जल प्रदूषण निवारण एवं जनता की भूमिका (Water pollution prevention and public role)

Submitted by Hindi on Mon, 03/06/2017 - 13:38
Source
योजना, 16-28 फरवरी 1991

‘जल ही जीवन है।’ यह कथन आदिकाल से चला आ रहा है। सृष्टि की उत्पत्ति के जो मूलभूत पाँच तत्व कहे गए हैं, उनमें जल का महत्त्व सर्वोपरि है क्योंकि यही रस रूप होकर प्राणियों को जीवन प्रदान करता है। जीवन को निरोग एवं स्वच्छ रखने के लिये जल की शुद्धता बरकरार रखनी आवश्यक है। गंगा आदि नदियों में स्नान का जो महात्म्य हमारे धर्म-ग्रन्थों में वर्णित है, उसके मूल में तथ्य यह है कि गंगा के जल में हिमालय पर्वत की दुर्लभ जड़ी-बूटियों का रस मिला हुआ रहता है जिससे शरीर के तमाम रोग दूर हो जाते हैं। लेकिन इसी जल में यदि बीमारी उत्पन्न करने वाला कूड़ा-कचरा मिल जाए तो वही गंगा प्राणलेवा भी बन सकती है।
प्रस्तुत लेख में जल प्रदूषण की इसी समस्या की ओर ध्यान आकर्षित कराया गया है तथा इसे दूर करने के लिये आवश्यक उपायों की चर्चा की गई है।


औद्योगीकरण के कारण उत्पन्न होने वाली विषैली गैसीय पदार्थों तथा रासायनिक प्रस्तावों को सोखकर वायु शुद्ध करने की वृक्षों में अद्भूत क्षमता है। वृक्षों की जड़ें पानी के वेग को कम करके भूमि क्षरण को रोकने तथा भूमि की उर्वराशक्ति बनाए रखने के साथ-साथ नदियों एवं जल धाराओं में निरन्तर जल प्रवाह प्रदान करती है।

भारत नदियों का देश है। ये नदियाँ देश के विभिन्न भागों को जीवन प्रदान करती हैं। देश के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, भौतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। नदियाँ परिवहन, सिंचाई एवं पेयजल की प्रमुख स्रोत रही हैं, जिसके कारण भारत के प्रमुख नगरों एवं गाँवों का विकास इन्हीं के तट पर हुआ। उत्पत्ति के आधार पर भारतीय नदियों का वर्गीकरण दो वर्गों में किया गया है। हिमालय की नदियाँ व प्रायद्वीपीय नदियाँ हिमालय की नदियाँ अपनी युवावस्था में हैं तथा शक्तिशाली होने के कारण मार्गों में परिवर्तन एवं कटाव करती रहती हैं। प्रायद्वीपीय नदियाँ उथली घाटियों में तथा वृद्धावस्था में पहुँच गयी हैं तथा इन नदियों की अपरदन क्षमता प्रायः समाप्त हो गयी है।

भारतीय नदियों से उत्पन्न समस्याएँ


आकार की दृष्टि से भारतीय नदियों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। बड़ी नदियाँ, जिनका अपवहन क्षेत्र 20,000 वर्ग कि.मी. से अधिक है। इनकी संख्या 14 है। मध्यम नदियाँ जिनका अपवहन क्षेत्र 2,000 से 20,000 वर्ग कि.मी. है। इसमें 44 नदियाँ हैं। छोटी नदियाँ जिनका अपवहन क्षेत्र 2,000 वर्ग कि.मी. से कम है। इनकी संख्या 55 है। हिमालय पर्वत से निकलने वाली नदियों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। यथा सिन्ध, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र तंत्र। प्रायद्वीपीय पठार की नदियों में गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार, कावेरी, नर्मदा, ताप्ती, माही, साबरमती प्रमुख हैं। उत्तरी भारत की नदियों का स्रोत हिमानी है तथा दक्षिणी भारत की नदियों का स्रोत वर्षा है, जो अधिकांशतः गर्मियों में सूख जाती हैं।

भारत में सिंचाई सुविधाओं का प्रमाण तो प्राचीन काल से मिलता है परन्तु प्रमुख रूप से इनका विकास 19वीं शताब्दी में हुआ। इस समय पूर्वी एवं पश्चिमी यमुना नहर का जीर्णोंद्धार किया गया। इसी शताब्दि के उत्तरार्द्ध में सरहिंद नहर, निचली सोहांग, चिनाव नहर, आगरा, बेतवा, पेरियार तथा मूथा नहर बनायी गयी। 20वीं शताब्दि के प्रारम्भ में बिहार में त्रिवेली; महाराष्ट्र में प्रवारा; गोदावरी, नीरा; उत्तर प्रदेश में शारदा; मध्य प्रदेश में वेनगंगा व महानदी नहर परियोजना प्रारम्भ की गयी। इस शताब्दि के उत्तरार्द्ध में नये-नये बाँध तथा नहरें निकाली गयी जिनमें प्रमुख भाखड़ा नांगल, राजस्थान नहर, व्यास नहर, रामगंगा, शारदा, कोसी, माताटीला, जवाहर सागर, कादना, उकाई, जयकवाड़ी, नागार्जुन सागर, तुंगभद्रा, मालप्रभा, घाटप्रभा, पोंग बाँध हैं। इन नहरों एवं बाँधों के बन जाने से नदियों की प्रवाह गति धीमी हो गयी है तथा कई स्थानों पर ये सूखने के साथ-साथ भयंकर रूप से प्रदूषित हो गयी हैं।

सिंचन क्षमता के आधार पर सिंचाई परियोजनाओं को तीन भागों में बाँटा गया है- बड़ी, मझोली एवं छोटी। इन परियोजनाओं की सिंचन क्षमता क्रमशः 10,000 हेक्टेयर से अधिक, 2000 से 10,000 हेक्टेयर तथा 2,000 हेक्टेयर से कम है। वर्तमान अनुमान के अनुसार 1135 लाख हेक्टेयर भूमि पर अंततोगत्वा सिंचन क्षमता का विकास किया जा सकता है जिसमें 735 लाख हेक्टेयर नदियों का जल से तथा 400 लाख हेक्टेयर भूगर्भ जल से होगा।

देश के कई भागों में बड़े पैमाने पर नहरें तथा बड़े एवं मझोले बाँध बनाये गये हैं जिनकी संख्या 450 है। इनसे विद्युत उत्पादन तथा खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हुई है। परन्तु जल संरक्षण के उपायों के प्रति बढ़ती हुई उपेक्षाओं के कारण जलाशयों की क्षमता हर वर्ष कम होती जा रही है। बाढ़ को बाँधों से बाँधने का उपाय जो नीतिवेत्तओं के मन में था अब इतना आसान नहीं बन पा रहा है। बड़े जलाशयों के लिये अधिक जगह की आवश्यकता पड़ती है। खेतों में केवल सिंचाई का इन्तजाम करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि जल निकासी का भी प्रबन्ध करना आवश्यक है। एकत्रित जल पौधों की जड़ों में वायु प्रवेश करने से रोकता है जिससे फसलों को नुकसान पहुँचता है।

सिंचित क्षेत्रों में नहरों एवं जलाशयों के कारण धरातल का जलस्तर ऊपर उठ जाता है। मिट्टी में क्षार की मात्रा बढ़ने लगती है। इस तरह की समस्या पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, उड़ीसा में तेजी के साथ बढ़ रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ कई कारणों से नदियों के पानी को जमाकर नहरों द्वारा सिंचाई करने के पक्ष में नहीं हैं। इसकी लागत अधिक होने के साथ-साथ नहरों, बाँधों की तली में मिट्टी एवं मलबा जमने लगता है। बड़े पैमाने पर वनों का विनाश होता है और लाखों की संख्या में क्षेत्रीय आबादी विस्थापित होती है। इससे बहुउद्देशीय परियोजनाएँ जैसे दामोदर, भाखड़ा नांगल, रिहन्द, हीराकुंड, चम्बल, नागार्जुन सागर, तुंगभद्रा, कोचमपाद, गंडक, कोसी, ककरापार, पारम्बिकुलम, अलियार, मयूराक्षी आदि तेजी से प्रभावित हो रही हैं।

प्राचीन काल में राजाज्ञा होती थी कि जलाशयों, नदियों में मल विसर्जन, बर्तन धोना, पशुओं को स्नान कराना, कपड़े साफ करना, शवों को फेंकना आदि वर्जित है। उसके चारों तरफ वृक्षों को बड़े पैमाने पर लगाया जाता था जिससे वहाँ का दृश्य रमणीय होने के साथ-साथ दर्शनीय एवं शान्तिवर्धक हो जाए। नवीनतम वैज्ञानिक अनुमान के आधार पर यह लगभग प्रमाणित हो चुका है कि बड़े एवं मझोले बाँध किसी भी दशा में देश के लिये उपयुक्त नहीं है, उसके स्थान पर छोटे बाँधों का निर्माण किया गया। यद्यपि इससे लागत व्यवस्था में वृद्धि होगी परन्तु लम्बे अन्तराल में इससे अधिक लाभ एवं पर्यावरण सुरक्षा में मदद मिलेगी नये बाँध बनाने के लिये जमीनों का अधिग्रहण किया जाता है, जिससे कार्यालय, आवासीय भवनों, सड़कों आदि का निर्माण किया जा सके।

इतना ही नहीं, परियोजना की आवश्यकता को पूरी करने के लिये पहले से विद्यमान मार्गों, भवनों तथा अन्य भौतिक संरचनाओं को हटा दिया जाता है। उदाहरणार्थ-नर्मदा सागर परियोजना में 23 कि.मी. लम्बी रेल की पटरी, 85 कि.मी. लम्बी सड़कें, 45 कि.मी. लम्बी टेलीफोन लाइनें, 19,000 भवन एवं 3310 पीने के पानी वाले कुँओं को तोड़ा गया। इसके अतिरिक्त इन परियोजनाओं से वनों का विनाश, भूक्षरण, मल निक्षेप, तलछटीकरण, जलभराव, वन्य जीवन अर्थात जैविक-अजैविक दोनों तत्वों का विनाश होता है जिसकी पर्यावरणीय लागत खरबों रुपए तक पहुँच जाती है, इसके लिये नियोजित व्यूह रचना का अपनाया जाना अति आवश्यक है।

भारतीय नदियों में प्रदूषण


देश की 80 प्रतिशत आबादी झील, कुँओं तथा नदियों के प्रदूषित जल का उपयोग करती है। लगभग 20 लाख व्यक्ति प्रतिवर्ष दूषित जल पीने के कारण मरते हैं। 1956 में दिल्ली में प्रदूषित यमुना के जल पीने से 200 व्यक्ति मरे और 30,000 व्यक्ति पीलिया के शिकार हुए। इसी तरह के परिणाम 1964 एवं 1970 में भी हुए। शहरीकरण और आद्योगिकीकरण के कारण प्रदूषण की नयी समस्यायें उत्पन्न हो गयी हैं। घरों तथा औद्योगिक कारखानों से निकले दूषित जल-मल को बिना साफ किए ही नदियों में डाल दिया जाता है। जिससे नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है।

उत्तर प्रदेश के 12,000 उद्योगों में से 1700 मुख्य रूप से प्रदूषणकारी हैं, जिसमें सिर्फ 150 उद्योगों में उत्प्रवाह के शुद्धीकरण की व्यवस्था है। इसी तरह 104 चीनी मिलों में सिर्फ 11 मिलों में शुद्धीकरण की व्यवस्था है। इसी प्रकार 31 डिस्टीलियरों में 6 द्वारा अपने शुद्धीकरण यंत्र लगाए गए हैं।

नदियों के जल प्रदूषण को रोकने एवं पर्यावरण सुधार हेतु जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाना अति-आवश्यक है। भारत के साथ-साथ विश्व के अन्य देशों को भी आगे आना होगा। नदियों के जल प्रदूषण रोकने के लिये सीवेज स्टेशनों द्वारा दूषित जल की सफाई करके सिंचाई या नदी में डालना चाहिए। सभी शहरों में विद्युत शवदाह गृह उसकी आबादी के अनुपात में बनाना चाहिए। कुछ लोग अभी भी अपने रिश्तेदारों के शव शव-दाह गृहों में नहीं ले जाते। आवश्यकता यह है कि उन्हें बताया जाए कि इससे पर्यावरण की सुरक्षा में काफी मदद मिलेगी।

गंगा, भारत तथा विश्व की एक पवित्र नदी है, इसमें रेडियोएक्टिव, खनिज बैक्टीरियोफेज और भारी तत्व लौह, ताम्र, क्रोमियम व निकिल पाया जाता है, जोकि उस जल को शुद्ध बना देता है। लेकिन आज उसमें औद्योगिक अवशिष्टों तथा जल-मल के गिरने के कारण प्रदूषण की मात्रा बढ़ गयी है। कानपुर में गंगा में चमड़े, रसायन, सूती, दुग्ध उद्योग के उत्प्रवाह तथा शहरी मल-जल मिलते हैं। इलाहाबाद में लगभग 13 बड़े नाले 4 करोड़ लीटर मल-जल के साथ गंगा-यमुना में मिलते हैं। गंगा परियोजना के कारण इसमें काफी सुधार हुआ है। इसके अंतर्गत गऊघाट पम्पिंग स्टेशन की क्षमता को 60 एम.एल.डी. से 160 एम.एल.डी. किया गया, तीन मध्यम स्तर के सीवेज पम्पिंग स्टेशन अलोपीबाग, बाकरगंज तथा मम्फोर्डगंज की क्षमता में सुधार किया गया। गऊघाट पम्पिंग स्टेशन से सीवेज को यमुनापार नैनी तथा डांडी भेजा जाता है, जिसमें 435 तथा 416 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है, सीवेज जल से गेहूँ, चावल, सरसों, खड़, अरहर, ज्वार-बाजरे की खेती उपयुक्त होती है परन्तु सब्जियों जैसे आलू, प्याज, लहसुन, साग, बैंगन, मूली, गोभी, सिंचाई के लिये अनुपयुक्त होती है, क्योंकि इसमें पेट की बीमारियों के बैक्टीरिया तथा कीटाणु पाये जाते हैं। गंगा परियोजना के अंतर्गत दारागंज में विद्युत शवग्रह का निर्माण किया गया है।

वाराणसी में 15 बड़े नाले (2,000 गैलन प्रति मिनट क्षमता) 19 मध्यम नाले (5 से 2,000 गैलन प्रति मिनट क्षमता) तथा अन्य कई छोटे नाले जिनकी क्षमता 5 गैलन प्रति मिनट से कम है, गिरते थे। इन सभी नालों को घाटों के किनारे मिलाकर अस्सी, हरिश्चन्द्र, दशाश्वमेघ व राजघाट पम्पिंग स्टेशन पर एकत्र कर कोनिया ले जाया जाता है, जहाँ पर उसे साफ करके सिंचाई के लिये उपयोग किया जाता है। मथुरा में साड़ियों की रंगाई छपाई का कार्य कई वर्षों से चल रहा है। उससे निकलने वाला दूषित जल यमुना में मिलकर रासायनिक प्रदूषण को जन्म देता है। आगरा में भी चमड़ा उद्योग से निकला दूषित जल इस नदी में जाता है जिससे बीमारियों में वृद्धि होती है।

सीवर के जल में टायफाइड, हैजा, पेचिस आदि बीमारियों के कीटाणु होते हैं। इसके अतिरिक्त उसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटास भी मिलता है, जिनका उपयोग कार्बनिक खाद के रूप में किया जाता है। सीवेज सफाई के बाद उसके जल को लम्बी उगने वाली फसलों की सिंचाई में किया जा सकता है।

ग्रामीण एवं शहरी कूड़ा-कचरा


ग्रामीण एवं शहरी कूड़ा-कचरा भी बड़े पैमाने पर भूमिगत जल, नदियों एवं झीलों को प्रदूषित करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कूड़ा-कचरा, गोबर का ढेर, नालियों का पानी, खलिहानों के पुआल तथा भूसी के कारण होता है। धान के पौधे से उपलब्ध सम्पूर्ण बायोगैस में 90 प्रतिशत पुआल और 10 प्रतिशत अन्न होता है। अन्य अनाजों में 22 से 75 प्रतिशत तक भूसी या छिलका रहता है। तथा 5 से 7 प्रतिशत चोकर होता है। देश में आजकल 400 लाख टन धान उत्पादित होता है, जिसमें 20 लाख टन चोकर निकलता है। जिससे तेल निकालने पर 1500 करोड़ रुपए की मुद्रा प्राप्त होती है। इसका उपयोग सीमेंट बनाने, ऊसर भूमि के सुधारने में भी किया जा सकता है।

जहाँ तक प्रतिव्यक्ति कचरे का सवाल है, जापान में 2 कि.ग्रा. अमेरिका में 3 कि.ग्रा. तथा भारत में 0.5 से 0.7 कि.ग्रा. कचरा उत्पन्न होता है। देश में प्रतिवर्ष 2040 लाख टन नगरीय कचरा उपलब्ध होता है। पशुओं से सम्बन्धित आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष 10000-10500 लाख टन गोबर उपलब्ध होता है। अगर इनसे बायोगैस बनायी जाए तो 224250 लाख घन मीटर गैस प्राप्त हो सकती है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इस समय 130 लाख टन कृृषीय कचरा उत्पन्न होता है इन कचरों का सदुपयोग अल्कोहल तथा ईंधन उत्पन्न करने के लिये किया जा सकता है।

शहरों में कूड़ा-कचरा घरों एवं औद्योगिक संस्थानों से उत्पन्न होता है। यहाँ पर इसे जलाते, गढ्ढों में भरते, नदियों या समुद्र में फेंक देते हैं। कूड़े-करकट की ढेरों की सड़न से मिथेन एवं कार्बन डाइआक्साइड बनती है जोकि पूरे वातावरण को दूषित कर देती है। जिन शहरों में 250 टन से अधिक कूड़ा-करकट निकलता हो वहाँ पर यांत्रिक कम्पोस्ट संयंत्र लगाया जाना चाहिए। इससे उत्पन्न कार्बनिक खाद में नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटास की मात्रा काफी संतुष्टजनक होती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में जल प्रदूषण


शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी जल प्रदूषण की समस्या काफी विकट होती है जा रही है। गाँवों में जल धरातलीय एवं भूमिगत दोनों स्रोतों से प्राप्त किया जाता है। धरातलीय स्रोतों में नदी, झील, तालाब, नहर तथा भूमिगत जल में कुएँ एवं नलकूप प्रमुख हैं। गाँवों में अज्ञानता के कारण प्रदूषित जल पीने के लिये उपयोग किया जाता है। कुएँ अधिकतर खुले होते हैं उनमें धूल, खरपतवार इत्यादि पड़ते रहते हैं। प्रायः कुँओं के ऊपर मेड़ इत्यादि नहीं होते जिससे बरसात के दिनों में गंदा जल आस-पास के क्षेत्रों में आकर मिल जाता है।

गाँवों में लोगों के घरों से निकलने वाला जल-आस-पास के क्षेत्रों में ही एकत्र हो जाता है। कभी-कभी तो इन्ही गंदी नालियों को लेकर लोगों में आपस में झगड़े भी हो जाते हैं। स्थिर गंदे जल से मच्छरों की बढ़ोतरी के साथ-साथ छुआ-छूत की बीमारियाँ भी तेजी से फैलती हैं। आज देश के केवल 15 प्रतिशत गाँवों में ही शौचालयों का उपयोग किया जाता है। शेष 85 प्रतिशत गाँवों में खुले स्थान का शौच के लिये उपयोग किया जाता है, जोकि वर्षा के समय में बहकर तालाबों, नदियों में मिलकर नॉन प्वाइंट प्रदूषण बनाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 80 प्रतिशत रोगों का सम्बन्ध जल से होता है। देश में अधिकांश लोग पेट की बीमारियों से पीड़ित हैं। देश में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति एक हजार व्यक्ति पर 16.5 व्यक्ति केवल पेचिस से मरते हैं।

उद्योग धन्धों, नालियों से डाला गया गन्दा जल, नदियों, झीलों, तालाबों के साथ-साथ भूमिगत जल को भी प्रदूषित कर देता है। सन 1981 में सूरत से 7 कि.मी. दूर 10 गाँवों के लोग प्रदूषित जल से प्रभावित हो गए। इसका प्रमुख कारण यह था कि मिंघोला नदी में उद्यवा औद्योगिक क्षेत्र से बड़े पैमाने पर फ्लोराइड युक्त गंदा जल डाला गया जिससे इस नदी की मछलियाँ मरने लगीं तथा बच्चों, गाय, बैल, भैंसों में दाँत की बीमारी फैलने लगी।

काम्बें शहर के आस-पास के क्षेत्रों में भूमिगत जल में सीसा (लेड) की मात्रा अधिकतम निर्धारित सीमा से आठ गुनी अधिक है। यही स्थिति बम्बई के आस-पास के क्षेत्रों की है। मई 1982 में उदयपुर के नंदवेल गाँव के चार बच्चे प्रदूषित कुएँ के जल पीने के कारण मर गए। इसका प्रमुख कारण यह था कि हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड कारखाना अपना गंदा जल बरची नदी में उड़ेलता था जिससे आस-पास का भूमिगत जल विषैले खनिज पदार्थों के कारण प्रदूषित हो गया था।

भूमिगत जल प्रदूषण


ऐसा विश्वास किया जाता है कि भूमिगत जल प्रदूषण से मुक्त होता है। जब तक कि उसमें ऊपरी क्षेत्र से प्रदूषित जल शोषित नहीं होता। परन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है, भूमिगत जल औद्योगिक गंदे जल, गंदी नालियों के जल के भूमि में सोखने के साथ-साथ रासायनिक खाद, सूक्ष्म जीवाणुओं, कीटाणुनाशक दवाइयों, डी.डी.टी. आदि से प्रदूषित होता है। यह जल उन क्षेत्रों में जल्दी प्रदूषित हो जाता है, जहाँ भूमिगत जलस्तर काफी ऊपर होता है। आवश्यकता इस बात की है कि उन सभी क्षेत्रों में जहाँ भूमिगत जलस्तर ऊँचा है जल का रासायनिक विश्लेषण करके लोगों को उपलब्ध कराया जाए। इण्डियन टाक्सीकोलॉजिकल रिसर्च सेंटर तथा के.जी. मेडिकल कॉलेज, लखनऊ ने उन्नाव जिले के कुछ ऊँचे जलस्तर वाले कुँओं के जल परीक्षण के बाद यह सिद्ध किया कि इसमें मैग्नीज की मात्रा अधिक है, जिससे आदमी लकवा का शिकार आसानी से हो जाता है।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड


पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार ने जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 तथा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 बनाया है। इसी तरह से देश के कई राज्यों ने यथा उत्तर पदेश जल प्रदूषण एवं नियंत्रण बोर्ड, 1975 उड़ीसा नदी प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम, 1958, महाराष्ट्र जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम, 1969 बनाए हैं। यदि कोई कारखाना या प्रतिष्ठान पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा हो तो कोई भी व्यक्ति या संस्था अपने निकट के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को रिपोर्ट कर सकता है और अगर 60 दिन के अंदर कोई कार्यवाही नहीं हुई तो आप दोषी के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा दर्ज कर सकते हैं। जिससे दोषी को 5 वर्ष की कैद या एक लाख रुपए जुर्माना या दोनों हो सकता है।

जल प्रदूषण निवारण में जनता की भूमिका


यह एक कटु सत्य है कि केवल कानूनों के बल पर ही पर्यावरण की सुरक्षा नहीं की जा सकती। सरकार कानून बना सकती है, उसे लागू कर सकती है। किन्तु उसकी भी एक सीमा है। गंगा परियोजना इसका एक ज्वलन्त उदाहरण है। मुख्य बात जन मानसिकता की है। जब तक आम आदमी के मन में यह बात नहीं बैठायी जाएगी कि पर्यावरण सुरक्षा में उसका सरकार से कहीं अधिक दायित्व है तब तक इस दिशा में सुधार मुश्किल है। अतः पर्यावरण सुरक्षा के प्रश्न को हमें जन आंदोलन का रूप देना होगा।

बच्चों के मन में प्रकृति के प्रति मोह पैदा करने का प्रयास करना चाहिए तथा पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना चाहिए। आज चंद रुपए के लिये लोग हरे-भरे वृक्षों का काट देते हैं, उद्योगों में प्रदूषण नियंत्रण हेतु मशीनों को नहीं लगाते तथा दूषित जल नदियों में डालते हैं। इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम मानवता के भविष्य को ध्यान न देकर केवल अपना ध्यान दें। इसी तरह औद्योगिक क्रांति के समय ब्रिटेन के लोगों की मानसिकता कुछ इस प्रकार से बदली थी कि उन्हें अपनी विरासत तक का ध्यान न रहा। उनकी टेंम्स नदी प्रदूषित हो गयी थी किन्तु वहाँ के चिंतक वर्ग ने इसका सामयिक विरोध किया। उन्हें अपनी संस्कृति के लुप्त हो जाने का खतरा दिखायी पड़ रहा था, अंततः उनकी बातें सुनी गयीं तथा संस्कृति के नाम पर विकास को नियंत्रित किया गया।

यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर आज ऐसे कितने लोग नेता बन गए हैं और ऐसी कितनी संस्थाएँ करोड़ों की लेन-देन कर रही हैं, जिन्हें वास्तव में पर्यावरण से कभी कोई सरोकार नहीं रहा। पर्यावरण के नाम पर देश-विदेश में होने वाले सम्मेलनों में ऐसे संदिग्ध चेहरे आसानी से देखे जा सकते हैं। हमें आंकड़ों के लिये या फोटो खिंचवाने के लिये वृक्षारोपण नहीं करना है। हम पौधे लगाएँगे क्योंकि यह हमारा धर्म है। हमें अपने क्षेत्र के पर्यावरण में सुधार लाना है तथा विश्व में पर्यावरण के प्रति जनचेतना उत्पन्न करना है। आज विश्व के सामने सबसे बड़ी समस्या ओजोन परत का पतलापन तथा अंटार्कटिका में छेद, अम्लीय वर्षा, ग्रीन हाउस प्रभाव तथा विश्व में ताप क्रम का बढ़ना है। लगभग 2015 तक विश्व का तापक्रम 1 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ जाएगा और भारत का 1/8 भाग समुद्री जल के अधीन हो जाएगा। अंटार्कटिका, आर्कटिक प्रदेशों की बर्फ जल में बदलने लगेगी और विश्व के कई देश सामुद्रिक जल के अधीन हो जाएँगे।

विश्व में कई संस्थाएँ पर्यावरण सुधार हेतु कार्यरत हैं जिनमें ग्रीन-पीस वर्डवाच, वर्ड रिसोर्स इन्स्टीच्यूट, सावाह आलम, मलेशिया का कार्य इस दिशा में संतोषजनक है। गत वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस (5, जून 1990) पर ‘‘बम्बई नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी’’ को ‘ग्लोबल 500’’ पुरस्कार दिया गया। इसके साथ-साथ 1962 में स्थापित ‘द केरला सत्र-साहित्य परिषद’, जिसकी 1300 इकाईयाँ एवं 50,000 सदस्य हैं, पर्यावरण संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के प्रचार-प्रसार पर उल्लेखनीय कार्य कर रही है।

नदियों के जल प्रदूषण को रोकने एवं पर्यावरण सुधार हेतु जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाना अति-आवश्यक है। भारत के साथ-साथ विश्व के अन्य देशों को भी आगे आना होगा। नदियों के जल प्रदूषण रोकने के लिये सीवेज स्टेशनों द्वारा दूषित जल की सफाई करके सिंचाई या नदी में डालना चाहिए। सभी शहरों में विद्युत शवदाह गृह उसकी आबादी के अनुपात में बनाना चाहिए। कुछ लोग अभी भी अपने रिश्तेदारों के शव शव-दाह गृहों में नहीं ले जाते। आवश्यकता यह है कि उन्हें बताया जाए कि इससे पर्यावरण की सुरक्षा में काफी मदद मिलेगी। गंगा परियोजना के अंतर्गत 32 विद्युत शवदाह गृह 22 शहरों में बनाए जा रहे हैं। इससे प्रतिवर्ष 3,000 कुन्तल लकड़ी की बचत या 900 हेक्टेयर वन की सुरक्षा होगी। नदियों के किनारे ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में सुलभ शौचालयों का निर्माण कराया जाना चाहिए। इससे न केवल सफाई होगी बल्कि रोजगार एवं पर्यावरणीय भूदृश्य में भी सुधार होगा। इस क्षेत्र में स्वेच्छिक संस्थाएँ बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को आगे आना होगा।

धोबियों एवं पशुओं के स्नान आदि के लिये शहर से जाने वाली नदी के अंतिम छोर का उपयोग किया जाना चाहिए। स्कूल, कॉलेज, गाँव-शहर में बड़े पैमाने पर पर्यावरण गोष्ठियाँ तथा लेखन प्रतियोगिता कराने की आवश्यकता है, जिससे पर्यावरण संरक्षण की ओर लोग आकर्षित हों। जल प्रदूषण से बचने के लिये ऊर्जा प्रदूषण को रोकना नितांत आवश्यक है। गाँवों में धुएँरहित चूल्हे का बड़े पैमाने पर विकास किया जाना चाहिए। साथ ही साथ सौर ऊर्जा पर आधारित साधनों का विकास करना होगा। रासायनिक खादों का कम से कम उपयोग किया जाना चाहिए। बड़े पैमाने पर बायोगैस संयंत्र गाँवों एवं शहरों में लगाए जाएँ जिससे खाद उत्पादन एवं गैस उत्पादन के साथ पर्यावरण में भी सुधार हो सके। डी.डी.टी., एल्डरीन, लिंडेन के उपयोग पर सरकार द्वारा तत्काल रोक लगायी जाए अन्यथा स्वच्छ जल और भी प्रदूषित हो जाएगा।

नदियों, झीलों, तालाबों में पाए जाने वाले जीव-जन्तुओं का संरक्षण भी अति-आवश्यक है। घड़ियाल, मेंढक, कछुए जो गाँव के पोखरों में बड़ी संख्या में मिलते थे, अब समाप्त हो रहे हैं। सरकारी नियंत्रण के बावजूद भी मेंढक की टांगों का बड़े पैमाने पर निर्यात होता है। मेढक पर्यावरण के लिये अति-आवश्यक जीव है। यह अपने शरीर के बराबर जीव-जन्तुओं एवं मच्छरों को खा जाता है। आज उसके भी संरक्षण की आवश्यकता है।

औद्योगीकरण के कारण उत्पन्न होने वाली विषैली गैसीय पदार्थों तथा रासायनिक प्रस्तावों को सोखकर वायु शुद्ध करने की वृक्षों में अद्भूत क्षमता है। वृक्षों की जड़ें पानी के वेग को कम करके भूमि क्षरण को रोकने तथा भूमि की उर्वराशक्ति बनाए रखने के साथ-साथ नदियों एवं जल धाराओं में निरन्तर जल प्रवाह प्रदान करती है। बाढ़ भूमि स्खलन, सूखे तथा प्रदूषण से बचने हेतु वृहद स्तर पर उपाय वृक्षारोपण ही है। खेत की मेड़ों, घरों के अहातों, विद्यालय प्रांगणों, सामूहिक चरागाहों, नदियों के किनारे तथा बंजर भूमि पर उचित प्रजातियों के वृक्ष लगाए जाएँ।

11, एडीए फ्लैट, अशोक नगर, इलाहाबाद-21001

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