शहरों को ‘गैस चैम्बर’ बनाता स्मॉग

Submitted by Hindi on Wed, 02/22/2017 - 11:06
Source
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर, 2016


हर साल दिवाली के बाद दिल्ली धुएँ, धुँध और धूल के जहरीले मिश्रण यानी स्मॉग से घिर जाती है। फसल कटाई के मौसम में अक्सर ऐसा होता है। दिल्ली के अलावा उत्तर भारत के कई शहर इस साल स्मॉग से घिरे रहे। जानिए, इस दमघोंटू प्रदूषण से जुड़े सवालों के जवाब

1. फॉग (धुँध) और स्मॉग (धूमकुहा) में क्या अन्तर है?


फॉग एक प्राकृतिक घटना है, जिसमें घनीभूत हुई जल की छोटी बूँदे हवा में रहती हैं। फॉग तब कहलाया जाता है, जब दृश्यता एक किलोमीटर से कम और वायु में नमी 75 प्रतिशत से ज्यादा हो। यह अक्सर सुबह या शाम के समय आता है और इससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर नहीं पड़ता। जबकि वायु में मौजूद धुँध, धुएँ और धूल के महीन कणों के मिलने से स्मॉग बनता है। इसके लिये मुख्यतः वायु प्रदूषण जिम्मेदार है। स्मॉग से साँस लेने में तकलीफ, आँखों में जलन के साथ-साथ अस्थमा और कई अन्य बीमारियाँ हो सकती हैं।

2. क्या इस साल दिल्ली में अधिक स्मॉग था?


भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, इस साल दिल्ली में पिछले वर्षों के मुकाबले कहीं अधिक स्मॉग रहा। गत 2 नवम्बर को इंदिरा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर दृश्यता 250-300 मीटर तक मापी गई, जो पिछले 17 वर्षों में सबसे कम थी। दिवाली के बाद कई दिनों तक दिल्ली व आस-पास के इलाके भयंकर स्मॉग से घिरे रहे। आनन-फानन में दिल्ली सरकार को स्कूली की छुट्टियाँ करने, बदरपुर पावर प्लांट बन्द करने, निर्माण गतिविधियों पर 10 दिनों की रोक और कूड़े जलाने पर रोक लगाने जैसे कदम उठाने पड़े। लेकिन ये अस्थाई उपाय हैं।

3. इस साल दिवाली पर वायु प्रदूषण कितना बढ़ा?


इस साल दिवाली के दिन और इसके बाद दिल्ली की हवा पिछले वर्षों के मुकाबले अधिक प्रदूषित थी। दिल्ली प्रदूषण नियन्त्रण समिति के अनुसार, इस दिवाली के दिन दिल्ली में पीएम 2.5, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे प्रदूषकों का स्तर पिछले वर्षों से कहीं अधिक पाया गया। दिल्ली में पिछले वर्ष दिवाली के दिन पीएम 2.5 का अधिकतम स्तर 369 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर था जो इस साल 440 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गया। साथ ही नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जिसका अधिकतम स्तर पिछले वर्ष 79 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर था, वह इस वर्ष 123 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुँच गया। ठीक ऐसा ही प्रभाव सल्फर डाइऑक्साइड पर भी देखा गया। दिवाली के बाद दिल्ली की हवा में दूषित कणों और स्मॉग का स्तर अचानक कई गुना बढ़ गया।

4. सर्दियों में ही इतना स्मॉग क्यों बढ़ जाता है?


सर्दियों में तापमान कम होने के कारण वायु धरती के आस-पास रहती है और हवा के साथ में मौजूद प्रदूषक कण भी धरती के आस-पास जमा हो जाते हैं। साथ ही वायु की गति कम होने के कारण भी प्रदूषकों का फैलना सम्भव नहीं हो पाता और स्मॉग की स्थिति बन जाती है।

5. दिल्ली में इस प्रकार के वायु प्रदूषण की क्या वजह है?


आईआईटी, कानपुर की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली की हवा को दूषित करने वाले अतिसूक्ष्म कणों यानी पीएम 2.5 के बढ़ने का मुख्य कारण सड़कों की धूल (38 फीसदी), वाहनों का धुआँ (20 फीसदी), घरेलू प्रदूषण (12 फीसदी), औद्योगिक धुआँ (11 फीसदी), शहरी कूड़े का जलना (3 फीसदी) और भवन निर्माण से जुड़ी गतिविधियाँ (करीब 4 फीसदी) हैं। औद्योगिक उत्सर्जन और डीजल जनरेटर से निकलने वाला धुआँ भी हवा में सल्फर डाइऑक्साइड व नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के प्रदूषण का मुख्य स्रोत है।

6. क्या पंजाब, हरियाणा में किसानों द्वारा पुआल जलाने से दिल्ली में स्मॉग फैलता है?


पंजाब और हरियाणा के किसान अक्टूबर-नवम्बर में धान कटाई के बाद पुआल या पराली को खेत में ही जला देते हैं। मशीन से कटाई के चलते यह चलन बढ़ा है। अकेले पंजाब में हर साल करीब दो करोड़ टन पुआल जलाए जाने का अनुमान है। दिल्ली में स्मॉग के लिये पुआल के जलने को बड़ी वजह माना जाता है।

7. पटाखों का धुआँ स्वास्थ्य के लिये कितना खतरनाक है?


कार्बन और सल्फर के कारण पटाखों के जलने से कई प्रकार की हानिकारक गैस निकलती हैं। रंगीन आतिशबाजी में इस्तेमाल होने वाले एल्युमीनियम और एंटीमनी सल्फाइड से अल्जाइमर और फेफड़ों का कैंसर होता है। पटाखों में मौजूद बेरियम नाइट्रेट से साँस लेने में परेशानी, गैस की समस्याएँ और मांसपेशियों में कमजोरी होती है।

8. पटाखों के प्रदूषण से बचने के लिये क्या करना चाहिए?


सरकार पटाखों की बिक्री और इनके इस्तेमाल को नियन्त्रित कर सकती है। संवेदनशील जगहों में पटाखे जलाने पर रोक लगाई जा सकती है। इसके अलावा पटाखों के उत्पादन से जुड़े नियम-कायदों में भी सुधार की आवश्यकता है। कई देश पटाखों पर रोक लगा चुके हैं।

9. छोटे बच्चों के लिये स्मॉग क्यों अधिक घातक है?


किसी भी वयस्क की तुलना में स्मॉग या वायु प्रदूषण बच्चों के लिये अधिक घातक है। इसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला, वयस्कों के मुकाबले बच्चे अधिक साँस लेते हैं, जिससे ज्यादा दूषित हवा उनके भीतर जाती है। दूसरा, बच्चों में बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी कम होती है। इसलिये भी बच्चों पर प्रदूषण की मार अधिक पड़ती है।

10. स्मॉग पर कैसे काबू पाया जा सकता है?


वायु प्रदूषण पर काबू पाने के लिये दूरगामी रणनीति बनाकर प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिये नागरिकों, उद्योगों, राज्य और केन्द्र सरकार को मिलकर काम करना होगा। पुआल जलाने पर रोक के साथ-साथ वाहनों व उद्योगों के धुएँ, भवन निर्माण की धूल, पटाखे और कूड़ा जलाने को नियन्त्रित करना जरूरी है।

प्रस्तुति: उस्मान नसीम, शोधकर्ता (सीएसई)

 

 

 

 

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