घुटती साँसों, मरते शहरों को संजीवनी

Submitted by Hindi on Mon, 01/30/2017 - 12:45
Source
राजस्थान पत्रिका, 13 जनवरी, 2017

सच पूछो तो सरकारी नीतियाँ ही सारे बिगाड़ के लिये जिम्मेदार हैं। सरकारें कोर्ट में सेक्टर प्लान की बातें भी करती रही हैं, किन्तु व्यवहार में कुछ और ही दिखाई पड़ता है। सरकार भूमि के उपयोग पर अपनी बातें बदलती रहती है।

राजस्थान उच्च न्यायालय की जोधपुर बैंच ने एक ऐतिहासिक फैसले में सरकार को मास्टर प्लान के अक्षरशः पालन के निर्देश दिए। यह फैसला प्रदेश ही नहीं देशभर में आम नागरिकों को खुली-स्वच्छ हवा में पूर्ण नागरिक अधिकारों के साथ जीने की राह प्रशस्त करेगा। राजस्थान पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी ने तेरह साल पहले 7 अप्रैल, 2004 को ‘मेरे जयपुर का ये हाल, क्या होना था क्या हो गया’ शीर्षक से लेख के साथ एक पत्र उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश को लिखा उच्च न्यायलय ने पत्र को जनहित याचिका मानते हुए सरकार से जवाब तलब किया। सालों-साल जिरह के बाद गुरुवार दिनांक 12 जनवरी 2017 को प्रदेश के न्याय इतिहास में सुनहरी इबारत लिखी गई। माननीय न्यायाधीश संगीत लोढा और न्यायाधीश अरुण भंसाली की पीठ ने सही मायनों में जीवन जीने का आदेश सुनाया। मास्टर प्लान का सख्ती से पालन हो, उद्योग शहर की परिधि के बाहर हों, राजमार्ग अतिक्रमण मुक्त हों, हरित पट्टी से छेड़-छाड़ ना हो, रिहायशी इलाकों में साफ आबो-हवा के लिये दो बस्तियों के बीच हरित क्षेत्र हों, बिना पार्किंग भवनों को इजाजत नहीं दी जाए, बिना पार्किंग वाले बहुमंजिले भवन सील हों, पहाड़, वन, नदी, झील जैसे तमाम जलस्रोतों के नैसर्गिक स्वरूप परिवर्तित न हों। पूर्व में यदि हो भी गया तो अतिक्रमणों और निर्माण को हटाकर मूल स्वरूप में लाया जाए। शहरों में बसी एकल कॉलोनियों में बहुमंजिला भवनों के निर्माण की इजाजत नहीं हो। न्यायालय ने कुल 35 दिशा-निर्देश सरकार को दिए हैं। इन पर क्रियान्वयन कर रिपोर्ट 22 मई 2017 को पेश करने के आदेश दिए हैं।

ऐतिहासिक फैसला


गुलाब कोठारी
सन 2004 में शहरी मास्टर प्लान को लेकर मेरे द्वारा लिखे, माननीय मुख्य न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय के पत्र को याचिका मानकर गहनता से सुनवाई हुई, जानकारियाँ एकत्र हुईं और अन्त में कल गुरुवार को उच्च न्यायालय ने अपना फैसला दे ही दिया। पत्र में लिखे पन्द्रह मुद्दों पर विस्तृत दिशा-निर्देश तथा आदेश जारी किए। माननीय न्यायालय का हृदय से आभार! फैसले से जहाँ आम नागरिकों को नगर नियोजन की विसंगतियों से छुटकारा मिल सकेगा, वहीं सरकार के हाथ भी निर्णय करने में मजबूत होंगे। राजनीतिक दबावों को झेल सकेगी। जिस संकल्प के साथ नरेन्द्र मोदी काले धन के पीछे पड़े हैं, अपने मुख्यमंत्री भी नगर नियोजन के सुचारू क्रियान्वयन के पीछे पड़ सकते हैं। फैसला बहुत बड़ा हथियार साबित होगा। बस इच्छाशक्ति चाहिए।

यूँ तो फैसला 257 पृष्ठों का है। किन्तु उसमें जो मुख्य बिन्दु है उनमें मास्टर प्लान का सख्ती से लागू करना। इसके जवाब में विभाग कोर्ट को बराबर यह कह रहा था कि जन सहयोग के अभाव में सख्ती नहीं हो सकती। इसके लिये जनता को शिक्षित करना होगा कि प्लान का उल्लंघन कभी भी उनके हक में नहीं है। सच तो यह है कि जनता को मास्टर प्लान की जानकारी ही नहीं होती। दूसरा कारण कालोनाइजर्स द्वारा अपने स्वार्थवश गैर कानूनी कॉलोनियाँ बसाना भी दिया है। यह किसी ने नहीं कही कि इनको रोकने के लिये सरकार ने क्या कदम उठाए। क्यों मौन स्वीकृति दे दी गई?

फैसले में एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि प्रत्येक बहुमंजिला इमारत में पार्किंग अनिवार्य है। सन 2004 से अब तक प्रदेश में सैकड़ों ऐसी बहुमंजिला इमारतें बन गई होंगी। क्या सरकारें इनके विरुद्ध कार्रवाई कर पाएँगी? करनी ही चाहिए। साथ ही उन अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई हो, जिनकी देखरेख में ये निर्माण हुए। कोर्ट ने प्राकृतिक संसाधनों, वनों अभयारण्यों आदि को भी शहरी विकास से मुक्त रखने का आदेश दिया है। हरित क्षेत्र से छेड़-छाड़ न की जाए। राष्ट्रीय राजमार्गों के दोनों ओर कोई निर्माण न हो। हमारे झालाना क्षेत्र में तो 200 फीट राजमार्ग के आधे हिस्से में नेताओं ने ही कब्जा करवा रखा है।

गहराई से सोचें तो दो बड़े बिन्दु हमारे सामने आते हैं। एक तो शहर का आनन-फानन में किया जाने वाला विस्तार। आज के जयपुर का क्षेत्र हजारों गाँवों के अस्तित्व को लूटकर खड़ा हुआ। सरकारों को यह सही नहीं लगा कि आस-पास सेटेलाइट टाउन खड़े किए जाएँ। वे तो इन कस्बों को लील जाना चाहते हैं। आगे यह विस्तार रुक जाना ही शहर के हित में है। अगला विकास आकाश की ओर गगनचुम्बी इमारतों के रूप में ही किया जाए। नहीं तो गरीब का जीना तो दूभर हो ही जाएगा। हर बार शहर की सीमा बढ़ती है और डेयरी को बाहर निकालने की अभियान शुरू हो जाता है। सरकार चाहती ही नहीं कि किसी बच्चे को ताजा दूध भी मिले।

सच पूछो तो सरकारी नीतियाँ ही सारे बिगाड़ के लिये जिम्मेदार हैं। सरकारें कोर्ट में सेक्टर प्लान की बातें भी करती रही हैं, किन्तु व्यवहार में कुछ और ही दिखाई पड़ता है। सरकार भूमि के उपयोग पर अपनी बातें बदलती रहती है। सेज का अनुभव खट्टा रहा। विदेशी निवेश के बड़े-बड़े आयोजनों को भी निवेशकों ने अँगूठा दिखा दिया। किसी को सरकार पर भरोसा तो हो। सरकारी घोषणाओं और उनकी क्रियान्विति में इतना अन्तराल होता है कि योजना का स्वरूप और लागत दोनों बदल जाते हैं। फिर कोई भी सरकार पाँच साल के आगे सोचती ही नहीं। पिछली सरकार के किए को उखाड़ने में ही लम्बा काल और बजट खर्च कर देती हैं। विकास आएगा कहाँ से?

सरकार ने देखा कि मास्टर प्लान पर संकट के बादल आने वाले हैं। उसने सिटी डवलपमेंट प्लान (सीडीपी) शुरू कर दिया। इसी की तर्ज पर स्मार्ट सिटी प्लान की घोषणा कर दी। अमृत योजना लागू कर दी। बीआरटीएस लागू किया। आधे रास्ते में मेट्रो प्रोजेक्ट आ गया। अब फिर बीआरटीएस की चर्चा जोरों से शुरू हो गई है। खास बात यह है कि ये सभी योजनाएँ होनी तो मास्टर प्लान में चाहिए थीं, किन्तु है नहीं। न मास्टर प्लान की नीतियाँ इन पर लागू हैं। इसी तरह की एक योजना हेरिटेज योजना (हृदय) अजमेर में लागू है। मेट्रो विकास परिषद का तो अभी तक गठन भी नहीं हुआ है। चारों ओर नियोजन के नाम पर बिखराव ही दिखाई देता है। सरकार को सर्वप्रथम इन सभी नगरीय योजनाओं को मास्टर प्लान में समाहित करना चाहिए। होता यह कि बिल्डर्स का भी कुछ क्षेत्र मास्टर प्लान में छोड़ा जाता है। सरकार समझौता भी करती जान पड़ती है।

राजस्थान पत्रिका ने जब ‘मकड़जाल’ अभियान छेड़ा था तब योजनाओं की क्रियान्विति के स्तर पर दलाली के अनेक प्रकरण सामने आए थे। कई एजेन्सियाँ यह कार्य कर रही थीं। नगर नियोजन के कार्य में लगभग दो दर्जन से अधिक विभाग जुटते हैं। लगभग 28-29 विभाग हैं। प्लानिंग में भी आज सभी एजेंसियाँ शामिल हो गईं। वही दलाली-राग! सरकार को संविधान के 74वें संशोधन के अनुसार केवल चुनाव द्वारा गठित संस्थाओं (नगर परिषद आदि) को ही इन कार्यों के लिये प्रोत्साहित करना होता है। सब कुछ इसके विपरीत हो रहा है। सभी एजेन्सियाँ बन्द हो जानी चाहिए। इसके लिये तो सरकारों को राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठना होगा। गाँवों में आज भी 73वाँ संशोधन अच्छे ढंग से लागू होता है। आज भी वहाँ अधिक प्रभावशाली ढंग से कार्य होता है। हम गाँवों से भी नहीं सीखना चाहते। कमाल है! गाँव आज भी राजनीतिक स्तर पर अधिक शक्तिशाली हैं। दिल्ली में आप सरकार ने मोहल्ला समितियाँ बना दीं। हमारे यहाँ कानूनी तौर पर अभी भी वार्ड समितियाँ तक नहीं बनीं। म्यूनिसिपल एक्ट में बूथ समितियों तक का प्रावधान है।

ये सारे तथ्य इस बात के प्रमाण हैं कि प्रदेश के सुचारू नियोजन के लिये जो व्यवस्था संविधान में है, वह कहीं किसी स्तर पर भी लागू होती दिखाई ही नहीं देती। आप उच्च न्यायालय के फैसले को कैसे लागू होता देख पाओगे? हाँ, आठ-दस अधिकारियों के खिलाफ कठोर दण्डात्मक कार्रवाई हो तो कुछ फैसला भी लागू हो सकेगा और आगे के लिये एक डर भी अधिकारियों के मन में बैठ सकेगा। वरना तो मई में सरकार को न्यायालय के समक्ष फौरी रिपोर्ट ही देनी पड़ेगी। -gulabkothari.wordpress.com

संकरी सड़कों पर मकान में दुकान के नियमन पर गिरेगी गाज


1. मास्टर प्लान की पालना को लेकर हाईकोर्ट के आदेश का असर
2. राज्य स्तरीय व स्थानीय स्तरी भू-उपयोग परिवर्तन समितियों पर भी लगेगी लगाम
3. मकानों पर किये अवैध निर्माणों पर भी कसेगा शिकंजा

जयपुर। मास्टर प्लान की पालना और शहरों के सुनियोजित विकास के लिये मास्टर प्लान के साथ छेड़-छाड़ नहीं करने को लेकर हाईकोर्ट की ओर से दिए आदेश से राज्य सरकार की ओर से प्रदेश में 21 जनवरी से शिविर लगाने की कोशिशें धराशाही हो गई हैं। 30 और 40 फीट चौड़ी सड़कों पर बने घरों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों के नियमन का भी अब रास्ता बन्द हो गया है। इसके अलावा स्कूलों के नियमन और अवैध निर्माणों को नियमित करने के शिविर में अब काम नहीं हो सकेंगे।

प्रदेश में बन रहे चुनावी माहौल को देखते हुए राज्य सरकार ने बड़े स्तर पर आमजन को लुभाने के लिये शहरों के सुनियोजित विकास को ही बिगाड़ने की तैयारी कर ली थी। हाईकोर्ट के आदेश से अब 30 व 40 फीट की सड़कों पर मकान और शोरूमों को नियमित नहीं किया जा सकेगा। जून 1999 से पहले की बसी कॉलोनियों का नियमन 20 फीट सड़क होने पर भी करने की दी जा रही छूट भी अब नहीं दी जा सकेगी। इसी प्रकार कॉलोनियों की एप्रोच सड़कों को कम करने के हाल ही दिए आदेश भी खटाई में पड़ गए हैं। उधर, मानवाधिकार आयोग भी 30 फीट चौड़ी सड़कों पर व्यावसायिक गतिविधियों के नियमन वाले प्रस्ताव पर रोक लगा चुका है। शिविरों में राज्य सरकार ने उन लोगों को भी लुभाने की कोशिश की थी, जिन्होंने नक्शे के विपरीत अतिरिक्त निर्माण कर लिया है। उन निर्माणों को जुर्माना लेकर नियमित करने का निर्णय किया था। इसी प्रकार राज्य स्तर व स्थानीय स्तर पर बनी भू-उपयोग परिवर्तन समितियों के ऊपर भी शिकंजा कस गया है। आए दिन भू-उपयोग परिवर्तन के निर्णय लेने वाली इन समितियों को अब राज्य स्तरीय बड़े मामलों में ही फैसला लेने का अधिकार होगा।

निर्देश नम्बर 1


आबादी से बाहर हों उद्योग

 

ये होगा असर


शहरी क्षेत्र में अथवा सटे हुए क्षेत्रों में स्थित औद्योगिक क्षेत्र मास्टर प्लान के अनुरूप बाहर शिफ्ट होंगे

 

क्या कहा
ये तय है कि मास्टर प्लान में उल्लेखित निर्धारित क्षेत्रों में ही औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किए जाएँ। रिहायशी क्षेत्रों में औद्योगिक क्षेत्रों को कतई अनुमति नहीं दी जा सकती है। न्याय मित्र की ओर से उठाए गए बिन्दु के अनुसार रिहायशी क्षेत्रों में अब तक विकसित हो चुके औद्योगिक क्षेत्रों को लेकर कोई विस्तृत रिपोर्ट पेश नहीं की है। ऐसे में न्यायालय की ओर से कोई भी निर्देश जारी नहीं किए जा सकते हैं। ऐसे में रिहायशी इलाकों में अथवा पास में स्थित औद्योगिक क्षेत्रों को किसी भी स्थिति में आवासीय क्षेत्रों में रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। राज्य सरकार को इस निर्देश की पालना सुनिश्चित करनी होगी। सरकार को इन औद्योगिक क्षेत्रों को रीलोकेट करने के लिये विस्तृत प्लान तैयार करना होगा। बिना मूल सुविधाओं के आवास मानवीय अधिकारों का भी उल्लंघन होगा। इसके लिये राज्य सरकार को प्रत्येक क्षेत्र में सुविधाओं को मुहैया करना होगा। कोर्ट के फैसले से राज्य भर में विभिन्न क्षेत्रों में बसे औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले प्रदूषण से भी मुक्ति मिलेगी।

निर्देश नम्बर 2


फुटपाथों, आम रास्तों को भी अतिक्रमण मुक्त किया जाए

 

ये होगा असर


फुटपाथों पर अतिक्रमण हटाए जाएँगे। साथ ही अतिक्रमण कर छोटे किए गए आम रास्ते भी अपनी मूल स्थिति में आ सकेंगे।

 

क्या कहा
स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे फुटपाथ और आम रास्तों से अतिक्रमण हटाये। वे इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं? फुटपाथ और सार्वजनिक सड़कों पर सुगम राह उपलब्ध हो यह प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। स्थानीय निकाय भी फुटपाथों पर कोई निर्माण कार्य नहीं करा सकते। ऐसे स्थानों पर अतिक्रमणों को नियमित नहीं किया जा सकता। अभी सार्वजनिक मार्ग तक लोगों ने सीढ़ियाँ व रैम्प तक निकाल रखे हैं। इससे आवागम तो बाधित होता ही है, यातायात अवरुद्ध होने की समस्या भी बनी रहती है। ऐसे अतिक्रमण हटने से अभी शहरी इलाकों में सिकुड़े सार्वजनिक मार्गों की हालत में सुधार होगा। अवैध तरीके से लगाए गए होडिंग्स भी हटाए जाएँगे जिससे दुर्घटनाओं पर अंकुश लग सकेगा।

निर्देश नम्बर 3


राष्ट्रीय राजमार्गों के पास हरित पट्टी, फुटपाथ

 

ये होगा असर


राष्ट्रीय राजमार्गों के 100 फीट के दायरे में हरित पट्टी विकसित करना जरूरी होगा। इस दायरे में कोई भी अतिक्रमण तत्काल हटाए जाने चाहिए।

 

क्या कहा
इसे लागू करने के लिये सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए। भविष्य में इस दायरे में कोई अतिक्रमण नहीं हो यह भी सुनिश्चित करना होगा। राजमार्गों के 100 फीट के दायरे में अतिक्रमण हटने से वाहनों की सुगम आवाजाही तो होगी ही, सड़क हादसों में भी कमी आएगी। राजमार्गों पर हरियाली विकसित हो सकेगी।

निर्देश नम्बर 4


ग्रीन बेल्ट कन्वर्जन रुके

 

ये होगा असर


मास्टर प्लान में इंगित ग्रीन बेल्ट के साथ किसी भी प्रकार की छेड़-छाड़ नहीं की जा सकेगी।

 

क्या कहा
अधिसूचित मास्टर प्लान में उल्लेखित ग्रीन बेल्ट के साथ किसी भी प्रकार की छेड़-छाड़ नहीं की जा सकेगी। इसके अनुसार मास्टर प्लान में एक बार उल्लेखित ग्रीन बेल्ट की अवधारणा में फेरबदल नहीं होगा। किसी भी स्थिति में ग्रीन बेल्ट को मास्टर प्लान की मूल भावना के साथ ही रखा जाएगा। इसे रिहायशी, व्यावसायिक, संस्थागत अथवा औद्योगिक उपयोग के लिये नहीं रखा जाएगा। ग्रीन बेल्ट के बाह्य नियन्त्रण के बारे में जयपुर, जोधपुर, अजमेर, उदयपुर, कोटा और बीकानेर के मास्टर प्लान तत्कालीन यूआईटी एक्ट के तहत प्रावधान बने थे। जयपुर का मास्टर प्लान 1991 में बना था। परम्परागत रूप से विभिन्न शहरों के मास्टर प्लान बनाने के समय ग्रीन बेल्ट का प्रावधान छोड़ जाता है। लेकिन ग्रीन क्षेत्रों में अवैध कॉलोनियाँ काट दी गईं। यहाँ अन्य व्यावसायिक गतिविधियाँ शुरू कर दी गईं। लेकिन कोर्ट के इस फैसले के बाद अब ग्रीन बेल्ट के अस्तित्व के बारे में पालना सुनिश्चित की जा सकेगी।

निर्देश नम्बर 5


पार्किंग के नियमों की सख्ती से पालना हो

 

ये होगा असर


नगर निकाय क्षेत्रों के भवन निर्माण नियमों में पार्किंग के प्रावधान को सख्ती से लागू किया जाए। प्रत्येक भवन निर्माण में पार्किंग सुविधा को अनिवार्य किया जाए।

 

क्या कहा
यह दुर्भाग्यजनक है कि बिल्डर्स बहुमंजिला इमारतें और कॉम्प्लेक्स की अनुमति लेते समय नियमों के तहत पार्किंग का प्रावधान करने का शपथ पत्र देते हैं लेकिन हकीकत में वे पार्किंग की जगह को भी अन्य उपयोग में लेते हैं। इसकी वजह से यातायात समस्या होती है। पार्किंग नियमों की कड़ाई से पालना होने पर शहरी इलाकों में ट्रैफिक जाम की समस्या से निजात मिल सकेगी। बड़ी संख्या में वाहन सड़कों पर खड़े होने से यह समस्या और बढ़ जाती है। ये निर्देश लागू होने पर सभी भवनों के निर्माण के पहले पार्किंग व्यवस्था करना जरूरी होगा।

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