसेलैफस ट्रोगोकैमलस (Boselaphus trogocamelus) है। यह भारतीय प्रायद्वीप में हिमालय की तलहटी से लेकर मैसूर तक पाया जाता है। किंतु पूर्वी बंगाल, असम और मालाबार तटों पर नहीं पाया जाता।

नीलगाय में ‘गाय’ शब्द जुड़ा होने से आमतौर पर लोग इसे गोवंश से संबंधित मानते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। नीलगाय की निकटता गोवंश की अपेक्षा मृगवंश (एंटीलोप) से अधिक है। इसमें ‘गाय’ शब्द कहाँ से आ गया, संभवत: इसके अंग्रेजी नाम Blue Bull है। Blue का अर्थ ‘नीला’ तथा Bull का अर्थ ‘सांड़’ होता है। इस तरह लोग इसे नीला सांड़ के बजाय नीलगाय कहने लगे होंगे।

नीलगाय वास्तव में वन्य जीव है और इसका मूल स्थान जंगल ही है। लेकिन जंगलों के लगातार विनाश के कारण यह आबादी वाले क्षेत्रों में फैल गया है। यह अपना आवास नदी-नालों के किनारे झाड़ियों और बीहड़ों में बनाता है। दिन के समय इसके झुण्ड उन्हीं स्थानों पर विश्राम करते हैं और रात में ये आबादी की ओर निकल पड़ते हैं।

नीलगाय भारी डील डौल वाला जानवर है। इसकी लंबाई करीब सात फुट तथा ऊँचाई पाँच फुट होती है। सींग केवल नर नीलगाय में होती है। सींग हिरन की तरह ठोस होती है और इसकी लंबाई 8 से 15 सेंटीमीटर तक होती है। नर जंगली नीलगायों का वजन करीब 1000 किलोग्राम तक तथा ग्रामीण आबादी के आस-पास रहने वालों का करीब 700 किलोग्राम तक होता है। मादाएं नर की अपेक्षा कुछ छोटी होती हैं और इनका वजन भी कम होता है। इनके दोनों अग्र पैर बड़े और पीछे वाले कुछ छोटे होते हैं। इसके कारण इसका शरीर आगे से पीछे की ओर ढलाननुमा होता है। नर नीलगाय के शरीर का अगला हिस्सा नीलापन लिये गहरे धूसर रंग का तथा पिछला हिस्सा भूरे रंग का होता है। मादा का पूरा शरीर भूरे रंग का होता है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश तथा तराई के क्षेत्रों में नीलगायों का आतंक सबसे ज्यादा है। ये 5-10 से लेकर 20-25 के झुंड में निकलते हैं। फसल कोई भी हो उसे खाने में इन्हें परहेज नहीं है। सब्जियों की खेती पर इनका हमला बहुत ज्यादा होता है। झुण्ड यदि एक बार खेत में घुस गया तो सारी फसल चौपट हो जाती है। जितना ये फसल को खाकर नष्ट नहीं करते उससे ज्यादा कुचल कर बर्बाद करते हैं। मादा नीलगाय का गर्भावस्था काल 9 माह का होता है और यह एक बार में एक बच्चे को जन्म देती है।

गोवंश नहीं हिरन वंश से संबंधित


नीलगाय में ‘गाय’ शब्द जुड़ा होने से इसके प्रति भ्रम की स्थिति पायी जाती है। आमतौर पर इसे गाय की प्रजाति मान कर लोग इसको न स्वयं मारते हैं और न मारने देते हैं। लेकिन असलियत यह है कि गोवंश से इसका कोई लेना देना नहीं है। इसकी शारीरिक विशेषताएँ हिरन के ज्यादा करीब बैठती है। नीलगायों की ये कुछ विशेषताएँ हैं जो इन्हें गायों से अलग करती हैं :

1. गाय में नर - मादा दोनों में सींग होती है। लेकिन नीलगायों में केवल नर में सींग होती है, मादा में नहीं। इसकी सींग ठोस होती है, अर्थात सींग के ऊपर किसी प्रकार का खोल नहीं रहता। जबकि गोवंश की सींग में खोल होता है।

2. गाय में चार थन होते हैं, जबकि मादा नीलगायों में केवल दो थन होते हैं।

3. गायों के खुर बीच से फटे होते हैं, जबकि नीलगायों के खुर फटे न होकर घोड़े के समान बंधे होते हैं।

4. गाय का गोबर गोल टुकड़ों में नहीं होगा, जबकि नीलगायों का गोबर बकरियों की तरह गोल-गोल लेड़ी के रूप में होता है।

रोकथाम


नीलगायों से फसल की सुरक्षा बहुत मुश्किल काम है। किसान इसके लिये कई उपाय अपनाते हैं जो थोड़े बहुत कारगर भी होते हैं। कुछ किसान खेत के चारों तरफ कंटीले तार लगवाते हैं। यह बहुत खर्चीला उपाय है जिसे आम किसान वहन नहीं कर सकता। कुछ किसान खेत में लालटेन या बिजली का बल्ब जला देते हैं। रोशनी से नीलगाय भागते हैं। खेत के चारों तरफ करौंदे की बाड़ लगायी जा सकती है। नीलगायों का शिकार भी एक उपाय है, लेकिन आम जनमानस इसकी अनुमति नहीं देता। सरकार भी इसकी अनुमति नहीं दे सकती, क्योंकि वन्य जीव होने के कारण इसकी हत्या प्रतिबंधित है। पतंजलि संस्थान की बुलेटिन के अनुसार नीलगायों से खेतों को बचाने के लिये फिनायल का उपयोग किया जा सकता है। उनका दावा है कि यह उपाय सौ प्रतिशत कारगर है।

नीलगायों की समस्या से निजात के लिये लेखक का सुझाव है कि नर नीलगायों का वंध्याकरण अभियान चलाया जाना चाहिए। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं होगा, क्योंकि नीलगाय हिरन की तरह ही बहुत तेज भागते हैं। इसके लिये उन क्षेत्रों में विभाग के कर्मचारियों की टीमें गठित की जानी चाहिए जहाँ नीलगायों की समस्या बहुत अधिक है। इसके अतिरिक्त उन्हें बेहोश करने वाली गोली मारकर तथा तत्काल उनकी नसबंदी करके छोड़ दिया जाना चाहिए। इस पूरे अभियान पर आया खर्च फसल बर्बादी से होने वाली क्षति की अपेक्षा बहुत कम होगी।

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