खाद्य सुरक्षा और व्यवस्थागत दायित्व

Submitted by Hindi on Fri, 03/17/2017 - 16:53
Source
पुस्तक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013

मानव इतिहास के वर्तमान दौर में राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय सभी स्तरों पर राज्य की सर्वमान्य अवधारणा एक कल्याणकारी राज्य की है। लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता राज्य की स्थापना करती है और राज्य का यह दायित्व है कि वह जनता के कल्याण का पूरा ध्यान रखे। संविधान में दिये गये मौलिक अधिकारों को समाज का मुख्य आधार माना जाता है। इस भाग में राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर राज्य की संवैधानिक प्रतिबद्धताओं के बारे में बताया गया है। यह स्थापित करता है कि खाद्य सुरक्षा की गारंटी प्रदान करना राज्य का पहला कर्तव्य है।

राज्य के दायित्व- हमारे देश में राज्य के दायित्व संविधान के प्रावधानों से उपजते और निर्धारित होते हैं।

संविधान के नजरिए से


जीवन के अधिकार के तहत खाद्य सुरक्षा राज्य की संवैधानिक बाध्यता है। भारत के संविधान के अनुसार प्रत्येक राज्य लोगों को खाद्य की सुरक्षा प्रदान करने को बाध्य है।

- संविधान का अनुच्छेद 21 हरेक के लिये जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। इस अनुच्छेद के तहत भोजन का अधिकार भी सम्मिलित है।

- संविधान का अनुच्छेद 47 कहता है कि लोगों के पोषण और जीवन के स्तर को उठाने के साथ ही जनस्वास्थ्य को बेहतर बनाना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

उच्चतम न्यायालय के नजरिए से


राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013उच्चतम न्यायालय ने भोजन सुरक्षा से संबंधित कई दावों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वीकार कर खाद्य सुरक्षा के सवाल को संविधान में प्रदत्त जीवन के मौलिक अधिकारों का अभिन्न अंग माना है। (इसके बारे में आपको विस्तृत जानकारी अनुच्छेद-2 में भी मिलेगी।)

इस संदर्भ में अप्रैल 2001 से भोजन के अधिकार पर दाखिल जनहित याचिका का केस इस समय भी उच्चतम न्यायालय में लंबित है। पिछले 13 वर्षों से चल रहे इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में यह स्थापित किया है कि भोजन सुरक्षा राज्य व केन्द्र दोनों सरकारों का प्रमुख दायित्व है। इसके निर्वाह में किसी प्रकार की कोताही, देरी, भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विभिन्न निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने एक प्रभावी निगरानी, शिकायत निवारण व्यवस्था और दंड की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है।

उच्चतम न्यायालय ने भोजन सुरक्षा के लिये रोजगार, पेंशन, मातृत्व लाभ, परिवार लाभ (कमाने वाले की मृत्यु होने पर), कमजोर एवं गरीब तबकों को विशेष प्रावधान, राशन व्यवस्था, पूरक पोषाहार, बेघरों को आवास आदि आवश्यकताओं को स्थापित किया है।

भोजन के अधिकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न आदेश


- किसी भी कीमत पर अनाज खरीद पाने में अक्षम व्यक्ति को सरकार मुफ्त अनाज देने पर विचार करे।

- सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में बच्चों को पका हुआ ताजा मध्यान्ह भोजन मुहैया कराया जाए।

- राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन जनवरी 2002 तक पूरी तरह लागू हो तथा हर महीने की 7 तारीख तक बुजुर्गों को पेंशन जरूर मिल जाए।

- गरीबों, महिलाओं और दलितों को लाभान्वित करने पर विशेष जोर दिया जाये।

- पूरक पोषण आहार कार्यक्रम में ठेकेदारों का प्रवेश वर्जित किया जाए।

- ग्राम सभाओं को भोजन और रोजगार से जुड़ी सभी योजनाओं के सामाजिक अंकेक्षण और धन के दुरुपयोग की रिपोर्ट करने का अधिकार दिया गया है। उन्हें विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन पर नजर रखने की जिम्मेदारी भी दी गई है। वे इस बात पर भी नजर रखेंगे कि लाभार्थियों का चयन किस आधार पर किया गया है और उन्हें किस तरह लाभ पहुँचाया गया है।

- अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि दोषियों को दंडित करे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना के खिलाफ मुख्य कार्यकारी अधिकारी जिलाधीश से एक पावती के साथ शिकायत की जाएगी। अंतिम रूप से राज्य के मुख्य सचिव जिम्मेदार होंगे।

- न्यायालय ने योजनाओं को प्रभावी रूप से लागू करने और निरंतर निगरानी के लिये अपने आयुक्त नियुक्त किये हैं।

- गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की पहचान के लिये सरकार को दिशा-निर्देश जारी करने को कहा गया है।

- शीर्ष अदालत ने सभी राशन दुकानों को एक निश्चित समयावधि में पूरे महीने खोलने और दुकान के बाहर तख्ती पर अनाजों की उपलब्धता के बारे में विस्तृत विवरण लिखने को कहा है।

- गरीब, बेघर तथा समाज के कमजोर वर्ग को भूख और भुखमरी से रोकना सरकार का प्रमुख दायित्व है। चाहे वह केन्द्र सरकार हो या राज्य की सरकारें।

- सरकार सुनिश्चित करे कि जो अनाज भण्डार गृहों, खासकर भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में भरा पड़ा है वह समुद्र में डुबोकर या चूहों को खिलाकर कर बर्बाद न किया जाये, गरीबों में मुफ्त बांट दिया जाये।

- केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित योजनाओं- रोजगार गारण्टी योजना (जो सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना में बदला गया है), मध्यान्ह भोजन योजना, समेकित बाल विकास सेवा, राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (गरीबी रेखा के नीचे की महिलाओं को) 65 वर्ष से ऊपर के निराश्रित व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, अन्नपूर्णा योजना, अन्त्योदय अन्न योजना, राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना और बीपीएल-एपीएल परिवारों के लिये सार्वजनिक राशन वितरण प्रणाली को राज्य सरकारों द्वारा लागू किया जाना जरूरी है।

अन्तरराष्ट्रीय बाध्यताएँ


खाद्य सुरक्षा के बारे में अन्तरराष्ट्रीय बाध्यताएँ इस प्रकार हैं -
1. मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा- संयुक्त राष्ट्र ने 10 दिसम्बर 1948 को मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की। इसमें हर प्राणी के मौलिक मानवीय अधिकारों को सभी सदस्य देशों ने सामूहिक रूप से अंगीकृत किया। मानवाधिकारों के अनुच्छेद 25 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को जन्म के साथ ही स्वस्थ्य, सुरक्षित जीवन के लिये भोजन, कपड़ा, मकान, चिकित्सा सुविधा और आवश्यक सामाजिक सेवाओं का अधिकार होगा। साथ ही बेरोजगारी, बीमारी, अपंगता, पति की मृत्यु, बुढ़ापा जैसे इंसानी नियंत्रण से परे के हालात में सुरक्षा का अधिकार भी दिया गया है।

2. आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के संबंध में अन्तरराष्ट्रीय सहमति- मानवाधिकारों के दस्तावेज में अनुच्छेद 11 के तहत प्रत्येक हस्ताक्षरकर्ता देश अपने यहाँ हर व्यक्ति को जीवन की बुनियादी जरूरतें- भोजन, कपड़ा और मकान के अधिकार दिलाने की जिम्मेदारी निभायेंगे। वे लोगों को भुखमरी के चंगुल से बाहर निकालने के लिये खुद या अन्य राष्ट्रों की मदद से विशेष कार्यक्रम चलाकर उनके मौलिक अधिकारों का संरक्षण करेंगे।

 

भुखमरी और कुपोषण मूल कारण


- खेती पर उद्योग के कब्जे और सरकारी असहयोग से उपजा कृषि संकट


- असमानता को बढ़ाने वाले विकास के प्रक्रिया के फलस्वरूप बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार।


- विकास के नाम पर रोजगार के मौके खत्म करना और लोगों को सस्ता, प्रवासी मजदूर बनने के लिये बाध्य करना


- सरकार द्वारा जन कल्याण हेतु अधकची, अप्रभावी, सीमित कल्याणकारी योजनाएँ बनाना।


- गरीबों के अधिकारों के नाम खैरात बाँटना।

 

3. संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र- संयुक्त राष्ट्र निम्नलिखित बातों को बढ़ावा देगा, जो स्थिरता और कल्याण की ऐसी स्थितियाँ पैदा करने के लिये, जो राष्ट्रों में समानतामूलक अधिकार और स्वअवधारणा के सिद्धांत, सम्मान पर आधारित शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिये आवश्यक है।

- उच्च जीवन स्तर, पूर्ण रोजगार तथा आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति और विकास की स्थितियाँ।

- अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक शैक्षणिक सहयोग। जाति, लिंग, भाषा और धर्म के बिना भेद के सभी के लिये मानवाधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रताओं के प्रति सार्वभौमिक सम्मान एवं उनका अनुपालन। (अनुच्छेद- 55)

4. नवम्बर 2004 में खाद्य एवं कृषि संगठन के 127वें अधिवेशन में अंगीकृत- (खाद्य एवं कृषि संगठन रोमरू 2005) - खाद्य सुरक्षा तभी सुनिश्चित मानी जाएगी, जब दुनिया में सभी लोगों की हर रोज पर्याप्त, सुरक्षित एवं पौष्टिक भोजन तक शारीरिक एवं आर्थिक पहुँच हो।

खाद्य सुरक्षा के चार स्तंभ हैं - उपलब्धता, आपूर्ति की स्थिरता, पहुँच और उपयोग।

5. अन्य प्रावधान -
- इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकार समझौते की धारा-27.1 और 27.3 और महिलाओं के खिलाफ होने वाले हर तरह के भेदभाव की समाप्ति के लिये सम्मेलन (सीडा) के घोषणा पत्र (धारा-12) महिलाओं और बच्चों की खाद्य-पोषण सुरक्षा के बारे में राज्य की जिम्मेदारी को स्पष्ट करते हैं।

- भारत ने मानव अधिकारों के अन्तरराष्ट्रीय घोषणा पत्र, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के घोषणा पत्र एवं बाल अधिकार समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं।

अतः भारत सरकार को भी इस हेतु जवाबदेह होना होगा।

 

‘राष्ट्रीय खाद्य-सुरक्षा कानून-2013

और सामुदायिक निगरानी मैदानी पहल के लिए पुस्तक


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम और अध्याय

पुस्तक परिचय : राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013

1

आधुनिक इतिहास में खाद्य असुरक्षा, भुखमरी और उसकी पृष्ठभूमि

2

खाद्य सुरक्षा का नजरिया क्या है?

3

अवधारणाएँ

4

खाद्य सुरक्षा और व्यवस्थागत दायित्व

5

न्यायिक संघर्ष से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून-2013 तक

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून बनने की पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का आधार

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून-2013 के मुख्य प्रावधान

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में दिए गए अधिकार

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत बनी हुई व्यवस्थाएँ

6

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून और सामाजिक अंकेक्षण


 

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