ताप बिजलीघरों से प्रदूषण : एक विश्लेषण

Submitted by Hindi on Tue, 03/07/2017 - 12:54
Source
योजना, 16-28 फरवरी 1990

पर्यावरण प्रदूषण देश की ही नहीं आज विश्व की ज्वलंत समस्या है। नियोजित विकास की प्रक्रियाओं से प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ता है जिसके कारण अनेक विपदाएँ आती हैं। ताप बिजलीघरों से जो धुआँ वातावरण में फैलता है उससे जल और वायु प्रदूषण बढ़ता है जो वनस्पति और प्राणी-जगत पर बुरा प्रभाव डालता है। लेखक ने बिजलीघरों से निकलने वाले धुएँ से वनस्पति तथा पानी के प्रदूषण होने के विभिन्न आयामों पर विस्तार से विचार किया है। संक्षेप में उन्होंने प्रदूषण रोकने की बात भी कही है। वातावरण प्रदूषण से मनुष्य के शरीर पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ होती हैं जिनसे नाना प्रकार की बीमारियाँ होने का डर रहता है।

सामाजिक विकास की वर्तमान प्रक्रिया में प्राकृतिक स्रोतों के समुचित उपयोग के साथ-साथ पर्यावरण की सुरक्षा करना अत्यावश्यक है। समूचे संसार में चलने वाली विकास योजनाओं ने प्रत्येक स्तर पर पर्यावरण को बदल दिया है। विकास प्रक्रिया सदैव किसी न किसी प्रकार के प्रदूषण से जुड़ी है जिससे न केवल पशु जीवन एवं वनस्पति जगत बल्कि मनुष्य जाति के अस्तित्व को भी खतरा पैदा हो गया है।

अनियोजित विकास की प्रक्रिया से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है तथा व्यापक पैमाने पर विपत्तियाँ आती हैं। घातक गैसों का रिसाव, पानी में विषैले रसायनों का मिलना, सूखा, भूस्खलन, बाढ़, बाँधों में मिट्टी या बालू का जमा होना, पेड़ पौधों का विनाश तथा वन्य जीवों एवं मछलियों का विनाश इनमें मुख्य हैं।

धुएँ और राख से प्रदूषण


ताप विद्युत गृहों में ईंधन के दहन से विनाशकारी गैस एवं ठोस पदार्थ निकलते हैं जो पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। कल कारखानों से भारी मात्रा में निकलने वाला धुआँ, यातायात के साधनों से उत्पन्न गैस, कृषि में प्रयुक्त रासायनिक खाद तथा मनुष्य निर्मित अविघटित पदार्थों के एकत्रीकरण से पर्यावरण विषाक्त हो रहा है। भारतवर्ष में इस शताब्दी के अन्त तक करीब 70,000 मेगावाट बिजली ऐसे कोयले से प्राप्त होगी जिसमें राख की मात्रा अधिक है। यह राख वातावरण तथा जलाशयों को दूषित कर रही है।

यह सही है कि विभिन्न औद्योगिक प्रतिष्ठान उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपना उत्तरदायित्व समझते हैं, परन्तु उत्पादकता की दौड़ में पर्यावरण संरक्षण गौण हो गया है। वास्तविकता यह है कि हमने प्रकृति पर आक्रमण कर दिया है और प्राकृतिक साधनों का समुचित उपयोग करने के स्थान पर हम उनका शोषण कर रहे हैं। आज संसार में ऐसे मनुष्यों की संख्या बढ़ रही है जो इस बात में विश्वास रखते हैं कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने के स्थान पर यदि इसे नष्ट किया जाए तो अधिक धन की प्राप्ति होगी। कल क्या होगा, विरासत में अगली पीढ़ी को क्या देंगे, इससे उन्हें कुछ भी प्रयोजन नहीं है।

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद और मध्यप्रदेश के आस-पास के क्षेत्रों में तापीय विद्युत गृह तथा अन्य उद्योग कल-कारखाने बहुतायत से लगाये गये हैं। सिंगरौली, विन्ध्याचल, रिहन्द अनपाड़ा और रेणुसागर में बड़े तापीय विद्युत गृहों का जाल बिछाया गया है। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र के अन्तर्गत रेनुकूट में हिण्डालको, एल्युमिनियम कार्पोरेशन और कनोरिया-केमिकल्स, विकास औद्योगिक गैस, हाइटेक कार्बन, डाला और चुर्क सीमेन्ट फैक्टरी तापीय विद्युत गृह ओबरा आदि कल-कारखानों की स्थापना की गई है। सिंगरौली में वन सम्पदा को नष्ट करके खदानों से कोयला और पत्थर निकाला जा रहा है।

ताप विद्युत गृहों में प्रतिदिन हजारों टन अधिक राख युक्त कोयला जलाया जाता है। इन विद्युत गृहों तथा कल-कारख़ानों ने इस क्षेत्र की प्राकृतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बिल्कुल बदल दिया है। प्राकृृतिक चट्टानें, जो पेड़-पौधों से ढकी रहती थी, खनन के फलस्वरूप समाप्त होती जा रही हैं। बड़ी-बड़ी मशीनों एवं ऊँची चिमनियों से राख मिश्रित धुआँ ऊपर उठकर अम्लीय वातावरण की रचना करता है। सीमेन्ट के छोटे-छोटे कण आसानी से पेड़-पौधों की पत्तियों पर एवं श्वसन क्रिया द्वारा मनुष्य के फेफड़ों में जमा हो जाते हैं। वस्तुतः इन प्रदूषणकारी क्रियाओं से स्वच्छ हवा, पानी ईंधन की लकड़ी, मकान के काम आने वाली लकड़ियाँ, चारागाह आदि समाप्त होते जा रहे हैं और मरुस्थल बनने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी है। इस प्रकार यह जनपद, जो अपनी वन्य एवं खनिज सम्पदा के लिये देश में ही नहीं परन्तु विदेशों में भी सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर चुका है, पर्यावरण प्रदूषण की भयावहता से आक्रान्त हो रहा है।

भारत सरकार के ऊर्जा मन्त्रालय द्वारा गठित ‘तथ्यों का पता लगाने वाली’ समिति ने अपनी 1987 की रिपोर्ट में बताया है कि मिरजापुर जनपद (सोनभद्र) में लगे तापीय विद्युत गृहों एवं कारखानों में लगी हुई चिमनियों से निकली हुई राख और धुएँ से यहाँ का पर्यावरण दूषित हो गया है। समिति ने इस सम्बन्ध में हिण्डालको रेणुसागर उद्योग, डाला एवं चुर्क सीमेन्ट फैक्टरी तथा ओबरा ताप विद्युत गृह को प्रदूषण के लिये विशेष रूप से उल्लिखित किया है। इन कल-कारखानों से निकाले गये विभिन्न प्रकार के घातक रसायनों, तेजाब आदि से सोन नदी तथा रिहन्द जलाशय का जल भी बड़े स्तर पर प्रदूषित हो रहा है।

ताप विद्युत गृहों में ईंधन के जलने से विभिन्न प्रकार की हानिकारक गैस, कार्बनडाइआक्साइड, नाइट्रोजन, सल्फर डाइआक्साइड, सल्फर ट्राइआक्साइड और राख निकलती हैं। उच्च ताप पर नाइट्रोजन हवा से संयोग करके नाइट्रोजन डाइआक्साइड, नाइट्रिक आक्साइड और परमाणविक ऑक्सीजन में बदल जाती है। परमाणविक ऑक्सीजन आणविक ऑक्सीजन से क्रिया करके ओजोन को सुदृढ़ करता है। प्रदूषित वातावरण में ओजोन प्राकृतिक ओजोन से 10 से 20 गुना अधिक बढ़ जाता है।

भट्टियों में ईंधन के पूर्णरूप से न जलने पर कार्बन मोनो आक्साइड, हाइड्रोकार्बन और कुछ कैंसर उत्पन्न करने वाले रसायन अधिक मात्रा में बनते हैं। अत्यधिक महत्त्व के बहुत से कैंसर उत्पन्न करने वाले पदार्थों में हाइड्रोकार्बन और विशेष रूप से बेन्ज़ापायरिन होते हैं। जब हवा कम होती है और ईंधन पूर्णरूप से नहीं जलता है तो बेन्जापायरिन अधिक मात्रा में बनता है।

नाइट्रोजन आक्साइड की न्यूनतम मात्रा भी मनुष्य तथा अन्य जीव-जन्तुओं के श्वसन अंगों में उत्तेजनशीलता, उपकरणों एवं पदार्थों को नष्ट करने, घना कुहरा बनाने एवं दृष्टि को नुकसान पहुँचाने में सक्षम हैं। ठोस ईंधन में गंधक आयरन पायराइट, आणविक सल्फर और सल्फेट के रूप में पाया जाता है। ईंधन के दहन होने पर तीनों प्रकार के सल्फर, सल्फर डाइआक्साइड और सल्फर ट्राइआक्साइड के रूप में ईंधन गैस में सम्मिलित हो जाते हैं।

ताप विद्युत गृहों द्वारा उत्पन्न रासायनिक कचरे में उपस्थित दूषित पदार्थों के प्राकृतिक पदार्थों से संयोग होने के फलस्वरूप बने हुए जटिल रासायनिक पदार्थ धरती पर जमा हो जाते हैं और वर्षा के कारण मिट्टी और नदियों के संग्रहण क्षेत्र में मिल जाते हैं, जिससे प्रदूषण भारी मात्रा में फैलता है।

चिमनियों से निकलने वाले धुएँ का शुद्धीकरण


ऊँची चिमनियों द्वारा निकली हुई गर्म गैसें काफी ऊँचाई तक जाकर वातावरण की ऊपरी सतह में मिल जाती हैं। इन ईंधन गैसों एवं राख को वातावरण में निकलने से पूर्व गैसों के विशुद्धीकरण की आधुनिक विधियों द्वारा काफी हद तक दूषित गैसों से रहित किया जा सकता है। गैस शुद्धीकरण के लिये इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रेसिपिटेटर्स प्रयोग में लाए जाते हैं। ईंधन और दूषित गैसों के शुद्धीकरण के बाद भी बाहर निकलने वाली गैस में कुछ न कुछ अशुद्धता रह ही जाती है। यदि वातावरण की अशुद्धता वैज्ञानिक मानक के अनुसार अधिक न हो तो जीवों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता। परन्तु बहुत से तापीय गृहों में इन विधियों का प्रयोग नहीं कर जहरीले रसायन निरन्तर वातावरण में उड़ेले जा रहे हैं।

प्राकृतिक एवं औद्योगिक दोनों प्रकार के विषैले पदार्थ सम्पूर्ण जीवमण्डल पर अपना घातक प्रभाव डालते हैं। इन जीवमण्डल में पृथ्वी की सतह के समीप का वातावरण, मिट्टी की ऊपरी सतह और नदियों का संग्रहण क्षेत्र भी आता है। यद्यपि कभी-कभी प्राकृतिक प्रदूषण, औद्योगिक प्रदूषण से भी भयावह होता है लेकिन औद्योगिक प्रदूषण ज्यादा हानिकारक होता है क्योंकि इसका कुप्रभाव घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अधिक होता है।

विभिन्न उद्योगों से निकली दूषित गैसों का घातक प्रभाव स्थानीय अथवा सम्पूर्ण भूमण्डल पर हो सकता है। तेजी से हो रहे औद्योगिक विकास के कारण सम्पूर्ण जीवमण्डल पर दुष्प्रभाव पड़ता है। विद्युत गृहों की ऊँची चिमनियों से निकलने वाले दूषित पदार्थ का प्रभाव चारों तरफ 20-25 किलोमीटर के क्षेत्रफल तक हो सकता है। ईंधन गैसों में मौजूद दूषित पदार्थों से वनस्पतियों, जीवजन्तुओं वहाँ के रहने वाले मनुष्य और उनके भवन इत्यादि पर बहुत हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

उड़ने वाली राख की काफी मात्रा पेड़-पौधों की पत्तियों पर जमा होने से प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया अत्यन्त मन्द पड़ जाती है या रुक जाती है। प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया न होने के कारण पेड़-पौधों की वृद्धि एवं विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। यह उड़ने वाली राख श्वसन क्रिया के दौरान फेफड़ों में प्रवेश कर जाती है जिसके परिणाम स्वरूप विभिन्न प्रकार के रोक जैसे दमा फेफड़ों में सूजन एवं तपेदिक जैसे जानलेवा एवं कष्टप्रद बीमारियाँ हो जाती हैं।

पेड़ों पर प्रभाव


कोयले और पेट्रोल दोनों प्रकार के ईंधनों के दहन से निकलने वाली सल्फर डाइआक्साइड गैस ज्यादा देर तक गैस अवस्था में नहीं रहती। यह गैस वातावरण की नमी से क्रिया करके सल्फ्यूरस एवं सल्फ्यूरिक अम्ल बना देती है जिसके परिणाम स्वरूप ही अम्ल की वर्षा होती है। सल्फ्यूरिक अम्ल संगमरमर के निर्माणों एवं बहुत से भवनों का धीरे-धीरे क्षरण कर देता है वैज्ञानिक प्रयोगों से पता चलता है कि वनस्पतियाँ वातावरण की सल्फर डाइआक्साइड गैस के प्रति अधिक सूक्ष्मग्राही होती है। इस गैस के विषैले प्रभाव के कारण पत्तियों का क्लोरोफिल नष्ट हो जाता है। सल्फर डाइआक्साइड का कुप्रभाव शंक्वाकार (कोनिफेरस) पौधों पर अधिक पड़ता है। 0.23 से 0.32 मिग्रा./एम.3 सांद्रण का सल्फरडाइआक्साइड गैस पेड़ पौधों की श्वसन एवं प्रकाश संश्लेषण क्रिया में व्यवधान पैदा कर देता है। देवदार के वृक्षों में तो प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया सल्फरडाइआक्साइड के 0.08 से 0.23 मि.ग्रा. एम 3 सान्द्रण पर ही बहुत कम हो जाती है जिसके कारण उनकी वृद्धि रुक जाती है।

वातावरण की निचली सतह में ओजोन की बढ़ती हुई मात्रा न केवल उत्तेजनशीलता पैदा करने वाला कुहरा ही बनाती है बल्कि फसलों का विनाश भी करती है। ओजोन का 0.05 पी.पी.एम. या इससे अधिक सान्द्रण विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों, जैसे टमाटर, आलू, आम नींबू के फलों, मटर सुपारी, खीरा, प्याज, हरे पत्तीदार पौधों, अंगूर, गेहूँ, चावल, कपास, सरसों तथा कई प्रकार की झाड़ियों आदि पर हानिकारक प्रभाव डालता है।

वातावरण के अन्य दूषित पदार्थ भी पेड़-पौधों पर अपना घातक असर डालते हैं। ओजोन के हानिकरक प्रभाव को सल्फर डाइआक्साइड और अधिक बढ़ा देता है। इस दुष्प्रभाव को सेब, तम्बाकू, अंगूर और चीड़ के वृक्षों की हरीतिमा समाप्त करने तथा उपज कम करने में देखा जा सकता है।

जहाँ तक मनुष्यों पर वातावरण के दूषित पदार्थों द्वारा हानिकारक असर होने का सम्बन्ध है, सल्फर डाइआक्साइड एवं छोटे-छोटे कण क्रॉनिक रोग पैदा करते हैं। इन क्रॉनिक रोगों में एन्थरोस्कोलोरोसिस और हृदय से सम्बन्धित कोरोनरी तथा कार्डियक रोग, क्रॉनिक ब्रान्काइटिस, इम्फिसेमा और ब्रान्कियल अस्थमा इत्यादि रोग मुख्य रोग हैं। इस क्षेत्र में अध्यनरत बहुत से वैज्ञानिकों का मत है कि शहरी क्षेत्र में रहने वाले लोगों का स्वास्थ्य ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वालों की अपेक्षा अधिक प्रभावित रहता है।

वातावरण में नाइट्रोजन आक्साइड की उपस्थिति से अत्यधिक उत्तेजक प्रभाव विशेषतः आँख श्लैष्मिक झिल्ली पर पड़ता है। यह गैस फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश करके उसकी सतह तथा श्वास नली को क्षति पहुँचाती है। प्रायोगिक परीक्षणों से यह तथ्य प्रमाणित हो गया है कि जो लोग नाइट्रोजन डाइआक्साइड के दूषित वातावरण में रहते हैं, वे श्वास रोगों से पीड़ित रहते हैं तथा इनके परिधीय (पेरिफेरल) रक्त में भी परिवर्तन हो जाता है। नाइट्रोजन आक्साइड प्राकृतिक विकिरण जैसे पराबैंगनी एवं दृश्य किरणों को अवशोषित कर घना कुहरा बनाता है और वातावरण की पारदर्शिता को कम करता है।

कार्बनमोनोआक्साइड गैस रक्त के हिमोग्लोबिन के साथ मिलकर कार्बोक्सीहिमोग्लोबिन बनाती है जिसके कारण शरीर में ऑक्सीजन के वितरण में व्यवधान आ जाता है फलस्वरूप मिचलाहट होती है तथा नाड़ी मण्डल और हृदय स्पंदन भी प्रभावित होता है।

वातावरण की ऑक्सीजन जीव-जन्तुओं के श्वसन एवं कार्बनिक पदार्थों के दहन में प्रयुक्त होती है दूसरी तरफ पेड़ पौधे कार्बनडाइआक्साइड खींचकर वनस्पति पदार्थ बनाते हैं तथा ऑक्सीजन की मात्रा को पूर्व की अवस्था में पहुँचाते हैं।

कार्बनिक पदार्थों की दहन प्रक्रिया द्वारा वातावरण में अधिकाधिक ऑक्सीजन का प्रयुक्त होना ही ऑक्सीजन की कमी होने का एक कारण है। शुद्ध वातावरण में ऑक्सीजन का सान्द्रण साधारणतया 21 प्रतिशत के लगभग होता है। जबकि ताप विद्युत गृहों के आस-पास ऑक्सीजन का सान्द्रण घटकर 19 प्रतिशत के करीब पाया गया है। जीवमण्डल के लिये ऑक्सीजन की मात्रा में थोड़ी गिरावट का हानिकारक प्रभाव न के बराबर होता है। इसलिये इस समय की महत्त्वपूर्ण समस्या यह है कि हम हानिकारक दूषित पदार्थों को स्थानीय स्तर पर ही नियंत्रित करने का अधिक प्रयास करें।

प्राकृतिक कारणों से प्रतिवर्ष धूल की मात्रा लगभग 100 करोड़ टन वातावरण में फैलती है जबकि औद्योगिक इकाइयों द्वारा यह मात्रा 15 से 20 करोड़ टन प्रतिवर्ष है। प्राकृतिक कारणों से ही लगभग 100 करोड़ टन नाइट्रोजन, डाइआक्साइड और अमोनिया के रूप में पूरित होती है। औद्योगिक इकाइयों द्वारा यह नाइट्रोजन केवल 6 से 7 करोड़ टन प्रतिवर्ष निकलती है। जहाँ तक सल्फर का प्रश्न है यह प्राकृतिक और औद्योगिक इकाइयों द्वारा समान रूप से निकलता है जोकि 10 से 15 करोड़ टन प्रतिवर्ष है।

पर्यावरण प्रदूषण, विशेषकर वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिये पर्यावरण के कारणों की निश्चित सीमा निर्धारित करना अत्यावश्यक है। वायु की गुणवत्ता उसमें उपस्थित विभिन्न प्रकार के विषैले पदार्थों की अधिकतम स्वीकार्य सान्द्रण (मैक्सीमम परमिसीबल कन्सट्रेशन लिमिट, एम.पी.सी.) पर निर्भर करती है। वायु प्रदूषण रोकने के लिये औद्योगिक इकाइयों एवं ताप विद्युत गृहों दोनों के लिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक दूषित पदार्थों की मात्रा निर्धारित मात्रा से अधिक नहीं होनी चाहिए।

जल प्रदूषण


विद्युत गृह के यंत्रों को ठंडा करने के लिये प्रयुक्त पानी अपने में बहुत अधिक मात्रा में ऊष्मा एकत्र कर नदियों के संग्रहण क्षेत्र में जाकर जल के तापक्रम को बढ़ाता है। इसका सीधा प्रभाव रासायनिक क्रिया पर पड़ता है। अधिक ताप पर जलीय प्राणियों एवं वनस्पतियों के प्रजनन एवं वृद्धि की दर बढ़ जाती है। जलाशयों के अनुपयोगी पानी में विभिन्न प्रकार के उदासीन लवण, अम्ल और क्षार होने से पानी का पी.एच. बदल जाती है। इस अनुपयोगी जल में बिना जला हुआ ईंधन, कीचड़ के रूप में पिसी हुई धातु, बिखरे हुए मोटे कण, कार्बनिक पदार्थ लोहा और अल्युमिनियम के यौगिक, मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड और कैल्सियम कार्बोनेट इत्यादि भी मौजूद होते हैं जो ऑक्सीजन की मांग (बी.ओ.डी.) को बढ़ाकर नदियों के पानी के पी.एच. को प्रभावित करता है। इस प्रकार कार्बनिक पदार्थों के सड़ कर इकट्ठा होने से पानी में रहने वाले जीव-जन्तु तथा वनस्पतियों के लिये गम्भीर खतरा उत्पन्न हो जाता है। इससे जल की गुणवत्ता पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है।

ताप विद्युत गृहों एवं किसी भी उद्योग द्वारा निकले विभिन्न प्रकार के पेट्रोलियम तेल, सल्फ्ल्यूरस ईंधन तेल, केरोसीन एवं अन्य विषैले पदार्थ नदियों के संग्रहण क्षेत्र में, तेलयुक्त तरल पदार्थ, कोलायडल अथवा घुली अवस्था में प्रवेश करते हैं। ये पदार्थ पानी की सतह पर पतली पर्त बनाकर गम्भीर नुकसान पहुँचा सकते हैं, क्योंकि इससे प्राकृतिक वायु दूषित हो जाती है। दूसरी तरफ भारी पदार्थ तली में जमा होने से वहाँ पाये जाने वाली वनस्पतियों एवं अन्य जीव नदी के शेष भाग से अलग पड़ जाते हैं। इसके अतिरिक्त सल्फ्यूरस ईंधन तेल का न्यूनतम मिश्रण भी कुछ महत्त्वपूर्ण मछलियों के अण्डों के लिये हानिकारक होता है। इस रसायन का प्रभाव लम्बे समय तक देखा गया है।

ताप विद्युत गृहों तथा कारखानों को मशीनों में सफाई तथा क्षयकरण से बचाने के लिये कार्बनिक यौगिकों का इस्तेमाल किया जाता है। ये रासायनिक पदार्थ, बाहर निकलने वाले प्रदूषित पानी के साथ मिलकर उसे और अधिक विषाक्त बना देते हैं। इन पदार्थों में जिंक, क्लोरीन, कॉपर और हाइड्रोजन मुख्य हैं। इनकी कम मात्रा भी प्राणियों की प्रजनन क्षमता और वृद्धि की दर को कम करती है। जूप्लेंक्टान, विषैले पदार्थों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और प्रदूषकों की अल्प मात्रा से भी समाप्त हो सकते हैं।

ताप विद्युत गृहों से ठोस ईंधन के दहन के कारण जो राख बनती है उसे ऐश डम्पस में सूखे अथवा नम रूप में या हाइड्रॉलिक विधि द्वारा ले जाया जाता है। हाइड्रॉलिक विधि में राख पानी के साथ मिलकर लुगदी के रूप में ऐश डम्पस में पहुँचा दी जाती है। राख में बहुत से अकार्बनिक यौगिक एवं थोड़ी मात्रा में विषैले रसायन जैसे, जिरेनियन बेनेडियम, आर्सेनिक, मर्करी, बेरेलियम और क्लोरीन के यौगिक भी मौजूद होते हैं। ईंधन दहन, के समय कैंसर पैदा करने वाले पदार्थ भी बनते हैं। जो राख के द्वारा पानी में पहुँचते हैं। ऐश डम्प क्षेत्र को 7 से 12 वर्षों तक कृषि कार्यों के लिये अनुपयुक्त समझा जाता है। इसके अतिरिक्त विस्फोटक पदार्थों के कारण वृक्षों की वृद्धि रुक सकती है जिससे जंगल नष्ट हो सकते हैं।

पदूषकों के प्रकृति के सम्पर्क में आने से जिन पदार्थों का प्रादुर्भाव होता है उनका संक्षिप्त विवरण देना आवश्यक है। यह एक तथ्य है कि प्रकृति मानव की क्रियाशीलता द्वारा निर्मित हानिकारक पदार्थों से अनभिज्ञ नहीं है। ये पदार्थ पर्यावरण में अन्य कई पदार्थों को बनाने में योगदान करते हैं। उदाहरणार्थ- पृथ्वी के वातावरण में 2,000 अरब टन कार्बन, कार्बनडाइआक्साइड के रूप में उपस्थित है। वर्ल्ड वाच संस्थान के अनुसार फॉसिल ईंधन के दहन के फलस्वरूप 150 से 190 अरब टन कार्बन पैदा होता है। हाल में हुए एक अध्ययन के अनुसार वनों के विनाश के कारण भी प्रतिवर्ष 1 से 2.6 अरब टन कार्बन उत्पन्न होता है।

वर्तमान समय में वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड का सान्द्रण 340 पी.पी.एम. है जो 1958 में 315 पी.पी.एम. और 1860 में 280 पी.पी.एम. था। वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि वातावरण में सन 2050 तक कार्बनडाइआक्साइड की मात्रा बढ़कर 650 पी.पी.एम. के लगभग हो जायेगी।

कार्बन डाइआक्साइड पृथ्वी पर जीव एवं वनस्पतियों के बसने योग्य स्थिति बनाता है। एक तरफ वाले छन्ने के समान सूर्य की ऊर्जा इस गैस से छनकर आती है परन्तु यह पृथ्वी की सतह से विकीर्ण होने वाली दीर्घ तरंगदैर्ध्य की किरणों को अवशोषित कर लेती है। यह ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में सहायक होती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड और ओजोन जैसी अन्य गैसों का बढ़ता हुआ स्तर भी उतना ही ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करता है जितना प्रभाव अकेले कार्बनडाइआक्साइड से होता है। जब इस प्रकार की गैसों की मात्रा बढ़ती है तब वे जमीन की सतह के पास अधिक ऊष्मा लेकर वातावरण का तापमान बढ़ा देती हैं। एक निश्चित मत के अनुसार बदलते हुए वातावरण के कारण आने वाले कुछ दशकों में पूरे संसार का तापमान 10डिग्री से.ग्रे. तक बढ़ जायेगा जिससे ग्लेसियर और बर्फ की चोटियों के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ जायेगा। इसके अतिरिक्त पृथ्वी के गर्म होने के फलस्वरूप समुद्र के पानी में फैलाव आ जाएगा।

यू.एस. पर्यावरण सुरक्षा ऐजेन्सी ने भविष्यवाणी की है कि सन 2100 तक समुद्र में 1.5 से 2.2 मीटर तक जलस्तर बढ़ जाएगा। जीवों एवं पेड़ पौधों की अनेक प्रजातियाँ मौसम परिवर्तन और तापमान बढ़ने के कारण विलुप्त हो जाएँगी। तापमान बढ़ने के कारण पेड़ पौधों में श्वसन दर भी बढ़ जायेगा। जब श्वसन, प्रकाश संश्लेषण से अधिक हो जाता है, तब पेड़ पौधे अधिक मात्रा में कार्बनडाइआक्साइड निकालेंगे। यदि यह क्रिया लम्बे समय तक होती है तो पेड़-पौधों की वृद्धि बन्द हो जायेगी तथा अन्ततोगत्वा वे नष्ट हो जाएँगे।

कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार कार्बनडाइआक्साइड की बढ़ती हुई मात्रा पेड़-पौधों की वृद्धि में सहायक होगी। जिससे इस गैस को वातावरण से दूर करने में मदद मिलेगी। परन्तु बढ़ी हुई कार्बनडाइआक्साइड की मात्रा तथा ईंधन के जलने से सम्बन्धित वातावरण में परिवर्तन आयेगा जो पौधों की पैदावार को या तो निष्क्रिय कर देगा या कम कर देगा।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि पारिस्थिक दृष्टि से शीघ्र ही नष्ट होने वाला पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य अधिकतर लोगों के मन में असुरक्षा और अनिश्चितता की भावना पैदा कर रहे हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या मानवजाति के लिये यह आवश्यक है कि वह अतिआवश्यक बिजली और औद्योगिक उत्पादन के लिये इतना बड़ा मूल्य चुकाएँ अथवा पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिये ठोस योजनायें अपनाई जानी चाहिए जिससे एक स्वस्थ पर्यावरण प्राप्त हो सके तथा भविष्य में प्रकृति का संतुलन बना रह सके।

प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय, ओबरा, सोनभद्र, पिन-231219

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