कीकर-आक के पार, काचरी-काकडी का स्वाद

Submitted by Hindi on Mon, 01/16/2017 - 16:47
Source
डाउन टू अर्थ, जनवरी 2017

राजस्थान के रेतीले इलाके में देसी फल-सब्जियों का स्वाद टटोलती एक दिलचस्प यात्रा

.वो जगह एकदम उजाड़ थी। हर तरफ रेतीली, पथरीली जमीन। जो सड़क हमें बीकानेर जिले के कोलायत ब्लॉक तक ले जा रही थी, उसके दोनों ओर कीकर और आक दिखाई पड़े थे। लेकिन हमारे लिये यह बहुत उत्साहजनक नजारा नहीं था। तीन दिन की यात्रा में हम राजस्थान के पारम्परिक या कहें देसी भोजन के बारे में जानने निकले थे। ऐसी चीजें जिन्हें यहाँ के लोग सदियों से उगा और खा रहे हैं। लेकिन अभी तक हमें बस कीकर और आक के पेड़ ही दिख रहे थे। कीकर को तो बकरियाँ भी नहीं खाती हैं और आक भोजन से ज्यादा औषधि के तौर पर जाना जाता है।

इसी उधेड़बुन के साथ हम बीकानेर से 90 किलोमीटर दूर कोलायत तहसील के भेलू गाँव पहुँचे। यहाँ एक जगह है गोदारो की ढाणी। यह 30 बीघा बेतरतीब-सी जमीन चार भाइयों की है। हमारी मुलाकात उन्हीं में से एक भाई बाबूराम से हुई। बाबू राम अपनी कुर्सी पर बैठा एक छोटा, धारीदार फल छील रहा था। आस-पास बिछी चारपाईयों पर यह कच्चा फल सूखाने के लिये पड़ा था।

यह काचर नाम का फल था, जो खरबूजे से मिलता-जुलता फल है और स्वाद में थोड़ा खट्टा होता है। इस इलाके में काचर का इस्तेमाल आमचूर की तरह होता है। बाबूराम इन फलों को सुखाकर व्यापारियों को बेचता है। ये व्यापारी इसका पाउडर, जिसे काचरी कहते हैं, बनाकर शहर के बाजारों में बेचते हैं। हमने बाबूराम से वह पौधा दिखाने के लिये कहा जिन पर काचर उगता है। बाबूराम और बच्चे, शैतान और मोती हमें खेत में लेकर गए। यह बेल खेत में अपने आप उग जाती है। इसमें सैकड़ों बीज होते हैं और एक भी फल खेत में रह जाए तो अगले साल खुद-ब-खुद उग जाती है।

घूमते-फिरते हमें एक बात और पता चली कि काचर यहाँ उगने वाला एकमात्र फल नहीं है। तपती दोपहर में हम जैसे ही खेत में पहुँचे, हमें रस भरी काकड़िया भी मिले। इन्हें भी काचर की तरह सुखाकर रख लिया जाता है। शैतान और मोती हमारे लिय खेत से कुछ जगंली टिंडा (टिंडसी) भी ढूंढ़ लाये। इस फल को भी काटकर-सुखाकर रखा जाता है ताकि बाद में सब्जी की तरह इस्तेमाल किया जा सके।

इसके बाद हम पास के खेत में गए, जहाँ हमें कुम्बट का पेड़ देखने को मिला। चूँकि, इसका मौसम गुजर चुका था, इसलिये इस पर फल ज्यादा तो नहीं थे पर कुछ शाखाओं से कुछ फलियाँ लटक रही थीं। इन फलियों के बीजों को कुमटिया कहते हैं। इनके साथ-साथ हमने खट्टे लाल बेर भी खाए। काफी घूमने-फिरने के बाद थक कर हम खेजरी के पेड़ के नीचे पानी पीने बैठ गए। पास में ही एक औरत ग्वार फली इकट्ठा कर रही थी। परिवार में सबसे बड़े भाई बुद्धाराम, जो हमारे लिये पानी लाए थे, उन्होंने बताया कि पहले जब इस इलाके में सूखा पड़ता था, तो खेजड़ी के पेड़ की छाल को पीसकर उसका इस्तेमाल आटे की जगह किया जाता है। सूखे की सबसे ज्यादा मार खाने-पीने की चीजों पर पड़ती थी और ऐसे में खेजड़ी की छाल जैसी चीजें खाने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता था।

बहरहाल, तपती दोपहर में हम अपने मेजबानों के घर पहुँचे और उन्होंने हमें भोजन करने को कहा। जितनी देर में खाना आता, उस बीच हमें थोड़ी और काकड़ी, मतीरा खाने को मिला। ये देसी तरबूज दिल्ली के तरबूज जितना लाल व मीठा नहीं था और इसे सब्जी की तरह भी पकाया जा सकता है। इस बीच खेत से आई ताजी मूँगफली भी भुन चुकी थी। गुड़ वाली मीठी चाय के साथ हमने इनका स्वाद भी चखा। इसके बाद हमें बाजरे की बड़ी-बड़ी रोटियों के साथ ग्वार और काचर की मसालेदार सब्जी और दही परोसी गई। ऐसी ठेट दावत कहाँ मिलेगी!

भारी पड़ा फसलों का गणित


ये चीजें मानसून पर निर्भर इस इलाके की खेती-बाड़ी का अहम हिस्सा रही हैं। ज्वार, बाजरा और ग्वार यहाँ की प्रमुख फसल हैं। लेकिन यह परिवार सिंचाई के नये साधन अपना चुका है और अब अन्य फसलें भी उगा रहा है। इस बार इन लोगों ने व्यापार के लिहाज से मूँगफली की खेती की है। पिछली बार प्याज भी उगाई थी। वाणिज्यिक खेती में मुनाफा ज्यादा है इसलिये यह परिवार इसे तेजी से अपना रहा है। काचर और इसके बीजों से होने वाली करीब आठ हजार रुपये की कमाई के मुकाबले इस साल लगभग मूँगफली से उन्हें पाँच लाख रुपए और ग्वार से 50 हजार रुपये की आमदनी होने की उम्मीद है।

इस रेतीले, शुष्क इलाके में हमारे लिये बहुत कुछ नया था, जिसे देखने-समझने के लिये हम भेलू गाँव से पूरब की ओर नोखड़ा गाँव की तरफ बढ़े। यह क्षेत्र केर नामक फल के लिये जाना जाता है। यहाँ हमारी मुलाकात 50 वर्षीय नारायण सिंह से हुई जो पिछले तीस साल से केर के फलों का व्यापार कर रहे हैं। इस कंटीले पेड़ से फल इकट्ठे कर महिलाओं और बच्चों को रोजगार मिल जाता है। निजी और सामुदायिक दोनों तरह की भूमि से ये केर प्राप्त कर लेते हैं। नारायण सिंह गाँव के उन चार लोगों में से हैं, जो 60 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से इनसे केर खरीदते हैं। कड़वापन दूर करने के लिये इन फलों को कुछ दिनों नमक के पानी में रखा जाता है। बाद में ये फल 100 रुपए किलो तक बिकते हैं। इनके खरीदार आकार पर विशेष ध्यान देते हैं और सबसे छोटा फल सबसे महँगा बिकता है, क्योंकि उनमें बीज नहीं होते।

नोखड़ा गाँव के लोगों ने हमें खाने-पीने की और भी कई पारम्परिक चीजों के बारे में बताया। ऐसा ही एक कंटीला बीज है भुरूट। अकाल के दिनों में इसे भी आटे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा हमें फोग के पेड़ के बारे में भी पता चला जो वहाँ तो नहीं दिखा, लेकिन हमें बताया गया कि जैसलमेर के रास्ते में इसके काफी सारे पेड़ मिल जाएँगे। गर्मियों में इसके फल और फूलों का इस्तेमाल रायता और कढ़ी बनाने में किया जाता है।

पारंपरिक फल-सब्जियों के बजाय राजस्थान के किसान मूंगफली जैसी नकद फसलों को अपना रहे हैंअगले दिन हम लोग जैसलमेर के लिये निकल गए। वहाँ हम शहर से कुछ पाँच किलोमीटर दूर चुंडी नाम के गाँव में पहुँचे। यहाँ हमारी मुलाकात 75 बीघा जमीन के मालिक 25 साल के खेवड़ा से हुई। हालाँकि, उसे फोग के पेड़ के बारे में नहीं मालूम था, लेकिन उसने इलाके में उगने वाली खाने-पीने की कुछ जंगली चीजों के बारे में हमें बताया। उनकी रसोई में टुम्बा के दुर्लभ बीज भी थे। आमतौर पर टुम्बा का फल जानवरों को खिलाने के काम आता है। लेकिन उन्होंने इन बीजों को अच्छी तरह उबालकर इंसान के खाने लायक बना दिया था। खेवड़ा की पत्नी ने हमें बताया कि वे बाजरा के आटे में इन बीजों को मिलाकर रोटियाँ बनाते हैं, जो बहुत करारी और पौष्टिक होती है। परिवार के लोगों ने हमें सम्भाल के रखी खाने-पीने की ऐसी कम से कम 10 देसी चीजें दिखाईं। परिवार के लोगों के लिये ये चीजें बहुत खास हैं। यह बात हमें तभी समझ आ गई, जब नौ साल के महिपाल ने जल्दी से ये पैकेट वापस अंदर रख दिए क्योंकि छोटे बच्चे इन पर झपटने लगे थे।

खेवड़ा ने बहुत चाव से हमें पीलू के मीठे फल के बारे में बताया। इस इलाके में बारिश के बाद रेत के टीलों पर जंगली मशरूम भी उगते हैं। इन्हें भी सुखाकर पीस लेते हैं और आटे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। हालाँकि, हमें उन मशरूमों का स्वाद चखने का मौका नहीं मिला, क्योंकि यहाँ बारिश कभी-कभार ही होती है पर रिसर्च बताती हैं कि बरसात के बाद यहाँ 48 किस्म के मशरूम उगते हैं।

हमने खेवड़ा से हमें उसके खेत पर ले जाकर खेजरी का पेड़ दिखाने को कहा। वह हमें एक ट्रैक्टर की ट्रॉली में बैठाकर हमें खेत तक ले गया, जो रेत भरकर ले जाने के लिये तैयार खड़ी थी। हालाँकि, उसका खेत जमीन एक सूखा टुकड़ा मात्र था लेकिन वहाँ रेत के खनन से वह काफी पैसे कमा चुका था।

यद्यपि इस परिवार को खान-पान से जुड़ी कई परम्परागत चीजों की जानकारी थी, लेकिन समय के साथ वे भी कई चीजें भूल चुके थे। परिवार में किसी को भी खीप के बारे में नहीं मालूम था। खीप की फली का इस्तेमाल सब्जी की तरह किया जाता था। लेकिन आज उन्हें सिर्फ यही मालूम है कि उस पेड़ की पतली डंडियों का इस्तेमाल झोपड़ी की छत बनाने या अंतिम संस्कार में किया जाता है।

पीछे छूटते पारम्परिक स्वाद


नोखड़ा गाँव के बुजुर्ग खेराज राम ठीक ही कहते हैं कि दिल्ली फकीरों का शहर है। जंगल में उगने वाली देसी चीजें हम दिल्ली वालों की किस्मत में कहाँ! हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि राजस्थान के किसान अपने पारम्परिक खान-पान को नहीं भूलेंगे। वैसे भी देश में ऐसी बहुत कम जगह है, जहाँ विविधता से भरपूर परम्परागत भोजन आज भी खान-पान का हिस्सा है।

यहाँ से हम पत्थर तोड़ने का काम करने वाले मजदूरों के समुदाय से मिलने निकल गए। यहाँ हमें अहसास हुआ कि खेवड़ा उन गिने-चुने लोगों में है जो स्थानीय भोजन के बारे में कम से कम कुछ तो जानते हैं। करीब पाँच किलोमीटर दूर बेलदारों की ढाणी में आमतौर पर लोग बाजार से लाई सब्जियाँ ही खाते हैं। भोरा राम नाम के एक नौजवान ने हमें बताया कि इन स्वादिष्ट जंगली चीजों को खोजना बहुत मेहनत का काम है और इसमें समय भी बहुत लगता है। ज्यादातर लोग बाजार से सब्जियाँ खरीद लाते हैं, जबकि आस-पास के इलाके में ये आसानी से मिल सकती हैं। लोग एक किलो मशरूम के लिये 200 रुपये खर्च करने को तैयार हैं, लेकिन उसे इकट्ठा करना नहीं चाहते। फिर भी परम्परागत फल-सब्जियों से हमारा परिचय कराने वाले भगवान राम ने हमसे वादा किया कि अगली बार वे हमें कई अन्य दुर्लभ भोजन खिलायेगा। हालाँकि, इस इलाके में केर नहीं मिलता लेकिन वे इस फल से लड्डू बनाने का तरीका बताते हैं। लेकिन उनकी बातों से ये साफ था की ऐसी परम्परागत चीजें आजकल लोगों की रसोई के बजाय उनकी स्मृतियों में अधिक पाई जाती हैं।

जोधपुर में स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंस के निदेशक एसएम मोहनोत यह जानकर हैरान थे कि हमें आजकल भी लोगों के घरों में इतना पारंपरिक भोजन मिल गया। वह कहते हैं, “अब गाँव के लोग परम्परागत भोजन पर निर्भर नहीं हैं। यह स्वादिष्ट आहार तो बस अतीत की निशानी भर रह गया है।” इस तरह का खान-पान बाजारों से दूर मुख्यत: ढाणियों तक ही सीमित है। राजस्थान के छोटे से छोटे गाँव में भी अब बाजार की फल-सब्जियाँ उपलब्ध हैं। इसके अलावा स्थानीय चीजें जैसे कुम्बट, केर और सांगरी तो आलू, प्याज से भी महंगी हैं। कई चीजों के दाम तो सूखे मेवों के बराबर हैं। इन पुरानी चीजों का उत्पादन भी लगातार कम होता जा रहा है। क्योंकि एक ओर जहाँ खेती के लिये इस तरह के पेड़-पौधे काटे जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खेती व खनन की वजह से नए बीजों को जमने का मौका नहीं मिलता। आज से करीब 50 साल पहले जिस जमीन पर एक क्विंटल (100 किलो) पैदावार होती थी, उस जमीन पर अब मुश्किल से 10 किलो पारम्परिक चीजें उग पाती हैं। इस तरह की फल-सब्जियों को धोने, सुखाने और सम्भालकर रखने में भी बहुत समय और मेहनत लगती है। हालाँकि, ऐसा नहीं है की सभी चीजें लुप्त हो रही है। उदाहरण के तौर पर, आज भी लोग सांगरी, केर और कुमटिया कोबड़े जतन से जुटाते हैं और लम्बे समय तक उपभोग के लिये सम्भालकर रखते हैं। लेकिन फोग, टिंडा, खीप जैसे चीजें तकरीबन गायब हो चुकी हैं। कुछ तो उग ही नहीं रही और कुछ को अब इकट्ठा नहीं किया जा रहा है।

उम्मीद की किरण


बीकानेर में ‘उर्मुल’ ट्रस्ट के सचिव और मुख्य कार्यकारी अरविंद ओझा खाने-पीने की कई परम्परागत चीजों के भविष्य को लेकर फिर भी आशान्वित हैं। उनका मानना है कि राजस्थान में पर्यटन बढ़ने से इस तरह की चीजों की मांग बढ़ी है। यहाँ आने वाले मेहमान ट्रेडीशनल फूड का स्वाद चखना चाहते हैं। वह बताते हैं, हम अपने स्वयं सहायता समूहों में पारम्परिक भोजन को लोकप्रिय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हम लोगों को सिखा रहे हैं कि ग्वार फलियों को सुखाकर रेगिस्तान की जायकेदार नमकीन के तौर पर कैसे बेचा जा सकता है। मेलों में इसे बेचा भी जाने लगा है। इन चीजों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिये हम सोलर ड्रायर्स लगाने की तैयारी कर रह हैं। इसके अलावा हम किसानों को लगातार इन पेड़-पौधों के बारे में बता रहे हैं, ताकि ये पेड़ पौधे आगे भी खेतों में बनी रह सकें। खेजरी का पेड़ साल भर में अंदाजन 10 हजार रुपए का फायदा देता है। भोजन के काम आने के अलावा इसकी छाया में फसलें अच्छी उगती हैं और इसकी पत्तियों का इस्तेमाल पशु चारे के लिये भी किया जाता है।

परम्परागत स्वाद का हमारा तीन दिन का सफर जोधपुर के रेस्टोरेंट में जाकर खत्म हुआ, जहाँ आलू-पूड़ी और चाऊमीन जैसी प्रचलित चीजें परोसी जा रही हैं। यही चीजें तो हमें दिल्ली में मिलती हैं। शायद नोखड़ा गाँव के बुजुर्ग खेराज राम ठीक ही कहते हैं कि दिल्ली फकीरों का शहर है। जंगल में उगने वाली देसी चीजें हम दिल्ली वालों की किस्मत में कहाँ! हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि राजस्थान के किसान अपने पारम्परिक खान-पान को नहीं भूलेंगे। वैसे भी देश में ऐसी बहुत कम जगह है, जहाँ विविधता से भरपूर परम्परागत भोजन आज भी खान-पान का हिस्सा है।

फोटो साभार : भास्करज्योति गोस्वामी

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