पर्यावरण आन्दोलन की हकीकत

Submitted by Hindi on Mon, 04/17/2017 - 12:52
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जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाला सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश अमेरिका अपनी सारी बेशर्मी की हदों को पार कर, गरीब मुल्कों को धमकियाँ देने लगता है। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने के लिये उन्हें जिम्मेदार ठहराने लगता है। परिणामस्वरूप कुछ लोग पर्यावरण बचाओ को अपना धन्धा बनाकर इन साम्राज्यवादी मुल्कों के जरिए धन उगाहने लगते हैं।

पिछले कुछ समय से पर्यावरण पर सत्ता से लेकर मीडिया संस्थानों द्वारा चिन्ता जाहिर की जा रही है। पर्यावरण बचाने की जद्दोजहद में सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थान लगे हुए हैं। आये दिन स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक ग्लोबल वार्मिंग और पानी के संकट को लेकर बहसें आयोजित हो रही हैं। इस कड़ी में पर्यावरण बचाने को लेकर वे भी दुनिया के सामने अपनी चिन्ता जाहिर कर रहे हैं, जो आसन्न स्थिति के लिये सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। हाल ही में आयोजित जी-8 की बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के सौजन्य से पर्यावरण संकट को मुख्य मुद्दा बनाया गया। ग्लोबल वार्मिंग संकट पर आयोजित बैठक में उपस्थित सभी प्रतिनिधियों ने चिन्ता जाहिर की। बुश के अचानक पनपे इस असहज प्रेम पर कुछ सवाल उठ खड़े हुए हैं। क्योटो प्रोटोकाल की शर्तों को धता बताने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति को क्या जरूरत आन पड़ी कि वे पर्यावरण के प्रति प्रेम दर्शाने लगे? जॉर्ज बुश के इस पर्यावरण प्रेम का आखिर राज क्या है? इन सवालों की पड़ताल हमें गम्भीरता से करनी होगी।

जब आप पर्यावरण के प्रति उनके प्रेम के कारणों में जाएँगे तो पाएँगे कि सत्ता ऐसे प्रपंच अपने अस्तित्व पर मौजूद खतरे को टालने के लिये करती है। यही सब कुछ जॉर्ज बुश के साथ हो रहा है।

जॉर्ज बुश की हालत पतली हो चुकी है। इराक में बुरी तरह फँस चुके जॉर्ज बुश की चारों ओर थू-थू हो रही है। उनकी स्थिति लगातार कमजोर हो रही है और उन्हें बाहर निकालने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। ऐसे में पर्यावरण जैसा लोकप्रिय मुद्दा उठाकर वे अपनी लचर स्थिति को ठीक करना चाहते हैं, लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि जॉर्ज बुश और अन्य तानाशाहों के पारिस्थितिकीय ‘चिन्तित’ होने से क्या हमारा पर्यावरण बेहतर हो पाएगा? दूसरा सवाल यह है कि क्या धरती के जीवन पर मँडरा रहे खतरे को साम्राज्यवादियों या अवसरवादियों के प्रयासों से टाल पाने में सफलता मिल पाएगी? यह हमारे मन का भ्रम मात्र ही है कि हम साम्राज्यवाद के पैरोकारों से उम्मीद करने लगते हैं कि वे मानव-सभ्यता से जुड़े गैर-मुनाफा वाले कामों में अपनी ऊर्जा सच्चे ढंग से लगाएँगे।

पूँजीवाद-साम्राज्यवाद का चरित्र ही ऐसा होता है कि अपने फायदे के लिये वह पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। उसके सन्तुलन को नष्ट करता है। पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका सहित अन्य साम्राज्यवादी देश ही पहुँचाते हैं। अमेरिका की मुख्य नदियों में मिसीसिपी-मिसौरी और इंग्लैंड की टेम्स नदियों के हश्र के बारे में कई रिपोर्टें प्रकाशन में अब तक आ चुकी हैं। पूँजीवादी व्यवस्था विशुद्ध मुनाफे पर आधारित व्यवस्था होती है। ज्यादा-से-ज्यादा मुनाफा किसी भी तरीके से कमाना इसका मूल मंत्र होता है। लालच इसके खून में है और प्रतियोगिता हर पूँजीपति को लगातार हर हाल में अधिकाधिक मुनाफा कूटने की ओर धकेलती है। मुनाफे की लालसा के कारण हर पूँजीपति और पूँजीवादी देश धरती की प्राकृतिक सम्पदा की लूट में लगा रहता है।

जैविक और गैर-जैविक, दोनों प्रकार की सम्पदा की अन्धाधुन्ध लूट का सिलसिला जारी रहता है। इस लूट में परिणाम की कोई चिन्ता नहीं की जाती है। तात्कालिक मुनाफा बाकी सारी चीजों पर हावी हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि बहुत सारे पेड़-पौधे, जीव-जन्तु तो इसके अन्धाधुन्ध इस्तेमाल के कारण ही खत्म हो जाते हैं। उनकी प्रजातियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है या वे पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं। इससे पर्यावरण का सन्तुलन बिगड़ता है।

धरती के पर्यावरण का सन्तुलन तैयार होने में लाखों-करोड़ों साल लगे होंगे। किसी भी विक्षोभ को सन्तुलित करने में पुनः लाखों साल लग जाते हैं। ऐसे में पूँजीपति वर्ग की पर्यावरण के सन्तुलन को भंग करने वाली विशाल कार्यवाहियाँ प्रकृति के बिगड़े असन्तुलन को सन्तुलित नहीं कर पाती हैं।

यह सच है कि इंसान ने अपने पैदा होने के साथ ही इस सन्तुलन में विक्षोभ पैदा किया है। यह भी ठीक है कि जीव-जन्तु भी विक्षोभ पैदा करते रहते हैं। पहले के इंसानों द्वारा पैदा किया गया विक्षोभ इतना बड़ा नहीं होता था। वह अक्सर बहुत ही स्थानिक होता था। वह सारी धरती के पर्यावरण के लिये खतरा नहीं बनता था, लेकिन मुनाफाखोरी की व्यवस्था ने सब तहस-नहस करके रख दिया है। उसके द्वारा पर्यावरण में पैदा किया गया विक्षोभ इतना बड़ा और त्वरित है कि उसकी आसानी से भरपाई नहीं की जा सकती है। पर्यावरण के लिये काम कर रही संस्थाओं और उससे जुड़े लोगों की सबसे बड़ी सीमा ही यही है कि वे केवल परिणाम को देखते हैं, कारणों को नहीं। वे पर्यावरण के खतरों पर बात करते हुए यह कहते हैं कि यह सब कुछ औद्योगीकरण, इंसान के लालच, उसके अनियंत्रित उपभोग का नतीजा है। इस तरह से बात को प्रस्तुत करना दरअसल मसले को ढँकने जैसा है। यह सब कहकर असली बात कहने से बचा जाना है। इस तरह से बात करने से जो पर्यावरण को नष्ट करने के खेल में सबसे ज्यादा बड़ा खिलाड़ी है, वही इसे बचाने के अभियान का भी सबसे बड़ा हिमायती बन बैठता है।

पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाला सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश अमेरिका अपनी सारी बेशर्मी की हदों को पार कर, गरीब मुल्कों को धमकियाँ देने लगता है। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने के लिये उन्हें जिम्मेदार ठहराने लगता है। परिणामस्वरूप कुछ लोग पर्यावरण बचाओ को अपना धन्धा बनाकर इन साम्राज्यवादी मुल्कों के जरिए धन उगाहने लगते हैं। आम लोगों को पर्यावरण बचाने के इस खेल को समझना पड़ेगा अन्यथा नारों की आड़ में वे हमेशा की तरह ठगे जाएँगे। हकीकत तो यही है कि आज तक पर्यावरण के असन्तुलन का सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों को ही झेलना पड़ा है।

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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