जैव विविधता पर संकट

Submitted by Hindi on Sun, 03/26/2017 - 10:36
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सर्वोदय प्रेस सर्विस, 24 मार्च 2017

वैश्विक स्तर पर जैव विविधता का संरक्षण एक चुनौती के रूप में सामने है। दुनियाभर में प्राकृतिक आवासों की क्षति, वन विनाश, खनिज कार्य, कृषि विकास, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक महत्त्व की फसलों का उत्पादन, शिकार तथा वन्य जीवों से जुड़े व्यापार आदि कारणों से जैव विविधता में कमी आ रही है। इस वजह से भी कई प्रजातियाँ खतरे में हैं। प्रस्तुत है जैव विविधता पर मँडराते इस संकट पर यह आलेख। दक्षिण-पूर्व एशिया में जैव विविधता पर संकट के बादल ज्यादा हैं। यहाँ के देश आर्थिक रूप से भले ही पिछड़े हों परन्तु ये जैव विविधता में सम्पन्न है। वर्तमान में उपभोक्तावाद तथा विकास की अंधी दौड़ में यहाँ के देश भी शामिल होकर प्राकृतिक संसाधनों का अतिदोहन कर रहे हैं जिससे जैव विविधता घट रही है। सम्पूर्ण विश्व में जैव विविधता के जो 25 मुख्य स्थल (हॉट-स्पॉट) पहचाने गये हैं, उनमें से 06 दक्षिण-पूर्वी एशिया में है। यहाँ पर फैली जैव विविधता में नई-नई प्रजातियों के मिलने की सम्भावना काफी अधिक है। 1997 से 2014 के मध्य यहाँ 2216 नई प्रजातियों की खोज की गयी। पौधा तथा कशेरुकी (वर्टिबेट्स) की 20 प्रतिशत स्थानिक (एंडेमिक) प्रजातियाँ यहाँ रिकॉर्ड की गई है। इसी के साथ-साथ दुनिया का तीसरा बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षा वन (ट्रॉपिकल रेन-फाॅरेस्ट) का क्षेत्र भी यहाँ है। यहाँ के मेकांग क्षेत्र में प्रजातियों की विविधता अधिक है एवं जीवों की लगभग 100 नई प्रजातियाँ यहाँ प्रतिवर्ष खोजी जाती हैं।

यहाँ की जैव विविधता पर सबसे बड़ा खतरा वनों के विनाश से है। यहाँ किये गये कुछ अध्ययनों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में तो वन विनाश कम हुआ (लगभग 14.5 प्रतिशत) परन्तु आगामी 9-10 वर्षों में कई क्षेत्रों में शेष बचे 90 प्रतिशत वन समाप्त हो जाएँगे। सेटेलाइट से प्राप्त चित्रों के अनुसार फिलीपाइंस में लगभग 90 प्रतिशत वन समाप्त हो चुके हैं। इस वन विनाश से स्तनपायी जीव (मेमल्स) सर्वाधिक प्रभावित हो रहे हैं। कागज, रबर तथा पाॅम ऑयल उद्योग द्वारा यहाँ सर्वाधिक वन साफ किये जा रहे हैं। दुनिया की जरुरत का 86 प्रतिशत पाॅम-ऑयल तथा 87 प्रतिशत रबर यहीं से आता है। पाॅम-ऑयल के खाद्य तेल व बायोडीजल के सस्ते विकल्प के रूप में आने से यहाँ अधिक से अधिक पाॅम के पेड़ जंगल काटकर लगाये जा रहे हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार यहाँ के वनों में पाॅम वृक्षों को उगाने हेतु सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियाँ पाई जाती है। वर्ष 2024 तक पाॅम ऑयल उत्पादन का क्षेत्र 4.3 से 8.5 मिलियन हेक्टेयर तक होने की सम्भावना है। पाॅम-रोपण व उत्पादन से जुड़ी कई कृषि व्यापार की कम्पनियाँ लेटिन अमेरिका में 23 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले वर्षा वनों में पाॅम-रोपण का कार्य कर रही है। कुछ वर्ष पूर्व यहाँ के आकाश में जो काले बादल फैल गये थे। उसके कारण वनों को जलाने से निकला धुआँ था। ब्राजील भी अब सोयाबीन तथा गन्ने की खेती छोड़कर पाॅम-ऑयल उद्योग की ओर बढ़ रहा है, क्योंकि यह ज्यादा मुनाफा देता है। यहाँ की सरकार ने अमेजन के वर्षा वनों के क्षेत्र में पाॅम-ऑयल उत्पादन योजना को मंजूरी प्रदान कर दी है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ के वर्षा वन पृथ्वी पर जीवों के लिये आवश्यक प्राणवायु (आॅक्सीजन) का 40 प्रतिशत हिस्सा पैदा करते हैं। वन विनाश से बिगड़ते पर्यावरण को देखते हुए सरकारों ने पाॅम-ऑयल तथा रबर उत्पादन को पर्यावरण हितैषी बनाने हेतु कई नियम कानून व शर्तें उद्योगों पर लगायी परन्तु उनका खुले आम उल्लंघन हो रहा है।

वन विनाश के अलावा यहाँ अधिक संख्या में बने बाँध एवं बनने वाले बाँधों से भी जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव हो रहा है एवं यह आगे भी जारी रहेगा। मेकांग डेल्टा में 78 बाँध बनाने की योजना प्रस्तावित है। बाँधों के जलाशयों में पानी रुकने से प्रवासी मछलियों की संख्या 70 प्रतिशत तक घटने की सम्भावना बताई जा रही है। इस क्षेत्र में 65 मिलियन लोग मछली पालन के धंधे से जुड़े हैं।

पर्यावरण वैज्ञानिकों ने नम भूमियों (वेट लैण्ड्स) में सर्वाधिक जैव विविधता का आकलन किया है, परन्तु इस क्षेत्र की नम भूमियों में भी वन विनाश, कृषि विस्तार एवं कुछ अन्य कारणों से 80 प्रतिशत समाप्त हो रही है। इनकी समाप्ति या कमी से लगभग 80 प्रतिशत प्रवासी पक्षियों पर संकट पैदा हो गया है।

खनन से जुड़े कई कार्य भी जैव विविधता पर असर डाल उसे कम कर रहे हैं, परन्तु इस ओर अभी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। आठ लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में चूने पत्थर की खदानें यहाँ फैली है, जिसका उत्खनन सीमेंट निर्माण हेतु बेधड़क किया जा रहा है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि चूने की अधिकता को सहन कर जीवित रहने वाली कई पादप प्रजातियाँ यहाँ हो सकती है जिनके सम्बन्ध में अभी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

अवैधानिक शिकार एवं वन्य जीवों से प्राप्त कई प्रकार की वस्तुओं का अवैध व्यापार या तस्करी भी जैव विविधता को कम कर कई प्रजातियों को विलुप्ति की ओर बढ़ा रही है। वन्य जीव एवं उनसे प्राप्त वस्तुओं का व्यापार चौथा बड़ा व्यापार माना गया है। औषधि निर्माण, सजावटी कार्य तथा प्राणी संग्रहालय एवं मछली-घरों में रखने के लिये जीवों का अतिदोहन एवं तस्करी इस हद तक की जा रही है कि विलुप्ति का खतरा पैदा हो गया है। कुछ वर्षों पूर्व अफ्रीका के देश केमरुन में 200 हाथियों को इसलिए मार दिया गया था कि हाथी के दाँत को बेचकर वहाँ की सरकार को हथियार खरीदना था।

कई कारणों से हो रहा वन विनाश, बाँधों की बढ़ती संख्या, नम-भूमियों में कमी, अनियंत्रित खनिज कार्य एवं वन्य जीवों तथा उनसे प्राप्त सामान की तस्कारी आदि ऐसे कारण हैं जो यहाँ की जैव विविधता पर इतना संकट पैदा कर रहे हैं कि कई जीवों की भविष्य में विलुप्ति निश्चित है। दुनिया के विकसित देशों को पेट्रोल के बाद अब जैव विविधता हरे-सोने (ग्रीन गोल्ड) के रूप में दिखायी दे रही है। अतः वे विकासशील देशों को कई लोभ एवं लालच देकर अतिदोहन हेतु प्रयासरत है। दक्षिण-पूर्वी एशिया के देश भी इसी जंजाल में फँसे हैं।

श्री ऐलिस कैथरीन ह्यूज चीनी अकादमी विज्ञान, भूगोलीय और संरक्षण, के लैण्ड्स्केप में सहायक प्रोफेसर हैं।

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