विस्थापितों को मुआवजे का फैसला पाने में लगी देर

Submitted by Hindi on Sun, 03/12/2017 - 11:10
Source
तहलका, 28 फरवरी, 2017

तकरीबन चालीस साल बाद सुप्रीम कोर्ट से सरदार सरोवर परियोजना के चलते मध्य प्रदेश के विस्थापित आदिवासियों को मुआवजा देने की व्यवस्था हुई। अब देखना है कि अदालती आदेश लागू हो पाता है या नहीं?

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकरसुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (आठ फरवरी) को ऐतिहासिक फैसला दिया। इस फैसले के तहत सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के चलते विस्थापितों को रुपए साठ लाख मात्र प्रति दो हेक्टेयर देने का सुप्रीम कोर्ट ने फैसला लिया है। यह फैसला सुनकर आंदोलन नेत्री मेधा पाटकर की आँखे छलछला उठीं। पिछले चार दशकों से वे न्याय की उम्मीद में एकदम निचले स्तर से आंदोलनों और हर दरवाजे को खटखटाते हुए सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद में पहुँची थीं।

विस्थापितों को मुआवजे में जमीन के बदले जमीन की बजाए रुपए देने से आदिवासी महिलाओं और बच्चों में थोड़ी निराशा है। क्योंकि जमीन होने से उनका और परिवार का भरण-पोषण बेहतर तरीके से पीढ़ी दर पीढ़ी चल सकता था जबकि पैसे कुछ समय बाद खत्म हो जाएँगे।

सुप्रीम कोर्ट के नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के कारण विस्थापित हुए 681 परिवारों के लिये प्रति दो हेक्टेयर भूमि के बदले रुपए 60 लाख रुपए की राशि बतौर मुआवजा देने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट की एपेक्स कोर्ट ने 681 परिवारों के लिये कई निर्देशों को भी जारी किया। साथ ही पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज की एक कमेटी बना दी है जो मुआवजे और पुनर्वास के प्रस्तावों पर अदालत के निर्देशों का अध्ययन करते हुए फैसलों पर अमल का ध्यान रखेंगे।

तीन जजों की बेंच ने यह फैसला दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर खुद इस बेंच में थे। उन्होंने जहाँ आदेश सुनाया कि प्रति परिवार को दो हेक्टेयर भूमि के बदले 60 लाख रुपए दिये जाएँ। विस्थापित परिवारों को यह लिख कर देना होगा कि वे अब तक भी जमीन नहीं खरीद पाए। ऐसे विस्थापितों को विशेष अनुदान साठ लाख रुपए का गुजरात सरकार दे। यह अनुदान शिकायत निवारण प्राधिकरण दे।

 

फैसले की मुख्य बातें


गुजरात सरकार को सरदार सरोवर परियोजना के विस्थापितों को साठ लाख रुपए देने होंगे।


सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित हुए लोगों को पुनर्वास नहीं दिया गया और इनमें एक बड़ी संख्या के लोगों को बदले में भूमि भी नहीं मिली।


यह न्यायिक फैसला उनकी जीत है जिन्होंने छोटे-मोटे दिलासों के बदले ‘पैकेज’ के नाम पर मिलने वाले थोड़े रुपयों को लेने का लालच नहीं किया। जिन्हें भ्रष्ट अफसरों और एजेंटों ने धोखा दिया। नर्मदा बचाओ आंदोलन दूसरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ता रहेगा।


एपेक्स कोर्ट ने शिकायत निवारण प्राधिकरण को यह फैसला लेने और खासकर मध्य प्रदेश में आर एंड आर स्थल पर सुविधाओं के इंतजाम करने का निर्देश दिया है। जिन्हें नकद धन मिल जाएगा वे 31 जुलाई, 2017 तक भूमि खाली कर देंगे।


महाराष्ट्र और गुजरात सरकारों से कहा गया है कि वे इस परियोजना से प्रभावित तमाम परिवारों का पुनर्वास करें।

 

जिन लोगों ने एसआरपी की नकद राशि का पूरा पैकेज लिया लेकिन फर्जी रजिस्ट्रियों के कारण जो जमीन नहीं ले सके उन्हें 15 लाख रुपए का विशेष पैकेज दिया जाए। जिन लोगों ने दो किश्तों में एसआरपी का विशेष अनुदान लिया हो उनसे यह रकम वसूली जाए। तकरीबन 681 परिवारों को 60 लाख, 1589 परिवारों को 15 लाख का अनुदान दिये जाने का अनुमान है। विस्थापितों के पुनर्वास स्थलों पर निर्माण कार्यों में तथा सुविधाओं में हो रही गलतियों की शिकायत निवारण प्राधिकरण सुनवाई करके आदेश देगा। यदि वह आदेश नामंजूर हो तो विस्थापित मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में न्याय की गुहार लगा सकेंगे। इस आदेश के तहत नकद राशि का भुगतान सम्बन्धित विस्थापितों को दो महीनों के अंदर करना होगा जो गुजरात सरकार में पूरी रकम के रूप में मध्य प्रदेश को दिया जाएगा और शिकायत निवारण को भुगतान करना होगा। मध्य प्रदेश के जिन विस्थापितों को विशेष पैकेज दिया जाएगा, उन्हें छह महीनों यानी 31 जुलाई, 2017 तक गाँव छोड़कर बसने का आदेश भी दिया गया है। यह न हो तो शासन कार्रवाई कर सकती है।

महाराष्ट्र और गुजरात के विस्थापितों के सम्बन्ध में आने वाले कुछ ही महीनों में नर्मदा न्यायाधिकरण का फैसला, राज्य की पुनर्वास नीति और अन्य कानूनी आधार अनुसार पूरा करने का आदेश भी सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है। महाराष्ट्र के ही अनुसार करीब 472 परिवारों को जमीन देनी बाकी है। साथ ही जमीन पसंदी और खरीदी की प्रक्रिया जारी हो। सैकड़ों आदिवासियों के दावे शिकायत निवारण प्राधिकरण के सामने आज भी हैं। पुनर्वास पर कई सुविधाओं की आज भी कमी है। ऐसी ही स्थिति गुजरात राज्य में भी है। यहाँ के सैकड़ों विस्थापित 13 जुलाई से केवड़िया कॉलोनी में संघर्ष कर रहे हैं। इस सबकी समस्याओं का निराकरण राज्य शासनों को तत्काल करना होगा।

नर्मदा बचाओ आंदोलनकारियों का मानना रहा है कि काश्त के लिये अनुपयोगी जमीन लेने से इंकार करने वालों और आज तक नकद राशि का अनुदान स्वीकार न करने वाले आंदोलनकारियों को 5.58 लाख रूपए की एसआरपी (पैकेज) के बदले 60 लाख रुपये मिलना उनकी जीत है। इससे उन्होंने न केवल जमीन खरीदनी है बल्कि पुनर्वास भी तलाशना है। फर्जीवाड़े के कारण जिन्होंने जमीन नहीं पाई उन्हें भी अब मिलने वाली रकम से सही जमीन न लेने की कोशिश करनी चाहिए।

नर्मदा बचाओ आंदोलनकारियों ने तय किया है कि भूमिहीन परिवारों की आजीविका के बाकी मुद्दों पर आंदोलन आगे भी जारी रहेगा।

तकरीबन 45 हजार परिवार सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में आज भी हैं। इनके पास मकान, स्कूल, पंचायत, दवाखाने, खेत-खलिहान छह महीने में ही दूसरी जगह बसाकर नई जिंदगी शुरू करना आसान नहीं है। मध्य प्रदेश के 88 पुनर्वास स्थल आज भी रहने के लायक नहीं हैं। ट्रिब्यूनल के फैसले और पुनर्वास नीति के अनुसार सभी सुविधाओं का निर्माण और सार्वजनिक स्थलों का मूल गाँव स्थानांतरण जरूरी होगा। जब तक सम्पूर्ण पुनर्वास नहीं होगा तब तक किसी भी विस्थापित परिवार की अर्जित सम्पत्ति डुबाने का अधिकार शासन को नहीं है। इसलिये आंदोलन जारी रहेगा।

सरदार सरोवर सम्बन्धी सर्वोच्च अदालत में दाखिल याचिका और उच्च न्यायालयों में लगी याचिकाओं को खारिज करने की बात आदेश में कही गई है। जिनके अधिकार के किसी भी मुद्दे पर पिछले 31 सालों संघर्षशील नर्मदा आंदोलन के सभी साथी मिलकर नर्मदा न्यायाधिकरण के अनुसार आगे की दिशा तय करेंगे। अन्य हक लेने के लिये शासन-प्रशासन के समक्ष प्रथम दावा करेंगे फिर आगे बढ़ेंगे।

नर्मदा बचाओ आंदोलन और विस्थापितों की ओर से संजय पारिख ने मुख्य पैरवी की। मेधा पाटकर ने भी आंदोलन की ओर से बात रखी। एडवोकेट लिप्टन रोजारिया और एडवोकेट नीनी सुसान ने याचिका के काम में सहयोग दिया।

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