शौचालय नहीं, तो घूंघट नहीं

Submitted by Hindi on Fri, 12/16/2016 - 16:54
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शुक्रवार डॉट नेट

भारतीय औरतों को जैसे-तैसे महानगरों और नगरों में घूंघट से मुक्ति मिली है। गाँवों में तो यह आज भी जस का तस जारी है। घूंघट की घुटन को उन स्त्रियों से पूछिए, जिनका जीवन इसकी कैद में बीत गया। ऐसे में इस तरह के विज्ञापन सरकार ने बनाए और उन्हें नेशनल मीडिया दिखा रहा है तो यह अफसोस की बात है। जिस घूंघट का गांधी जी ने आजीवन विरोध किया था लेकिन वह उसे हटा नहीं सके थे मगर टीवी पर दिखने वाली महिला चरित्रों, एंकरों, विज्ञापनों की देखादेखी और स्त्रियों की आत्मनिर्भरता, उनके बाहर निकलने, उनकी शिक्षा ने घूंघट की विदाई कर दी।

‘निर्मल भारत’अभियान को सफल बनाने के लिये टीवी पर आ रहे विज्ञापन में संदेश कुछ देना चाहते थे, पहुँचा कुछ और। बताना चाहते थे कि किसी औरत और नवविवाहिता के लिये शौचालय कितना जरूरी है मगर हुआ यह कि घूंघट का महत्त्व बताने लगे इन दिनों भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय का जोर शौचालय बनाने पर है। बताया जा रहा है कि भारत के घर-घर में शौचालय बनाने से पूरा भारत साफ-सुथरा और बीमारी-महामारी से मुक्त हो जाएगा।

शौचालय बनें, यह एक अच्छी बात है। जिन घरों में शौचालय नहीं होते, वहाँ की औरतों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के लिये वे दिन के समय जा ही नहीं सकतीं। मान लिया जाता है कि औरतों को ऐसी जरूरतें सिर्फ सुबह-शाम ही हो सकती हैं। यदि किसी को डायरिया हो जाए तो सोचिए उस पर क्या गुजरती होगी!

लेकिन शौचालय बनने के बाद सरकारें सीवेज की समस्याओं से किस तरह निबटेंगी, यह नहीं बताया जा रहा है। दिल्ली तथा अन्य महानगर इन समस्याओं से जूझ रहे हैं। मानव मल की गंदगी के कारण देश भर की नदियाँ बर्बाद हो गई हैं। दिल्ली का ही उदाहरण लें तो यमुना जीता-जागता ऐसा नाला बन गई है जिसे साफ करना दिनोंदिन मुश्किल होता जा रहा है। कई नेता कहते हैं कि जैसे ब्रिटेन ने अपनी टेम्स को बेहद साफ-सुथरा बना दिया है, हम भी यमुना को वैसा ही बना सकते हैं, मगर किस जादू की छड़ी से ऐसा किया जा सकता है, यह नहीं बताया जाता।

यमुना सफाई योजनाओं पर अब तक अरबों रुपये खर्च हो चुके हैं। सौ सफाई योजनाएं बन चुकी हैं। न जाने कितने सभा-सेमिनार हो चुके हैं मगर स्थिति जस की तस है। इस गंदगी को फैलाने में नागरिकों की भूमिका भी है। पूजा-पाठ की सामग्री से लेकर मूर्तियों का विसर्जन भी नदियों को प्रदूषित करने के लिये जिम्मेदार होता है। यमुना के प्रदूषण का बड़ा कारण दिल्ली में बहने वाले वे नाले हैं जो पूरे शहर के मानव मल-मूत्र और गंदगी को बहाकर यमुना में धकेल देते हैं। इन नालों में बहती गंदगी को साफ करके, फिर उस साफ पानी को यमुना में भेजने की बात कई बार की गई है लेकिन अब तक ऐसा हो नहीं पाया है।

इसी ‘निर्मल भारत’ अभियान को सफल बनाने के लिये आजकल चैनल्स पर कई विज्ञापन आ रहे हैं। फिल्म अभिनेत्री विद्या बालन चूँकि पर्यावरण मंत्रालय की ‘ब्रांड एंबेसडर’ हैं इसलिये वे कई विज्ञापनों में दिखती हैं। एक विज्ञापन में परदे पर एक पूरा परिवार बैठा दिखता है। वे सब राजस्थानी वेशभूषा में हैं। विद्या बालन भी उसी तरह का लहंगा-चोली और मांग टीका पहने हैं। लड़के की नई-नई शादी हुई है। बहू घूंघट काढ़ कर बैठी है। विद्या बालन अपने अंदाज में सास से पूछती हैं- ‘और शौचालय?’ तब बहू के पास बैठी सास जवाब देती है ‘वह तो नहीं है।’ तब विद्या बालन बड़ी हिकारत से कहती हैं : ‘तब तो बहू का घूंघट उतरवा ही दो।’

इसी को कहते हैं कि संदेश कुछ देना चाहते थे मगर पहुँचा कुछ और। बताना चाहते थे कि किसी औरत और नवविवाहिता के लिये शौचालय कितना जरूरी है। मगर हुआ यह कि घूंघट का महत्त्व बताने लगे। अगर घर में शौचालय नहीं है तो बहू के घूंघट मारने की जरूरत क्या? यानी कि अगर घर में शौचालय होता तो बहू का घूंघट मारना ठीक था। आश्चर्य है कि स्क्रिप्ट की इस कमी की ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं गया? विज्ञापन का कुल संदेश घूंघट के पक्ष में जाता है।

भारतीय औरतों को जैसे-तैसे महानगरों और नगरों में घूंघट से मुक्ति मिली है। गाँवों में तो यह आज भी जस का तस जारी है। घूंघट की घुटन को उन स्त्रियों से पूछिए, जिनका जीवन इसकी कैद में बीत गया। ऐसे में इस तरह के विज्ञापन सरकार ने बनाए और उन्हें नेशनल मीडिया दिखा रहा है तो यह अफसोस की बात है। जिस घूंघट का गांधी जी ने आजीवन विरोध किया था लेकिन वह उसे हटा नहीं सके थे मगर टीवी पर दिखने वाली महिला चरित्रों, एंकरों, विज्ञापनों की देखादेखी और स्त्रियों की आत्मनिर्भरता, उनके बाहर निकलने, उनकी शिक्षा ने घूंघट की विदाई कर दी।

घर-घर शौचालय बनें मगर अच्छा यह होगा कि वे कचरा निबटारे की तैयारी के साथ, गाँव-गाँव में नालियों, नाले की सफाई के साथ बनें लेकिन इसके लिये औरतों का घूंघट में रहना कब से जरूरी हो गया? कोई कह सकता है कि जी राजस्थान में तो अब तक परदा प्रथा जारी है और हम तो वहाँ का सीन क्रिएट कर रहे थे। लेकिन किसी एक अच्छे संदेश को देने के लिये समाज को पिछड़ेपन में बनाए रखने के मुकाबले उसे पिछड़ेपन से निकालने की जरूरत होती है। उम्मीद है कि पर्यावरण मंत्रालय इस विज्ञापन की ओर ध्यान देगा।

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