गाँधीजी का ग्राम स्वराज सम्भव है

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योजना, 15 अक्टूबर 1993

गाँधीजी ने कुछ स्वप्न देखे थे। इन स्वप्नों में से हर एक स्वप्न को, चाहे वह ग्राम स्वराज्य की स्थापना का हो अथवा भाषा, जाति और धर्म की संकीर्ण भावना से परे आदर्श समाज के निर्माण का हो, गाँधीजी की विचारधारा को पूरी तरह समझकर व उनके आदर्शों पर चलकर साकार करने की दिशा में प्रयास करने चाहिए।

ग्रामों वे ग्रामीण समाज की समृद्धि के सम्बन्ध में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का समग्र चिन्तन, श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त उनके उच्च जीवन दर्शन: ग्रामों की घोर गरीबी के सम्बन्ध में उनके तीव्र अहसास और इस गरीबी को करने की उनकी प्रबल आकांक्षा से प्रेरित था।

गाँधीजी में सत्यनिष्ठा, शोषित व दलित समाज के प्रति सीमा से परे स्नेह व संवेदनशीलता, सत्ता से मोह बिना सेवा की भावना, ईमानदारी आदि श्रेष्ठ मानवीय गुण थे। यही कारण था कि वे जिन बातों से अत्यन्त दुखी थी, उनमें एक बात ग्रामों की घोर गरीबी भी थी।

शहरों की समृद्धि में सर्वश्रेष्ठ योगदान देने के बावजूद ग्रामों की गरीबी व ग्रामों में रह रहे लोगों में से अपार संख्या में निम्नस्तर का जीवन-यापन कर रहे लोगों की हालत देखकर गाँधीजी को गहन पीड़ा होती थी।

गाँधीजी का दृढ़ मत था कि जब तक ग्रामों में घोर गरीबी से त्रस्त लोगों की दयनीय दशा में परिवर्तन लाकर उनके जीवनस्तर में सुधार नहीं किया जाता, तब तक न तो हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता का कोई अर्थ होगा और न इसकी प्रगति का स्वप्न पूरा होगा।

इस प्रकार गाँधीजी में श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त एक उच्च जीवनदर्शन के साथ ग्रामों की गरीबी के सम्बन्ध में तीव्र अहसास तो था ही, पर साथ में उसे दूर करने की प्रबल आकांक्षा भी थी। यही कारण था, कि उनके द्वारा ग्रामों के विकास व ग्राम स्वराज्य की स्थापना के सम्बन्ध में प्रस्तुत विचारों व कार्यक्रमों के प्रति लोगों को विशेषकर ग्रामीण जनों को आस्था थी। ग्रामीण जन इन कार्यक्रमों में अपने सुखद भविष्य की कल्पना करते थे।

गाँधीजी द्वारा ग्रामों के विकास व ग्राम स्वराज्य की स्थापना के लिये प्रस्तुत कार्यक्रमों में प्रमुख थे- चरखा व करघा, ग्रामीण व कुटीर उद्योग, सहकारी खेती, ग्राम पंचायतें व सहकारी संस्थाएँ, राजनीति व आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण, अस्पृश्यता निवारण, मद्य निषेध, बुनियादी शिक्षा आदि।

स्वतंत्रता के बाद सरकारों ने गाँधीजी के अधिकांश कार्यक्रमों को क्रियान्वित किया। इन कार्यक्रमों के साथ ग्रामों के आर्थिक व सामाजिक विकास के अन्य कार्यक्रम भी संचालित किए। लेकिन इन कार्यक्रमों की उपलब्धियाँ आशाओं के अनुरूप नहीं रही। एक ओर यह स्थिति है तो दूसरी ओर गाँधीजी के अनेक कार्यक्रमों के प्रति आस्था कम होती जा रही है। गाँधीजी के एक सबसे महत्त्वपूर्ण ‘चरखा व करघा’ की उपयोगिता पाश्चात्य औद्योगीकरण के प्रभाव के कारण अस्वीकृत की जाने लगी है। यही नहीं ‘चरखा व करघा’ के अलावा गाँधीजी के अन्य ग्रामीण तथा कुटीर उद्योग कार्यक्रमों को भी अनुपयुक्त बताया जाने लगा है।

इसमें सन्देह नहीं कि पाश्चात्य औद्योगीकरण की आकर्षक उपलब्धियों के सामने ‘चरखा व करघा’ और अन्य ग्रामीण तथा कुटीर उद्योग की उपलब्धियाँ अनाकर्षक प्रतीत होती हैं। यदि हमारे देश के अर्थशास्त्रियों व विचारकों का एक बड़ा वर्ग गाँधीजी की आर्थिक विचारधारा को ‘‘पाश्चात्य औद्योगीकरण विचारधारा’’ की कसौटी पर कसकर अस्वीकृत करता है तो यह आश्चार्यजनक नहीं है। लेकिन पाश्चात्य औद्योगीकरण के प्रभाव और अपने देश की आर्थिक व सामाजिक दशाओं के सम्बन्ध में समग्र चिन्तन किए बिना पाश्चात्य औद्योगीकरण को आवश्यक तथा गाँधीजी के ग्रामीण तथा कुटीर उद्योग को अनावश्यक बताना या इनकी महत्ता को नकारना विवेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

ग्रामों में कृषि पर सीमित निर्भरता, बढ़ती बेरोजगारी की समस्या और ग्रामों से जीविका की तलाश में पहले से अपनी समस्याओं से जूझ रहे शहरों की ओर लोगों का पलायन जैसी महत्त्वपूर्ण बातों को गाँधीजी की आर्थिक विचारधारा को अमान्य करते समय यदि विचारणीय बनाया जाए तो यह निर्णय विवेकपूर्ण नहीं लगेगा। कोई आर्थिक विचारधारा अथवा अन्य कोई विचारधारा को, चाहे वह अतीत की हो अथवा वर्तमान की अमान्यता तभी औचित्यपूर्ण कही जा सकती है जब वह किसी समस्या के समाधान की स्थिति में न हो अथवा समस्या उत्पन्न कर रही हो या अपनी उपयोगिता समाप्त कर चुकी हो। गाँधीजी की आर्थिक विचारधारा पर ये तीनों बातें लागू नहीं होती हैं। उनका ‘चरखा व करघा’ एवं अन्य ग्रामीण तथा कुटीर उद्योग कार्यक्रम ग्रामीण बेरोजगारी की समस्या का आज भी समाधान है।

यही नहीं ये ग्रामों की आत्मनिर्भरता में भी सहायक हैं। अतः इन उद्योगों की अवहेलना मानव की श्रमशक्ति की अवहेलना तो है ही, साथ में ग्रामीण बेरोजगारी की संख्या वृद्धि में सहायक भी है। वस्तुतः गाँधीजी के चरखा व करघा एवं अन्य ग्रामीण तथा कुटीर उद्योग के समर्थन एवं औद्योगीकरण के विरोध के पीछे बेरोजगारी की समस्या का समाधान, मानव श्रमशक्ति को प्रोत्साहित करना एवं मानवीय मूल्यों से युक्त जीवनदर्शन निहित है। जैसा कि यहाँ प्रस्तुत उनके कुछ विचारों से प्रकट है। ‘‘...........हमें इस बात पर शक्ति केन्द्रित करनी होगी कि गाँव स्वावलम्बी बनें और अपने उपयोग के लिये अपना माल स्वयं तैयार करें। अगर कुटीर उद्योग का यह स्वरूप कायम रखा जाए तो ग्रामीणों को आधुनिक यन्त्रों और औजारों को काम में लेने के बारे में मेरा कोई ऐतराज नहीं........।’’ ‘‘मैं यंत्रों का विरोधी नहीं, मैं तो उनके पागलपन का विरोधी हूँ। मानव के लिये उस यंत्र का क्या काम जिससे हजार-हजार व्यक्ति बेकार होकर भूख से सड़कों पर मारे-मारे फिरे।’’ मैं नहीं मानता कि किसी भी देश के लिये किसी भी हालत में बड़े उद्योगों का विकास करना जरूरी है। मेरा विश्वास है कि स्वाधीन भारत दुख से कराहते हुए संसार के प्रति अपने कर्तव्य का ऋण अपने कुटीर उद्योगों का विकास करके, सादा किन्तु उदात्त जीवन अपनाकर और संसार के साथ शान्तिपूर्वक रहकर पूरा कर सकता है.......।

गाँधीजी ग्रामों के विकास व ग्राम स्वराज्य के लिये सहकारी खेती, ग्राम पंचायतों व सहकारी संस्थाओं को आवश्यक बताते थे। वे ग्राम स्वराज्य की स्थापना के लिये जहाँ राजनीति व आर्थिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण अनिवार्य मानते थे, वहीं इस विकेन्द्रीकरण के लिये ग्राम पंचायतों व सहकारी संस्थाओं को सर्वोत्तम साधन कहते थे। लेकिन स्वतंत्रता के कई दशक बाद भी इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। इसके विपरीत राजनीतिज्ञों व नेताओं ने ग्रामों में सेवा व त्याग की भावना से युक्त राजनीति की धारा प्रवाहित करने की बजाय जाति व धर्म के संकीर्ण विचारों व पदलिप्सा से ग्रस्त राजनीति की धारा प्रवाहित कर ग्रामों के वातावरण को दूषित कर दिया इसके कुपरिणामों की अभिव्यक्ति ग्राम पंचायतों व सहकारी संस्थाओं के चुनावों में कटुता व हिंसा के रूप में होने लगी है। राजनीति व आर्थिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण की दिशा में यदि ठोस कदम उठाने हैं तो यह कार्य उन ग्रामों में किया जाए जहाँ लोग आपसी सहयोग के साथ जाति, धर्म और राजनीति को दूर रखकर विकास कार्यों में लगे हैं अथवा इस दिशा में अच्छे उदाहरण प्रस्तुत कर चुके हैं। ऐसे ग्रामों में राजनीति व आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण बड़े स्तर पर किया जा सकता है। निश्चय ही इसके परिणाम सुखद होने के साथ ग्राम स्वराज्य की स्थापना की दिशा में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगे।

गाँधीजी की कल्पना के ग्राम स्वराज्य में आर्थिक अवस्था ही आदर्श नहीं, अपितु सामाजिक अवस्था भी आदर्श थी, इसीलिये वे सभी सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन पर जोर देते थे। अस्पृश्यता व मद्यपान जैसी सामाजिक बुराइयों के वे घोर विरोधी थे। वे इन्हें ग्रामों की प्रगति में भी बाधक मानते थे।

अस्पृश्यता के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए गाँधीजी ने एक स्थान पर लिखा है। ‘‘यह बड़े दुख की बात है कि आज हमारे लिये धर्म का मतलब खान पान पर रोक टोक तथा ऊँच नीच के भेद के सिवा कुछ नहीं रह गया है। मैं आपको बता दूँ कि इससे बढ़कर और कोई मूर्खता नहीं हो सकती। जन्म से और बाहरी नेम धर्म से कोई बड़ा छोटा नहीं होता। एक मात्र चरित्र ही इसकी कसौटी है। ईश्वर ने मनुष्य को बड़ा या छोटा नहीं बनाया। कोई धर्म ग्रन्थ जो किसी मनुष्य को उसके जन्म के कारण हीन अथवा अछूत करार देता है, हमारी श्रद्धा का पात्र नहीं हो सकता.........।’’

गाँधीजी शराब एवं अन्य नशीली वस्तुओं के सेवन के सख्त विरोधी थे। एक बार उनसे पूछा गया कि ‘‘यदि आपको हिंदुस्तान का एक घन्टे का तानाशाह बना दियाए तो आप क्या करेंगे।’’ गाँधीजी का उत्तर था। ‘‘यदि मुझे घन्टे भर के लिये हिन्दुस्तान का तानाशाह बना दिया जाए तो मैं सबसे पहले बिना हरजाना दिए समस्त मदिरालय बन्द कर ताड़ी उत्पादक वृक्षों को नष्ट कर दूँगा।’’ इस उत्तर पर जब उनसे कहा गया कि क्या शराबबन्दी से लोगों को कानून द्वारा जबरन सदाचारी बनाने की बात नहीं है? इसका गाँधीजी ने बहुत सटीक उत्तर दिया। ‘‘आप ऊपर से सत्य दिखाई देने वाले इस तर्क के धोखे में मत आइए कि भारत को जबरन संयमी न बनाया जाए और जो शराब पीनी चाहे, उसे पीने की सुविधा दी जाए। राज्य का काम लोगों में बुराइयों के लिये सहूलियतें पैदा करना नहीं है। हम व्यभिचार के अड्डों का संचालन नहीं करते और न इन्हें बढ़ने देते हैं। मैं शराबखोरी को चोरी और व्यभिचार से भी निन्दनीय समझता हूँ। क्या यह अक्सर दोनों की जननी नहीं है।’’

गाँधीजी ने अपने विचार अनुसार ग्रामों के बच्चों और प्रौढ़ों की शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया। बुनियादी शिक्षा इसी का परिणाम है। इसके सम्बन्ध में उनके विचार प्रस्तुत हैं, ‘‘शिक्षा से मेरा प्रयोजन यह है कि बालकों और प्रौढ़ों के शरीर, मन व आत्मा का सर्वांगीण विकास किया जाए। पढ़ना-लिखना न शिक्षा का आरम्भ है, न वह उसका लक्ष्य ही। यह स्त्री-पुरुषों की शिक्षा का एक साधन मात्र है। लिखना-पढ़ना स्वयं में कोई शिक्षा नहीं है, अतः मैं चाहता हूँ कि बच्चे का शिक्षण उसे कोई उपयोगी हस्तकला सिखाने से आरम्भ हो और उसकी शिक्षा के आरम्भ से ही उसमें उत्पादन की क्षमता पैदा होना चाहिए। मेरा विश्वास है कि इस शिक्षण पद्धति के द्वारा मन और आत्मा का सर्वोच्च विकास सम्भव है।’’

गाँधीजी देश की प्रगति के लिये महिलाओं की सक्रियता आवश्यक समझते थे। वे महिलाओं की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। उन्हें उनकी (महिलाओं की) क्षमता में पूर्ण विश्वास था। यही नहीं वे पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ऊँचा समझते थे। इस सम्बन्ध में गाँधीजी के कुछ विचार यहाँ प्रस्तुत हैं। ‘‘स्त्री-पुरुष की साथिनी होती है और उसे वही मानसिक शक्तियाँ प्राप्त हैं जो पुरुष को। उसे पुरुष की समस्त गतिविधियों में पूरी तरह भाग लेने का अधिकार है और उसे भी स्वतंत्रता का उतना ही हक है, जितना पुरुष को। उसे अपने कार्यक्षेत्र में वही स्थान प्राप्त है, जो पुरुष को अपने कार्यक्षेत्र में।........’’

‘‘स्त्री पुरुष से ज्यादा ऊँची होती है, क्योंकि वह त्याग, मौन कष्ट सहन शीलता, विनम्रता, विश्वास तथा ज्ञान की मूर्ति है।..........।’’ ‘‘मैं महिला को सेवा तथा त्याग की भावना की जीवित मूर्ति के रूप में पूजता हूँ।......’’

स्वतंत्रता के बाद सरकारों ने ग्रामीणों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति सुधारने के लिये सतत प्रयास किए लेकिन न तो सफलताएँ ऐसी रही और न प्रयास ही ऐसे रहे जिनसे गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य की स्थापना का सपना साकार होने की आशा की जा सके। इसका एक प्रमुख कारण प्रयासों में ईमानदारी, कार्य निष्ठा और सेवा की भावना जैसे मानवीय गुणों से युक्त श्रेष्ठ जीवनदर्शन का अभाव रहा।

युद्धों में विजय सिर्फ हथियारों और सैनिकों की कतार खड़ी कर देने से ही नहीं होती। सैनिकों में विजय के प्रति विश्वास, युद्ध में बड़ा से बड़ा संकट का सामना करने का साहस और देश पर मर मिटने की भावना जैसी बातें भी विजय के पीछे होती हैं। इसी प्रकार गरीबी के खिलाफ लड़ाई केवल योजनाएँ बनाने, उनके लिये आवश्यक धनराशि जुटाने और योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिये अधिकारियों व कर्मचारियों की जमात खड़ी कर देने से नहीं जीती जा सकती। इस लड़ाई में जीत के लिये अधिकारियों और कर्मचारियों में विश्वास ईमानदारी, निष्ठा, सेवा की भावना जैसे गुण भी होने चाहिए। यही बात इस लड़ाई से सम्बद्ध अन्य लोगों पर भी लागू होती है।

हम प्रतिवर्ष राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जयंती और पुण्य तिथि पर सुन्दर व मार्मिक शब्दों और सुगन्धित पुष्पों द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, लेकिन सन्त, दीन व दलितों के मसीहा और हिन्दुस्तान की आत्मा ग्रामों में है, इस सत्य का उद्घाटन करने वाले गाँधीजी के प्रति यह श्रद्धांजलि पर्याप्त नहीं है।

गाँधीजी ने कुछ स्वप्न देखे थे। इन स्वप्नों में से हर एक स्वप्न को, चाहे वह ग्राम स्वराज्य की स्थापना का हो अथवा भाषा, जाति और धर्म की संकीर्ण भावना से परे आदर्श समाज के निर्माण का हो, गाँधीजी की विचारधारा को पूरी तरह समझकर व उनके आदर्शों पर चलकर साकार करने की दिशा में प्रयास करने चाहिए। वस्तुतः हर आँख का हर आँसू पोंछने की आकांक्षा रखने वाले महा मानव गाँधीजी के प्रति यह हमारी यह हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

824 ‘सी’ सेक्टर, बी.डी.ए. कॉलोनी, शाहपुरा भोपाल (म.प्र.)

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