उदारीकरण में उदारता किसके लिये

Submitted by Hindi on Mon, 04/17/2017 - 11:30
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जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

जनता के बीच काम कर रहे संगठनों की जिम्मेदारी इसलिये और बढ़ जाती है, क्योंकि कई जनसंगठन अपने मूल तेवर को दरकिनार कर ऐसी लड़ाइयों को अपना धंधा बनाकर धन उगाहने में जुटे हुए हैं। यह काम बहुत बड़ी जिम्मेदारी का है। इसलिये जो संगठन लोकतांत्रिक मूल्य के साथ जनता के लिये लड़ता है, उसे अपने कन्धों पर यह भार लेना ही होगा। सम्भव है कि किसानों के उगते हुए ये विद्रोह पूरी तरह से पककर समाज में चल रहे और समूहों के संघर्षों को बल देंगे।

नई आर्थिक और नई उदारीकरण नीति 1991 के लागू करते हुए पीवी नरसिम्हा राव ने कहा था, ‘‘सरकार की नीतियों का कोई बाहर कितना भी विरोध कर ले, लेकिन वे सरकारी मंचों पर इसका विरोध नहीं कर सकते हैं।’’ हाल ही में वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी जनता को यह सलाह दे डाली कि वे कठिनाइयों के साथ जीने की आदत डाल लें। हकीकत भी यही है कि सरकार की नीतियों का विरोध करने के नाम पर सरकार के साथ की वामपंथी पार्टियाँ भी अपना सरकारी चरित्र जाहिर कर चुकी हैं। वे भी विरोध का स्वांग रचती रहती हैं। सरकार को जो नीतियाँ या कानून लागू करने होते हैं, वे स्पष्ट तौर पर उसे उसी अन्दाज में लागू कर रही हैं, जैसा वे चाहती हैं। यहाँ मैं किसानों के साथ बढ़ रहे जुल्म के सन्दर्भ में बात करना चाहता हूँ। पिछले 15 साल में अनाज पैदा करने वाले वर्ग की दुर्गति बहुत अधिक हो चुकी है। पूरे देश में किसानों के साथ सरकारी हुक्मरानों का अन्याय बढ़ता ही जा रहा है। हुक्मरान अब सब्सिडी कम और डंडे ज्यादा बरसा रहे हैं।

पिछले साल ‘स्पेशल इकोनॉमिक जोन एक्ट-2005’ नामक एक खतरनाक अधिनियम को भारत सरकार ने मंजूरी दे दी। इस अधिनियम के अन्तर्गत किसानों की जमीन पर जबरन अधिकार जमाकर वहाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और विदेशी कम्पनियों को उद्योग लगाकर मुनाफा कमाने की खुली छूट धड़ल्ले से दी जा रही है। इन नीतियों के फलस्वरूप विरोध के स्वर कहीं फूटते हैं तो साथ ही उसे कुचलने के प्रयास भी दिखाई पड़ रहे हैं। किसानों के इस असन्तोष को लेकर विरोध के तेवर अलग-अलग तरीके से सामने आ रहे हैं। कहीं वे तीखे हैं तो कहीं वे खुद को मिटा लेने की हद तक भी पहुँच चुके हैं। सवाल यह है कि इन विद्रोहों को सही दिशा में गोलबन्द करने की मुहिम की रफ्तार जितनी होनी चाहिए, वह नहीं है। बहुत सारे संगठन, जो किसी फंडिंग एजेंसी से चालित हैं, वे भी इन विरोधों में स्वर मिलाकर अपना कुछ साध लेना चाहते हैं। सही और गलत का फर्क करते-करते ये भोले किसान थक चुके हैं। किसानों की लड़ाई का सपना, उन्हें गोलबन्द करके लड़ाई को छेड़ने का सपना, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का सपना आज भी अधूरा है।

यह लड़ाई कई स्तरों पर जारी है, परन्तु इसे दिशा देने के लिये कौन आगे आएगा, इन सवालों पर गम्भीरता से पूरे समाज को सोचना होगा। हाल के वर्षों में किसानों की समस्या पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीकों से विरोध के स्वर उभरे हैं। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें होने के बावजूद तमाम राज्यों की सरकारों के चरित्र में समानता साफ दिखती है। सभी सरकारें शोषण का ही साम्राज्य चलाती नजर आती हैं।

घड़साना, राजस्थान में पानी की माँग को लेकर आन्दोलित किसानों को सबक सिखाने के लिये छह लोगों की हत्या राज्य पुलिस द्वारा कर दी गई। वहाँ कई दिनों तक राज्य सरकार ने कर्फ्यू लगाए रखा है। चंदूराम की पुलिस द्वारा पिटाई से हालत इतनी खराब हो गई और अन्ततः उसकी मौत हो गई। उसको मरे हुए कई दिन हो गए हैं। परिजनों ने चंदूराम के अन्तिम संस्कार के बदले मुआवजे के रूप में उसके परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी और कुछ रुपयों की माँग राज्य सरकार से की है। सरकार ने चंदूराम के बदले कुछ न देने की जिद का रुख अपनाया हुआ है। राज्य सरकार अपने इस फासीवादी रवैए से किसानों और राज्य के लोगों के बीच भय का माहौल तैयार करना चाहती है। चंदूराम सहित घड़साना के किसान सड़कों पर इसलिये उतर आये थे, क्योंकि वे राज्य सरकार से अपने खेतों में अनाज पैदा करने के लिये पानी चाहते थे। इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना-प्रथम चरण से किसान अपने खेतों में जरूरत लायक पानी छोड़ने की माँग कर रहे थे। जब इस नहर का निर्माण हुआ था, तब इसके उद्देश्य के रूप में यह बताया गया था कि इससे उनके खेतों के लिये पानी मिलेगा।

दरअसल राज्य सरकार, राज्य में सूखे से निपटने के लिये पानी की व्यवस्था नहरों, नदियों से नहीं, बल्कि पूजा-पाठ से हल करने की शिक्षा देती है। मालूम हो, 2004 में बारिश कराने के लिये राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने राजकीय स्तर पर तंत्र का बड़े पैमाने पर सहारा लिया था। राजस्थान में बारिश कराने के लिये विभिन्न सम्प्रदायों के धार्मिक स्थलों में धार्मिक अनुष्ठान कराने गए थे। वसुंधरा राजे ने इस मुहिम में अजमेर के सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह, अजमेर के ही एक चर्च, श्रीगंगानगर के एक गुरुद्वारे और जयपुर के झूलेलाल मन्दिर को शामिल किया गया था। बाकायदा इन धार्मिक अनुष्ठानों में राज्य सरकार के मंत्रियों की ड्यूटी लगाई गई थी। ऐसी घटना को इस साल आन्ध्र प्रदेश राज्य सरकार द्वारा भी अंजाम दिया गया।

सरकारी खजाने से 12 करोड़ रुपए खर्च किये गए। वास्तविक स्थिति यह है कि केन्द्र सरकार और राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारियों से हाथ खींच लेना चाहती हैं। वे किसानों को मिल रही सारी सब्सिडियों को धीरे-धीरे समाप्त करा देने की ओर अग्रसर हैं। इससे किसानों का संकट बढ़ रहा है। अपने संकट के हल के लिये जब वे सड़कों पर उतरते हैं तो सरकारें इसे कानून-व्यवस्था का संकट बताकर आन्दोलनों को कुचलना अपना कर्तव्य मानती हैं।

महाराष्ट्र के रायगढ़ व पश्चिम बंगाल के 24 परगना, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों में स्पेशल इकोनॉमिक जोन एक्ट-2005 के तहत किसानों की जमीन पर जबरन अधिकार जमा लिया गया है। इन नीतियों का यहाँ के किसान लम्बे समय से विरोध कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में वामपंथी सरकार ने इंडोनेशिया के सलेम ग्रुप को इस सम्बन्ध में अपने ही नियमों के विरुद्ध जाते हुए कृषि योग्य जमीन का काफी बड़ा हिस्सा ‘सेज’ के अन्तर्गत उद्योग लगाने के लिये दे दिया है। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में 45 गाँवों की भी 10 हजार हेक्टेयर कृषि योग्य जमीन रिलायंस ग्रुप को दे दी गई है। इन राज्य सरकारों का कहना है कि इस प्रकार ज्यादा-से-ज्यादा सेज का निर्माण कर विदेशी पूँजी व देसी पूँजी को बढ़ावा मिलेगा। इससे रोजगार का बड़ी मात्रा में सृजन होगा।

पर वास्तव में सेज के अन्तर्गत मिलने वाला रोजगार ठेकेदारी के अनुरूप है। इसका तात्पर्य यह है कि बहुत कम कीमत पर लोगों को अस्थायी काम इसके जरिए मिलने वाला है। इस बारे में साफ तौर पर यह कहा जा सकता है कि रोजगार सृजन की बात मात्रा ढकोसला है। हकीकत तो यह है कि कृषि योग्य भूमि पर उद्योगों को लगाने के लिये भारी संख्या में किसानों को विस्थापित किया जा रहा है। यदि जरूरी हो तो विस्थापित किया जा सकता है, लेकिन इसके लिये शर्त यह होती है कि विस्थापित आबादी के लिये पहली स्थिति से बेहतर स्थिति की व्यवस्था सरकार करे, लेकिन सरकारें भी मानती हैं कि विस्थापितों का पुनर्वास कराना बहुत ही कठिन कार्य होता है। फिर विस्थापितों को उनको पहले जैसा हैबीटाट प्रदान कराना तो इस व्यवस्था के पैरोकारों की इच्छाशक्ति के दायरे से बाहर है।

किसान पुत्र कहलाने वाले मुलायम सिंह यादव की सरकार ने किसानों को सूखा राहत के नाम पर तीन रुपए, दस रुपये और छब्बीस रुपए के चेक बाँटे हैं। किसान पुत्र अपने को कहने वाले मुख्यमंत्री का चरित्र जब ऐसा है तो मर्सिडीज बेंज (कीमत 40 लाख रुपए मात्रा) का ऑर्डर देने वाली राजस्थान सरकार अगर अपनी पृष्ठभूमि देखने की बात जब मीडियाकर्मियों से कहती है तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

किसानों की अपनी इस हालत से वे इतने हतोत्साहित हो चुके हैं कि रोज कहीं-न-कहीं से दो-चार किसानों की आत्महत्या की खबरें आ रही हैं। किसान आत्महत्या पर इसलिये उतारू हैं, क्योंकि उनका इस व्यवस्था से भरोसा उठ चुका है। राज्य की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की कार्यवाहियाँ उनके पक्ष में नहीं होती हैं। दुखद तो यह है कि उनके बीच कोई ऐसा संगठन बड़े पैमाने पर काम नहीं कर रहा है, जो साथ मिलकर लड़ने का भरोसा किसानों में पैदा कर सके।

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के साथ काफी समय ‘हल्ला बोल’ का नारा लगाने वाले राज बब्बर उनसे कुछ मतभेद पैदा होने पर अब अपना मोर्चा बनाकर उनके खिलाफ नारे लगा रहे हैं। राज बब्बर का साथ दे रहे पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने दिल्ली में कुछ माह पूर्व एक व्याख्यान समारोह में कहा था, ‘वे गेहूँ, प्याज के समर्थन मूल्य के मामले पर अटल बिहारी वाजपेई को साथ लाएँगे और लड़ाई छेड़ेंगे।’ दिल्ली में ‘पीस’ संस्था द्वारा राजेन्द्र भवन में आयोजित ‘भारत में उदारीकरण नीति और किसानों की स्थिति’ विषय पर पी. साईनाथ को व्याख्यान देना था। इस कार्यक्रम में राजेन्द्र सारंगी, प्रो. मोहंती, वीपी सिंह आदि सभी बोलने के लिये आमंत्रित थे। सबों ने भारत में किसानों, आदिवासियों की समस्याओं पर गहरी चिन्ता व्यक्त की। ऐसी ही चिन्ता वीपी सिंह ने भी व्यक्त की। उन्होंने ऐसी गम्भीर परिस्थितियों के लिये देशव्यापी आन्दोलन चलाने की बात कही, परन्तु आन्दोलन में उन्होंने भाजपा जैसी कट्टरवादी पार्टी का साथ लेने की योजना भी बताई। इतिहास बताता है कि ऐसी धार्मिक कट्टरता की बात करने वाली पार्टी दुनिया में सब कुछ कर सकती है, लेकिन आन्दोलन कतई नहीं। आन्दोलन की पहली शर्त तो वैचारिक साफगोई का होना जरूरी है।

वैचारिक स्पष्टता का मतलब जाति, धर्म, सम्प्रदाय के भावों से ऊपर उठकर आम जन की लड़ाई में शामिल होना होता है। क्या वाजपेई जी और उनकी पार्टी भाजपा के किसान-प्रेम के बारे में वीपी सिंह नहीं जानते हैं? गौरतलब है कि भाजपा की अब तक की राजनीतिक गतिविधियों में मन्दिर, मस्जिद, जाति परिवर्तन, अगड़ा-पिछड़ा जैसे सवाल अहम रहे हैं। इस पार्टी ने रोजी-रोटी के सवाल पर कोई लड़ाई लड़ी हो, इसका इतिहास नहीं है। राजस्थान में भाजपा सरकार राज्य के अहम मुद्दों पर आन्दोलित किसानों पर कई बार लाठीचार्ज और गोलियाँ चला चुकी हैं। राज्य की पुलिस द्वारा हाल में घड़साना में छह किसानों की हत्या भाजपा सरकार के किसान-प्रेम का ताजा उदाहरण है।

किसानों पर बंगाल में वामपन्थी सरकार के विरोध में तृणमूल कांग्रेस सामने आई है। सच तो यह है कि इन सारी विरोध करने वाली पार्टियों और व्यक्तियों के विरोध के मकसद अपने हित में जनता की लड़ाई साधने के हैं। जनता के बीच काम कर रहे संगठनों की जिम्मेदारी इसलिये और बढ़ जाती है, क्योंकि कई जनसंगठन अपने मूल तेवर को दरकिनार कर ऐसी लड़ाइयों को अपना धंधा बनाकर धन उगाहने में जुटे हुए हैं। यह काम बहुत बड़ी जिम्मेदारी का है। इसलिये जो संगठन लोकतांत्रिक मूल्य के साथ जनता के लिये लड़ता है, उसे अपने कन्धों पर यह भार लेना ही होगा। सम्भव है कि किसानों के उगते हुए ये विद्रोह पूरी तरह से पककर समाज में चल रहे और समूहों के संघर्षों को बल देंगे।

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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